जनसत्ता में ‘दुनिया मेरे आगे’ स्तंभ शुरू होने की कहानी बता रहे पत्रकार उमेश चतुर्वेदी

Umesh Chaturvedi : नवभारत टाइम्स में जब मेरे गुरू डॉक्टर रघुवंश मणि पाठक के गुरू और हिंदी के प्रकांड विद्वान पंडित विद्यानिवास मिश्र संपादक थे, तब संपादकीय पृष्ठ पर एक स्तंभ सिर्फ रविवार को छोड़कर हफ्ते में छह दिन प्रकाशित होता था -निर्बंध..तब अच्युतानंद मिश्र वहां कार्यकारी संपादक थे..चूंकि मैं हिंदी में एमए करके पत्रकारिता करने आया था, लिहाजा उन दिनों हिंदी की प्रकीर्ण विधाओं मसलन डायरी, गद्यगीत, ललित निबंध आदि से मेरा कुछ ज्यादा ही लगाव था। निर्बंध कुछ-कुछ ललित निबंध जैसा ही स्तंभ था..उन दिनों अपनी भी कच्ची-पक्की लेखनी से लिखे आलेख निर्बंध में छपे।

बाद में जब अच्युतानंद मिश्र जी जनसत्ता के संपादक बने तो उन्होंने अखबार को रिलांच करने की योजना बनाई। कोशिश भी की, क्यों नाकाम हुई, ये तो वही बताएंगे। लेकिन उन दिनों तक उनका स्नेह मुझे और भाई अजित राय को खूब मिलना शुरू हो गया था। उस स्नेह हासिल करने में तब के प्रतापी अखबार जनसत्ता में नौकरी पाने की लालचभरी उम्मीद भी छुपी हुई थी। उन्हीं दिनों मैंने अपनी सीमा जानने के बावजूद एक सुझाव दिया था..जनसत्ता में भी निर्बंध जैसा स्तंभ छपना चाहिए। मैं तब बहुत छोटा और बच्चा ही था। इसलिए इसका श्रेय तो मैं नहीं ले सकता। लेकिन इतना जरूर है कि तब शायद ऐसा कुछ अच्युता जी के दिमाग में भी चल रहा था। इसलिए संपादकीय पेज का जब नया लेआउट उन्होंने तैयार किया तो उसमें निर्बंध जैसा भी स्तंभ जरूर रहा। जिसे लोग ‘दुनिया मेरे आगे’ नाम से जानते हैं।

तब से लेकर यह स्तंभ लगातार ना सिर्फ चल रहा है, बल्कि काफी लोकप्रिय भी है। इस स्तंभ में पहला आलेख अच्युताजी ने ही लिखा था- संपादक की भाषा-। हाल में जनसत्ता के मौजूदा संपादक मुकेश भारद्वाज जी से मुलाकात हुई तो उन्होंने दुनिया मेरे आगे की लोकप्रियता बने रहने की जानकारी दी। इस स्तंभ में पहले भी काफी छपा हूं..लेकिन भारद्वाज जी की जानकारी के बाद मैं लोभ संवरण नहीं कर पाया और एक आलेख भेज दिया। वही आज के जनसत्ता में साया आलेख आपके सामने है। आभार मुकेश जी…

वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी की एफबी वॉल से.

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जनसत्ता के संपादकजी अपना चंडीगढ़ का सरकारी मकान बचाने के लिए क्या कुछ नहीं कर रहे हैं!

अपन एकदम सही थे। जो सलाह कभी भजनलाल को दी थी, इस पर अगर आज की सरकार भी अमल कर ले तो उसे पत्रकारों और पत्रकारिता की ओर से कभी कोई संकट पैदा नहीं होगा। अपना शुरू से मानना रहा है कि मकान ऐसी चीज है जिसे लेकर कोई भी इंसान कुछ भी कर गुजरने या कितना भी नीचा झुकने के लिए तैयार नजर आता है। उन दिनों भजनलाल पत्रकारों से बहुत परेशान थे। एक बार कहने लगे कि मैंने न जाने कितने पत्रकारों को अपने विवेकाधीन कोटे से प्लाट देकर उन्हें लखपति बनाया पर इन लोगों की आंख में तो सुअर का बाल है मतलब निकलते ही आंखें दिखाने लगते हैं। ऐसे लोगों का क्या क्या किया जाए?

मैंने उन्हें सुझाव दिया कि बेहतर होता कि आप उन्हें प्लाट बांटने की जगह उनके लिए सरकारी फ्लैट बनवाते और उसे उन्हें आवंटित कर देते। जब भी कोई आपके खिलाफ लिखता तो उसे प्यार से बुलाकर समझा देते। मैंने उन्हें एक बड़ी समाचार एजेंसी के मैनेजर का किस्सा सुनाया जो कि मंडी हाउस स्थित पंजाब सरकार के मकान में रहते थे। वे ज्ञानी जैल सिंह के काफी करीब थे। उन्होंने ही उनको दशकों पहले यह मकान आवंटित करवाया था। किराया कोई 70-75 रुपए रहा होगा। पर अगर वे किराया देते तो उन पर रेकेटियर होने का आरोप लग जाता क्योंकि जिस पत्रकार के घर में मीट मुरगा से लेकर सब्जी तक उपहार में आती हो वो पैसे देने या सरकार उससे किराया लेने का दुस्साहस कैसे कर सकती थी?

एक बार उन्होंने प्रकाश सिंह बादल सरकार को अपना निशाना बनाया। मुख्यमंत्री ने उन्हें समझाया। वे नहीं माने तो उन्होंने करीब डेढ़ करोड़ रुपए की रिकवरी का नोटिस भेज दिया। उस मकान का मार्केट रेंट लगाकर यह गणना की गई थी। नोटिस मिलते ही उनकी हवा खराब हो गई और अगले दिन वे उनके दरबार में शामिल होकर माफी मांग आए पर वह सब उन्होंने नितांत एकांत में किया। किसी ने उन्हें माफी मांगते या बादल की चंपूगिरी करते हुए नहीं देखा।

पर अब जो कुछ हो रहा है उसके लिए तो शर्मनाक शब्द कहने में भी शर्म आ जाए। कभी सबकी खबर लेने व देने वाले अखबार के संपादकजी अपना चंडीगढ़ का सरकारी मकान बचाने के लिए जो कुछ कर रहे हैं उसे सुन पढ़कर तो चुल्लू भर पानी में डूब मरने का मन करता है। बाहर से दिल्ली आने वाले तमाम पत्रकार लंबे अरसे तक अपने उस पुराने शहर से लगाव समाप्त नहीं कर पाते हैं जहां से उन्होंने पत्रकारिता शुरू की थी। ठीक वैसे ही जैसे कि एच डी देवगौड़ा व सीएम इब्राहीम प्रधानमंत्री व केबिनेट मंत्री होते हुए भी हर हफ्ते कर्नाटक भागते थे। यही हाल इन संपादक का भी है। दिल्ली में भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय में मान्यता के लिए आवेदन कर रखा है। चंडीगढ़ में अपना मकान किराए पर दिया हुआ है। परिवार पत्नी को मिले उनके दफ्तर के मकान में रहता है। जब कि वे वहां का सरकारी मकान बनाए रखना चाहते हैं।

मकान बनाए रखने के लिए क्या-क्या कर रहे है, यह सुनकर सिर शर्म से झुक जाता है। कभी संघ से जुड़े नेता का इंटरव्यू लेने के लिए उसके दफ्तर पहुंच जाते हैं। तो कभी अखबार के पूर्व वरिष्ठ पत्रकार का 6 कालम में इंटरव्यू महज इसलिए छाप देते हैं क्योंकि उनका परिचित राज्यपाल का सलाहकार है। तो कभी गृहमंत्री के करीबी लोगों की चंपूगीरी करते हैं। हाल ही में तो तब हद हो गई जब इसी कड़ी के चलते एक अपराधी छवि वाले नेता का लंबा चौड़ा लेख छाप दिया गया क्योंकि वह सत्ता के गलियारों के काफी करीब है। इससे ज्यादा घटिया काम और क्या हो सकता है कि जिस अखबार में कभी केंद्रीय मंत्री अपने बारे में दो पैरे छपने पर अनुग्रहीत महसूस किया करते थे वहीं आज अपराधिक छवि वाले नेताओं के लेख सिर्फ इसलिए छापे जा रहे हैं ताकि घर बचाया जा सके।

उफ! ये वही पत्रकार है जो कि सरकार के सामने सीना चौड़ा करके कहते हैं कि पत्रकारिता की नैतिकता के मानदंड तैयार करने की जिम्मेदारी हम पर छोड़ दीजिए। हम खुद तय करेंगे कि क्या नैतिक व अनैतिक है। पर जब सरकारी मकान बनाए रखने की बात आती है तो बिना कहे अपना पायजामा खोल कर खड़े हो जाते हैं। कई बार तो लगता है कि मैं बहुत अच्छे समय रिटायर हो गया वरना आज न जाने क्या दिन देखने पड़ते। जो अखबार कभी सर्कुलेशन और धमक में देश का सबसे अग्रणी था आज उसका दोनों ही मानकों पर इतना पतन हो चुका है कि वह नीचे से नंबर वन है। यों अपना मानना है कि सर्कुलेशन और विश्वसनीयता में कोई संबंध नहीं होता है। अक्सर कम प्रसार संख्या वाले अखबारों की भी विश्वसनीयता बड़ी होती है। विश्वसनीयता तो उस हाथी की तरह होती है जो कि पूरे जीवन में दो बच्चे देता है। इसलिए हर हफ्ते हजारों अंडे देने वाली मक्खी से उसकी संख्या के आधार पर तुलना करना उसे नीचा दिखाने जैसा होगा।

यह सब इसलिए लिखना पड़ा कि अभी जनसत्ता से रिटायर हुए ज्यादा समय नहीं हुआ है। आज भी जनसत्ता पढ़ रहा हूं। यह जानते हुए भी कि उसमें क्या छप रहा है। वह तो जीवन का एक अभिन्न अंग समान है। वह तो भैंस के मरे हुए उस पड़वे की ठठरी की तरह है जिसे चाटे बिना उसके थनों में दूध नहीं उतरता है। यह शायद पूजा पाठ का ही फल है कि जनसत्ता ने पत्रकारिता में दबंगई और निष्पक्ष लेखन की जो दौड़ शुरू की थी वह आज भी जारी है। जब जनसत्ता दौड़ से अलग हुआ तो ‘नया इंडिया’ ने रेस का मौका दे दिया। अपनी किस्मत भी ऐसी रही कि कभी किसी की चंपूगीरी करने के लिए न तो मजबूर किया गया और न ही खुद को दिल्ली प्रेस से लेकर आज तक जहां भी नौकरी की सब के मालिक, पत्रकारों को सिर्फ पत्रकारिता करने के लिए रखते थे। रामनाथ गोयनका ने एक बार किसी इंटरव्यू में कहा था कि मैं संपादक अखबार निकालने के लिए रखता हूं क्योंकि मेरे निजी काम तो मेरे अपने फोन से ही हो जाते हैं। आज उस प्रकाशन समूह में संपादक की इतनी दुर्गति हो चुकी है कि संपादक का अपना काम ही नहीं हो पा रहा है। बेचारा पत्रकारिता क्या खाक करेगा? अच्छा हुआ कि गोयनकाजी नहीं रहे वरना यह सब देखकर वे आत्महत्या कर लेते!

प्रभाष जोशी से लेकर व्यासजी तक ने कभी सरकार से किसी तरह का काम करवाने को नहीं कहा। कभी किसी रिपोर्टर से यह नहीं कहा गया कि हमें खबर लिखते समय किन लोगों का विशेष ध्यान रखना है। हालांकि यही परंपरा बाद में अखबार के साथ डूबने लगी। बाद में संपादक तो मुगलिया शासक हो गए जो कि जबरन खबरों की सुन्नत करवाने पर आमादा नजर आते थे। उनके ईष्ट के खिलाफ कही गई बात उनके रिपोर्टर को काफिर करार कर देती थी।

‘नया इंडिया’ में प्रकाशित विवेक सक्सेना के लेख का सम्पादित अंश.

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लड़ाई ऐसे नहीं लड़ी जाती शशि शेखर जी

पटना में अपने संवाददाता की हत्या के बाद दैनिक हिन्दुस्तान अपने संवाददाता के साथ है, यह बड़ी बात है। मुझे नहीं पता पीड़ित संवादादाता हिन्दुस्तान के पेरॉल पर थे या स्ट्रिंगर। लेकिन इतिहास गवाह है, हिन्दी अखबार का संवाददाता मरता है तो वह स्ट्रिंगर ही होता है। मरने के बाद उसका संस्थान उससे पल्ला झाड़ लेता है। हिन्दुस्तान ने ऐसा नहीं किया बहुत बड़ी बात बात है। इसके लिए पूरे संस्थान की प्रशंसा की जानी चाहिए। पर संपादक जी एक दिन बाद जगे और लिख रहे हैं हम लड़ेंगे क्योंकि जरूरत है। बहुत ही लिजलिजा है।

इससे अच्छा संदेश तो पटना की टीम ने हत्या के बाद जो एडिशन निकाला उससे दे दिया था। कहने की जरूरत नहीं है, लाजवाब निकाला। लड़ने का तेवर वहां दिख रहा था। आपका लिखा तो औपचारिकता है। नौकरी बजाना है, शर्मनाक है। आपका लिखा पढ़कर मुझे याद आया जब इंडियन एक्सप्रेस की हड़ताल के दौरान जनसत्ता के तीन लोग घायल हुए थे तो इंडियन एक्सप्रेस प्रबंधन के साथ जनसत्ता ने क्या रुख अपनाया था और क्या तेवर था।

ठीक है, वह झगड़ा हड़ताल को लेकर था लेकिन एक्सप्रेस मैनेजमेंट उसे सरकार से लड़ाई के रूप में ले रहा था और वैसे ही तेवर थे। आप लड़ेंगे क्योंकि जरूरत है जमा नहीं। जरूरत तो बहुत पहले से है। आप अभी जगें हैं और नीन्द में ही लग रहे हैं। पाठकों के लिए मैं अपनी अप्रकाशित पुस्तक से एक्सप्रेस मैनेजमेंट की घोषणा और प्रभाष जी का लिखा पेश कर रहा हूं। यह बताने के लिए कि लड़ा कैसे जाता है। प्लेसमेंट के लिहाज से ही देखें तो पेज वन बॉटम हार्ड न्यूज नहीं होता है। प्लेसमेंट ही बहुत कुछ कह रहा है।

