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आज के अखबार : तहव्वुर के प्रत्यर्पण का श्रेय सरकार को देने की कोशिश में कांग्रेस का दावा नजरअंदाज

संजय कुमार सिंह

आज मेरे सभी अखबारों में 26/11 के साजिशकर्ता तहव्वुर हुसैन राणा के प्रत्यर्पण और उसके दिल्ली पहुंचने की खबर लीड है। ऐसा बहुत कम होता है कि आठो अखबारों की लीड एक ही हो। आज ऐसा है तो उसी की चर्चा की जाये। इस खबर का शीर्षक और प्रस्तुति ऐसी है कि प्रत्यर्पण का श्रेय मौजूदा सरकार को मिलेगा और इसके लिए अखबारों ने जो प्रतिभा प्रदर्शन किया है उसपर आने से पहले यह बताना जरूरी है कि कांग्रेस ने इसके श्रेय का दावा किया है और ‘क्वाइट डिपलोमैसी’ की प्रशंसा की है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, इसे नरेन्द्र मोदी सरकार की उपलब्धि के रूप में पेश करने की भाजपा की कोशिश की उम्मीद में कांग्रेस ने यह दावा किया है। अखबारों से लगता है कि भाजपा ने श्रेय लेने की कोशिश की हो या नहीं, अखबारों ने तो दे ही दिया है। इसका पहला सबूत यही है कि कांग्रेस के इस दावे को अखबारों में मुख्य खबर के साथ जगह नहीं दी गई है। दूसरी ओर, इंडियन एक्सप्रेस में सिंगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, उन वकीलों से मिलिये जिनका चुनाव राणा के खिलाफ कार्रवाई के लिए किया गया है। अखबार ने दोनों वकीलों की फोटो भी छापी है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया है कि एनआईए टीम का नेतृत्व निर्भया मामले में सरकारी वकील नियुक्त किये गये वरिष्ठ अधिवक्ता दयान कृष्णन करेंगे। हिन्दस्तान टाइम्स ने मामले के जानकार अधिकारियों के हवाले से इस प्रमुख प्रत्यर्पण के पीछे के बहुआयामी प्रयास शीर्षक से (सिंगल कॉलम) की खबर छापी है। हिन्दुस्तान टाइम्स में एक और बड़ी घोषणा है, राणा पर राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने, हत्या और आतंकवाद का मुकदमा चलेगाअमर उजाला ने प्रत्यर्पण के मायने बताये हैं और शीर्षक है, पाकिस्तान की साजिश को उजागर करने में मिलेगी और अधिक मदद। तस्वीरों से नहीं लग रहा है कि तहव्वुर हुसैन राणा को बेड़ियों में भेजा गया है लेकिन अमेरिका ने इसे न्याय की दिशा में अहम कदम कहा है। अमर उजाला के अनुसार, पाकिस्तान ने पल्ला झाड़ लिया है और कहा है कि राणा – कनाडा का नागरिक है।

