
संजय कुमार सिंह-
आज के अखबारों में भारत से संबंधित दुनिया भर की कई प्रमुख खबरों के साथ एक खबर यह भी है कि प्रधानमंत्री साइप्रस में सम्मान करवा रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर फोटो टॉप पर है। ठीक है कि तमाम काम करने और देखने के लिए दूसरे लोग हैं और बिना छुट्टी रोज 18 घंटे काम करने वाले प्रधानमंत्री अपना सम्मान करवा सकते हैं। लेकिन तथ्य यह भी है कि प्रधानमंत्री सर्वदलीय सभा में नहीं गये, बिहार में चुनाव प्रचार करने चले गये, पुलवामा के आतंकियों का पता नहीं चला लेकिन पहलगाम के आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन सिन्दूर चला जो युद्ध में बदल गया और अचानक बंद भी हो गया। हवाई दुर्घटना की खबरों में विमानन मंत्री ना के बराबर दिखे और भारत सरकार की एक जांच का नेतृत्व गृहसचिव करेंगे। खबरों के अनुसार यह जांच समिति एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर) बनाने पर ध्यान देगी और यह भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने तथा हैंडल करने के लिये होगी। यह सब विमान हादसे के बारे में केंद्रीय गृहमंत्री के इस एलान के बावजूद होगा, ‘ये एक्सीडेंट था… कोई रोक नहीं सकता’। जो भी हो, इससे और पहले के तमाम उदाहरणों से यह तो साफ ही है कि दो ही लोग देश चला रहे है और इसलिए चला पा रहे हैं कि चुनाव जीतते जा रहे हैं और शायद इसीलिये उनका सारा जोर चुनाव जीतने पर ही है वरना साइप्रस में प्रधानमंत्री के सम्मान से भारत जैसे देश या यहां के आम नागरिकों का क्या बनना-बिगड़ना या मिलना है। आज विमान हादसे से संबंधित कई खबरें हैं और प्रधानमंत्री के विदेश में होने की खबर भी है। आइये, आज बिन्दुवार खबरें ही देखें।
- इंडियन एक्सप्रेस में एक खास खबर है जो दूसरे अखबारों में नहीं है। खबर के अनुसार, वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्य सभा सदस्य कपिल सिबल ने कहा है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई शुरू करने के लिए कोई सबूत नहीं है। सिबल ने यह भी कहा है कि न्यायमूर्ति शेखर यादव के खिलाफ उनकी कथित सांप्रदायिक टिप्पणी के लिए महाभियोग की कार्रवाई के लिये विपक्ष के प्रस्ताव पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है जबकि उनके बयान सार्वजनिक और निर्विवाद हैं। उन्होंने कहा कि स्पष्ट रूप से सरकार जज को बचाना चाहती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ किसी कार्रवाई से पहले विपक्ष न्यायमूर्ति शेखर यादव के खिलाफ कार्रवाई पर जोर देगा। इस मामले में सिबल का कहना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इससे पहले के दो महाभियोग मामलों से वे करीबी से जुड़े रहे हैं। इसके बावजूद इस मामले में किसी और मीडिया संस्थान ने उनसे बात नहीं की और यह सब पाठकों को नहीं बताया है।
- इसके अलावा आज भाजपा नेता और गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रुपानी के अंतिम संस्कार की खबर है जिनका निधन विमान हादसे में हो गया था। खबरों में नहीं दिखा कि दिल्ली से या भाजपा केंद्रीय नेतृत्व से कोई इसमें शामिल होने गया है। शायद ऐसी खबरें हेडलाइन मैनेजमेंट में नहीं आती हैं।
- फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने पहलगाम हमले की निन्दा की। हिन्दुस्तान टाइम्स में साइप्रस की फोटो के नीचे खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में सेकेड लीड है। टीओआई ने लिखा है कि इसे ऐसे बर्बर हमले पर इसकी दुर्लभ टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत ने 1989 में स्थापित एजेंसी से भारत के खिलाफ पहलगाम समेत आतंकी गतिविधि का समर्थन करने के लिए पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई के लिए कहा है।
