Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

तीसरे कार्यकाल की मिसाल, तीन खास खबरें – तीन मुद्दे जो मीडिया के लिए अछूत हैं!

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा, संघ परिवार का अपना प्रचार और लीक आदि ही प्रमुख है। नीट मामले में कल खबर थी तो शिक्षा मंत्री का बयान प्रमुखता से छपा था। आज खबर है तो प्रधान का बयान नहीं या फिर खबर ही नहीं। अकेले टाइम्स ऑफ इंडिया ने मामले के साथ बयान की भी चर्चा की है। हिन्दी अखबारों के लिए राम मंदिर उड़ाने की धमकी बड़ी खबर है तो  अरुणधति राय के खिलाफ पुराने मामले में यूएपीए के तहत कार्रवाई की दिल्ली के एलजी की अनुमति जैसी खबरें प्रमुखता से हैं। द टेलीग्राफ ने आरएसएस नेता मोहन भागवत के बयान के बाद अब इंद्रेश कुमार के बयान को आज लीड बनाया है और इस तरह मीडिया के सारे मुद्दे संघ परिवार पर केंद्रित और संचालित हैं। इसमें देश समाज के लिए जरूरी मुद्दों पर ना अखबारों में ना टेलीविजन पर चर्चा होती है। दूसरी ओर, बंद कमरे की चर्चा को भी विवादास्पद बना देना शमिल है और आज के इस गंभीर मुद्दे पर किसी अखबार में कोई चर्चा नहीं है। 

मेरे लिए आज तीन बड़ी खबरें हैं। सबसे पहले दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने अरुणधति राय के खिलाफ 2010 के एक मामले में यूएपीए के तहत कार्रवाई की अनुमति दी है। अरुंधति रॉय के साथ केंद्रीय विश्वविद्यालय कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय कानून के पूर्व प्रोफेसर डॉ. शेख शौकत हुसैन के खिलाफ भी केस चलाने की मंजूरी दी गई है। अरुंधति रॉय और हुसैन पर 21 अक्टूबर 2010 को दिल्ली के कोपरनिकस रोड पर मौजूद एलटीजी ऑडिटोरियम में ‘आजादी – द ओनली वे’ के बैनर तले आयोजित एक सम्मेलन में भड़काऊ भाषण देने का आरोप है। सम्मेलन में ‘कश्मीर को भारत से अलग करने’ का प्रचार किया गया था। भाषण देने वालों में सैयद अली शाह गिलानी, एसएआर गिलानी (सम्मेलन के एंकर और संसद हमले के मामले में मुख्य आरोपी) अरुंधति रॉय, डॉ. शेख शौकत हुसैन और माओवादी समर्थक वरवर राव शामिल थे।

अभिव्यक्ति की आजादी और फंसाने का अधिकार

इंडियन एक्सप्रेस ने आज इस खबर के साथ अपूर्व विश्वनाथ की एक खबर में बताया है कि मामला 14 साल पुराना है और तब यूएपीए नहीं था। ऐसे मामले में कार्रवाई यूएपीए के तहत नहीं हो सकती है पर दिल्ली के एलजी ने इसके तहत इजाजत दी है। जाहिर है, यह कानूनी मामला है और अदालत में तय होगा लेकिन मोटा-मोटी बात में दम है। इसलिए खबर है पर छपी नहीं है। मेरा मानना है कि बंद कमरे में (सीधे प्रसारित होने वाली चर्चा अपवाद हो सकती है) अगर किसी विषय पर चर्चा हो रही हो (किसी भी मकसद थे) और उसमें बोलने के लिये किसी को बुलाया जाय तो जाहिर है कि वहां मौजूद लोग उसे सुनना चाहते हैं। किसी के विचार देश विरोधी और आपराधिक भी हो सकते हैं। अगर उससे पूछा जाये या बोलने के लिए कहा जाये तो जाहिर है लोग वही सुनना चाहते हैं और जानना चाहते है। इसे बताने का मतलब ना किसी को भड़काना है ना व्यवस्था का विरोध करना है ना इसके लिए कार्रवाई होनी चाहिये। मेरे विचार किसी की हत्या कर देने के हो सकते हैं। मेरी नजर में कोई ऐसा अपराधी या संकट हो सकता है। लेकिन मैं जानता हूं कि हत्या अपराध है, मेरा अधिकार नहीं है। इसलिए मैं हत्या नहीं कर रहा ना मेरा ऐसा कोई इरादा है। मेरा कहना भर, वह भी पूछने पर अपराध कैसे हो गया?