प्रबंधन की घोषणा 

दो दिसंबर 1987 को जारी कंपनी प्रबंधन की घोषणा के बारे में जनसत्ता ने लिखा था, “प्रबंधन ने जनसत्ता के बहादुर पत्रकारों पर कायराना हमले की निन्दा की है। प्रबंधन ने कहा है कि जनसत्ता के प्रदीप कुमार सिंह, संजय कुमार सिंह और महादेव चौहान पर टीएम नागराजन के गुंडों ने हमला किया। नागराजन गुंडों और कुछ बाहरी राजनैतिक ताकतों की मदद से इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता के दिल्ली के संस्करणों को बंद कराने पर तुले थे। दिल्ली दफ्तर के बहादुर साथियों ने उनकी कोशिश को नाकाम कर दिया। जनसत्ता के ये तीन साथी भी इन्हीं में से थे। जनसत्ता और एक्सप्रेस को निकालने के संकल्प के साथ जुटे इन युवकों की कोशिशों से दोनों अखबार निकले पर गुंडे नहीं चाहते थे कि अखबार हॉकरों तक पहुंच पाए। जब तक प्रदीप कुमार सिंह, संजय सिंह और महादेव चौहान जैसे लोग रहेंगे जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस को निकलने से कोई नहीं रोक सकता। 

प्रबंधन को इन बहादुर साथियों पर हुए हमले से गहरी ठेस पहुंची है। वह इन युवकों के साहस के सामने श्रद्धा से सिर झुकाता है क्योंकि वे खतरे से आमने सामने मुकाबला करते हुए घायल हुए हैं ना कि उससे कतराते हुए। हमले में पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल, मनोज चतुर्वेदी और अजय शर्मा भी घायल हुए हैं। ये युवक दिन भर की मेहनत को अखबार विक्रेताओं तक पहुंचाने की गारंटी करने का असाधारण काम कर रहे थे। वह अखबार पहुंचाने वाली गाड़ियों की पहरेदारी कर रहे थे। प्रबंधन की घोषणा में कहा गया है कि वह सच्चाई के हक में इन साथियों के समर्थन की कोई भरपाई नहीं कर सकता लेकिन कृतज्ञता के एक छोटे से प्रतीक के रूप में प्रबंधन ने प्रदीप कुमार सिंह, संजय सिंह और महादेव चौहान के लिए 10,001 रुपए प्रत्येक और मनोज चतुर्वेदी, शंभूनाथ शुक्ल और अजय शर्मा के लिए 2001 रुपए प्रत्येक की कृतज्ञता राशि की घोषणा की है। (इस घोषणा के साथ हमले की खबर जनसत्ता, इंडियन एक्सप्रेस और फाइनेंशियल एक्सप्रेस – तीनों में प्रमुखता से छपी थी।)

प्रभाष जोशी ने लिखा था 

3 दिसंबर 1987 के जनसत्ता में पहले पेज पर छपी खबर के साथ प्रभाष जोशी का विशेष आलेख भी था। “तेजाब से बची आंखें”, शीर्षक से उन्होंने लिखा था, “एक्सप्रेस बिल्डिंग के कोने में लगे तंबू से कुछ थके लोग नारे लगा रहे हैं – मजदूर, मजदूर भाई-भाई और मजदूर एकता जिन्दाबाद। इन्हीं में से तीन-चार लोगों ने परसों रात जनसत्ता के उन आठ साथियों पर गुंडों से तेजाब, पत्थरों, लाठियों और सरियों से हमला करवाया जो प्रसार विभाग के मजदूरों की रक्षा में अपने दफ्तर से प्रताप भवन जाकर लौट रहे थे। इन उप संपादकों और संवाददाताओं से प्रसार विभाग के साथियों ने संरक्षण मांगा था क्योंकि हिंसा आतंक और सरकारी मदद से “हड़ताल” करने वाले मजदूर नेताओं ने अखबार न बंटने देने की धमकी दे रखी थी। लेकिन जनसत्ता के ये साथी अड़तालीस दिन बाद निकले अपने अखबार को पाठकों तक पहुंचाना चाहते थे। टाइम्स बिल्डिंग के सामने कोई पंद्रह-बीस लोगों ने उनपर घात लगाकर हमला किया। तेजाब से अपनी आंखें बचाकर भागते साथियों में से ट्रेनी उपसंपादक संजय सिंह गिर गया। उस लड़के को इन “हड़ताल बहादुरों” ने इतना पीटा कि सिर पर दर्जन भर टांके आए। 

इस हमले के डेढ़ घंटे बाद आए एसीपी वीरेन्द्र सिंह ने वहां तैनात बीसियों पुलिस वालों से यह नहीं पूछा कि उनके होते हुए हमला कैसे हुआ और हमलावर क्यों नहीं पकड़े गए। उन्होंने कहा कि इन जर्नलिस्टों को रात में वहां जाने की क्या जरूरत थी? दरियागंज पुलिस ने कहा कि ये पत्रकार चाय पीने निकले थे और हड़तालियों के तंबू के सामने से गुजरे इसलिए झगड़ा हो गया। लेकिन एसीपी वीरेन्द्र सिंह की सीख और पुलिस की गलतबयानी का क्या गिला? जिस बिल्डिंग के सामने इन पत्रकारों पर हमला हुआ वहां से निकलने वाले टाइम्स ऑफ इंडिया के स्वनामधन्य संपादक गिरिलाल जैन से कोई पूछे तो वे भी कहेंगे कि पत्रकारों को अखबार निकालने की जरूरत क्या थी? हड़ताल है अपने घर में बैठो। पत्रकार का आखिर क्या रोल है? क्या वह अंगरक्षक है जो अखबार लादने वालों के साथ जाए? उसका काम गुंडों से मजदूरों को पिटते देखना है और जब उसके खुद के साथ ही कोई बदसलूकी हो तो अपने अखबार में हड़ताल करवा के दूसरे दिन संपादकीय लिखना है। पत्रकार पर्यवेक्षक है जबतक उसकी कार रोककर पुलिस आईडेंटिटी कार्ड न मांगे। अगर पुलिस ऐसा कर दे तो पत्रकार को तथ्यों से आंख मूंदकर लिखने की आजादी है लेकिन यह भी तभी तक जब तक सरकार न रोके। 

ऐसे गिरिलाल जैन सब तरफ हैं इसलिए 28 अक्तबूर को अपना अखबार निकालने की एक्सप्रेस के लोगों की कोशिश पर जमीन आसमान एक कर देने वाले वाले आज चुप हैं। वे दबी जुबान से इसकी निन्दा भी नहीं करते हैं क्योंकि जैसा कि दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट की एक बैठक में कोई महासंघ के किसी अध्यक्ष संतोष कुमार ने कहा था, ‘हड़तालों में तो ऐसी हिंसा होती ही है।’ यूनियन हिंसा हिंसा न भवति! जनसत्ता के सोलह पत्रकार साथी यूनियन नेताओं के बताने पर गुंडों से पिट चुके हैं। न पुलिस ने कुछ किया है न पत्रकारों के वाचाल संघों ने। भले ही लोकतंत्र हो, सरकार की थोपी गई हड़ताल को तोड़ने और अखबार निकालने की कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। संजय सिंह, प्रदीप सिंह, महादेव चौहान और मंगलेश डबराल ने अपने खून से यह कीमत चुका दी है और अभी किसी का भी उत्साह चुका नहीं हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया था कि एक्सप्रेस बिल्डिंग से 50 मीटर दूर तक धरना देना वालों को पहुंचाया जाए। उन्हें नहीं हटाया गया। पुलिस को एक्सप्रेस के लोगों के आने-जाने की सुरक्षा करने को कोर्ट ने कहा था। और बिल्डिंग के बाहर बीसियों पुलिस वालों के बावजूद तंबू से निकले लोगों ने हमला करवा दिया और वापस आकर सो गए लेकिन पुलिस ने नहीं देखा। जब घायल पत्रकार पानी के लिए चिल्लाते एक्सप्रेस भवन में भागे आए और उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया गया तब भी पुलिस को कुछ मालूम नहीं हुआ। जब एक्सप्रेस के लोग हल्ला करते हुए पुलिस के पीछे पड़े तो किसी अफसर ने पूछा – कहां हुआ हमला, क्यों हल्ला मचा रहे हो ! मौके पर तैनात दरियागंज के थानेदार कालिया को जीप में सोते हुए से मैंने जब जगाया तो हमला हुए को आधा घंटा हो गया था। इसके बाद से रक्षा में तैनात पुलिस लगातार शिकायत करती रही कि पत्रकारों को बाहर जाने की क्या जरूरत थी और जाना ही था तो बता कर क्यों नहीं गए? सोने वालों और हमला होते हुए न देखने वालों को बताने से फायदा? पुलिस की पहरेदारी और वफादार प्रेस की पहरेदारी में कोई फर्क नहीं है। संजय सिंह, प्रदीप सिंह और महादेव चौहान भगवान की कृपा मानो कि मुंह पर फेंके गए तेजाब से तुम्हारी आंखें बच गईं। यही आंखें तुम्हे अपनी पत्रकारिता की सच्चाई दिखाएंगी।”

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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शैलेंद्र की जनसत्ता कोलकाता से हो गयी विदाई, अगले हफ्ते मेरी बारी

माननीय ओम थानवी का आभार कि शैलेंद्र जी और मेरे करीबन पच्चीस साल एक साथ काम करते हुए साथ साथ विदाई की नौबत आ गयी। पिछले साल जब शैलेंद्र रिटायर होने वाले थे, तब हमने उनसे निवेदन किया था कि 1979 से शैलेंद्र हमारे मित्र रहे हैं और अगले साल मेरी विदाई है तो कमसकम उन्हें एक साल एक्सटेंशन दे दिया जाये। वैसे ओम थानवी से मेरे संबंध मधुर नहीं थे लेकिन उनने तुरंत फेसबुक पर सूचना करीब दो महीने पहले दे दी कि शैलेंद्र की सेवा जारी है।

अबकी दफा आज तक हमें मालूम नहीं था कि शैलेंद्र जा रहे हैं जबकि डेस्क पर हम लोग कुल पांच लोग थे। शैलेंद्र, मैं, डा.मांधाता सिंह, जयनारायण और रामबिहारी। राम बिहारी वेज बोर्ड पर नही हैं। चूंकि दस्तूर है कि संपादक मैनेजर की सेवा में विस्तार सामान्य बात है और उपसंपादक विदा कर दिये जाते हैं। हम मान रहे थे कि इस बार हम विदा होंगे जरूर, लेकिन शैलेंद्र रहेंगे। वैसा नहीं हुआ।

माननीय प्रभाष जोशी ने आईएएस जैसी परीक्षा लेकर हमें चुना तो उनने अगस्त्य मुनि की तरह जो यथावत रहने का वरदान दिया,उसके मुताबिक हम यथावत विदा हो रहे हैं हालांकि मजीठिया वेतन बोर्ड में दो प्रमोशन का प्रावधान है। वेतनमान बदल गया है लेकिन हैसियत नहीं बदली। अखबार भी अब खबरों का अखबार हो गया है और संपादक भी बदल गये हैं। जिन्हें मैं निजी तौर पर नहीं जानता। वे कृपापूर्वक कोलकाता आये और हमने उनसे कहा कि दस साल तक कोलकाता कोई संपादक आये नहीं हैं तो आप आये हैं तो आपका आभार।

हमने उनसे कहा कि हमें अब तक कुछ नहीं मिला तो आगे भी कोई उम्मीद नहीं है और न हमारी कोई मांग है। वैसे भी हम जा रहे हैं तो हम बस इतना चाहते हैं कि हमारे साथी रामबिहारी का वेतन थोड़ा बढ़ा दिया जाये और स्ट्रींगरों का कुछ भला हो जाये। हमें तब भी उम्मीद थी कि अगर संस्करण जारी रहता है तो कमसकम शैलेंद्र बने रहेंगे। कल तक यही उम्मीद बनी हुई थी जबकि हम जाने की पूरी तैयारी कर चुके हैं और बाद में क्या करना है, यह भी तय कर चुके हैं।

मेरे जाने से हफ्तेभर पहले ही शैलेंद्र की विदाई 25 साल का साथ छूटने का दर्द दे गयी और इसके लिए हम कतई तैयार न थे। खुशी इस बात की है कि कोलकाता में हम लोग एक परिवार की तरह आखिर तक बने रहे। अब यह परिवार टूटने के आसार हैं।  जिस तेजी से सूचना परिदृश्य बदला है, उससे परिवर्तन तो होना ही था और इस परिवर्तन में जाहिर है कि सनी लिओन की प्रासंगिकता हो भी सकती है, हिंदी पत्रकारिता और साहित्य में हमारी कोई प्रसंगिकता नहीं है। जाते जाते हमें कोई अफसोस नहीं है।

मामूली पत्रकार होने के बवजूद जनसत्ता में होने की वजह से जो प्यार, सम्मान और पहचान मुझे मिली, मेरी जाति और मेरे तबके के लोगों के लिए इस केसरिया समय में हासिल करना बेहद मुश्किल है। फिर पिछले 25 साल में अपनी बातें कहने लिखने और संपादक की आलोचना तक कर देने की बदतमीजियां जैसे मैंने की, उसके मद्देनजर मुझे किसी भी स्तर पर रोका टोका नहीं गया। हम संपादक या मैनेजर नहीं हुए, इसका भी कोई अफसोस नहीं है। हमने विशुद्ध पत्रकारिता की है चाहे कोई हैसियत हमारी हो न हो, जनसत्ता ने हमें इतनी आजादी दी, इसके लिए हम आभारी हैं।

शैलेंद्र से हमारी मुलाकात 1979 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में डा.रघुवंश की कक्षा में हुई थी, जहां इलाहाबाद पहुंचते ही शैलेश मटियानी जी ने मुझे भेज दिया था। इलाहाबाद में मैं जबतक रहा तब तक लगातार हम साथ साथ रहे। वैसे शुरू से शैलेंद्र वामपंथी रहे हैं और पत्रकारिता में भी उनने वामपंथ का निर्वाह किया और यह आज के केसरिया दौर में उनकी अपनी उपलब्धि है। इलाहाबाद में तब वामपंथी कम नहीं थे। उदितराज तब रामराज थे और एसएफआई के सक्रिय कार्यकर्ता थे और जिनके साथ वे जेएनयू लैंड हुए, वे देवीप्रसाद त्रिपाठी भी वामपंथी थे।

अनुग्रह नारायण सिंह तब एसएफआई की तरफ से इलाहाबाद विश्विद्यालय के अध्यक्ष थे जिनने सबसे पहले दलबदल किया। इसलिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय की मौजूदा अध्यक्ष की राजनीति पर मुझे कोई अचरज नहीं हुआ। रीता बहुगुणा भी पीएसओ से इलाहाबाद विश्वविद्यालय की उपाध्यक्ष बनी थीं। तमाम लोग बदल गये लेकिन शैलेंद्र नहीं बदले और न हम बदले। हम जब तक रहे, पूरे मिजाज और तेवर के साथ रहे, शायद जनसत्ता जैसे अखबार की वजह से ऐसा संभव हुआ।

शायद प्रभाष जी संपादक थे तो हम लोगों की नियुक्तियां जनसत्ता में हो सकीं और हमने पच्चीस साल बिता भी लिये। वैसे अपने सरोकार और सामाजिक सक्रियता जारी रखते हुए दैनिक आवाज में अप्रैल 1980 से शुरू पत्रकारिता 2016 तक बिना किसी व्यवधान के जारी रख पाना कुदरत का करिश्मा ही कहा जायेगा। अब मौसम बदल रहा है। फिजां बदल रही है। देश मुक्तबाजार है तो पत्रकारिता भी मुक्तबाजार है।

सूचना और विचार की बजाय सर्वोच्च प्राथमिकता बाजार और  मनोरंजन है और हम जैसे बूढ़े लोग न बाजार के लायक हैं और न मनोरंजन के लिहाज से काम के हैं, इसलिए ऐसा होना ही था। हिंदी समाज के लिए जनसत्ता के होने न होने के अलग मतलब होसकते हैं।आज के दौर में नहीं भी  हो सकते हैं। बहरहाल हम चाहते हैं कि हम रहे या न रहे, जनसत्ता अपने मिजाज और तेवर के साथ जारी रहे।

लेखक पलाश विश्वास जनसत्ता कोलकाता में कार्यरत हैं.