- आप जानते हैं कि भारत ने बहुपक्षीय संस्थानों से पाकिस्तान को मिलने वाली राशि आतंकवाद के वित्तपोषण और रक्षा क्षेत्र में इस्तेमाल किए जाने को लेकर चिंता जताते हुए एशियाई विकास बैंक (एडीबी) से पड़ोसी देश को दी जाने वाली किसी भी प्रकार की वित्तीय सहायता पर कड़ा विरोध जताया है।
- भारत के पूर्व एनएसए शिवशंकर मेनन ने बिजनेस टुडे से कहा है कि भारत का काम नहीं है कि वह आईएमएफ को पाकिस्तान को कर्ज देने से रोके। खबर के अनुसार, पाकिस्तान ने खुद को चीन और अमेरिका के लिए उपयोगी बना लिया है तथा दोनों के बीच की दुश्मनी ने असल में कुछ ढंग से पाकिस्तान के पक्ष में काम किया है।
- पाकिस्तान से आतंकवाद के मामले में नरेन्द्र मोदी का रुख मुंबई हमले के समय कुछ और था, पुलवामा के समय कुछ और तथा पहलगाम के समय बि्लकुल अलग। मुंबई हमले के बाद कसाब को जिन्दा गिरफ्तार किया जाना और उसके खिलाफ मुकदमा चलाकर उसे सजा दिया जाना उचित और सामान्य कार्रवाई थी जिससे पाकिस्तान की भागीदारी साबित हुई। दूसरी ओर, बिरयानी खिलाने का आरोप और कहानी गढ़ने वाले को चुनाव लड़ने के लिए टिकट बहुत कुछ कहता है जो मीडिया के लिए चर्चा का विषय नहीं है।
- दूसरी ओर पुलवामा के बाद पहलगाम के भी आतंकी नहीं पकड़े गये। ऑपरेशन सिन्दूर के नाम पर युद्ध चला और आईएमएफ तक से पाकिस्तान को कसने की कोशिश हुई लेकिन युद्ध अचानक बंद हो गया। पर बात यहीं नहीं रुकी।
- आज नवोदय टाइम्स में छपी खबर के अनुसार मोदी बोले, यह युद्ध का युग नहीं है। जाहिर है, पाकिस्तान से युद्ध छेड़ चुके प्रधान के हवाले से यह शीर्षक चौंकाता है। खबर के अनुसार, उन्होंने और साइप्रस के राष्ट्रपति ने पश्चिम एशिया और यूरोप में चल रहे संघर्षों पर चिन्ता जताई। दोनों का मानना है कि यह युद्ध का युग नहीं है।
- प्रधानमंत्री की मौजूदगी के लिहाज से महत्वपूर्ण आज की दूसरी खबर है, 22 हजार फीट की उंचाई पर एअर इंडिया के विमान में आई गड़बड़ी, हांग कांग लौटा (अमर उजाला)। उपशीर्षक है, दिल्ली आ रहा था ड्रीमलाइनर विमान …36 घंटों में चार विमानों में आपात स्थिति। लखनऊ में पहियों से निकला धुआँ, हज यात्री थे सवार। अहमदाबाद में हाल में दुर्घटनाग्रस्त विमान यही था और इसे अब तक सुरक्षित माना जाता रहा है और उसी विमान के साथ 36 घंटे में चार में आपात स्थिति हो तो मामला सरल नहीं है।
- वह भी तब जब ड्रीमलाइनर विमान पर एक आलेख चर्चा में है और अभी तक 24.5 बार साझा किया जा चुका है। इसके अनुसार ड्रीमलाइनर के खतरनाक होने की बात 15 साल से चल रही है और इसके साथ यह भी कि ये सबसे सुरक्षित माने जाते हैं। इसका जवाब यह है कि विमान की खराबी ऐसी है कि क्रैश के रूप में सामने आने में 10 से 12 साल लगेंगे। कहने की जरूरत नहीं है कि मामला पर्याप्त गंभीर है और भारत में इसकी चर्चा भी नहीं और कार्रवाई के नाम पर यह नहीं हो सकता है कि ड्रीमलाइनर का उड़ान प्रतिबंधित कर दिया जाये। इस संबंध में निर्णय कौन करेगा, कैसे करेगा जब ज्यादातर निर्णय दो ही लोग लेते हैं।
- द टेलीग्राफ ने अपनी खबर में लिखा है हांगकांग से दिल्ली आ रहे ड्रीमलाइनर में खराबी का पता तब चला है जब दुर्घटना के बाद भारत के डीजीसीए ने एअर इंडिया से कहा था कि वह अपने सभी 33 ड्रीमलाइनर विमानों की सुरक्षा जांच करे। अखबार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि हांगकांग दिल्ली उड़ान के लिए विमान की सभी जरूरी तकनीकी और सुरक्षा जांच की गई थी। द टेलीग्राफ ने ही खबर दी है कि उत्तराखंड में दुर्घटनाग्रस्त हेलीकॉप्टर सेवा कंपनी ने निर्धारित समय से एक घंटे पहले परिचालन शुरू कर दिया था। इसका मकसद ज्यादा फेरे लगाना और ज्यादा पैसे कमाना था। इसमें ना अधिकारियों का डर था और ना नियमों के पालन की इच्छाशक्ति। लेकिन दोषी तो वो अधिकारी भी हैं जिन्हें सुनिश्चित करना था कि दुर्घटना न हो और मंत्री जी कह चुके हैं कि कोई रोक नहीं सकता। क्या यह मुद्दा मीडिया में चर्चा के लिए उपयुक्त नहीं है? क्या ऐसी कोई चर्चा इस अघोषित इमरजेंसी में होगी?