मेरी नजर में किसी मामले में उपाय या कार्रवाई या सजा हत्या है तो मैं कहूंगा (मुझे इसकी आजादी होनी चाहिये)। मुझे बोलने का मौका ही इसीलिए दिया गया है और नहीं देने से मेरी राय बदल नहीं जायेगी और राय जताना अपराध नहीं हो सकता। राय जरूर आपराधिक हो सकती है। आपराधिक राय रखने के लिए सजा नहीं होनी चाहिये। वह मेरे पास उपलब्ध विकल्पों की सीमा के कारण है। यह वैसे ही है जैसे फांसी की सजा होनी चाहिये कि नहीं इसी पर मतभेद है। पर सजा हो रही है किसी मामले में माफ किया रहा है और किसी में नहीं। यह सबके लिए एक कानून के खिलाफ है। इसलिए चर्चा तो होनी ही चाहिये। बंद कमरे की चर्चा अगर विवादास्पद या गैर कानूनी है तो नहीं हो या उसे प्रसारित-प्रकाशित नहीं किया जाये या करना अपराध हो और मेरी राय में देश विरोधी राय समझदार लोगों के बीच रखना बुरा नहीं है। उसे सार्वजनिक करना बुरा हो सकता है क्योंकि कम समझदार लोग उसका आशय नहीं समझे या गलत समझ सकते हैं। यह समाज की कमजोरी है और इसके लिए समाज को दुरुस्त किया जाना चाहिये न कि ऐसी चर्चा पर प्रतिबंध या कार्रवाई होनी चाहिये

मीडिया जब तमाम मुद्दों पर चर्चा ही नहीं करा रहा है तब सरकार विरोधी मामलों पर बंद कमरे में हुई चर्चा के लिए कार्रवाई होगी तो सरकार के खिलाफ कोई काम ही नहीं हो सकेगा जबकि बुरी सरकार का विरोध जरूरी है। चुनाव में हराने के लिए उसकी बुराई करनी ही होगी और यह तय है कि सरकार का विरोध देश विरोध नहीं है, बल्कि सरकार का विरोध करने की हिम्मत दिखाना, स्वार्थ में नहीं फंसना देशभक्ति है। अरुणधति राय से संबंधित खबर आज इंडियन एक्सप्रेस में टॉप पर दो कॉलम में, हिन्दुस्तान टाइम्स में सिंगल कॉलम में एकदम नीचे, द टेलीग्राफ में टॉप पर सिंगल कॉलम, द हिन्दू में फोल्ड के नीचे डबल कॉलम में है। टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। विडम्बना यह है कि खुद एलजी के खिलाफ 2002 में सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर के साथ अहमदाबाद के साबरमती आश्रम में मारपीट का मामला है। गुजरात हाईकोर्ट ने इस मामले में वीके सक्सेना को राहत दी है। गुजरात हाईकोर्ट ने दिल्ली के उपराज्यपाल पद पर रहने तक वीके सक्सेना के खिलाफ आपराधिक ट्रायल पर रोक लगा रखी है। दूसरी ओर, वीके सक्सेना ने 2001 में मेधा पाटकर के खिलाफ अवमानना का मामला दायर किया था। उसपर सुनवाई हो चुकी है, फैसला आना है।  