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‘जनसत्ता’ जिस हाल में निकल रहा है उसमें यही समझना मुश्किल हो गया है कि निकल किस लिए रहा है!

Sanjaya Kumar Singh : जनसत्ता एक अच्छा अखबार था और जब खराब होना शुरू हुआ तो लगातार खराब होता गया। उसका कोई ग्राफ नहीं बना। कुंए में (गड्ढे) में जाती बाल्टी की तरह सीधी रेखा बनती जा रही है। मैं समझ रहा था कि बाल्टी मराठवाड़ा के किसी कुंए में छोड़ दी गई है पड़ी हुई है। लेकिन अच्छे अखबार के पाठक भी अच्छे होते हैं और बता देते हैं कि जनसत्ता आज कैसे और नीचे गया। एक दिन मैं भी लिखने बैठा था तो लगा कहां दीवार पर सिर मारूं।

पर आज ‘अलविदा जनसत्ता’ पढ़कर लगा कि संस्थान इससे खुश होगा या दुखी। जनसत्ता जिस हाल में निकल रहा है उसमें यही समझना मुश्किल हो गया है कि निकल किस लिए रहा है। एक समय था कि एक पाठक की प्रतिक्रिया को जनसत्ता में प्रमुखता से छापा गया था उसके उसे साथ नोट लगा था कि यह सिर्फ कड़वा-कड़वा है। मीठा-मीठा निकाल लिया गया है। बाद में लिखने वाले जनसत्ता में सहायक संपादक बने। अब इस पाठक की सार्वजनिक चिट्ठी जनसत्ता के बारे में फिर कड़वा-कड़वा बयां कर रही है।

पढ़ें मूल पोस्ट :

जनसत्ता में कार्यरत रहे वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Vinod K. Chandola फटफटिया लेखक/ सम्पादक महज़ उनके आदर्श जिन्हें गहरी छपास होती है!

Hemraj Chauhan सही बात है एक महीने पहले मैं भी अलविदा कहा चुका हूं, प्रभाष जोशी जी के बारे आप लोगों से इतना सुना है कि जनसत्ता से बहुत उम्मीद बढ जाती है. ओम थानवी सर ने इसे अलग बनाए रखा और हिंदी अखबारों से पर अब ये वो भी नहीं रहा था. बस लंबी लंबी खबरें, ना कोई विचार सिर्फ खानापूर्ति..

Radhakishan Meghwanshi संजय कुमार सिंह जी किसी के अलविदा कह देने मात्र से जनसत्ता का अंत नहीं हो जाएगा , कहानिया लिखी जाती रही है , किसी को कम और किसी को ज्यादा महत्त्व दिया जाता रहा है , यहाँ सनी लीओन को ज्यादा महत्त्व देने से भारतीय संस्कारी पुरुषों को या किसी व्यक्ति विशेष को परेशानी हो सकती है पर मुझे जनसत्ता जैसे संसथान और उनके पत्रकारों पर ही ज्यादा भरोषा है !

Alok Sinha लेकिन दैनिक भास्कर जैसे शासन समर्थक ( चाहे किसी का भी शासन हो ) से हारना अच्छा नहीं लगता और आज इंडियन एक्सप्रेस भी कौन सा तीर मार रहा हे इसे TV . मीडिया का असर ना कहे | नवभारत टाइम्स , हिन्दुस्तान , अदि की क्या हालत हे , ये तो मानना ही पडेगा की पत्रकारों की पौध सूख रही हे | नई पीढ़ी में कोई अखबारी पत्रकार बनना ही नहीं चाहता ,मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक ,खुले मैदान में कोई दौड़ना नहीं चाहता रही बात भास्कर की वहीं बात कांग्रेस और बीजेपी का अंतर की सही मार्केटिंग और साजसज्जा के साथ परोसना जिसे आता हे उसका वास्तविक प्रचार प्रसार कितना हे पर निर्भर हे, भास्कर का देश का सर्वाधिक बिकने वाला हिंदी पेपर बना ,क्या वास्तविक रिपोर्ट हे ? रमेश अगरवाल जी के बाद उनका पब्लिक रिलेशन कौन करेगा ( यंहा नाम पब्लिक रिलेशन जरूर हे लेकिन वो पब्लिक रिलेशन ना हो कर कुछ और हे ) कभी भासकर मध्यप्रदेश में स्वदेश और नई दुनिया से टक्क्र लेता था कभी आगे कभी पीची लेकिन जब ,नव भारत टाइम्स और हिन्दुस्तान टाइम्स ने हिंदी के क्षेत्र में हथियार फेक दिए तो उसका फायदा जनसत्ता ने ना उठाकर भास्कर ने उठाया |बिना कोई नामचीन पत्रकार होते हुए और संपादक होते हुए |और आज राजिस्थान में पत्रिका ,यूपी में अमर उजाला ,जागरण, पंजाब में पंजाब केसरी ,गुजरात में पत्रिका , महाराष्ट्र में जनसत्ता, पत्रिका ,हरियाणा में जनसत्ता और पंजाब केसरी ,और तो और दिल्ली में जनसत्ता , पंजाब केसरी, आदि को तकर देने लगा , कैसे बिना नामचीन पत्रकार और संपादक मंडल के |

Sanjaya Kumar Singh जब तक सनी लियोन के बारे में पढ़ने वाले रहेंगे उसके बारे में लिखा भी जाएगा। पढ़ने वाले को शर्म नहीं तो लिखने वाले को क्यों हो। आप बिल्कुल ठीक हैं Meghwanshi जी। और जनसत्ता में अभी क्या बुराई उससे पीछे बहुत सारे अखबार हैं।

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जनसत्ता अखबार में देवी प्रसाद त्रिपाठी की प्रशस्ति पढ़कर मुझे घोर आश्चर्य हुआ

जनसत्ता 2 मई के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर मुकेश भारद्वाज द्वारा रचित भाई डी पी त्रिपाठी की प्रशस्ति पढ़ी। मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि जो पत्र किसी भी बड़े लेखक, वैज्ञानिक, कलाकार के बारे में अवसर विशेष पर भी कोई टिप्पणी छापने से गुरेज करता है उसमें इस तरह की प्रशस्ति कैसे छप गई। संभव है मुकेश भारद्वाज की जनसत्ता में अलग हैसियत हो। बहरहाल मेरी नजर में देवी प्रसाद त्रिपाठी का व्यक्तित्व बेहद रहस्यमय है। इसमें कोई दो राय नहीं कि साहित्य और समाज की गहरी समझ के साथ ही उनकी राजनीतिक समझ भी काबिले तारीफ़ है। लेकिन जैसा कि मुकेश भारद्वाज इंगित करना चाहते हैं देवी प्रसाद त्रिपाठी की प्रतिबद्धता न तो सिंह वाली है न मिमियाती हुई है बल्कि भारतीय राजनीति के अवसरवादी यथार्थ से ही संचालित है।

अगर ऐसा न होता तो त्रिपाठी कांग्रेस और राष्ट्वादी कांग्रेस की जगह किसी साम्यवादी दल के सदस्य होते। रही बात उनके साहित्यिक अवदान की तो हिंदी साहित्य में त्रिपाठी का ऐसा महत् अवदान मेरी नजर में तो कुछ दिखाई नहीं देता। अगर मुकेश भारद्वाज उनके साहित्यिक अवदान की चर्चा कर देते तो हम जैसे साहित्यकार अवश्य उससे लाभान्वित होते। खैर अब जब यह प्रचलन जनसत्ता में शुरू हो ही गया है तो मैं भी अपनी प्रशस्ति किसी से लिख कर भिजवाता हूँ। यूँ मैं प्रभावी तो दूर प्राथमिक स्तर का राजनेता भी नहीं हूँ लेकिन एक जेनुइन लेखक तो हूँ ही और प्रतिबद्ध भी। इसलिए मेरी प्रशस्ति का प्रकाशन हो सकता है ऐसी मुझे उम्मीद है। अग्रिम धन्यवाद सहित। यदि जनसत्ता एक निष्पक्ष और निर्भीक समाचार पत्र है जैसा कि उसका दावा रहा है तो यह प्रतिक्रिया अवश्य प्रकाशित हो सकेगी।

जयपुर निवासी लेखक शैलेंद्र चौहान से सपर्क 07838897877 या shailendrachauhan@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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आज के जनसत्ता को लेकर एक समीक्षात्मक टिप्पणी : अलिवदा जनसत्ता!

प्रिय बंधु
नमस्कार
जनसत्ता को लेकर एक टिप्पणी भेज रहा हूं। सुना है कि आपका ब्लाग काफी पढ़ा जाता है। मेरी चिंता को स्थान देंगे तो बहुत आभारी रहूंगा। मैं एक शिक्षक हूं और आज का जनसत्ता देखकर दुखी हूं। सोच रहा हूं कि संपादक को भी लिखूं। टिप्पणी थोड़ी आक्रोश में लिखी है, आप देख लीजिए।

देवेंद्र नागमणि
आरके पुरम
दिल्ली

जनसत्ता में कूढ़मगज संपादक और फटफटिया लेखक का विष्ठा वमन

1 मई (मजदूर दिवस) का ”जनसत्ता” अखबार मेरे सामने पड़ा है। इसका ”रविवारी जनसत्ता” का पहला पन्ना- देहलीला से देहगान तक -( पोर्न स्टार सनी को लियोनी पर आधारित) की स्टोरी देख कर मैं हैरान हूं। यही लेख हो सकता है  कहीं और छपा होता तो मुझे हैरानी नहीं होती। लेख में सनी को आज की वुमेन आइकन की तरह पेश किया गया है। यानी इरोम शर्मिला, मेरा कॉम, सोनी सोरी,  मेधा पाटकर आदि की जगह गई बट्टेखाते में। जनसत्ता ने नई औरत की नई परिभाषा दे दी है। मेरे हिसाब से यह इस अखबार का विष्ठा-वमन है। जनसत्ता का ऐसा पतन, इतना पतन। मेरी कल्पना से परे है। इसे सुधीश पचौरी महाशय ने लिखा है। वे वैसे भी फटफटिया लेखक हैं और उसे हिंदी में गंभीरता से कोई नहीं लेता। उसे राइटिंग-डायरिया है। बाएं हाथ से मार्क्स पर लिख देता है और दाएं हाथ से गुरु गोलवलकर पर। बीच वाली डंडी से सनी पर लेखनी चलाई है।

कहते हैं कि जब गीदड़ की मौत आती है तो वह गांव की तरफ भागता है, लेकिन जब एक अखबार की मौत आती है तो वह पोर्न-आइकन की तरफ भागता है। जनसत्ता अगर कल नहीं, परसों,  या कुछ बरसों-बाद बंद हुआ या बंद न भी हुआ और किसी लकवाग्रस्त रोगी की तरह घिसटता रहा तो, मई दिवस की यह कवर (कब्र)-कथा का उसमें बड़ा योगदान होगा। मेरे विचार से जनसत्ता की अपनी जो पहचान थी, उसे उसी रास्ते पर चलना चाहिए था। लेकिन, यह मौजूदा संपादक का मानसिक दिवालियापन ही कहा जाएगा कि उसे कुछ ”मसालेदार” चीजों में बढ़ता सर्कुलेशन नजर आ रहा है। मैं नहीं जानता कि संपादक कौन है, लेकिन मेरे खयाल से यह व्यक्ति प्रभाष-परंपरा का बिल्कुल नहीं है। मुझे तो लगता है कि यह प्रभाष जोशी का गू-मूत्र उठाने लायक भी नहीं है। यह वही अखबार है, जिसने रवींद्रनाथ टैगोर, फैज अहमद, मजाज, नागार्जुन से लेकर न जाने कितने महान लोगों पर स्टोरियां की हैं। कभी मंगलेश डबराल इसके संपादक होते थे। जनसत्ता को बचाना है तो उसे अपने को इस मौजूदा संपादक से मुक्त करना होगा।

”जनसत्ता ” न सिर्फ मेरा, बल्कि हिंदी पट्टी के एक बहुत बड़े बौद्धिक वर्ग की मानसिक-बौद्धिक भूख लंबे अरसे से शांत करता रहा है। प्रभाष जोशी के लंबे कार्यकाल में इसका समाचार और विचार पक्ष दोनों काफी सशक्त थे । इसका सर्कुलेशन भी ठीकठाक था। जोशीजी के जाने के बाद ओम थानवी ने इसकी सत्ता संभाली तो इसका समाचार पक्ष क्षीण हो गया। सर्कुलेशन भी कुछ खास नहीं रहा। लेकिन, इसके बावजूद थानवी की कुव्वत यह रही कि उन्होंने इसके संपादकीय पृष्ठ और रविवारी के स्तर को न सिर्फ कायम रखा, बल्कि उसे बौद्धिक ऊंचाई और गरिमा प्रदान की। अखबार को सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक सरोकार से जोड़े रखा। बाजारी मानसिकता से अलग हटकर उन्होंने इसे अपनी प्रतिभा के दम पर चर्चा में बनाए रखा। अखबार का सर्कुलेशन कम होने के बावजूद जनसत्ता की आवाज की अनसुनी नहीं की जा सकती थी। सत्ता से टकराने का मामला रहा हो या सांप्रदायिक ताकतों से लोहा लेने का, थानवी के बौद्धिक कौशल और हिम्मत को दाद देनी चाहिए।

मैं देख रहा हूं कि कई महीनों से वैसे भी अखबार में कुछ दम नहीं रह गया है। इसका संपादकीय पेज चलताऊ लेखों की मगजमारी से बजबचा रहा है। लगता है कायदे के लेखक या विदा कर दिए गए हैं या उन्होंने खुद ही इससे अपना हाथ खींच लिया है। नएपन के नाम पर एक सनीचरी पन्ना निकलता है, जो  कायर्कारी संपादक मुकेश भारद्वाज लिखते हैं, हास्यास्पदता और निरर्थकता का फूहड़ नमूना है।

मेरे कुछ परिचित साथी और मित्र महीनों पहले जनसत्ता बंद करा चुके थे, एक मैं  ही इसे पढ़े जा रहा था। आज से मेरे लिए भी इसका दरवाजा बंद ।

जनसत्ता जो सालों से मेरी सुबह का पहला मुलाकाती रहा था।

अलिवदा जनसत्ता!