आप जानते हैं कि तहव्वुर हुसैन राणा पर 16 साल से ज्यादा पुराने 2008 के मुंबई हमलों की साजिश रचने का आरोप है। उसे अब प्रत्यर्पित किया गया है तो नवोदय टाइम्स का एक शीर्षक है, पूछताछ में पाकिस्तान की पोल खोलेगा राणा। अमर उजाला ने लिखा है, 1990 के दशक के अंत में कनाडा जाने से पहले पाकिस्तानी सेना में काम किया था। इंडियन एक्सप्रेस ने उम्मीद जताई है कि प्रत्यर्पण से इस आतंकी हमले के पीछे की साजिश का पर्दाफाश होगा। कुल मिलाकर, अखबारों की खबरों से लगता है कि राणा को भारत सरकार के भारी प्रयासों से दिल्ली लाया गया है और इससे उसे उसके किये की सजा मिलेगी जबकि कुछ अखबारों को पाकिस्तान की पोल खुलने और इसमें पाकिस्तान के शामिल होने की उम्मीद और उसका खुलासा होने की संभावना भी नजर आ रही है। इतने भर में कुछ बुराई नहीं है और खबर तो खबर है लेकिन सवाल यह भी है कि सरकार अगर 16 साल पुराने मामले में इतनी सक्रिय है तो 2019 के पुलवामा मामले में क्या कर रही है या सरकार के साथ मीडिया भी क्यों चुप्पी साधे हुए है। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, तहव्वुर राणा को 26/11 के लिए कानून से सामना करने के लिए भारत लाया गया। द हिन्दू का शीर्षक है, “राणा को प्रत्यर्पित किया गया; एनआईए ने गिरफ्तार किया”। इंडियन एक्सप्रेस का फ्लैग शीर्षक है, “लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अमेरिका से प्रत्यर्पित”। मुख्य शीर्षक है, “भारत का 16 साल का इंतजार पूरा हुआ:26/11 का साजिशकर्ता तहव्वुर रहमान दिल्ली लाया गया, ट्रायल का सामना करेगा”।  दि एशियन एज का शीर्षक है, 26/11 का साजिशकर्ता राणा दिल्ली पहुंचा, एनआईए कोर्ट से 20 दिन का रिमांड मांगा। द टेलीग्राफ का फ्लैग शीर्षक है, आतंकी हमले की जांच में पाकिस्तान की भूमिका पर तेज रोशनी। मुख्य शीर्षक है, 26/11 के साजिशकर्ता राणा को दिल्ली लाया गया, 17 साल बाद। और ऐसे में सबसे अलग शीर्षक है टाइम्स ऑफ इंडिया का, पहुंचते ही राणा को गिरफ्तार किया गया, एनआईए के समक्ष पेश हुआ। इंट्रो है, 20 – दिन का रिमांड मांगा गया, जज ने फैसला सुरक्षित रखा। हिन्दी अखबारों में नवोदय टाइम्स का शीर्षक भी अलग है, भारत की धरती पर सजा पायेगा 26/11 का आरोपी तहव्वुर। उपशीर्षक है, विशेष विमान से अमरीका से दिल्ली लेकर आई एनआईए, एनएसजी की टीम। यहां मुझे मेहुल चोकसी के लिए विमान भेजने की याद आई पर उसे अभी तक वापस नहीं लाया जा सका है। पुलवामा की तो चर्चा भी नहीं है जबकि यह भी आतंकी घटना ही है। अमर उजाला का शीर्षक है, आतंकी तहव्वुर अब कानून के शिकंजे में। दि एशियन एज ने इसे भाजपा, कांग्रस में आरोप प्रत्यारोप के रूप में छापा है। सीर्षक है, राणा की वापसी पर भाजपा, कांग्रस में आरोप प्रत्यारोप । 

कहने की जरूरत नहीं है कि अखबारों के ज्यादातर शीर्षक सूचना से ज्यादा श्रेय देते लग रहे हैं और 16 साल पुराने मामले के अभियुक्त के प्रत्यर्पण पर जो खुशी दिख रही है वह खुशी या उसके लिए उत्सुकता अथवा चिन्ता 2019 के पुलवामा हमले के साजिशकर्ता के लिए नहीं है। दूसरी ओर, कांग्रेस का दावा मेरे अखबारों में किसी में मूल खबर के साथ नहीं है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने एक बयान में कहा है, “यह प्रत्यर्पण डेढ़ दशक के कठिन कूटनीतिक, कानूनी और खुफिया प्रयासों का परिणाम है। यूपीए सरकार ने संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ निकट समन्वय में इसकी शुरुआत की थी। इसका नेतृत्व किया और बनाए रखा।” इस संबंध में 2014 से पहले किए गए काम का ब्यौरा देते हुए चिदंबरम ने कहा: “तथ्य स्पष्ट होने दें: मोदी सरकार ने इस प्रक्रिया की शुरुआत नहीं की, न ही उसने कोई नई सफलता हासिल की है। ​​इसे यूपीए के तहत शुरू की गई परिपक्व, सुसंगत और रणनीतिक कूटनीति से लाभ हुआ है। “यह प्रत्यर्पण किसी दिखावे का नतीजा नहीं है, यह इस बात का प्रमाण है कि जब कूटनीति, कानून प्रवर्तन और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग ईमानदारी से तथा छाती ठोकने जैसी किसी हरकत के बिना किया जाता है तो भारतीय राज्य क्या हासिल कर सकता है।” चिदंबरम ने जोर देकर कहा, “शांत, दृढ़ कानूनी कूटनीति” के तहत ये पहले से चल रहे संस्थागत प्रयास थे, जिन्होंने 2014 में भारत में सरकार बदलने के बाद भी मामले को जीवित रखा। मोदी सरकार के तहत इस मामले में हुई प्रगति को चिह्नित करते हुए चिदंबरम ने कहा: “ये ‘मजबूत नेता’ साबित करने के क्षण नहीं हैं, बल्कि न्याय के धीमे पहिये हैं, जिन्हें वर्षों की कड़ी मेहनत से आगे बढ़ाया गया है।” पी चिदंबरम ने कहा कि एनडीए सरकार “अभी जो कुछ कर रही है उसका श्रेय ले सकती है। लेकिन उन्हें पिछली सरकार को भी श्रेय देना चाहिए जिसने बहुत कुछ किया है। भारत सरकार एक निरंतरता है।”