उनका आरोप था कि मेधा पाटेकर ने एक प्रेस नोट जारी करके कहा था कि सक्सेना देशभक्त न होकर कायर हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मेधा पाटकर का बयान सक्सेना की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला है। इस मामले में दोषी पाई गईं मेधा पाटकर के मामले में दिल्ली की एक अदालत एक जुलाई को अपना फैसला सुनाएगी। आप देख सकते हैं कि मारपीट के मामले में तो सक्सेना को स्टे मिल गया है पर अवमानना मामले में (उनके पद पर होने के कारण या बावजूद) कोई स्टे नहीं है। संभव है इसका लाभ उन्हें मिल रहा हो। अवमानना तो एलजी होने के कारण ही है वरना आम आदमी की अवमानना की कौन परवाह करता है। मुझे नहीं लगता कि जब का यह मामला है तब सक्सेना किसी पद पर होंगे। इस तरह, सक्सेना के मामले में पद पर होने से उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई और उनके पक्ष में कार्रवाई हो गई। यह देश की अदालती व्यवस्था है। आम आदमी के हित में इसे दुरुस्त किये जाने की जरूरत है। मीडिया को इसे मुद्दा बनाना चाहिये। कहने की जरूरत नहीं है मारपीट के आरोपी एलजी के मामले तो 2001 और 2002 के हैं, राहुल गांधी के खिलाफ तो 2019 के मामले में सजा हो चुकी है जिसपर सुप्रीम कोर्ट का स्टे है। यही नहीं, सांसदों के मामले में महुआ मोइत्रा के खिलाफ कार्रवाई हुई पर संसद में ही दूसरे सांसद दानिश अली को गाली देने वाले बीजेपी सांसद रमेश बिधूड़ी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई।

नीट से संबंधित खबर पहले पन्ने से गायब

दूसरा मामला नीट से संबंधित है। आप जानते हैं कि कल लगभग सभी अखबारों में शिक्षा मंत्री का यह बयान प्रमुखता से छपा था कि इस मामले में कोई सबूत नहीं है और मामला प्रश्नपत्र लीक का नहीं है। कल मैंने लिखा था कि जब एक मुख्यमंत्री को बिना सबूत के सिर्फ ‘अनुभवी चोर’ होने के कारण जेल में रखा जा सकता है तो नीट मामले में कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिये या सबूत क्यों चाहिये। आज इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार (बाकी अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है) बिहार पुलिस ने कहा है कि उसकी जांच में संकेत प्रश्नपत्र लीक होने का संकेत देते हैं। आज के अखबारों में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का बयान नहीं है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने बयान नहीं दिया है या उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है। दरअसल उनके बयान में दम नहीं है इसलिए अखबारों ने नहीं छापा है। यह अलग बात है कि इसी लिए खबर भी नहीं छपी हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस की खबर में भी धर्मेंद्र प्रधान के बयान का हवाला है।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार इस मामले में 13 लोग गिरफ्तार किये गये हैं। इनमें चार नीट की परीक्षा देने वाले उम्मीदवार हैं। बाकी अभिभावक और संगठित गैंग के सदस्य हैं। इनमें एक, गया का नीतिश कुमार पहले भी पेपर लीक मामले में गिरफ्तार हुआ है। यह परीक्षा बिहार लोक सेवा आयोग करवाता है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले पन्ने की खबर से बताया है कि सुप्रीम कोर्ट नीट की अनियमितताओं की जांच सीबीआई से कराने की अपील पर विचार करने के लिए सहमत हो गया है। इस खबर के साथ प्रधान का बयान हाईलाइट किया हुआ है। उन्होंने कहा है, किसी गड़बड़ी की कोई गुंजाइश नहीं है। इसके साथ मल्लिकार्जुन खरगे का बयान भी है, उन्होंने कहा है, अगर पेपर लीक नहीं हुआ है तो 13 लोग गिरफ्तार क्यों किये गये हैं। क्या नीट-यूजी का रोकेट गोधरा में नहीं खुला है?         

गुजरात में एक नौकरी के लिए 3.2 करोड़ की सबसिडी

जनता दल एस के नेता एचडी कुमारस्वामी ने आरोप लगाया है कि अमेरिकी मुख्यालय वाली एक कंपनी को गुजरात में प्लांट लगाने के लिए 2 बिलियन डालर की सबसिडी दी जा रही है। यह 5000 रोजगार पैदा करेगी और उसके लिए इतने पैसे का मतलब हुआ 3.2 करोड़ रुपए प्रति नौकरी। टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज इसे तीन कॉलम में छापा है। खबर के अनुसार कंपनी के कुल निवेश का 70 प्रतिशत सबसिडी के रूप में दिया जाना है। तीसरी मोदी सरकार में शामिल होने के लिए शपथ ग्रहण करने के बाद बैंगलोर पहुंच कर यह आरोप लगाया। इससे पहले टेलीविजन पर सीधा प्रसारण में कंपनी की पहचान बताने के बाद कुमारस्वामी ने कहा कि वे यह खुलासा करने के लिए अधिकृत नहीं है।

