कन्नड़ के प्रसिद्ध लेखक चिदानंद मूर्ति को सीएम के सामने घसीट ले गई पुलिस

बेंगलुरु : प्राचीन काल के कवि देवरदासी मैया के जन्मदिन के मौके पर कर्नाटक विधानसभा के बैंक्वेट हॉल में एक कार्यक्रम चल रहा था। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के साथ-साथ कई वरिष्ठ नेता और मंत्री वहां मौजूद थे।

तमिल लेखकों पर हमलों के पीछे कौन?

अभिव्यक्ति की आज़ादी की लड़ाई में सरकार से किसी भी रूप में जुड़े लोगों की आक्रामक भूमिका की बात छोड़ दी जाए तो पेरुमल मुरुगन और पुलियुर मुरुगेसन जैसे तमिल लेखकों पर हुए हालिया हमलों में कोई नई बात नहीं दिखती है.

फिल्म लेखक संघ बनाम मुस्लिम लेखक संघ

फिल्म लेखक संघ के मुशायरे को संघ अध्यक्ष जलीस शेरवानी ने मुस्लिम लेखक संघ के मुशायरे में तब्दील कर दिया। यह नजारा देखने को मिला पिछले दिनों रंग शारदा हॉल (बांद्रा) में, जहां बड़े बैनर पर लिखा तो गया था कवि सम्मेलन/ मुशायरा मगर उसमें मुंबई की एक शायरा और एक अन्य हास्य कवि के अलावा एक पाकिस्तान और एक दुबई समेत 14 भारतीय मुस्लिम शायर थे, जिन्हें अच्छे खासे पैसे और प्लेन का टिकट देकर बुलाया गया था। इनमें नवाज देवबंदी और मुनव्वर राणा के अलावा अदब का कोई बड़ा नाम नहीं था। पता चला कि बाकी शायर वे हैं, जिनसे जलीस शेरवानी का मुशायरों का कथित लेनदेन चला करता है- मुझे तुम बुलाओ, तुम्हें मैं बुलाऊं। निमंत्रण पत्र पर लिखा था- फर्स्ट कम फर्स्ट सीट…लेकिन हॉल में पहुंचने पर पता चला कि आधा हॉल रिजर्व रखा गया है…बाद में उन सीटों पर अधिकांश वे लोग दिखे, जो उजले कुर्ते-पाजामे में सिर पर टोपी लगाये बार बार सुभान अल्ला, सुभान अल्ला चिल्ला रहे थे।

फिल्म राइटर्स संघ के समर्थन पत्र की प्रतिलिपि

हिंदी संस्थान ने लखकों को झूठा-फ्रॉड साबित कर अपनी फोरेंसिक लैबोरोट्री भी खोल ली है…

Dayanand Pandey : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में इस बार पुरस्कार वितरण में धांधली भी खूब हुई है। इस धांधलेबाजी खातिर पहली बार उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने एक फर्जी फोरेंसिक लैब्रोटरी भी खोल ली है। तुर्रा यह कि बीते साल किसी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में किसी ने याचिका दायर कर दी थी सो इस याचिका कर्ता के भय में लेब्रोटरी में खुद जांच लिया कि कौन सी किताब किस प्रेस से कैसे छपी है और इस बिना पर कई सारी किताबों को समीक्षा खातिर ही नहीं भेजा समीक्षकों को। और इस तरह उन्हें पुरस्कार दौड़ से बाहर कर दिया। क्या तो वर्ष 2014 की छपाई है कि पहले की है कि बाद की है। खुद जांच लिया, खुद तय कर लिया। ज़िक्र ज़रूरी है कि इस बाबत लेखक की घोषणा भी हिंदी संस्थान लेता ही है हर बार।