चिदंबरम ने इस मामले के महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला, जिसकी शुरुआत राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा नवंबर 2009 में अमेरिकी नागरिक डेविड कोलमैन हेडली, कनाडाई नागरिक राणा और साजिश में शामिल होने के आरोपी अन्य लोगों के खिलाफ दिल्ली में मामला दर्ज करने से हुई। चिदंबरम ने कहा, “उसी महीने, कनाडा के विदेश मंत्री ने भारतीय एजेंसियों के साथ सहयोग की पुष्टि की, जो यूपीए की प्रभावी विदेश नीति की बदौलत संभव हुआ। एफबीआई ने कोपेनहेगन में विफल लश्कर-ए-तैयबा की साजिश का समर्थन करने के लिए 2009 में शिकागो में राणा को गिरफ्तार किया था।” “भले ही जून 2011 में 26/11 हमले में प्रत्यक्ष संलिप्तता के आरोप में राणा को अमेरिकी अदालत ने बरी कर दिया था, लेकिन उसे आतंकवाद से संबंधित अन्य अपराधों का दोषी ठहराया गया और 14 साल जेल की सजा सुनाई गई। यूपीए सरकार ने उनके बरी होने पर सार्वजनिक रूप से निराशा व्यक्त की थी और कूटनीतिक दबाव को बनाए रखा।” तीन सदस्यीय एनआईए टीम ने पारस्परिक कानूनी सहायता संधि के तहत आपसी कानूनी सहयोग ढांचे के आधार पर अमेरिका में हेडली से पूछताछ की। “अमेरिकी सरकार ने भारत को महत्वपूर्ण साक्ष्य हस्तांतरित किए, जो दिसंबर 2011 में राणा सहित नौ आरोपियों के खिलाफ दायर एनआईए की चार्जशीट का हिस्सा बन गए। दिल्ली में विशेष एनआईए अदालत ने गैर-जमानती वारंट जारी किए, और फरार आरोपियों के लिए इंटरपोल रेड नोटिस सुरक्षित किए गए। यह कोई मीडिया स्टंट नहीं था, बल्कि शांत, दृढ़ कानूनी कूटनीति थी,” पूर्व गृह मंत्री ने कहा।