देवेंद्र नागमणि
आरके पुरम
दिल्ली
ddanav6@gmail.com

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राकेश सिन्हा ने कहा है कि वे जनसत्ता में कभी नहीं रहे… फिर सच्चाई क्या है…

Sanjaya Kumar Singh : भूल सुधार… एक पोस्ट में मैंने लिखा कि भाजपा के विचारक राकेश सिन्हा जनसत्ता में थे। परिचित हैं। उसे भड़ास4मीडिया ने प्रकाशित किया और अपने ट्वीटर पर भी। राकेश जी ने कहा है कि वे जनसत्ता में कभी नहीं रहे। मैंने चेक कर लिया। मुझे ही गलत याद था और मैं उन्हें जनसत्ता का स्ट्रिंगर समझता था। पर चूंकि स्ट्रिंगर और स्टाफर के तकनीकी अंतर को मैं नहीं मानता इसलिए मैंने लिख दिया था कि वे जनसत्ता में थे।

मैंने चेक कर लिया वे वाकई जनसत्ता में नहीं रहे। उनकी एकाध खबरें (उनके नाम के साथ) जरूर छपीं हैं पर वे स्टाफ में तो नहीं ही थे और इनकार कर रहे हैं तो स्ट्रिंगर भी नहीं थे। असल में वे ऑफिस आते-जाते थे और रिपोर्टिंग कक्ष में पाए भी जाते थे तभी की हाय हलो है। मुमकिन है अब उन्हें याद नहीं होगा तो परिचित भी नहीं हैं। हालांकि मुझे इसी से भ्रम हुआ। असल में हम जैसों के कांफिडेंस (जिसे मैंने भ्रम लिखा है) का कारण यह है कि उन दिनों जनसत्ता में खबर के साथ किसी का एक बार नाम छप जाता था तो वह उसी को लेकर घूमता और दिखाता था, सीना ठोंककर कहता भी था कि वह जनसत्ता में है।

लोग बाग पूछते कि वो तो वहां है, ऐसा है, वैसा है, जनसत्ता में कैसे है तो हमीं लोग बताते रहते थे कि नहीं स्ट्रिंगर है, फ्रीलांसर है (अंशकालिक कर्मचारी) आदि। आम लोग तो तब ना इसका अंतर जानते थे ना समझते थे। आपस में भी बुरा लगता था कि एक ही काम के लिए किसी को ज्यादा वेतन आई कार्ड (कनवेयंस अलाउंस भी, जो मुझे नहीं मिलता था और बहुत तकलीफ रही) सब कुछ और किसी को कुछ नहीं। राकेश जी मना कर रहे हैं कि जनसत्ता में नहीं थे तो मैं इसकी पुष्टि करता हूं और इसके लिए खुले दिल से उनकी प्रशंसा भी।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Ajay Setia राकेश सिंहा कभी जनसत्ता में नहीं थे. वह इंडियन एक्सप्रैस में लिखा करते थे.

Sanjaya Kumar Singh ये तो और नई जानकारी है। मुझे लगता है उम्र का असर मेरी याद्दाश्त पर पड़ रहा है।

Ajay Setia मैने आप की पोस्ट में उन का नाम पढा तो आश्चर्य हुआ.लेकिन जानबूझकर टिप्पणी नहीं की थी. आईएएस की भागदौड के बाद राकेश सिन्हा करीब करीब उन्हीं दिनों में दिल्ली विवि में अध्यापक हो गए थे.

Sanjaya Kumar Singh दिल्ली विश्विद्यालय के एक कालेज में पढ़ाते हुए सुधीश पचौरी जनसत्ता में नियमित कॉलम लिखते थे और दफ्तर कम आते थे। आप बता रहे हैं कि राकेश जी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे और मुझे याद है कि वे जनसत्ता दफ्तर (अब मैं एक्सप्रेस बिल्डिंग कहूंगा) सुधीश जी के मुकाबले तो बहुत ज्यादा आते थे (एक समय)। फिर भी यह विवाद का मुद्दा नहीं है। एक्सप्रेस बिल्डिंग आने वालों का हिसाब नहीं रखा जा सकता है। अरुण शौरी लिख चुके हैं कि लोग भ्रष्टाचार की पूरी फाइल रीसेप्शन पर छोड़ जाते थे फिर फोन करके बताते थे कि फाइल छोड़ आया हूं।

Ambrish Kumar वे दूसरे राकेश सिन्हा है अक्सर शाम को सुशील सिंह के साथ प्रेस क्लब में मिलेंगे वे एक्सप्रेस थे और एक तीसरे भी हैं जो अब एक्सप्रेस में हैं तीसरे वाले ब्यूरो में हम लोगो के समय से है अब प्रमोशन हो गया है.

Ramendra Jenwar जनसत्ता मेँ नहीँ थे तब तो उनका जीवन ही बेकार है उन्हेँ पत्रकार नहीँ माना जा सकता…जैसे देशभक्ति का प्रमाणपत्र सँघ कार्यालय से मिलने पर ही मान्य होता है ऎसे ही पत्रकारिता का जनसत्ता से.

Sanjaya Kumar Singh नहीं उनके साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है। वो पत्रकार होने का दावा भी नहीं करते और इस खंडन के बाद तो लगता है, पहले भी ऐसा कोई शौक नहीं रखते होंगे। आप किसी और का गुस्सा किसी और पर निकाल रहे हैं।

Mohd Zahid जहाँ भी थे या हैं, एक नंबर के छूठे और मक्कार हैं।

Kumar Bhawesh Chandra वह अपने रवि प्रकाश के अच्छे मित्र हैं। 20 आशीर्वाद (अस्तबल) में आना जाना था। इस नाते हम सभी उन्हें तभी से जानते हैं।

Ambrish Kumar तब उन्हें कोई नहीं जानता था, अब वे किसी को नहीं पहचानते हैं हिसाब बराबर. वे जनसत्ता में भी आते / मंडराते थे पर उसका अब कोई अर्थ नहीं.


मूल पोस्ट….

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‘जनसत्ता’ में अशोक वाजपेयी का कालम बंद करने के लिए संपादक मुकेश भारद्वाज ने की घटिया हरकत

ओम थानवी के जनसत्ता अखबार से रिटायर होने के बाद चंडीगढ़ से आए नए संपादक मुकेश भारद्वाज की करतूतें इन दिनों चर्चा का विषय है. अखबार को आधुनिक बनाने के चक्कर में न तो अखबार की पुरानी पहचान साख चरित्र बचा पा रहे और नया कुछ बेहतर करने के चक्कर में दूसरे अखबारों से आगे निकल पा रहे. इसी को कहते हैं न घर का न घाट का. मुकेश भारद्वाज ने पुराने सारे स्तंभकारों के कालम एक एक कर बंद करना शुरू कर दिया. सबको बताया गया कि अखबार का पुनर्गठन किया जा रहा है, री-लांच हो रहा है, इसलिए कालम बंद करने पड़ रहे हैं. लोगों ने इशारे को समझा और कालम लिखना बंद कर दिया.

लेकिन अशोक वाजपेयी के मामले में तो हद हो गई. ये लोग न तो अशोक वाजपेयी को साफ साफ कह सके कि आप लिखना बंद कर दीजिए और न ही छपने के लिए आए मैटर को छाप सके. बहाना बना दिया कि मैटर खो गया, मिल नहीं रहा है. अंदरखाने से जुड़े कई लोगों का कहना है कि अशोक वाजपेयी ने अपने कालम के लिए जो मैटर भेजा, बाकायदा उसकी रिसीविंग है और उसे न्यूज रूम में छपने के लिए आगे बढ़ाया गया पर ऐन मौके पर रोक दिया गया. इस बारे में जब अशोक वाजपेयी ने जब जनसत्ता अखबार वालों से संपर्क किया तो उन लोगों ने यही बहाना बनाया कि आपके कालम का मैटर खो गया है और इन दिनों हम सब लोग अखबार के पुनर्गठन में लगे हैं. अशोक वाजपेयी ने इस हरकत के जवाब में एक पत्र लिखा है, जिसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है.

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जनसत्ता अखबार को पत्रकारों की जरूरत, 20 नवंबर तक कर सकते हैं अप्लाई

एक जमाने में चर्चित हिंदी अखबार रहा जनसत्ता को युवा पत्रकारों की तलाश है. अखबार की तरफ से निकाली गई वैकेंसी में बताया गया है कि डेस्क और रिपोर्टिंग दोनों के लिए युवा पत्रकारों की तलाश है. अप्लाई करने वालों को ट्रांसलेशन और पेजमेकिंग का काम भी आना चाहिए. आवेदन की अंतिम तारीख 20 नवंबर है.

बायोडाटा editor.jansatta@expressindia.com पर मेल से भेंजे या डाक से इस पते पर भेजें:

जनसत्ता
ए-8, सेक्टर-7
नोएडा- 201301
जिला- गौतमबुद्ध नगर (उत्तर प्रदेश)

जनसत्ता अखबार में छपे पत्रकारों की जरूरत संबंधी ओरीजनल विज्ञापन को देखने के लिए अगले पेज पर जाएं>

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ओम थानवीजी, अंबरीष कुमारजी, ये सब आप दोनो की गरिमा के खिलाफ

फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार Om Thanvi जी और वरिष्ठ पत्रकार Ambrish Kumar जी ने कभी इशारों में और कभी नाम लेकर कुछ लिखा है. मैंने दोनों की पोस्ट पढ़ी है और पढ़कर अच्छा नहीं लगा. बहुत बुरा लगा. 

ये सब कुछ जो हो रहा है, वो आप दोनों की गरिमा के खिलाफ है और मेरा करबद्ध निवेदन है कि इस विवाद को तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए. नई पीढ़ी आप लोगों से बहुत कुछ सीखती है, सो कृपया उनकी आशाओं को जिंदा रखें.

हम सब को नहीं मालूम कि मामला क्या था, गलती किसकी थी और क्या था. पर एक बात जानता हूं कि माफ करने वाले के पास दुनिया में हमेशा से एक नैतिक बल रहा है. माफ करने वाला हमेशा बड़ा होता है.

नदीम एस अख्तर के एफबी वाल से

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जनसत्ता के 26 साल : अब दफ्तर से घर को निकल रहा- ओम थानवी

जनसत्ता के संपादक एवं लेखक ओम थानवी न संस्थान में लंबी पारी खेलते हुए अपने कार्यकाल के आखिरी दिन अपने फेसबुक वाल पर लिखा –  ”अब दफ्तर से घर को निकल रहा हूं। बरसों के पिटारे में से अपने निजी कागजात और असबाब लेकर। मेरी खुशनसीबी थी कि जनसत्ता में 26 साल (दस साल चंडीगढ़, सोलह बरस दिल्ली) काम किया। एक ही अखबार में इतनी लंबी संपादकी पता नहीं कितनों को नसीब हुई होगी। जनसत्ता में अगर कहीं कुछ सार्थक कर पाया तो अपने सहयोगियों, लेखकों, स्तंभकारों, व्यंग्यचित्रकार और चित्रकारों की बदौलत। जो नहीं कर सका, उसका जिम्मेदार मैं हूं। इतना ही है कि काश कुछ साधन और मिल पाते। पर, ‘जो नहीं है उसका गम क्या’!

”जनसत्ता प्रभाष जोशीजी की देन है। उनकी ऊंचाई को कोई नहीं छू सकता। फिर भी अपनी प्रतिभा और क्षमता की सीमाओं में लोग प्रयास करते रहेंगे। आने वाले संपादक इसमें नए आयाम जोड़ेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं। अब संपादन का जिम्मा चंडीगढ़ के दौर से मेरे साथी रहे मुकेश भारद्वाज संभाल रहे हैं। बहुत निष्ठावान और सुरुचिपूर्ण पत्रकार हैं। आशा है आप मित्रों, लेखकों का सहयोग उन्हें मिलता रहेगा। उनका इ-मेल आइडी है- ee.jansatta@expressindia.com

”हां, मैं किसी अखबार में नहीं जा रहा। फिलहाल घूमने जरूर निकल सकता हूं। (ईर्ष्यालु दुश्मन खड़े करने में मेरे इस शौक की भूमिका भी कुछ कम नहीं!) फिर, फेसबुक और मौका मिलने पर टीवी पर तो अपनी बात रखता ही रहूंगा!”

