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साहित्य

तमिल लेखकों पर हमलों के पीछे कौन?

अभिव्यक्ति की आज़ादी की लड़ाई में सरकार से किसी भी रूप में जुड़े लोगों की आक्रामक भूमिका की बात छोड़ दी जाए तो पेरुमल मुरुगन और पुलियुर मुरुगेसन जैसे तमिल लेखकों पर हुए हालिया हमलों में कोई नई बात नहीं दिखती है.

अभिव्यक्ति की आज़ादी की लड़ाई में सरकार से किसी भी रूप में जुड़े लोगों की आक्रामक भूमिका की बात छोड़ दी जाए तो पेरुमल मुरुगन और पुलियुर मुरुगेसन जैसे तमिल लेखकों पर हुए हालिया हमलों में कोई नई बात नहीं दिखती है.

अपनी क़िताब ‘ वन पार्ट वुमन’ या ‘माधुरोबागान’ के ख़िलाफ़ ऐसे ही लोगों के दबाव में स्थानीय पुलिस के झुक जाने के बाद मुरुगन ने लेखक के रूप में अपनी मृत्यु का एलान कर बहुत से लोगों को हैरान कर दिया था.

इन घटनाओं ने उन्हें एकाकी बना दिया. हालांकि एक मानवाधिकार संगठन के हाईकोर्ट में जाने के बाद उन्हें कॉलेज प्रवक्ता के रूप में नमक्कल से चेन्नई ट्रांसफ़र मिल गया है.

पुलियुर मुरुगेसन को एक स्थानीय अदालत ने अग्रिम ज़मानत दे दी है. लेकिन उन्हें 289 किलोमीटर दूर तूतीकोरिन अदालत में पेश होने को कहा गया है. इन लेखकों के अनुभव, पिछले कुछ सालों में मा मू कन्नन और दुरई गुना के कड़वे अनुभवों से अलग नहीं हैं. दोनों ही अपने समाज से बाहर कर दिए गए. मुरुगन और मुरुगेसन से अलग, दोनों ही समाज के वंचित तबके का प्रतिनिधित्व करते हैं और व्यावहारिक रूप से पुड्डुकोट्टई में ‘निर्वासन’ में हैं.

हालांकि, मुरुगन और मुरुगेसन, आर्थिक रूप से मजबूत और दबदबे वाली जाति गाउंदर के गुस्से का सामना कर रहे हैं. कोंगावेल्लावार कम्युनिटी ट्रस्ट के अध्यक्ष अमैय्यपन ने बीबीसी को बताया, “उन्होंने (मुरुगेसन ने) जो कुछ लिखा है, मैं उसे शब्दों में भी नहीं बता सकता. उन्होंने हमारी जाति या गोत्र के 1700 परिवारों के लोगों की ज़िंदगी बर्बाद कर दी है. कोई भी हमारे बेटे-बेटियों से शादी नहीं करेगा.” उन्होंने कहा, “हमने सरकार से उन्हें गिरफ़्तार करने, उनकी किताब पर प्रतिबंध लगाने और उन्हें जेल में बंद रखने को कहा है. सरकार ने हमारी सुनी ही नहीं.”

मुरुगेसन की कहानी का नायक जिस जाति का है, अमैय्यपन उसके नेता हैं. वे कहते हैं, “मुझे बालचंद्रन के नाम से भी जाना जाता है.” यह एक ट्रांसजेंडर की कहानी है जो परिजनों के दबाव में शादी कर लेता है. ट्रांसजेंडर का पिता अपनी बहू से संबंध बनाता है. मुरुगन ने दर्जनों उपन्यास लिखे हैं और उन लोगों से कहीं ज़्यादा चर्चित हैं, जिन्हें हाल के कुछ वर्षों में सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा है. मुरुगन को छोड़कर बाकी लेखक अपनी पहली किताब से ही परेशानी में पड़ गए.

मुरुगन और मुरुगेसन के दुख अलग-अलग हैं. मुरुगन को झगड़े के माहौल में अपना क़स्बा नमक्कल छोड़ना पड़ा. मुरुगेसन का अपहरण कर लिया गया और उन्हें पास के जंगल में ले जाकर पीटा गया. उस समय वह उन लोगों से मिलने जाने की तैयारी कर रहे थे जिनकी भावनाएं ‘आहत’ हुई थीं. अस्पताल में कुछ दिन बिताने के बाद पुलिस की सुरक्षा में उन्हें करूर से दूसरे ज़िले में भेजा गया.

मुरुगन के शहर तिरुचेंगोडे में कोंगुवेल्लारार संघाओंगल फ़ेडरेशन के पोन गोविंदराजन ने कहा, “इस बारे में साफ़ हो जाना चाहिए कि केवल गाउंदर समाज ने ही मुरुगन का विरोध नहीं किया था. तिरुचेंगोडे के सभी समुदायों ने उनका विरोध किया था. वे सभी उस मंदिर के भक्त हैं, जिसका अपमान मुरुगन ने अपनी क़िताब में किया था. हम उन्हें लिखने से रोकना कभी नहीं चाहते. ज़िला प्रशासन यह मामला हल कर रहा है.”

लेकिन मुरुगन की किताब के प्रकाशक कानन सुंदरम का कहना है, “अभिव्यक्ति की आज़ादी सबसे ऊपर है. अब हमें सुप्रीम कोर्ट जा कर अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी की मांग करनी होगी. यदि हम पर कुछ पाबंदियां हैं तो ऐसा लगता है कि इसे स्थानीय पुलिस इंस्पेक्टर निर्धारित कर रहे हैं. वे निर्णय लेते हैं कि किसकी कला या साहित्य किसको प्रभावित कर रहा है. इस तरह से तो यथार्थवादी लेखन की धीरे-धीरे मौत हो जाएगी.”

सुंदरम विरोध प्रदर्शनों पर सवाल खड़ा नहीं करते हैं. वे कहते हैं, “यदि किसी को ऐतराज़ है या उसे कुछ ग़लत लगता है तो उसे विरोध करने, किताब जलाने और अदालत में मामला दायर करने का पूरा अधिकार है. लेकिन लेखक को धमकी देना, उसे शारीरिक रूप से नुक़सान पहुंचाना या उसे निर्वासित कर देना क़तई मंजूर नहीं है.”

(बीबीसी हिंदी डॉटकॉम से साभार)

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