2012 में, यूपीए सरकार ने तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और अंडर सेक्रेटरी वेंडी शेरमेन के साथ हेडली और राणा के प्रत्यर्पण का मामला उठाया। “जनवरी 2013 तक, हेडली को 35 साल की सजा सुनाई गई, और राणा को भी अमेरिका में सजा सुनाई गई। चिदंबरम ने कहा कि भारत ने हेडली के प्रत्यर्पण की मांग को दृढ़ता से दोहराया, जबकि यूपीए सरकार ने सजा पर अपनी निराशा व्यक्त की। “यह इस बात का एक बेहतरीन उदाहरण है कि अंतरराष्ट्रीय न्याय के संवेदनशील मुद्दों को कूटनीति के माध्यम से कैसे देखा जाना चाहिए।” चिदंबरम ने राणा के प्रत्यर्पण का समर्थन करने के लिए जो बिडेन प्रशासन को धन्यवाद दिया, हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने फरवरी में वाशिंगटन में प्रधान मंत्री मोदी के साथ एक संयुक्त समाचार सम्मेलन में घोषणा की थी कि राणा को भारत को प्रत्यर्पित किया जाएगा। कांग्रेस नेता सुशील कुमार शिंदे ने कहा है, “बीजेपी सरकार भी तहव्वुर राणा को लंबे समय से भारत वापस लाने के लिए कोशिश कर रही थी। अब हम उसे वापस लाने में सफल हुए हैं। मुझे लगता है कि एनआईए अब पूरी तरह से जांच करेगी और न्याय देगी। इससे फर्क नहीं पड़ता कि पीएम मोदी या भारत सरकार, किसी भी तरह तहव्वुर को यहां लाया गया है।” कहने की जरूरत नहीं है कि आज जब अखबारों ने इस प्रत्यर्पण का श्रेय मौजूदा सरकार को दिया है तो मीडिया (और सरकार) को भी चाहिये कि वह देश को यह भी बताये कि मौजूदा सरकार ने पुलवामा मामले में क्या किया है और मौजूदा स्थिति क्या है। ठीक है कि मुंबई हमले में 16 साल लग गये तो पुलवामा में भी समय लगेगा पर तथ्य है कि पांच साल गुजर चुके हैं।

याद दिलाना जरूरी है कि नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के प्रचार तंत्र की शिकार कांग्रेस सरकार न सिर्फ हर संभव मौके पर प्रेस कांफ्रेंस करके और सवालों के जवाब देकर तथा आरटीआई कानून के जरिये अपना पक्ष बताती थी। इस सरकार के मुखिया ने दस साल में कोई प्रेस कांफ्रेंस तो नहीं ही की, पेशवर को इंटरव्यू नहीं ही दिया है मन की बात जैसा प्रचार सरकारी खर्च पर कर रहे हैं और फिर भी पुलवामा जैसे मामले मे क्या हुआ – कभी नहीं बताया। मीडिया ने तो नहीं ही पूछा क्योंकि उसे यह संदेश दे दिया गया है कि कैसे सवाल करने वालों को इंटरव्यू का मौका दिया जायेगा। यह सब अभी मेरी चिन्ता का विषय नहीं है पर तथ्य है कि सरकार को इस मौके पर कांग्रेस के दावों के संदर्भ में पुलवामा मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिये। मुझे उम्मीद नहीं है कि ऐसा हो पायेगा और मीडिया की इसमें कोई रुचि होगी हालांकि यह प्रचार जरूर किया जाता रहता है कि भाजपा राज में क्या नहीं होते हैं और विपक्ष की कमजोरी या हिन्दू विरोधी होने के कारण क्या सब होते रहे हैं। सरकार समर्थक भी वैसे ही हैं। वे आंख मूंदकर सरकारी प्रचार में यकीन करते हैं। यह अलग बात है कि पीड़ित भी वही हैं लेकिन उन्हें न पीएम केयर्स से मतलब है ना आरटीआई कानून को कमजोर किये जाने से। पीएम केयर्स धन बटोरने का एक नया, अनैतिक और अनूठा उदाहरण था जो कोविड के समय जनता की सहायता के लिए शुरू किया गया था। खबरों के अनुसार, स्थिति यह है कि उससे जो वेंटीलेटर खरीदे गये वे खराब निकले, काम नहीं आये और करोड़ों रुपये बचे रह गये। पीएम केयर्स हर तरह से सरकारी होने के बावजूद आरटीआई के तहत नहीं है और आज खबर है कि कानून में संशोधन से पारदर्शिता कम नहीं होगी।