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चार दिनों बाद यानी 31 जुलाई से ओम थानवी जनसत्ता के संपादक पद से अवकाश ले लेंगे

इंडियन एक्सप्रेस इसलिए नहीं पढ़ा जाता रहा है कि उसमें ढूंढ़-ढूंढ़ कर स्टोरी लाई जाती थीं बल्कि उसकी प्रतिष्ठा इसलिए थी क्योंकि उसका चरित्र व्यवस्था विरोधी (एंटी इस्टैबलिशमेंट) रहा है। बाद में एक्सप्रेस ने तो खैर अपना चरित्र बदला भी मगर जनसत्ता दृढ़ रहा। प्रभाष जी के बाद भी जनसत्ता का यह चरित्र यथावत बना रहा तो यकीनन इसका श्रेय ओम थानवी को जाता है। प्रभाष जोशी बड़ा नाम था इसलिए उनके वक्त तक जनसत्ता में काम कर रहे दक्षिणपंथी पत्रकार खुलकर सामने नहीं आए थे मगर ओम थानवी के समय ऐसे तत्व खुलकर अपने दांव चलने लगे थे इसके बावजूद जनसत्ता का चरित्र नहीं बदला। ऊपर से प्रबंधन ने ओम थानवी को वह स्वायत्तता भी नहीं दी जैसी कि प्रभाष जी के वक्त तक संपादक को प्राप्त थी।

जनसत्ता के चंडीगढ़ और कोलकाता संस्करणों के प्रभारी रहने के दौरान ये समस्याएं मैने स्वयं भुगती थीं मगर चूंकि मैं कारपोरेट संपादक नहीं था इसलिए मेरा सीधा साबका प्रबंधन से नहीं पड़ता था। चार दिनों बाद यानी 31 जुलाई से श्री ओम थानवी अपने पद से अवकाश ले लेंगे। दिल्ली में जनसत्ता के समूह संपादक के तौर पर उनका कार्यकाल याद किया जाएगा। वे जनसत्ता में कुल 26 साल संपादक रहे। चंडीगढ़ में दस साल स्थानीय संपादक के तौर पर और दिल्ली में 16 साल समूह संपादक के तौर पर। उनका पूरा कार्यकाल उनकी पत्रकारीय प्रखरता और बतौर संपादक उनकी समझ व अखबार के चरित्र को व्यवस्था विरोधी बनाए रखने के लिए याद किया जाएगा। जनसत्ता आज भी अगर उतना ही प्रखर है तो निश्चय तौर पर ओम थानवी का कुशल संपादन ही इसकी रीढ़ रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार शम्भूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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तीस्ता के खिलाफ ये खबर मीडिया ट्रायल का हिस्सा है!

Sanjaya Kumar Singh : मैं तीस्ता समर्थक नहीं हूं। ठीक से फॉलो भी नहीं करता। पर उनके खिलाफ इस खबर में दम नहीं है। मीडिया ट्रायल का हिस्सा है। बदनाम करने की कोशिश। खबर तब होती जब बताया जाता कि कुल कितने दिन में कितने की शराब पी गई (या पिलाई गई) कितनी फिल्मों की सीडी कितने दिनों में खरीदी गई। काम करने वाला कोई आदमी कितनी शराब पी जाएगा और कितनी सीडी देख लेगा। बांटा होता तो लगता कि आरोप है।

सुबह से शाम काम करते हुए हमलोग भी हजार दो हजार रुपए पर उड़ा देते हैं। दोस्त मित्र हों, साथ काम करने वाले तो यह खर्च ज्यादा भी होता है। अब कोई कहे कि दिन भर मेहनत करके कमाता है, शाम को पीने (खाने में) उड़ा देता है। भइया वो कमाई का बहुत छोटा हिस्सा होता है। और काम करने वाला आदमी इतना खर्च करता है – खुराक कहिए इसे डीजल मोबिल। ये कोई भ्रष्टाचार नहीं है।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.


Samar Anarya : जियो तीस्ता सीतलवाड़ आज हिन्दुस्तानी मीडिआ को उसकी औक़ात बताने के लिए. यह कहने के लिए कि ‘ब्रीफिंग’ है- जवाब नहीं देंगे, जो दिल हो कहिये। अरे हिटलर नहीं जीत पाया जनता से, अंबानियों अडानियों के जरखरीद जीत जायेंगे? मैं तीस्ता हूँ- और जो जो साबिर अली को कल तक भाजपा के दो मंत्रियों के मुताबिक आतंकवादी मानते थे, दाऊद का आदमी मानते थे, या तीस्ता बनेंगे, या अपनी जुबान बेच चुके गुलाम। ठीक वैसे जैसे उनमें से एक मंत्री गिरिराज सिंह (वही पाकिस्तान भेजू) बेच चुका है या बेशर्म लालची- (वही मुख़्तार अब्बास नक़वी जिसको इस बार ट्वीट करने के पहले ही धमका दिया लगता है.

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय समर के फेसबुक वॉल से.

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जब कुमार आनंद ने सीधे विवेक गोयनका को इस्तीफा दिया और दुबारा एक्सप्रेस बिल्डिंग की सीढियों पर नहीं चढ़े

Ambrish Kumar : एक साथी ने आनंद जी के बारे में विस्तार से लिखने को कहा तो कुछ तो लिखा ही जाये. कुमार आनंद टिकमानी यानी ‘इंतजाम बहादुर’. कुमार आनंद नब्बे के दशक में वे बिहार से आने वाले सबसे प्रतिभाशाली पत्रकारों में शुमार थे. पूरा नाम कुमार आनंद टिकमानी जिला मुजफ्फरपुर बिहार. जनसत्ता में तेरह बार इस्तीफा दिया जो अंतिम बार ही मंजूर हुआ. देश के ज्यादातर बड़े अखबारों में रहे. ‘पीटीआई भाषा’ के संपादक रहे और इस समय किसान चैनल के प्रमुख सलाहकार है. कल ही उनका फोन भी आया था और कुछ समय पहले उनकी बिटिया की शादी में दिल्ली भी गया था जिसकी दावत दिन में थी और बिहार से लेकर दक्षिण भारतीय व्यंजनों का अद्भुत मेल था. पर हम लोगों ने कहा इस दावत से काम नहीं चलेगा क्योंकि आप की शाम की दावत ही मशहूर रही है.

1987 -88 में जनसत्ता में आया तो डेस्क पर था. रिपोर्टिंग का शौक था इसलिये तबके चीफ रिपोर्टर कुमार आनंद से ज्यादा बनने लगी. जन आंदोलनों की कवरेज से शुरुआत हुई फिर बनवारी जी ने किसान आंदोलन की कवरेज भी करवाई. तब जनसत्ता में ब्यूरो नहीं था. सब कुछ कुमार आनंद थे और उनके सिपहसालार जिनमे हम भी शामिल थे. ये कैलास सत्यार्थी तब स्वामी अग्निवेश के सहयोगी थे और आनंद जी ने एक नहीं कई बार कैलास सत्यार्थी के साथ भेजा. तब वे एक टुटही किस्म की जीप से चलते थे और 26 आशीर्वाद एपार्टमेंट के फ़्लैट से अपने को उठाते थे. यह एक उदाहरण है सिर्फ. आज दिल्ली के जितने बड़े नेता है तब सबको जनसत्ता रिपोर्टिंग वाले कक्ष में आनंद जी के सामने घंटो बैठे देखा है. तब हडतालों का दौर था और एक नहीं कई हड़ताल हुई. अपना नेतृत्व कुमार आनंद करते थे. एक्सप्रेस वाले भी साथ होते थे. मदिरा का दौर तभी शुरू हुआ जब शाम को हड़ताल के बाद पीछे टीटू की दुकान पर बैठक जमती थी. मना करने पर भी ये लोग मानते नहीं.

बाद में आनंद जी के घर पर दावत होती. वे खिलाते पिलाते पर काम भी जान निकाल कर करवाते. जनसत्ता की हर दावत का इंतजाम प्रभाष जी उन्ही को देते. बाद में उदारीकरण का दौर आया प्रभाष जोशी के बाद अखबार की रीति नीति बदलने की बात आई तो मामला बिगड़ गया. हम लोग खिलाफ थे प्रबंधन की इस नीति के. झंडा डंडा सब उठा. चार संस्करण में हस्ताक्षर अभियान चला. मैं प्लांट यूनियन का चुनाव लड़ रहा था. एकदम छात्रसंघ की तर्ज पर, नारे थे- अयोग्यता बैठी सिंघासन -योग्यता को मिले न आसन. ओमप्रकाश और हमने कामगार मोर्चा बना दिया था और उसका एकमात्र उम्मीदवार मैं था. माहौल गर्म था. हिंसा की आशंका भी. रात में करीब दो बजे नतीजे आये और मेरी जीत के एलान के साथ ही एक खेमे की तरफ से प्रभाष जोशी के लिये टिपण्णी हुई. इतना काफी था .आनंद जी और कुछ लोगों ने हाथ छोड़ दिया और फिर जमकर हिंसा. विवेक गोयनका से लेकर प्रभाष जोशी तक इस घटना से आहत थ. कुमार आन्नद से नाराज प्रभाष जी ने कहा- कोई कुछ कह देगा तो क्या मारपीट होगी. आनंद जी का जवाब था- आपके खिलाफ एक शब्द नहीं सुन सकता. मामला तूल पकड़ा और आनंद जी ने सीधे विवेक गोयनका को इस्तीफा दे दिया फिर लौट कर एक्सप्रेस बिल्डिंग की सीढियों पर नहीं चढ़े. बहुत कोशिश हुई उन्हें मनाने की समझाने की पर वे नहीं माने. यह एक फौरी और छोटा सा परिचय है कुमार आनंद टिकमानी का.

जनसत्ता अखबार से रिटायर हो चुके अंबरीश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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सुना है जनसत्ता अखबार में सकारात्मक बदलाव का दौर आ गया है…

Ambrish Kumar : जनसत्ता के ज्यादातर साथी कह रहे है अखबार में सकारात्मक बदलाव का दौर आ गया है. नये संपादक ने भी कहा है कि अब इसे ख़बरों का अख़बार बनाया जायेगा. अगस्त से यह सब शुरू हो जायेगा. ऐसा होता है तो स्वागत किया जाना चाहिये.

इंडियन एक्सप्रेस. वह समूह जिसका कभी साथ नही छूटता. प्रभाष जोशी निधन से ठीक एक दिन पहले जब लखनऊ में एक्सप्रेस के दफ्तर मुझसे मिलने आये तो दो घंटा बैठे. जनसत्ता, एक्सप्रेस और फाइनेंशियल सभी के लोग थे. जब उठे तो सामने खडी मौलश्री की तरफ मुखातिब होकर ऊपर हाथ उठाकर बोले, ऊपर भी मेरा घर एक्सप्रेस परिवार में ही होगा. उस एक्सप्रेस के बारे में कल से जो सुन रहा था उससे तकलीफ हो रही थी. कल संस्थान के एक निर्णायक अधिकारी से बात हुई तो उन्होंने कहा यह गलत खबर है. आज विवेक गोयनका के उद्बोधन के बाद उम्मीद है इस पर विराम लग जाना चाहिये. इस समूह से अभी भी बहुत उम्मीद है.

जनसत्ता अखबार से रिटायर हो चुके वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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अपने ही समूह के अखबार के बारे में लिखना : ओम थानवी

देश का सबसे अच्छा अंगरेजी अखबार कौन-सा है? ‘हिन्दू’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में मेरे लिए चुनाव थोड़ा मुश्किल होता था, अब नहीं है। मेरी नजर में इंडियन एक्सप्रेस अब अव्वल ठहरता है – उसका बौद्धिक कलेवर अचानक निखरा है।

सामग्री के स्तर पर ही नहीं, डिस्प्ले-डिज़ाइन के स्तर पर भी एक्सप्रेस मुझे अपनी ओर ज्यादा खींचता है। मैंने दुनिया के आला अखबार गौर से देखे हैं, इधर के एक्सप्रेस को आप उनमें किसी के भी समकक्ष रखकर देख सकते हैं।

शेखर गुप्ता के बाद राजकमल झा इंडियन एक्सप्रेस के संपादक हुए। अपेक्षया लो-प्रोफाइल नाम सुन लोग कहते थे, पता नहीं अब पाठक समाज की कैसी प्रतिक्रिया होगी। मुझे लगता है संपादक के साथ अखबार में आता बदलाव पाठकों को ज्यादा रुचा है। हालाँकि कार्यकारी संपादक के रूप में झा पहले भी एक्सप्रेस की धुरी ही थे। फिर बदलाव क्यों और कैसे संभव हुआ? 

दरअसल, मिली हुई आजादी और अर्जित की गई आजादी में फर्क होता है; नया (‘न्यू’ नहीं) एक्सप्रेस अब उनकी कल्पना की उपज है – हर पन्ने पर उनकी छाप नुमायां है। फोंट और उसके पसारे तक पर। बस, हमारे आलातरीन व्यंग्य-चित्रकार उन्नी के पॉकेट कार्टून की जेब का आकार बढ़ाने की ओर उनका ध्यान अब तक नहीं गया है!

