अपने ही समूह के अखबार के बारे में लिखना : ओम थानवी

देश का सबसे अच्छा अंगरेजी अखबार कौन-सा है? ‘हिन्दू’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में मेरे लिए चुनाव थोड़ा मुश्किल होता था, अब नहीं है। मेरी नजर में इंडियन एक्सप्रेस अब अव्वल ठहरता है – उसका बौद्धिक कलेवर अचानक निखरा है।

सामग्री के स्तर पर ही नहीं, डिस्प्ले-डिज़ाइन के स्तर पर भी एक्सप्रेस मुझे अपनी ओर ज्यादा खींचता है। मैंने दुनिया के आला अखबार गौर से देखे हैं, इधर के एक्सप्रेस को आप उनमें किसी के भी समकक्ष रखकर देख सकते हैं।

शेखर गुप्ता के बाद राजकमल झा इंडियन एक्सप्रेस के संपादक हुए। अपेक्षया लो-प्रोफाइल नाम सुन लोग कहते थे, पता नहीं अब पाठक समाज की कैसी प्रतिक्रिया होगी। मुझे लगता है संपादक के साथ अखबार में आता बदलाव पाठकों को ज्यादा रुचा है। हालाँकि कार्यकारी संपादक के रूप में झा पहले भी एक्सप्रेस की धुरी ही थे। फिर बदलाव क्यों और कैसे संभव हुआ? 

दरअसल, मिली हुई आजादी और अर्जित की गई आजादी में फर्क होता है; नया (‘न्यू’ नहीं) एक्सप्रेस अब उनकी कल्पना की उपज है – हर पन्ने पर उनकी छाप नुमायां है। फोंट और उसके पसारे तक पर। बस, हमारे आलातरीन व्यंग्य-चित्रकार उन्नी के पॉकेट कार्टून की जेब का आकार बढ़ाने की ओर उनका ध्यान अब तक नहीं गया है!

अपने ही समूह के अखबार के बारे में लिखना शायद ठीक न हो, पर अब मैं चूँकि 26 साल की रोज़गारी के बाद विदा-मोड (अढ़ाई महीने और बचते हैं) में आ गया हूँ, एक अखबार में निखरकर आई ताजगी और प्रस्तुतीकरण की खूबसूरती का जिक्र करना मुनासिब लगता है।

ओम थानवी के एफबी वॉल से

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