- आज की एक और महत्वपूर्ण खबर द हिन्दू में लीड है। वैसे तो यह सरकार और उसके काम का प्रचार ही है लेकिन (प्रवासी) नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण है। खबर के अनुसार, भारत इरान और इजराइल में अपने नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा रहा है। यह विडंबना ही है कि यह युद्ध का युग नहीं है के बावजूद जम्मू में लोग मारे गये, नुकसान सहा और प्रधानमंत्री ने उनका जख्म भी नहीं सहलाया। पहलगाम में जितने मरे, लगभग उतने ही या उससे ज्यादा ऑपरेशन सिन्दूर या युद्ध में मर गये पर नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का काम (या प्रचार) इरान और ईजराइल में हो रहा है।
हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने से विमान दुर्घटना की खबर बहुत पहले ही गायब हो गई थी और जमीन पर जो सब हुआ उसकी रिपोर्टिंग कायदे से नहीं हुई। स्थानीय प्रशासन ने प्रेस कांफ्रेंस करके सारी जानकारी देने की जरूरत नहीं समझी। इसकी खबर भी नहीं हुई भले इसका कारण डबल इंजन वाला राज्य होना हो। इसी तरह, उत्तराखंड के हेलीकॉप्टर दुर्घटना की जो खबर टेलीग्राफ में है वह उत्तर प्रदेश के लोकप्रिय अखबार, अमर उजाला में नहीं है। ऐसे में आज एक खबर यह भी है कि दुर्घटनाग्रस्त विमान का कॉकपिट वॉयस रिकार्डर दुर्घटना स्थल पर मिल गया है।
मैं लिख चुका हूं कि ब्लैक बॉक्स मिलने से पहले विमान दुर्घटना के बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी है और मीडिया जब तमाम खबरें नहीं छाप रहा है तो तरह-तरह की चर्चा चल रही है। यह हर तरह से नुकसानदेह है। सरकार की चिन्ता अपने खिलाफ खबरों तक ही रही है और बाकी मामलों में किसी कार्रवाई की सूचना नहीं होती है। जहां तक सरकार के काम की बात है उसकी पहली चिन्ता सही सूचना देने की होनी चाहिये और विमान दुर्घटना के मामले में कार्रवाई कैसे हुई राम जानें पर ब्लैक बॉक्स और अब कॉकपिट वॉयस डाटा रिकार्डर मिलने में इतना समय लगा जबकि आबादी के बीच होने के कारण इसमें समय नहीं लगना चाहिये था और प्रमुखता के लिहाज से सबसे पहले तलाशा जाना चाहिये था। अखबारों की खबरों के जरिये सूचनाएं चाहे जो छिपाई जाती हों – यह साफ हो गया है कि न तो सरकार और ना उसपर नजर रखने वाला मीडिया अपना काम ढंग से कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के काम की बात करें तो जज के रिटायर होने पर विदाई समारोह नहीं होना बड़ी बात है और यह चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस के बाद है। फिर भी सरकार को अपनी छवि की चिन्ता नहीं है और वह चुनाव जीतती जा रही है तो लेवल प्लेइंग फील्ड मुद्दा हो सकता है लेकिन उसकी भी चिन्ता नहीं है। दूसरी ओर एक अयोग्य और अनुपयुक्त व्यक्ति को प्रचार और पैसे के दम पर महामानव बनाने की कोशिशें चल रही हैं। देशभक्ति का दावा ऊपर से।