अपने ही समूह के अखबार के बारे में लिखना शायद ठीक न हो, पर अब मैं चूँकि 26 साल की रोज़गारी के बाद विदा-मोड (अढ़ाई महीने और बचते हैं) में आ गया हूँ, एक अखबार में निखरकर आई ताजगी और प्रस्तुतीकरण की खूबसूरती का जिक्र करना मुनासिब लगता है।

ओम थानवी के एफबी वॉल से

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मुकेश भारद्वाज होंगे जनसत्ता के अगले कार्यकारी संपादक

जनसत्ता के अगले कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज होंगे। वह ओम थानवी का स्थान लेंगे। थानवी जी लगभग तीन माह बाद सेवानिवृत्त हो रहे हैं। मुकेश के मनोनयन की सूचना का ई-मेल आ चुका है। मेल जनसत्ता एवं इंडियन एक्सप्रेस के बोर्ड अध्यक्ष विवेक गोयनका ने प्रेषित किया है। मुकेश भारद्वाज अभी जनसत्ता के चंडीगढ़ क्षेत्र के संपादक हैं। 

हिंदी पत्रकारिता में इतिहास रचने वाले इस अखबार के सबसे बड़े ओहदे की जिम्मेदारी संभालने जा रहे मुकेश के लिए चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी एवं विराट हैं। देखना होगा कि वह इसका सामना कैसे और किस प्रकार करते हैं। क्यों कि जनसत्ता इस समय अपने चरम अवसान पर है। चंडीगढ़ में इसकी महज तीन-चार सौ प्रतियां छपती हैं। दिल्ली एवं अन्य स्थानों पर भी तकरीबन यही स्थिति है। 

मैनेजमेंट, खासकर शेखर गुप्ता के इंडियन एक्सप्रेस का सीईओ रहते जनसत्ता की जो दुर्गति हुई-की गई और उसे प्रकाशित होने से रोकने, उसके सुधी पाठकों को उससे वंचित करने, जनसत्ता के कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाने की जितनी भी तिकड़में, साजिशें, कुचक्र रचे-किए गए वह छिपा नहीं है। बावजूद इसके जनसत्ता की बेजोड़ टीम और कार्यकारी संपादक ओम थानवी के नेतृत्व-सोच-चिंतन ने, बेहद सीमित दायरे में ही सही, उसकी लोकप्रियता, उसके समाचार-विचार को प्रभावित नहीं होने दिया।

यही वजह है कि इस वक्त आम उपलब्धि से दूर रहने के बावजूद इस अखबार को पढ़ने, इसमें लिखने की ललक-रुचि बरकरार है। यहां तक कि हिंदी अखबारों में कार्यरत किसी भी पत्रकार साथी से जनसत्ता की चर्चा करिए तो वे बेधड़क कहते हैं- जो भी हो, जनसत्ता में जो छपता है, लिखा जाता है, दूसरे हिंदी अखबारों में दुर्लभ है। काश, जनसत्ता पुराने, अपने शुरुआती काल की तरह छपने, बंटने लगता! क्योंकि इस तरह के अखबार को पढ़ने की ललक आज के दौर में बेहद बढ़ गई है। सबसे रोचक तो यह है कि आज भी अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में अच्छा-सही-सटीक-सुस्पष्ट एवं गंभीर लेखन करने वाले लोग जनसत्ता को येन-केन प्रकारेण पढ़ने की कोशिश जरूर करते हैं।  

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‘जनसत्ता’ के संपादक ओम थानवी को ‘मुअनजोदड़ो’ पर ‘बिहारी पुरस्कार’

नयी दिल्ली : ‘जनसत्ता’ के संपादक एवं लेखक ओम थानवी को वर्ष 2014 का 24वां बिहारी पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। के.के. बिड़ला फाउंडेशन के निदेशक सुरेश ऋतुपर्ण ने थानवी को उनकी यात्रा वृत्तांतपरक चर्चित पुस्तक ‘मुअनजोदड़ो’ के लिए यह पुरस्कार देने की घोषणा की है। इस पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2011 में हुआ था। थानवी को पुरस्कार के रूप में 1 लाख रुपए, प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिह्न प्रदान किया जाएगा। इससे पूर्व उन्हें शमशेर सम्मान, सार्क सम्मान, केंद्रीय हिंदी संस्थान सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। वह निरंतर लेखनरत रहते हुए वर्तमान में साहित्य, समाज, राजनीति, शिक्षा, पत्रकारिता आदि विषयों पर त्वरित टिप्पणियों के लिए हिंदी क्षेत्र में सुप्रसिद्ध हैं।

केके बिरला फाउंडेशन द्वारा स्थापित बिहारी पुरस्कार राजस्थान के हिन्दी या राजस्थानी भाषा के लेखकों को प्रदान किया जाता है। पिछले 10 वर्षों में प्रकाशित राजस्थानी लेखकों की कृतियों में से विजेता का चयन किया जाता है।  वर्ष 1991 में स्थापित पहला बिहारी पुरस्कार डॉ. जयसिंह नीरज को उनके काव्य संकलन ‘ढाणी का आदमी’ के लिए दिया गया था। ओम थानवी की एक अन्य चर्चित कृति है- ‘अपने अपने अज्ञेय’। 

ओम थानवी का जन्म 1 अगस्त 1957 को फलोदी, जोधपुर (राजस्थान) में हुआ था। वह नौ वर्षों (1980 से 1989) तक ‘राजस्थान पत्रिका’ में रहे। इसके बाद चंडीगढ़, फिर दिल्ली में संपादक बने। उन्होंने हिंदी की साहित्यिक तथा सांस्कृतिक इतवारी पत्रिका का भी सम्पादन किया है। ओम थानवी की साहित्य, कला, सिनेमा, पर्यावरण, पुरातत्त्व, स्थापत्य और यात्राओं में गहन रुचि है। 

वह मेक्सिको, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, स्विटजरलैंड, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड, फिनलैंड, स्वीडन, बेल्जियम, रोमानिया, थाईलैंड, आर्मेनिया, बेलारूस, चीन, ब्राजील, मलेशिया, सिंगापुर, गयाना, त्रिनिदाद एवं टोबेगो, सूरीनाम, श्रीलंका, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, ग्रीस और क्यूबा आदि अनेक देशों की यात्राएं कर चुके हैं। 

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मीडिया कौन सा दूध का धुला है, बाजारू या बिकाऊ कहने पर आपत्ति जताना ठीक नहीं : ओम थानवी

वीके सिंह कहते हैं, देश का दस फीसद मीडिया ‘बाजारू’ है। लगता है वे लिहाज करने लगे वरना, मेरा खयाल है, यह प्रतिशत कहीं ज्यादा ही होगा। 

मीडिया के एक हिस्से को बाजारू या बिकाऊ कहने पर आपत्ति नहीं हो सकती, असल बात पत्रकारिता के पेशे को वेश्यावृत्ति से जोड़ना है। यह वेश्याओं का अपमान है; वे अपना पेशा डंके की चोट पर करती हैं, किसी आड़ में नहीं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी (सितम्बर 2005 में चंडीगढ़ प्रेस क्लब में बोलते हुए) मीडिया को गैर-जिम्मेदार बताया था और शेयर बाजार की उठापटक के मामले में बहुत बुरा-भला कहा था।

पेशे के चरित्र पर सीधे प्रधानमंत्री के हमले से मीडिया बेचैन हुआ। तब मैं एडिटर्स गिल्ड का महासचिव था और मामन मैथ्यू अध्यक्ष। हमने प्रसिद्ध संपादक (स्व.) अजित भट्टाचार्जी की अध्यक्षता में एक समिति प्रधानमंत्री के आरोपों की जांच के लिए गठित की। समिति ने मनमोहन सिंह की आलोचना को सही पाया और पत्रकारों को आचार संहिता में काम करने की हिदायत दी। सो, मीडिया कौन दूध का धुला है, पर वीके सिंह को बात को कहने का सलीका और तमीज डॉ मनमोहन सिंह से सीखनी चाहिए। जनरल निजी खुन्नस में छींटाकशी करेंगे और अपने प्रतीक चुनने में प्रकारांतर किसी स्त्री-समुदाय का अपमान करने लगेंगे तो भद्द उन्हीं की न उड़ेगी!

जनसत्ता के संपादक ओम थानवी की इस टिप्पणी पर प्रतिक्रियाओं का जम कर बारिश हुई। एक फेसबुक मित्र ने लिखा – ‘वीके सिंह जी ने ‘वेश्या’ नहीं ‘छिनाल’ कहा था।और क्या गलत कहा? पत्रकारों को अपने गिरेबां में झांक कर देखना होगा कि उसकी विश्वसनीयता आज इतनी क्यों गिर गई ? क्यों आज अखबार छपे शब्द को पत्थर की लकीर नहीं समझा जाता ? जब से पत्रकार बुद्धु बक्शे पर बोलते हुए दिखने लगा है, बिकने भी लगा है।ऐसे बिकाऊ माल को यदि छिनाल कह दिया तो इसमें तिलमिलाना क्यों

जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के एफबी वॉल से

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हमने प्रभाष जोशी का असहाय चेहरा देखा है

हम जिन्हें प्रभाष जोशी से बेहतर संपादक मानते हैं, वे क्यों अरविंद केजरीवाल का पक्ष लेंगे, इसके लिए मामूली सबएटीटर होकर भी हमने ओम थानवी के खिलाफ सवाल उठाये थे तो आज मेरा सवाल जनपक्षधर सारे लोगों से है कि जनपक्षधरता आपपक्ष क्यों बनती जा रही है।

दरअसल जनसत्ता बंद होने की खबरों से खुश होने या चिंतित होने वाले लोगों को पता ही नहीं है, उन लोगों को भी शायद पता नहीं है कि जनसत्ता की सेहत ने किस कदर आखिरी वक्त प्रभाष जोशी को तोड़ दिया था। हमने उस प्रभाष जोशी को देखा है जो हमारे लिए मसीहा न थे लेकिन हमारे सबकुछ थे और जिनकी पुकार पर हम देश भर से आगा पीछा छोड़कर चले आये थे और अपना भूत भविष्यवर्तमान उनके हवाले कर चुके थे। उन प्रभाष जोशी को हमने घुट घुटकर मरते जीते देखा है।

सबसे बड़े अफसोस की बात है कि प्रभाष जोशी का महिमामंडन और कीर्तन करने वाले संप्रदाय को उस जनसत्ता के बारे में तनिक परवाह नहीं है, जिसके लिए प्रभाष जोशी जिये और मरे। वे क्रिकेट की उत्तेजना को सह नहीं पाये और उनने दम तोड़ा, सचिन तेंदुलकर ने अपनी सेंचुरी उनके नाम करके यह मिथ मजबूत बनाया है। जबकि सच यह है कि निरंतर दबाव में टूटते हुए जनसत्ता का बोझ वे उठा नहीं पा रहे थे, जिसे उनने पैदा किया और जिसके लिए वे मरे और जिये।

दस साल पहले उनके जीवनकाल में मैं उनके सारस्वत ब्राह्मणवाद का मुखर आलोचक रहा हूं लेकिन जब मैं नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हिंदी वालों से गुहार लगायी कि जनसत्ता की हत्या हो रही है तो दरअसल वह बयान मेरा प्रभाष जोशी के साथ हिंदीसमाज को खड़ा करने के मकसद से था। वह मेरे औकात से बड़ी कोशिश थी।

आज जो मैं बार बार बार ओम थानवी को प्रभाष जोशी से बेहतर संपादक कह रहा हूं तो संकट की घड़ी में यह मेरा बयान ओम थानवी का हाथ मजबूत करने के मकसद से ही है। हमें अगर जनसत्ता की फिक्र करनी है तो जो हम चूक गये प्रभाष जोशी के समय से, वह काम हमें करना चाहिए कि हिंदी समाज की इस विरासत को बचाने के लिए उसके संपादक के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए।

हम सबने प्रभाष जी का वह असहाय चेहरा देखा है जब वे जनसत्ता को रिलांच करना चाहते थे। चंडीगढ़ को माडल सेंटर बनाने के लिए वहां इतवारी से उठाकर ओम थानवी को लाये थे और कोलकाता के जरिये समूचे पूरब और पूर्वोत्तर में नया हिंदी आंदोलन जनसत्ता के मार्फत गढ़ना चाहते थे।

हुआ इसके उलट, सीईओ शेखर गुप्ता तुले हुए थे कि ऐनतेन प्रकारेण जनसत्ता को बंद कर दिया जाये और उनकी योजना मुताबिक यकबयक जनसत्ता चंडीगढ़ और जसत्ता मुंबई के अच्छे खासे एडीशन बंद कर दिये गये।

सीईओ शेखर गुप्ता ने प्रभाष जोशी को अपमानित करने और उन्हें हाशिये पर धकेलने की कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी और हिंदीसमाज इसका मजा लेता रहा और महिमामंडन संप्रदाय को कभी खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं हुई।

अनन्या गोयनका नहीं चाहती थीं कि उनके मायके से कोलकाता से जनसत्ता बंद हो जाये तो जोशी जी कोलकाता को बचा सके लेकिन जिन लोगों को वे बतौर टीम लाये थे, एक के बाद एक को वीआरएस देते रहने के सिलसिले को वे रोक न सकें और न जनसत्ता कोलकाता की साथियों की हैसियत वे बदल सकें। खून के आंसू रो रहे थे जोशी और हम देखते रहे।

आखिरी दिनों में जोशी जी कोलकाता आये तो जनसत्ता नहीं आये, ऐसा होता रहा है और यह हमें लहूलुहान करता रहा।

उसीतरह जैसे ओम थानवी जानबूझकर हमारी कोई मदद नहीं कर सकते, यह बेरहम सच, जिससे न ओम थानवी बच सकते हैं और न हम।

समझ बूझ लें कि यह कोई ओम थानवी का निजी संकट नहीं है और न मेरा और मेरे साथियों का यह कोई निजी संकट है।

मैनेजमेंट इस बहस को किस तरह लेगा, इसकी परवाह किये बिना बतौर केसस्टडी हम इसे साझा कर रहे हैं और बता रहे हैं कि हिंदी समाज के तमाम संस्थान किस तरह से मुक्त बाजार के शिकंजे में हैं और हमारे लोग कितने बेपरवाह हैं, कितने गैर जिम्मेदार हैं।

इस पोस्ट से ओम थानवी का कितना नुकसान होगा और मेरा कितना नुकसान, इस पर हमने सोचा नहीं है। न यह सोचा कि इसे पढ़कर थानवी कितने खुश या नाराज होंगे।

प्रधान संपादक से सलाहकार संपादक बना दिये जाने के बाद तो जोशी जी कोलकाता विभिन्न आयोजनों में आते रहे लेकिन वे अपने ही नियुक्त किये साथियों से मुंह चुराते रहे क्योंकि वे उनके लिए कुछ भी कर नहीं सकते थे। उनकी हालत इतनी खराब थी कि एक एक शख्स से निजी संबंध होने के बावजूद मुझ जैसे मुखर साथी का नाम भूलकर वे मुझे मंडलजी कहने लगे थे।

ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में जनसत्ता का तेवर बनाये रखना और हिंदुत्व सुनामी के मुकाबले उसे खड़ा कर पाना ओम थनवी का कृतित्व है चाहे व्यक्ति बतौर उनसे हमारे संबंध अच्छे हों या बुरे, हम उन्हें पसंद करते हों या नहीं, हिंदी को जनपक्षधर जनसत्ता को जारी रखने में रुचि है तो हिंदी समाज को ओम थानवी के साथ मजबूती के साथ खड़ा होना चाहिए।

इसी सिलसिले में हमने अपने नये पुराने तमाम साथियों से आवेदन किया हुआ है कि जनसत्ता के लिए बिंदास तब तक लिखें जबतक वहां ओम थानवी हैं।

प्रभाष जोशी का महिमामंडन करने वाले लोगों को इस संकट से लगता है लेना देना नहीं है। हम जो लोग अब भी जनसत्ता में तमाम तूफानों के बावजूद बने हुए हैं, हालात हमारे लिए कमसकम रिटायर होने तक अपनी इज्जत बचाये रखने के लिए इस संकट की घड़ी में ओम थानवी के साथ खड़ा होने की जरूरत है और हम वही कर रहे हैं।