राम मंदिर को उड़ाने की धमकी

इन खबरों के साथ आज नवोदय टाइम्स में टॉप पर चार कॉलम की एक खबर है, अयोध्या में राम मंदिर को उड़ाने की धमकी, अलर्ट। अमर उजाला में यह खबर तीन कॉलम में, राम मंदिर उड़ाने की धमकी, सुरक्षा बढ़ाई शीर्षक से है। आप जानते हैं कि बंद कमरे या परिसर में चर्चा को कैसे मुद्दा और अपराध बना दिया गया है और बनाया जाता रहा है। इसी शुरुआत जेएनयू के कन्हैया मामले से कीजिये और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे उदयनिधि के बयान तक आ जाइये। खूब बवाल मचा था। दूसरी ओर, चुनावी सभा में प्रधानमंत्री के आपत्तिजनक भाषणों की चर्चा तक नहीं हुई। मुझे लगता है कि भाषण सीधे प्रसारण के लिए नहीं हो, बंद परिसर में हो तो उसमें जो बोला जाये अगर वह विचार है तो कुछ भी हो, अपराध नहीं है अगर मकसद लोगों को उकसाना या भड़काना नहीं है। कानूनन इसकी इजाजज होनी चाहिये और विचारों के आदान-प्रदान के लिए इसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिये और बच्चों की वाद-विवाद प्रतियोगिता में बोली गई बातों पर कार्रवाई नहीं हो, यह सुनिश्चित होना चाहिये। वैसे भी वह शिक्षकों की देख-रेख में होता है। लेकिन स्थिति यह है कि विचारों के मुक्त प्रवाह को रोकने के लिए शिक्षक के खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है।

उदयनिधि का बयान उदाहरण है। उसने कहा था, सनातन का सिर्फ विरोध नहीं किया जाना चाहिए. बल्कि, इसे समाप्त ही कर देना चाहिए। सनातन धर्म सामाजिक न्याय और समानता के खिलाफ है। कुछ चीजों का विरोध नहीं किया जा सकता, उन्हें खत्म ही कर देना चाहिए। हम डेंगू, मच्छर, मलेरिया या कोरोना का विरोध नहीं कर सकते। हमें इसे मिटाना है। इसी तरह हमें सनातन को भी मिटाना है। यह व्यक्ति की राय है। वैसे ही जैसे इंडी गठबंधन राम मंदिर पर बाबरी ताला लगा देगा। इसमें अगर गलत है तो बाद वाला क्योंकि चुनावी भाषण में कहा गया है, आम लोगों के बीच कहा गया है और किसी व्यक्ति या पार्टी के बारे में कहा गया है जो ऐसा कहने से जीत हार सकता था। लेकिन सनातन के बारे में राय सही हो या गलत – चुनाव के मौके पर नहीं कहा गया था, वोट पाने के मकसद से नहीं कहा गया था और आम जनता से नहीं कहा गया था।पांचजन्य की एक खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि कांग्रेस के शहजादे राममंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटना चाहते हैं और राममंदिर पर ‘बाबरी ताला’ लटकाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि हमारा देश 500 साल से राममंदिर की प्रतीक्षा कर रहा था, मगर इंडी गठबंधन वालों को राममंदिर और श्रीराम से परेशानी है। सपा के बड़े नेता कहते हैं कि राम मंदिर बेकार है और रामभक्त पाखंडी हैं। उन्होने कहा कि ये वो लोग हैं जो सनातन धर्म के विनाश की बात करते हैं और इनकी आका है कांग्रेस पार्टी। कांग्रेस के शहजादे तो फिर से रामलला को टेंट में भेजना चाहते हैं। इन पर वोट से करारी चोट होनी चाहिए। पीएम मोदी ने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने यूपी को गर्त से बाहर निकालने में अपनी सरकार के साथ बहुत मेहनत की है। इसकी सत्यता को किसी ने चुनौती नहीं दी।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन