जनसत्‍ता डॉट कॉम को चाहिए वेब जर्नलिस्ट

इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी अखबार जनसत्ता के वेब पोर्टल जनसत्ता डॉट कॉम को वेब जर्नलिस्टों की जरूरत है. यहां शिफ्ट इंचार्ज के अलावा जनरल डेस्क पर कार्य करने वााले, आटो और टेक्नालजी फील्ड से जुड़े पत्रकार चाहिए. कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जनसत्ता में ‘दुनिया मेरे आगे’ स्तंभ शुरू होने की कहानी बता रहे पत्रकार उमेश चतुर्वेदी

Umesh Chaturvedi : नवभारत टाइम्स में जब मेरे गुरू डॉक्टर रघुवंश मणि पाठक के गुरू और हिंदी के प्रकांड विद्वान पंडित विद्यानिवास मिश्र संपादक थे, तब संपादकीय पृष्ठ पर एक स्तंभ सिर्फ रविवार को छोड़कर हफ्ते में छह दिन प्रकाशित होता था -निर्बंध..तब अच्युतानंद मिश्र वहां कार्यकारी संपादक थे..चूंकि मैं हिंदी में एमए करके पत्रकारिता करने आया था, लिहाजा उन दिनों हिंदी की प्रकीर्ण विधाओं मसलन डायरी, गद्यगीत, ललित निबंध आदि से मेरा कुछ ज्यादा ही लगाव था। निर्बंध कुछ-कुछ ललित निबंध जैसा ही स्तंभ था..उन दिनों अपनी भी कच्ची-पक्की लेखनी से लिखे आलेख निर्बंध में छपे।

जनसत्ता के संपादकजी अपना चंडीगढ़ का सरकारी मकान बचाने के लिए क्या कुछ नहीं कर रहे हैं!

अपन एकदम सही थे। जो सलाह कभी भजनलाल को दी थी, इस पर अगर आज की सरकार भी अमल कर ले तो उसे पत्रकारों और पत्रकारिता की ओर से कभी कोई संकट पैदा नहीं होगा। अपना शुरू से मानना रहा है कि मकान ऐसी चीज है जिसे लेकर कोई भी इंसान कुछ भी कर गुजरने या कितना भी नीचा झुकने के लिए तैयार नजर आता है। उन दिनों भजनलाल पत्रकारों से बहुत परेशान थे। एक बार कहने लगे कि मैंने न जाने कितने पत्रकारों को अपने विवेकाधीन कोटे से प्लाट देकर उन्हें लखपति बनाया पर इन लोगों की आंख में तो सुअर का बाल है मतलब निकलते ही आंखें दिखाने लगते हैं। ऐसे लोगों का क्या क्या किया जाए?

लड़ाई ऐसे नहीं लड़ी जाती शशि शेखर जी

पटना में अपने संवाददाता की हत्या के बाद दैनिक हिन्दुस्तान अपने संवाददाता के साथ है, यह बड़ी बात है। मुझे नहीं पता पीड़ित संवादादाता हिन्दुस्तान के पेरॉल पर थे या स्ट्रिंगर। लेकिन इतिहास गवाह है, हिन्दी अखबार का संवाददाता मरता है तो वह स्ट्रिंगर ही होता है। मरने के बाद उसका संस्थान उससे पल्ला झाड़ लेता है। हिन्दुस्तान ने ऐसा नहीं किया बहुत बड़ी बात बात है। इसके लिए पूरे संस्थान की प्रशंसा की जानी चाहिए। पर संपादक जी एक दिन बाद जगे और लिख रहे हैं हम लड़ेंगे क्योंकि जरूरत है। बहुत ही लिजलिजा है।

शैलेंद्र की जनसत्ता कोलकाता से हो गयी विदाई, अगले हफ्ते मेरी बारी

माननीय ओम थानवी का आभार कि शैलेंद्र जी और मेरे करीबन पच्चीस साल एक साथ काम करते हुए साथ साथ विदाई की नौबत आ गयी। पिछले साल जब शैलेंद्र रिटायर होने वाले थे, तब हमने उनसे निवेदन किया था कि 1979 से शैलेंद्र हमारे मित्र रहे हैं और अगले साल मेरी विदाई है तो कमसकम उन्हें एक साल एक्सटेंशन दे दिया जाये। वैसे ओम थानवी से मेरे संबंध मधुर नहीं थे लेकिन उनने तुरंत फेसबुक पर सूचना करीब दो महीने पहले दे दी कि शैलेंद्र की सेवा जारी है।

‘जनसत्ता’ जिस हाल में निकल रहा है उसमें यही समझना मुश्किल हो गया है कि निकल किस लिए रहा है!

Sanjaya Kumar Singh : जनसत्ता एक अच्छा अखबार था और जब खराब होना शुरू हुआ तो लगातार खराब होता गया। उसका कोई ग्राफ नहीं बना। कुंए में (गड्ढे) में जाती बाल्टी की तरह सीधी रेखा बनती जा रही है। मैं समझ रहा था कि बाल्टी मराठवाड़ा के किसी कुंए में छोड़ दी गई है पड़ी हुई है। लेकिन अच्छे अखबार के पाठक भी अच्छे होते हैं और बता देते हैं कि जनसत्ता आज कैसे और नीचे गया। एक दिन मैं भी लिखने बैठा था तो लगा कहां दीवार पर सिर मारूं।

जनसत्ता अखबार में देवी प्रसाद त्रिपाठी की प्रशस्ति पढ़कर मुझे घोर आश्चर्य हुआ

जनसत्ता 2 मई के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर मुकेश भारद्वाज द्वारा रचित भाई डी पी त्रिपाठी की प्रशस्ति पढ़ी। मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि जो पत्र किसी भी बड़े लेखक, वैज्ञानिक, कलाकार के बारे में अवसर विशेष पर भी कोई टिप्पणी छापने से गुरेज करता है उसमें इस तरह की प्रशस्ति कैसे छप गई। संभव है मुकेश भारद्वाज की जनसत्ता में अलग हैसियत हो। बहरहाल मेरी नजर में देवी प्रसाद त्रिपाठी का व्यक्तित्व बेहद रहस्यमय है। इसमें कोई दो राय नहीं कि साहित्य और समाज की गहरी समझ के साथ ही उनकी राजनीतिक समझ भी काबिले तारीफ़ है। लेकिन जैसा कि मुकेश भारद्वाज इंगित करना चाहते हैं देवी प्रसाद त्रिपाठी की प्रतिबद्धता न तो सिंह वाली है न मिमियाती हुई है बल्कि भारतीय राजनीति के अवसरवादी यथार्थ से ही संचालित है।

आज के जनसत्ता को लेकर एक समीक्षात्मक टिप्पणी : अलिवदा जनसत्ता!

प्रिय बंधु
नमस्कार
जनसत्ता को लेकर एक टिप्पणी भेज रहा हूं। सुना है कि आपका ब्लाग काफी पढ़ा जाता है। मेरी चिंता को स्थान देंगे तो बहुत आभारी रहूंगा। मैं एक शिक्षक हूं और आज का जनसत्ता देखकर दुखी हूं। सोच रहा हूं कि संपादक को भी लिखूं। टिप्पणी थोड़ी आक्रोश में लिखी है, आप देख लीजिए।

देवेंद्र नागमणि
आरके पुरम
दिल्ली

राकेश सिन्हा ने कहा है कि वे जनसत्ता में कभी नहीं रहे… फिर सच्चाई क्या है…

Sanjaya Kumar Singh : भूल सुधार… एक पोस्ट में मैंने लिखा कि भाजपा के विचारक राकेश सिन्हा जनसत्ता में थे। परिचित हैं। उसे भड़ास4मीडिया ने प्रकाशित किया और अपने ट्वीटर पर भी। राकेश जी ने कहा है कि वे जनसत्ता में कभी नहीं रहे। मैंने चेक कर लिया। मुझे ही गलत याद था और मैं उन्हें जनसत्ता का स्ट्रिंगर समझता था। पर चूंकि स्ट्रिंगर और स्टाफर के तकनीकी अंतर को मैं नहीं मानता इसलिए मैंने लिख दिया था कि वे जनसत्ता में थे।

‘जनसत्ता’ में अशोक वाजपेयी का कालम बंद करने के लिए संपादक मुकेश भारद्वाज ने की घटिया हरकत

ओम थानवी के जनसत्ता अखबार से रिटायर होने के बाद चंडीगढ़ से आए नए संपादक मुकेश भारद्वाज की करतूतें इन दिनों चर्चा का विषय है. अखबार को आधुनिक बनाने के चक्कर में न तो अखबार की पुरानी पहचान साख चरित्र बचा पा रहे और नया कुछ बेहतर करने के चक्कर में दूसरे अखबारों से आगे निकल पा रहे. इसी को कहते हैं न घर का न घाट का. मुकेश भारद्वाज ने पुराने सारे स्तंभकारों के कालम एक एक कर बंद करना शुरू कर दिया. सबको बताया गया कि अखबार का पुनर्गठन किया जा रहा है, री-लांच हो रहा है, इसलिए कालम बंद करने पड़ रहे हैं. लोगों ने इशारे को समझा और कालम लिखना बंद कर दिया.

जनसत्ता अखबार को पत्रकारों की जरूरत, 20 नवंबर तक कर सकते हैं अप्लाई

एक जमाने में चर्चित हिंदी अखबार रहा जनसत्ता को युवा पत्रकारों की तलाश है. अखबार की तरफ से निकाली गई वैकेंसी में बताया गया है कि डेस्क और रिपोर्टिंग दोनों के लिए युवा पत्रकारों की तलाश है. अप्लाई करने वालों को ट्रांसलेशन और पेजमेकिंग का काम भी आना चाहिए. आवेदन की अंतिम तारीख 20 नवंबर है.

ओम थानवीजी, अंबरीष कुमारजी, ये सब आप दोनो की गरिमा के खिलाफ

फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार Om Thanvi जी और वरिष्ठ पत्रकार Ambrish Kumar जी ने कभी इशारों में और कभी नाम लेकर कुछ लिखा है. मैंने दोनों की पोस्ट पढ़ी है और पढ़कर अच्छा नहीं लगा. बहुत बुरा लगा. 

जनसत्ता के 26 साल : अब दफ्तर से घर को निकल रहा- ओम थानवी

जनसत्ता के संपादक एवं लेखक ओम थानवी न संस्थान में लंबी पारी खेलते हुए अपने कार्यकाल के आखिरी दिन अपने फेसबुक वाल पर लिखा –  ”अब दफ्तर से घर को निकल रहा हूं। बरसों के पिटारे में से अपने निजी कागजात और असबाब लेकर। मेरी खुशनसीबी थी कि जनसत्ता में 26 साल (दस साल चंडीगढ़, सोलह बरस दिल्ली) काम किया। एक ही अखबार में इतनी लंबी संपादकी पता नहीं कितनों को नसीब हुई होगी। जनसत्ता में अगर कहीं कुछ सार्थक कर पाया तो अपने सहयोगियों, लेखकों, स्तंभकारों, व्यंग्यचित्रकार और चित्रकारों की बदौलत। जो नहीं कर सका, उसका जिम्मेदार मैं हूं। इतना ही है कि काश कुछ साधन और मिल पाते। पर, ‘जो नहीं है उसका गम क्या’!

चार दिनों बाद यानी 31 जुलाई से ओम थानवी जनसत्ता के संपादक पद से अवकाश ले लेंगे

इंडियन एक्सप्रेस इसलिए नहीं पढ़ा जाता रहा है कि उसमें ढूंढ़-ढूंढ़ कर स्टोरी लाई जाती थीं बल्कि उसकी प्रतिष्ठा इसलिए थी क्योंकि उसका चरित्र व्यवस्था विरोधी (एंटी इस्टैबलिशमेंट) रहा है। बाद में एक्सप्रेस ने तो खैर अपना चरित्र बदला भी मगर जनसत्ता दृढ़ रहा। प्रभाष जी के बाद भी जनसत्ता का यह चरित्र यथावत बना रहा तो यकीनन इसका श्रेय ओम थानवी को जाता है। प्रभाष जोशी बड़ा नाम था इसलिए उनके वक्त तक जनसत्ता में काम कर रहे दक्षिणपंथी पत्रकार खुलकर सामने नहीं आए थे मगर ओम थानवी के समय ऐसे तत्व खुलकर अपने दांव चलने लगे थे इसके बावजूद जनसत्ता का चरित्र नहीं बदला। ऊपर से प्रबंधन ने ओम थानवी को वह स्वायत्तता भी नहीं दी जैसी कि प्रभाष जी के वक्त तक संपादक को प्राप्त थी।

तीस्ता के खिलाफ ये खबर मीडिया ट्रायल का हिस्सा है!

Sanjaya Kumar Singh : मैं तीस्ता समर्थक नहीं हूं। ठीक से फॉलो भी नहीं करता। पर उनके खिलाफ इस खबर में दम नहीं है। मीडिया ट्रायल का हिस्सा है। बदनाम करने की कोशिश। खबर तब होती जब बताया जाता कि कुल कितने दिन में कितने की शराब पी गई (या पिलाई गई) कितनी फिल्मों की सीडी कितने दिनों में खरीदी गई। काम करने वाला कोई आदमी कितनी शराब पी जाएगा और कितनी सीडी देख लेगा। बांटा होता तो लगता कि आरोप है।

जब कुमार आनंद ने सीधे विवेक गोयनका को इस्तीफा दिया और दुबारा एक्सप्रेस बिल्डिंग की सीढियों पर नहीं चढ़े

Ambrish Kumar : एक साथी ने आनंद जी के बारे में विस्तार से लिखने को कहा तो कुछ तो लिखा ही जाये. कुमार आनंद टिकमानी यानी ‘इंतजाम बहादुर’. कुमार आनंद नब्बे के दशक में वे बिहार से आने वाले सबसे प्रतिभाशाली पत्रकारों में शुमार थे. पूरा नाम कुमार आनंद टिकमानी जिला मुजफ्फरपुर बिहार. जनसत्ता में तेरह बार इस्तीफा दिया जो अंतिम बार ही मंजूर हुआ. देश के ज्यादातर बड़े अखबारों में रहे. ‘पीटीआई भाषा’ के संपादक रहे और इस समय किसान चैनल के प्रमुख सलाहकार है. कल ही उनका फोन भी आया था और कुछ समय पहले उनकी बिटिया की शादी में दिल्ली भी गया था जिसकी दावत दिन में थी और बिहार से लेकर दक्षिण भारतीय व्यंजनों का अद्भुत मेल था. पर हम लोगों ने कहा इस दावत से काम नहीं चलेगा क्योंकि आप की शाम की दावत ही मशहूर रही है.

सुना है जनसत्ता अखबार में सकारात्मक बदलाव का दौर आ गया है…

Ambrish Kumar : जनसत्ता के ज्यादातर साथी कह रहे है अखबार में सकारात्मक बदलाव का दौर आ गया है. नये संपादक ने भी कहा है कि अब इसे ख़बरों का अख़बार बनाया जायेगा. अगस्त से यह सब शुरू हो जायेगा. ऐसा होता है तो स्वागत किया जाना चाहिये.

अपने ही समूह के अखबार के बारे में लिखना : ओम थानवी

देश का सबसे अच्छा अंगरेजी अखबार कौन-सा है? ‘हिन्दू’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में मेरे लिए चुनाव थोड़ा मुश्किल होता था, अब नहीं है। मेरी नजर में इंडियन एक्सप्रेस अब अव्वल ठहरता है – उसका बौद्धिक कलेवर अचानक निखरा है।

मुकेश भारद्वाज होंगे जनसत्ता के अगले कार्यकारी संपादक

जनसत्ता के अगले कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज होंगे। वह ओम थानवी का स्थान लेंगे। थानवी जी लगभग तीन माह बाद सेवानिवृत्त हो रहे हैं। मुकेश के मनोनयन की सूचना का ई-मेल आ चुका है। मेल जनसत्ता एवं इंडियन एक्सप्रेस के बोर्ड अध्यक्ष विवेक गोयनका ने प्रेषित किया है। मुकेश भारद्वाज अभी जनसत्ता के चंडीगढ़ क्षेत्र के संपादक हैं। 