इसका भाई जो मतलब निकाले और जाहिर है कि अब बहुत साफ हो चुका है कि अगर यह चमचई है तो इस चमचई से हमारा कोई भला नहीं होने वाला है।

मजीठिया के मुताबिक कुल जमा डेढ़ साल हमारा ग्रेड और हमारा वेतनमान जो भी हो और भले एरिअर हमें 2011 से दो दो पदोन्नति के मुताबिक मिल रहा हो, आखि कार हमें रिटायर बतौर सबएटीटर होना है। गनीमत यही है कि हम शैलेंद्र के साथ ही रिटायर होंगे। उसके बाद जो होगा, वह मेरा सरदर्द नहीं है।

बहरहाल राहत इस बात की है कि एक्सप्रेस समूह मुझे किसी बंदिश में नहीं जकड़ने जा रहा है और अखबार के मामले में मेरी कोई जिम्मेदारी उतनी ही रहनी है, जितनी आजतक थी।

मेरी ओम थानवी जी से कभी पटी नहीं है। मेरी अमित प्रकाश सिंह से भी कभी पटी नहीं है। हम दोनों बल्कि दोस्त के बजाय दुश्मनी का रिश्ता निभाते रहे हैं। जबकि मैंने आज तक चालीस साल के अपनी लेखकीय यात्रा में अमित प्रकाश से बेहतर कोई संपादक देखा नहीं है। उनके साथ मेरी टीम बननी चाहिए थी। यह बहुत सुंदर होता कि ओम थानवी के साथ मैं सीधे संवाद में होता और उनके साथ मैं संपादकीय मैं कुछ योगदान कर पाता। हुआ इसका उलट, ओम थानवी को समझने में मुझे काफी वक्त लग गया और वक्त अब हाथ से निकल गया है।

अब मजीठिया के मुताबिक वेतनमान कुछ भी हो, मैं सब एटीटर बतौर ही रिटायर करने वाला हूं। मेरी हैसियत किसी सूरत में बदलने वाली नहीं है।

ओम थानवी जी का मैं उनके संपादकत्व के घनघोर समर्थक होने के बावजूद मुखर आलोचक हूं। मेरी मनःस्थिति समझकर मुझे उनने अभूतपूर्व दुविधा और संकट से जो निकालने की पहल की है, मैं उसके लिए आभारी हूं।

अब मैं पहले की तरह बिंदास लिख सकता हूं और मेरी दौड़ भी देश के किसी भी कोने में जारी रह सकती है। यह मेरे लिए राहत की बात है कि कारपोरेट पत्रकार बनने की अब मेरी कोई मजबूरी नहीं है। आखिरी साल में भी नहीं।

थानवी जी ने बेहद अपनत्व भरा निजी संदेश दिया है, जिसे मैं सार्वजनिक तो नहीं कर सकता और मैं वास्तव को सही परिप्रेक्ष्य में रखकर मुझे नये सिरे से दिशा बोध कराया है। फिर भी उनके निजी संदेश को मैं साझा नहीं कर सकता।

कर पाता तो आपको भी किसी दूसरे ओम थानवी का दर्शन हो जाता जो उनकी लोकप्रिय छवि के उलट है।

हाल में मैंने थानवी जी की कड़ी आलोचना की थी कि कि वे मुझे अचानक आप के प्रवक्ता दीखने लगे हैं। इस पर उनने कोई प्रतिक्रिया दी नहीं है।

आप के अंदरुनी संकट को जैसे देश का संकट बतौर पेश किया जा रहा है मीडिया और सोशल मीडिया में भी, वह हैरतअंगेज है।

अमलेंदु से मेरी रोज बातें होती हैं। लेकिन कल जैसे अमलेंदु ने सारे मुद्दे किनारे करते हुए मेरे रोजनामचे के सिवाय पूरा फोकस आप पर किया है, वह मेरे लिए बहुत दुखद है। आप संघ परिवार का बाप है। इसे नये सिरे से साबित करने की जरूररत नहीं है।

मेधा पाटकर और कंचन भट्टाचार्य, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव और तमाम जनआंदोलन वाले, समाजवादी कुनबे के लोग किस समझ के साथ आप में रहे हैं, यह मेरी समझ से बाहर है। जो आंतरिक लोकतंत्र पर बहस हो रही है, उसका की क्या प्रासंगिकता है, वह भी मेरी समझ से बाहर है। क्या अब हम संघ परिवार के आंतरिक लोकतंत्र पर भी बहस करेंगे?

सत्तावर्ग का लोकतंत्र और आंतरिक लोकतंत्र फिर वही तिलिस्म है या फरेब है।

जैसे मैं आजादी के खातिर जनसत्ता और एक्सप्रेस समूह में मेरे साथ हुए अन्याय की कोई परवाह नहीं करता और न रंगभेदी भेदभाव की शिकायत कर रहा हूं और जैसे मैं मुझे कारपोरेट बनने के लिए मजबूर न करने के लिए ओम थानवी जी का आभार व्यक्त कर रहा हूं।

प्रभाष जोशी जी के जमाने में मैं अनुभव और विचारों से उतना परिपक्व था नहीं और उस जमाने में मेरी पत्रकारिता में महात्वाकांक्षाएं भी बची हुई थीं। इसलिए प्रभाष जी ने मेरे भीतर की आग सुलगाने का जो काम किया है, उसे मैं सिरे से नजरअंदाज करता रहा हूं।

आज निजी अवस्थान, अपने स्टेटस के मुकाबले हमारे लिए अहम सवाल है कि हम अपने वक्त को कितना संबोधित कर पा रहे हैं और उसके लिए हम सत्तावर्ग से कितना अलहदा होकर जनपक्षधर मोर्चे के साथ खड़ा होने का दम साधते हैं। इस मुताबिक ही ओम थानवी जी का संदेश मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

उसी तरह आप प्रसंग में कोई बहस वाद विवाद इस बेहद संगीन वक्त के असली मुद्दों को डायल्यूट करने का सबसे बड़ा चक्रव्यूह है और हमारी समझ से हमारे मोर्चे के लोगों को उस चक्रव्यूह में दाखिल होना भी नहीं चाहिए।

हमारा अखबार अब भी जनआकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। हमारा संपादकीय बेहद साफ है। भाषा शैली और सूचनाओं की सीमाबद्धता के बावजूद और इसीलिए मैं प्रभाष जोशी के महिमामंडन के बजाय अपने संपादक के साथ खड़ा होना पसंद करुंगा चाहे इसके लिए मुझे जो और जैसा समझा जाये।

उस संपादक के आप के साथ खड़ा देखकर जो कोफ्त हुई, हस्तक्षेप को आप के रंग में रंगा दीखकर वही कोफ्त हो रही है।

अरविंद केजरीवाल सत्ता वर्ग, नवधनाढ्यवर्ग का रहनुमा है।

इस वर्ग को न फासीवाद से कुछ लेना देना है और न जनता के जीवन मरण के मुद्दों से। न इस तबके को किसी जनपक्षधर मोर्चे की जरुरत है और न दिग्विजयी अश्वमेधी मुक्त बाजार की नरसंहार संस्कृति से इस तबके की सेहत पतली होने जा रही है।

यूथ फार इक्वेलियी के नेता बतौर देश को मंडल कमंडल दंगों की चपेट में डालने वाले संप्रदाय के सबसे बड़े प्रतिनिधि जो समता, सामाजिक न्याय और लोकतंत्रक के सिरे से विरोधी है, उसे पहचानने में अगर हमारे सबसे बेहतरीन, सबसे प्रतिबद्ध साथी चूक जाते हैं और उनके विचलन को ही आज का सबसे बड़ा मुद्दा मानकर असल मुद्दों को दरकिनार कर देते हैं, तो मेरे लिए यह घनघोर निराशा की बात है।

हम जिन्हें प्रभाष जोशी से बेहतर संपादक मानते हैं, वे क्यों अरविंद केजरीवाल का पक्ष लेंगे, इसके लिए मामूली सबएटीटर होकर भी हमने ओम थानवी के खिलाफ सवाल उठाये थे तो आज मेरा सवाल जनपक्षधर सारे लोगों से है कि जनपक्षधरता आपपक्ष क्यों बनती जा रहीं है।

हस्तक्षेप से साभार

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भाड़ में जाए यह जनसत्ता की नौकरी जो नवभारत टाइम्स व हिंदुस्तान से कम वेतन देता था

Shambhunath Shukla : 1983 में जब दिल्ली आया तो शुरू-शुरू में राजघाट के गेस्ट हाउस में रहा करता था। जनसत्ता के संपादक दिवंगत प्रभाष जोशी ने मेरा, राजीव शुक्ल और सत्यप्रकाश त्रिपाठी के रहने का इंतजाम वहीं पर करवा दिया था। उस गेस्ट हाउस की खास बात यह थी कि वहां पर लंच व डिनर में अरहर की दाल भी मिलती थी। यह दाल हमारी सबसे बड़ी कमजोरी थी। इतनी अधिक कि हम जनसत्ता की नौकरी छोड़ वापस कानपुर जाने की ठान रखे थे। और तब चूंकि दिल्ली के ढाबों में छोले-भटूरे व मां-चने की दाल के सिवाय कुछ नहीं मिलता था इसलिए हमने ठान लिया था कि हम कानपुर लौट जाएंगे।

 

भाड़ में जाए यह जनसत्ता की नौकरी जो नवभारत टाइम्स व हिंदुस्तान से कम वेतन देता था। सब एडिटर के तीन इंक्रीमेंट देने के बाद भी मात्र 1463 रुपये और वह भी हर महीने दो-तीन दिन के पैसे कट जाते क्योंकि हम जब छुट्टी लेते तो वह छुट्टी अवैतनिक हो जाती। ऊपर से इंडियन एक्सप्रेस के लोगों ने हमें बता रखा था कि इस समूह के मालिक रामनाथ गोयनका हिंदी अखबार पटापट बंद कर देते हैं। इसलिए उनके मूड का कोई भरोसा नहीं है। पर सही समय में प्रभाष जी ने राजघाट गेस्ट हाउस में अरहर की दाल का इंतजाम कर दिया। उसी गेस्ट हाउस के परिसर में कवि भवानी प्रसाद मिश्र रहा करते थे।

हम रोज उस आवास के बाहर हिंदी में लिखी उनकी नेमप्लेट देखते और सोचते कि एक दिन उनके पास जाना है। उनकी एक नहीं अनगिनत कविताएं हमें याद थीं। एक रोज पिताजी को मैने पत्र लिखा कि मैं कानपुर आ रहा हूं बहुत हो गई यह दिल्ली की नौकरी। यहां की पत्रकारिता में वह चार्म नहीं जो डकैतों के इलाके में रिपोर्टिंग करते हुए महसूस होता था। जनसत्ता से तो दैनिक जागरण भला। भले वहां पगार कम थी और मेहनत ज्यादा पर मनोनुकूल काम का अवसर तो था। इस पर पिताजी का पत्र आया जिसमें भवानी प्रसाद मिश्र की कविता कोट थी-

जन्म लिया है खेल नहीं है/
यहां नाचना ही होता है/ हर राधा को
भले किसी के पास मनाने को/ छटाक भर तेल नहीं है।

इसके बाद कानपुर सिकनेस कुछ दिन के लिए रुक गई। पर जब फिर कानपुर की हूक उठी तो मैं हिम्मत कर भवानी बाबू के आवास पर पहुंच गया और काफी देर के इंतजार के बाद जब वे मिले तो मैने उनको अपने पिताजी का वह खत दिखाया और कहा कि क्या आपके पास ऐसी और कोई कविता है जो मुझे दिल्ली रोक सके। भवानी बाबू के धीर-गंभीर चेहरे पर मुस्कान झलकी और फिर उन्होंने कई कविताएं सुनाईं। उनमें से जो मुझे सबसे अधिक पसंद आई वह थी- “कठपुतली गुस्से से उबली …….!”

बाद में भवानी बाबू ने हमारे संपादक प्रभाष जी को कहा कि आपके परचे से अच्छे लोग जुड़े हैं। जब प्रभाष जी ने यह बात बताई तो हमने कहा कि बस अब नहीं जाना। यहीं रहना है। आज उन्हीं भवानी बाबू यानी भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म दिन है।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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भाड़ में जाए जनसत्ता की नौकरी, ठान लिया कि कानपुर लौट जाएंगे

(आज उन्हीं भवानी बाबू यानी भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म दिन है।) 1983 में जब दिल्ली आया तो शुरू-शुरू में राजघाट के गेस्ट हाउस में रहा करता था। जनसत्ता के संपादक दिवंगत प्रभाष जोशी ने मेरा, राजीव शुक्ल और सत्यप्रकाश त्रिपाठी के रहने का इंतजाम वहीं पर करवा दिया था। उस गेस्ट हाउस की खास बात यह थी कि वहां पर लंच व डिनर में अरहर की दाल भी मिलती थी। यह दाल हमारी सबसे बड़ी कमजोरी थी।इतनी अधिक कि हम जनसत्ता की नौकरी छोड़ वापस कानपुर जाने की ठान रखे थे। और तब चूंकि दिल्ली के ढाबों में छोले-भटूरे व मां-चने की दाल के सिवाय कुछ नहीं मिलता था इसलिए हमने ठान लिया था कि हम कानपुर लौट जाएंगे। भाड़ में जाए यह जनसत्ता की नौकरी जो नवभारत टाइम्स व हिंदुस्तान से कम वेतन देता था।

सब एडिटर के तीन इंक्रीमेंट देने के बाद भी मात्र 1463 रुपये और वह भी हर महीने दो-तीन दिन के पैसे कट जाते क्योंकि हम जब छुट्टी लेते तो वह छुट्टी अवैतनिक हो जाती। ऊपर से इंडियन एक्सप्रेस के लोगों ने हमें बता रखा था कि इस समूह के मालिक रामनाथ गोयनका हिंदी अखबार पटापट बंद कर देते हैं। इसलिए उनके मूड का कोई भरोसा नहीं है। पर सही समय में प्रभाष जी ने राजघाट गेस्ट हाउस में अरहर की दाल का इंतजाम कर दिया। उसी गेस्ट हाउस के परिसर में कवि भवानी प्रसाद मिश्र रहा करते थे।

हम रोज उस आवास के बाहर हिंदी में लिखी उनकी नेमप्लेट देखते और सोचते कि एक दिन उनके पास जाना है। उनकी एक नहीं अनगिनत कविताएं हमें याद थीं। एक रोज पिताजी को मैने पत्र लिखा कि मैं कानपुर आ रहा हूं बहुत हो गई यह दिल्ली की नौकरी। यहां की पत्रकारिता में वह चार्म नहीं जो डकैतों के इलाके में रिपोर्टिंग करते हुए महसूस होता था। जनसत्ता से तो दैनिक जागरण भला। भले वहां पगार कम थी और मेहनत ज्यादा पर मनोनुकूल काम का अवसर तो था। इस पर पिताजी का पत्र आया जिसमें भवानी प्रसाद मिश्र की कविता कोट थी- जन्म लिया है खेल नहीं है/ यहां नाचना ही होता है/ हर राधा को भले किसी के पास मनाने को/ छटाक भर तेल नहीं है।

इसके बाद कानपुर सिकनेस कुछ दिन के लिए रुक गई। पर जब फिर कानपुर की हूक उठी तो मैं हिम्मत कर भवानी बाबू के आवास पर पहुंच गया और काफी देर के इंतजार के बाद जब वे मिले तो मैने उनको अपने पिताजी का वह खत दिखाया और कहा कि क्या आपके पास ऐसी और कोई कविता है जो मुझे दिल्ली रोक सके। भवानी बाबू के धीर-गंभीर चेहरे पर मुस्कान झलकी और फिर उन्होंने कई कविताएं सुनाईं। उनमें से जो मुझे सबसे अधिक पसंद आई वह थी- “कठपुतली गुस्से से उबली …….!”