सच्चाई तो यह है कि प्रधानमंत्री की डिग्री दिखाने के आरटीआई के आदेश को चुनौती दी गई है और विश्वविद्यालय की तरफ से सोलीसिटर जनरल वकालत करते हैं। इसमें ऐसा कुछ है नहीं जो समझ में न आये लेकिन इस मामले में फर्जी डिग्री मुद्दा ही नहीं है और ऐसे में आरटीआई में जो संशोधन किया जा रहा है वह पारदर्शिता बढ़ाने के लिए किया जा रहा होगा उसे मानना मजबूरी है क्योंकि बहुमत की सरकार यही कर रही है। निजी सूचना के नाम पर जो दावा शपथपूर्वक किया गया है उसकी पुष्टि करने की जरूरत नहीं समझना भी अगर चुनाव आयोग की स्वतंत्रता है तो इसी मामले में किसी और को गिरफ्तार कर लिया जाना कानून और सत्ता के दुरुपयोग का मामला है। इसके अलावा इस सरकार के कितने ही कानून आम आदमी की जिन्दगी में सीधे घुसपैठ करने वाले हैं और होटल में साथ ठहरने वाले का परिचय पत्र दिया जाना कानूनन जरूरी हो या नहीं व्यावहारिक तौर पर जरूरी कर ही दिया गया है। इससे ज्यादा निजी सूचना क्या होगी जो सार्वजनिक है पर डिग्री सार्वजनिक नहीं होगी जबकि उस जमाने में पास होने वाले सभी लोगों का नाम / रोल नंबर अखबारों में छपता था। डिग्री की गोपनीयता के  साथ फर्जी डिग्री वाले डॉक्टर की गिरफ्तारी का मामला भी जुड़ना चाहिये। अगर कोई व्यक्ति ऑपरेशन कर रहा था, खबरों और खुलासों के बावजूद कर पा रहा था और सात राज्यों में सक्रिय था तथा कुछ सफल ऑपरेशन भी किये हैं तो उसे गिरफ्तार क्यों किया गया। कम से कम उसकी डिग्री पर तो सवाल नहीं ही उठाना चाहिये लेकिन अखबारों की खबर यही है फर्जी डिग्री वाला डॉक्टर गिरफ्तार या इतने राज्यों में काम करता था। ऐसा नहीं है कि मीडिया सिर्फ बड़े मामलों में चुप्पी साध लेता है। सरकारी योजनाओं में घोटाले और भ्रष्टाचार की खबरों को भी अखबारों में प्रमुखता नहीं मिलती है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के दुरुपयोग की पोल खोलती है और इनकी व्यावहारिकता पर सवाल उठाती है। खबर के अनुसार, 45 हजार रुपये का सरकारी ईनाम पाने के लिए उत्तर प्रदेश की एक महिला को 25 बार प्रसव हुआ और 30 महीने में उसने पांच बार नसबंदी कराई। यह खुलासा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के रिकार्ड से हुआ है। दिलचस्प यह है कि 35 साल की इस महिला को पैसों की कोई जानकारी नहीं थी और घोटाले के लिए उसकी पहचान का दुरुपयोग किया गया है। अखबार ने इसमें अधिकारियों के शामिल होने की आशंका जताई है लेकिन यह मान भी लिया जाये कि महिला ने अकेले ही सब कर लिया (या कर पाई) और सारी कमाई उसी    ने खाई है तो भी क्या सिस्टम को ठीक करने की जरूरत नहीं है या सिस्टम 10 साल से ऐसा क्यों है कि इस तरह के घोटाले हो जाते हैं और मामला दूसरी बार नहीं, पांचवीं बार या 25वीं बार पकड़ा जाता है। कहने की जरूरत है कि ‘ना खाउंगा, ना खाने दूंगा’ के दावे के साथ शुरू की गई कई योजनाएं खाने और खाने देने के लिए ही बनाई गई लगती हैं और आयुष्मान योजना इसमें शामिल है। कई घोटालों की खबरों के बावजूद आज खबर है कि दिल्ली के मोहल्ला क्लिनिक को बंद करके आरोग्य मंदिर खोले जायेंगे। ऐसी प्रचार वाली खबरों के साथ आज और भी खबरें हैं जो लीड बन सकती थी और इसमें अमर उजाला की खबर खास है, उत्तर प्रदेश, बिहार व हरियाणा में बेमौसम की बारिश, आंधी और बिजली गिरने से 49 लोगों की जान गई। फिर भी ज्यादातर ने राणा के प्रत्यर्पण को लीड बनाया है तो उसका मकसद हिन्दू-मुसलमान की राजनीति को चलाते रहना भी है।

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