‘जनसत्ता’ के संपादक ओम थानवी को ‘मुअनजोदड़ो’ पर ‘बिहारी पुरस्कार’

नयी दिल्ली : ‘जनसत्ता’ के संपादक एवं लेखक ओम थानवी को वर्ष 2014 का 24वां बिहारी पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। के.के. बिड़ला फाउंडेशन के निदेशक सुरेश ऋतुपर्ण ने थानवी को उनकी यात्रा वृत्तांतपरक चर्चित पुस्तक ‘मुअनजोदड़ो’ के लिए यह पुरस्कार देने की घोषणा की है। इस पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2011 में हुआ था। थानवी को पुरस्कार के रूप में 1 लाख रुपए, प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिह्न प्रदान किया जाएगा। इससे पूर्व उन्हें शमशेर सम्मान, सार्क सम्मान, केंद्रीय हिंदी संस्थान सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। वह निरंतर लेखनरत रहते हुए वर्तमान में साहित्य, समाज, राजनीति, शिक्षा, पत्रकारिता आदि विषयों पर त्वरित टिप्पणियों के लिए हिंदी क्षेत्र में सुप्रसिद्ध हैं।

मीडिया कौन सा दूध का धुला है, बाजारू या बिकाऊ कहने पर आपत्ति जताना ठीक नहीं : ओम थानवी

वीके सिंह कहते हैं, देश का दस फीसद मीडिया ‘बाजारू’ है। लगता है वे लिहाज करने लगे वरना, मेरा खयाल है, यह प्रतिशत कहीं ज्यादा ही होगा। 

हमने प्रभाष जोशी का असहाय चेहरा देखा है

हम जिन्हें प्रभाष जोशी से बेहतर संपादक मानते हैं, वे क्यों अरविंद केजरीवाल का पक्ष लेंगे, इसके लिए मामूली सबएटीटर होकर भी हमने ओम थानवी के खिलाफ सवाल उठाये थे तो आज मेरा सवाल जनपक्षधर सारे लोगों से है कि जनपक्षधरता आपपक्ष क्यों बनती जा रही है।

भाड़ में जाए यह जनसत्ता की नौकरी जो नवभारत टाइम्स व हिंदुस्तान से कम वेतन देता था

Shambhunath Shukla : 1983 में जब दिल्ली आया तो शुरू-शुरू में राजघाट के गेस्ट हाउस में रहा करता था। जनसत्ता के संपादक दिवंगत प्रभाष जोशी ने मेरा, राजीव शुक्ल और सत्यप्रकाश त्रिपाठी के रहने का इंतजाम वहीं पर करवा दिया था। उस गेस्ट हाउस की खास बात यह थी कि वहां पर लंच व डिनर में अरहर की दाल भी मिलती थी। यह दाल हमारी सबसे बड़ी कमजोरी थी। इतनी अधिक कि हम जनसत्ता की नौकरी छोड़ वापस कानपुर जाने की ठान रखे थे। और तब चूंकि दिल्ली के ढाबों में छोले-भटूरे व मां-चने की दाल के सिवाय कुछ नहीं मिलता था इसलिए हमने ठान लिया था कि हम कानपुर लौट जाएंगे।

भाड़ में जाए जनसत्ता की नौकरी, ठान लिया कि कानपुर लौट जाएंगे

(आज उन्हीं भवानी बाबू यानी भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म दिन है।) 1983 में जब दिल्ली आया तो शुरू-शुरू में राजघाट के गेस्ट हाउस में रहा करता था। जनसत्ता के संपादक दिवंगत प्रभाष जोशी ने मेरा, राजीव शुक्ल और सत्यप्रकाश त्रिपाठी के रहने का इंतजाम वहीं पर करवा दिया था। उस गेस्ट हाउस की खास बात यह थी कि वहां पर लंच व डिनर में अरहर की दाल भी मिलती थी। यह दाल हमारी सबसे बड़ी कमजोरी थी।इतनी अधिक कि हम जनसत्ता की नौकरी छोड़ वापस कानपुर जाने की ठान रखे थे। और तब चूंकि दिल्ली के ढाबों में छोले-भटूरे व मां-चने की दाल के सिवाय कुछ नहीं मिलता था इसलिए हमने ठान लिया था कि हम कानपुर लौट जाएंगे। भाड़ में जाए यह जनसत्ता की नौकरी जो नवभारत टाइम्स व हिंदुस्तान से कम वेतन देता था।

