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साहित्य

‘टारगेट’ बनाना नहीं, बल्कि सेट करना सिखाती है पुस्तक ‘टारगेटेड जर्नलिज्म’!

संजीव शर्मा-

‘टारगेटेड जर्नलिज्म’ शीर्षक सुनकर चौंकना लाजमी है क्योंकि इन दिनों आप पहलगाम में टारगेटेड किलिंग जैसा शब्द रोज सुन रहे हैं। हालांकि यहां टारगेटेड जर्नलिज्म का आशय किसी को लक्ष्य बनाना नहीं है बल्कि पत्रकारिता की सही दिशा समझाना है। यह किताब किसी को टारगेट नहीं बनाती बल्कि टारगेट सेट करने जैसे आदर्श उद्देश्यों का फलसफा पेश करती है।

हम बात कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार प्रोफेसर मनोज कुमार की नई पुस्तक ‘टारगेटेड जर्नलिज्म’ की… यह किताब मूल रूप से मीडिया के लोगों, मीडिया के विद्यार्थियों एवं मीडिया को समझने के इच्छुक पाठकों के लिए है।

प्रोफेसर मनोज कुमार किसी परिचय के मोहताज नहीं है। चार दशकों से सक्रिय पत्रकार हैं और इन दिनों शोध पत्रिका समागम के संपादक है। वे मध्यप्रदेश में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय सहित प्रदेश और देश के कई विश्वविद्यालयों के मीडिया संस्थानों में पढ़ाते हैं और अखबारों में नियमित लेखन कर रहे हैं। सीधे शब्दों में कहें तो यह किताब उनके पत्रकारीय अनुभवों का निचोड़ है।

यह पुस्तक हमें पत्रकारिता के मीडिया बनने और पत्रकारिता की ‘ठोक दो’ परंपरा के ‘निपटा दिया’ वाले दौर तक की यात्रा कराती है। पुस्तक के जरिए हमें मीडिया में आए तमाम बदलावों से दो-चार होने का मौका मिलता है। लेखक प्रोफेसर मनोज कुमार ने ‘अपनी बात’ में लिखा है कि “यह बात किसी से छिपी नहीं है कि आज पत्रकारिता करना कितना कठिन कार्य है। बाहरी दबाव की बात न भी करें तो भी संस्थान के भीतर मैनेजमेंट का दबाव इतना होता है कि हम निर्भीक होकर अपनी बात नहीं कर पाते हैं। ऐसे में स्वतंत्र रूप से लेखन एक माध्यम बच जाता है, जहां हम अपने मन की बात कर सकते हैं।” वे आगे लिखते हैं कि “अपने लिखे को समाज तक पहुंचाने का संकट बड़ा है तो समाधान भी छोटा नहीं है।” टीवी चैनल के साथी यहां मैनेजमेंट का अर्थ एचआर या प्रबंध संपादक के तौर पर भी ले सकते हैं।

मनोज जी अपनी पुस्तक में ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता की बात भी करते हैं तो मीडिया के उद्योग बनने और उसके मुताबिक विद्यार्थियों को ढालने की बात भी करते हैं। वे ‘पत्रकारों की शिक्षा नहीं शिक्षित होना जरूरी’ अध्याय में साफ कहते हैं कि पत्रकारों की शिक्षा नहीं बल्कि पत्रकारों का शिक्षित होना जरूरी है। उनका मानना है कि पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता तय करने की बजाय उन्हें शिक्षित किया जाए क्योंकि प्रशिक्षण के अभाव में ही पत्रकारिता में नकारात्मकता का प्रभाव पड़ रहा है। वहीं, ‘पत्रकारिता और मीडिया एजुकेशन’ अध्याय के जरिए वे मानते हैं कि मीडिया शिक्षा वर्तमान समय की अनिवार्य जरूरत है लेकिन हम पत्रकारिता की तकनीकी सिखाने की बजाय तकनीकी की पत्रकारिता सिखा रहे हैं।

मनोज जी ने अपने करियर की शुरुआत से लेकर कई दशक प्रिंट पत्रकारिता को दिए हैं इसलिए वह पत्रकारीय दायित्व की बारीकियां भी समझते हैं तो पाठक की जरूरत को भी… इसलिए ‘पत्रकारिता की रीढ़ आंचलिक पत्रकारिता’ अध्याय में वे जमीनी स्तर पर और ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद पाठकों की जरूरतों को साफ तौर पर समझते हुए लिखते हैं कि आंचलिक पत्रकारिता की अपनी गमक है। इस बात को अक्सर हम लोग भूल जाते हैं और महानगर की पत्रकारिता की ओर टकटकी लगाए देखते हैं । उनका यह भी कहना है कि आंचलिक पत्रकारिता के साथी ही सबसे ज्यादा समस्याओं से जूझते हैं। उनके घरों में न तो ठीक से रहने का इंतजाम है और न ही उनके बच्चे बड़े स्कूलों में पढ़ पाते हैं लेकिन फिर भी खबरों के लिहाज से वह किसी मामले में पीछे नहीं रहते।’

‘सोसायटी की हार्टबीट है पीआर’ अध्याय के जरिए वे जनसंपर्क की नब्ज को भी टटोल लेते हैं और पत्रकार और जनसंपर्क कर्मियों के बीच के संबंध की भी खुलकर पड़ताल करते हैं। वह कहते हैं कि जनसंपर्क और पत्रकारिता की अपनी सीमा है और दोनों की अपनी मर्यादा भी लेकिन आज भी ये दोनों एक दूसरे के पूरक भी हैं इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि दोनों एक दूसरे को और एक दूसरे की जरूरतों को समझे।

31 अध्याय में फैली ‘टारगेटेड जर्नलिज्म’ हमें समय-समय पर घटने वाली घटनाओं के जरिए पत्रकारिता के बदलते स्वरूप से जोड़ती है। वह ‘पाठकों के हिस्से में सेंधमारी कब तक’ जैसे अध्याय के माध्यम से पाठकों के हितों की खुलकर चिंता करती है तो बाल पत्रकारिता और अपराध पत्रकारिता जैसे विषयों पर भी बेलाग ढंग से बात करती है। यह किताब चुनाव और चुनाव प्रबंधन पर भी बेझिझक बात करती है तो मीडिया के उद्योग में बदलने की स्थितियों को भी हमारे सामने लाती है।

‘टारगेटेड जर्नलिज्म’ में आप उदंत मार्तंड से लेकर सोशल मीडिया तक आए परिवर्तन को भी समझ सकते हैं तो मीडिया के गुण धर्म पर भी गंभीर चर्चा कर लेते हैं। कुल मिलाकर यह किताब मीडिया और इसमें रुचि रखने वाले लोगों के लिए एक संग्रहणीय अंक है।

पुस्तक: टारगेटेड जर्नलिज्म
लेखक: प्रोफेसर मनोज कुमार
पृष्ठ: 150
मूल्य: 300 रुपए
प्रकाशक: लोक प्रकाशन, भोपाल

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