जनसत्‍ता में सब कुछ ठीक नहीं जान पड़ता है… कुछ तो गड़बड़ है…

Abhishek Srivastava : दिल्‍ली के मोतीलाल नेहरू कॉलेज में चल रही मीडिया संगोष्‍ठी के एक सत्र में कल जनसत्‍ता के पत्रकार मनोज मिश्र और डॉ. राजेंद्र धोड़पकर वक्‍ता थे। दोनों लोगों ने भाषा के मामले में प्रभाष जोशी और जनसत्‍ता को याद किया। मनोज मिश्र ने बताया कि कैसे जनसत्‍ता में प्रभाषजी ने पत्रकारिता की एक नई भाषा गढ़ी जिसकी बाद में सारे इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया ने नकल मार ली। आप आज का और 23 तारीख का जनसत्‍ता उठाकर देखिए, समझ में आ जाएगा कि पत्रकार खुद अपना अखबार क्‍यों नहीं पढ़ते हैं और अतीत के गौरव में जीना क्‍यों पसंद करते हैं।


अखबार या परचा? प्रधानमंत्री की कही बात को अपने मुंह में डाल लेना कौन सी समझदारी है भाई?

कौन नामजद- बाप या बेटा?


हिंदी अखबार के उप संपादक छोकरे और अंग्रेजी अखबार की कन्या का लव जिहाद!

साल 1988 की बात है। मैं तब जनसत्ता में मुख्य उप संपादक था और उसी साल संपादक प्रभाष जोशी ने जनसत्ता के राज्यों में प्रसार को देखते हुए एक अलग डेस्क बनाई। इस डेस्क में यूपी, एमपी, बिहार और राजस्थान की खबरों का चयन और वहां जनसत्ता के मानकों के अनुरूप जिला संवाददाता रखे जाने का प्रभार मुझे सौंपा। तब तक चूंकि बिहार से झारखंड और यूपी से उत्तराखंड अलग नहीं हुआ था इसलिए यह डेस्क अपने आप में सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा जिम्मेदारी को स्वीकार करने वाली डेस्क बनी। अब इसके साथियों का चयन बड़ा मुश्किल काम था। प्रभाष जी ने कहा कि साथियों का चयन तुम्हें ही करना है और उनकी संख्या का भी।

जनसत्ता अखबार में नौकरी शुरू करने के कुछ समय बाद ही समझ में आ गया कि मैं इस पेशे में गलत आ गया हूं

Sanjaya Kumar Singh :  हिन्दी, हिन्दी की नौकरी, अर्ध बेरोजगारी और हिन्दी में बने रहना… जनसत्ता में उपसंपादक बनने के लिए लिखित परीक्षा पास करने के बाद इंटरव्यू से पहले ही सहायक संपादक बनवारी जी ने बता दिया था कि प्रशिक्षु रखा जाएगा और (लगभग) एक हजार रुपए महीने मिलेंगे। इतने में दिल्ली में रहना मुश्किल है, रह सकोगे तो बताओ। मैंने पूछा कि प्रशिक्षण अवधि कितने की है। बताया गया एक साल और फिर पूरे पैसे मिलने लगेंगे। पूरे मतलब कितने ना मैंने पूछा और ना उन्होंने बताया। बाद में पता चला कि प्रशिक्षण अवधि में 40 प्रतिशत तनख्वाह मिलती है। पूरे का मतलब अब आप समझ सकते हैं। मेरे लिए उस समय भी ये पैसे कम नहीं, बहुत कम थे।