बाद में भवानी बाबू ने हमारे संपादक प्रभाष जी को कहा कि आपके परचे से अच्छे लोग जुड़े हैं। जब प्रभाष जी ने यह बात बताई तो हमने कहा कि बस अब नहीं जाना। यहीं रहना है। आज उन्हीं भवानी बाबू यानी भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म दिन है।

शंभुनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से

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जनसत्‍ता में सब कुछ ठीक नहीं जान पड़ता है… कुछ तो गड़बड़ है…

Abhishek Srivastava : दिल्‍ली के मोतीलाल नेहरू कॉलेज में चल रही मीडिया संगोष्‍ठी के एक सत्र में कल जनसत्‍ता के पत्रकार मनोज मिश्र और डॉ. राजेंद्र धोड़पकर वक्‍ता थे। दोनों लोगों ने भाषा के मामले में प्रभाष जोशी और जनसत्‍ता को याद किया। मनोज मिश्र ने बताया कि कैसे जनसत्‍ता में प्रभाषजी ने पत्रकारिता की एक नई भाषा गढ़ी जिसकी बाद में सारे इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया ने नकल मार ली। आप आज का और 23 तारीख का जनसत्‍ता उठाकर देखिए, समझ में आ जाएगा कि पत्रकार खुद अपना अखबार क्‍यों नहीं पढ़ते हैं और अतीत के गौरव में जीना क्‍यों पसंद करते हैं।


अखबार या परचा? प्रधानमंत्री की कही बात को अपने मुंह में डाल लेना कौन सी समझदारी है भाई?

कौन नामजद- बाप या बेटा?


23 मार्च को प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ को जनसत्‍ता ने अपने मन की बात बनाकर छापा था। मैंने सवेरे अखबार उठाया तो चौंक गया कि ये अखबार खुद ही किसानों से क्‍यों झूठे हमदर्दों से बचने का आवाहन कर रहा है। खबर के भीतर जाकर पता चला कि ये तो प्रधानजी ने कहा है। आज फिर से मैंने अखबार उठाया तो व्‍यापमं घोटाले में नामजद व्‍यक्ति की ‘मौत’ की खबर पर नज़र पड़ी। समझ ही नहीं आया कि नामजद कौन है- राज्‍यपाल रामनरेश यादव या उनका बेटा?

जनसत्‍ता में सब कुछ ठीक नहीं जान पड़ता है। कुछ तो गड़बड़ है। पता नहीं कौन बता रहा था कि एक्‍सप्रेस अब नोएडा में शिफ्ट हो रहा है और जनसत्‍ता के भी दिन कम बचे हैं। संपादकजी भी समाजवादियों के सान्निध्‍य में डब्‍लूएसएफ गए हुए हैं। जनसत्‍ता चाहे जो हो, जैसा हो, अंतत: अपना अखबार है। चिंता स्‍वाभाविक है!

युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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हिंदी अखबार के उप संपादक छोकरे और अंग्रेजी अखबार की कन्या का लव जिहाद!

साल 1988 की बात है। मैं तब जनसत्ता में मुख्य उप संपादक था और उसी साल संपादक प्रभाष जोशी ने जनसत्ता के राज्यों में प्रसार को देखते हुए एक अलग डेस्क बनाई। इस डेस्क में यूपी, एमपी, बिहार और राजस्थान की खबरों का चयन और वहां जनसत्ता के मानकों के अनुरूप जिला संवाददाता रखे जाने का प्रभार मुझे सौंपा। तब तक चूंकि बिहार से झारखंड और यूपी से उत्तराखंड अलग नहीं हुआ था इसलिए यह डेस्क अपने आप में सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा जिम्मेदारी को स्वीकार करने वाली डेस्क बनी। अब इसके साथियों का चयन बड़ा मुश्किल काम था। प्रभाष जी ने कहा कि साथियों का चयन तुम्हें ही करना है और उनकी संख्या का भी।

मैंने आठ लोग रखे- Sunil Shah (संप्रति अमर उजाला हल्द्वानी के स्थानीय संपादक) Sanjaya Kumar Singh, Arihan Jain (इस समय वे बिजनेस स्टैंडर्ड में संपादकीय प्रभारी हैं), अजय शर्मा (संप्रति एनडीटीवी में संपादक हैं) Sanjay Sinha (आजतक समूह के में संपादक हैं) अमरेंद्र राय बहुत दिनों से मिले नहीं पर वे विजुअल मीडिया के बिग गन हैं। सातवां साथी प्रभाष जी ने दिया प्रदीप पंडित। वे चंडीगढ़ जनसत्ता से आए थे और पद में तो मुझसे ऊपर थे ही पैसा भी अधिक पाते थे। अब प्रभाष जी की इच्छा। कौन किन्तु-परन्तु करे इसलिए स्वीकार किया। उनसे मुझे भी कुछ कहने में संकोच होता पर वे थे सज्जन आदमी कभी भी कोई भी काम सौंपा ऐतराज नहीं किया बस जिम्मेदारी लेने से कतराते थे इसलिए इस डेस्क पर डिप्टी इंचार्ज मैने बेहद पढ़ाकू और जिम्मेदार तथा जिज्ञासु पत्रकार सुनील शाह को बनाया। अब बाकी का तो ठीक था लेकिन संजय सिन्हा और संजय सिंह से काम कराना बहुत कठिन।

ऐसा नहीं कि वे नाकारा थे अथवा काम नहीं करना चाहते थे बल्कि वे सबसे ज्यादा काम करते लेकिन अपनी मर्जी से। एक घंटे काम किया और दो घंटे एक्स्प्रेस बिल्डिंग के पीछे टीटू की दूकान में जाकर अड्डेबाजी करने लगे। अथवा शाम आठ बजे पीक आवर्स में जामा मस्जिद के पास वाले करीम होटल में चले गए। कभी-कभी वे अपने साथ सुनील शाह को भी ले जाते। डांट-डपट से उन्हें भय नहीं था और उन दोनों के बीच कोई भेद उत्पन्न करना भी संभव नहीं था। मेरा सारा कौशल और श्रम उनकी मान-मनौवल में चला जाता। यह देखकर मेरे समकक्ष साथी मजे लेते क्योंकि इस डेस्क का भौकाल देखकर सभी उसमें आना चाहते थे। यह एक ऐसी डेस्क थी जिसमें किसी की कुछ न चलती सिवाय मेरे व संपादक श्री प्रभाष जोशी जी के। बड़े-बड़े जनसत्ताई तीसमार खाँ इस डेस्क से बेजार थे। इसलिए ऐसे में उनके पास एक उपाय था डेस्क के साथियों को फोड़ लेना। तब मैने एक आखिरी दांव फेंका संजय सिंह और संजय सिन्हा के पास। संजय सिन्हा नरम थे और जल्दी समझाए जा सकते थे। मैने कहा कि संजय देखो मैं भी चला करूंगा तुम लोगों के साथ करीम। अकेले-दुकेले जाते हो कुछ झगड़ा वगड़ा कर बैठे तो मुश्किल होगा। एक गार्जियन नुमा कद-काठी में भारी आदमी रखना जरूरी है। संजय सिन्हा ने यह बात संजय सिंह को बताई और दोनों राजी हो गए। अब दस साढ़े दस बजे जब मैं फारिग होता तो कहता चलो। तब तक वे भी थक जाते और टाल जाते तथा कहते कि शंभू जी अब सारा काम निपटा ही लेते हैं। इस तरह मैं उनको काम पर वापस लाया।

इसी बीच बेहद दर्शनीय, मनोहारी और लड़कियों के बीच बहुत लोकप्रिय संजय सिन्हा ने शादी करने की ठानी इंडियन एक्सप्रेस की उप संपादक दीपशिखा सेठ से। अब दोहरी मुसीबत लड़का खाँटी बिहारी और कन्या ठेठ पंजाबी। ऊपर से तुर्रा यह कि लड़का हिंदी अखबार में उप संपादक और कन्या अंग्रेजी अखबार में। यह अलग बात है कि बिहार के एक अभिजात्य कायस्थ परिवार में जन्में संजय सिन्हा का पारिवारिक माहौल अंग्रेजी दां था। उनके दादा ब्रिटिश काल में कानपुर के एडीएम थे और पिता बिहार बिजली बोर्ड के निदेशक, मामा मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशक। संजय की पढ़ाई विदेश में हुई थी। पर अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकारों को लगा कि अंग्रेजी पत्रकार कन्या हिंदी अखबार के पत्रकार से ब्याही जाए यह तो उनके लिए लव जिहाद टाइप का मामला हो गया। तत्काल इंडियन एक्स्प्रेस और जनसत्ता की डेस्क के बीच दीवाल चिनवा दी गई। लेकिन “जब मियाँ-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी” सो शादी तो होकर रही। चोरी-चोरी घर से छिपाकर भी और दफ्तरी लोगों से भी। फिर भी वह शादी ऐतिहासिक थी। शादी तो हुई आर्य समाज मंदिर में और भात हुआ नेशनल स्पोट्स क्लब आफ इंडिया (एनएससीआई) के लान में। खूब खाया भी गया और पीया भी। बाद में इंडियन एक्सप्रेस वालों ने वह दीवाल खुद ही तुड़वा दी।

कल दिल्ली के छतरपुर स्थित जी समूह के मालिक श्री जवाहर गोयल के फार्म हाउस में संजय सिन्हा का पुनर्विवाह हुआ। मैं तब भी मौजूद था और कल भी। चौंकिए नहीं दरअसल मौका था उन्हीं संजय सिन्हा की फेसबुक पुस्तक रिश्ते का जब विमोचन हुआ तो वहां एकत्र करीब हजार के आसपास फेसबुक मित्रों और उनके मित्रों को बताया गया कि यह साल संजय व दीपशिखा सेठ की शादी के 25 साल पूरा होने का है तो सब ने कहा कि तिथि की कौन जाने आज ही संजय सिन्हा और दीपशिखा सेठ का फिर से जयमाल कार्यक्रम हो। और हुआ। मैं ये दोनों फोटो अपनी पुरानी यादों के साथ रख रहा हूं। संजय सिंह और मेरे अलावा वहां वे लोग ही थे जिन्होंने संजय व दीपशिखा का वह जयमाल कार्यक्रम नहीं देखा था जो 24 साल पहले हुआ था पर यकीनन यह आयोजन ज्यादा भव्य और ज्यादा उत्साह के साथ मनाया गया। संजय सिन्हा और दीपशिखा सेठ के नवजीवन की बधाई और शुभकामनाएं कि अचल रहे अहिवात तुम्हारा जब लौं गंग-जमन की धारा।

मित्रों मेरा यहां यह चिठठा लिखने का आशय यह है कि अगर आप चाहते हो कि परस्पर प्रेम के बीच आने वाले अवरोधों और दीवालें तोड़नी हैं तो पहली क्रांति सामाजिक रिश्तों की करो। रिश्ते बनाओ प्रेम से, स्नेह से परस्पर के मेल-मिलाप से। खुदा तो सिर्फ मां-बाप ही देता है और बाकी के रिश्ते तो इंसान खुद तलाशता है। रिश्तों के अवरोधों को ध्वस्त करो।

लेखक शंभूनाथ शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है.

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जनसत्ता अखबार में नौकरी शुरू करने के कुछ समय बाद ही समझ में आ गया कि मैं इस पेशे में गलत आ गया हूं

Sanjaya Kumar Singh :  हिन्दी, हिन्दी की नौकरी, अर्ध बेरोजगारी और हिन्दी में बने रहना… जनसत्ता में उपसंपादक बनने के लिए लिखित परीक्षा पास करने के बाद इंटरव्यू से पहले ही सहायक संपादक बनवारी जी ने बता दिया था कि प्रशिक्षु रखा जाएगा और (लगभग) एक हजार रुपए महीने मिलेंगे। इतने में दिल्ली में रहना मुश्किल है, रह सकोगे तो बताओ। मैंने पूछा कि प्रशिक्षण अवधि कितने की है। बताया गया एक साल और फिर पूरे पैसे मिलने लगेंगे। पूरे मतलब कितने ना मैंने पूछा और ना उन्होंने बताया। बाद में पता चला कि प्रशिक्षण अवधि में 40 प्रतिशत तनख्वाह मिलती है। पूरे का मतलब अब आप समझ सकते हैं। मेरे लिए उस समय भी ये पैसे कम नहीं, बहुत कम थे।

नौकरी शुरू करने के बाद कुछ ही समय में यह समझ में आ गया कि मैं इस पेशे में गलत आ गया हूं। मैं मानता हूं कि यह पेशा (कम वेतन और सुविधाओं के कारण) मेरे लायक नहीं है। आप यह मान सकते हैं कि मैं इस पेशे के लायक नहीं था। मुझे दोनों में कोई खास अंतर नहीं लगता है। वैसे, मुझे यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि जनसत्ता या हिन्दी पत्रकारिता ने वेतन भत्तों के अलावा जो दिया वह कत्तई कम नहीं है। पर यह तो मिलना ही था। मैं यह बताना चाहता हूं कि आम नौकरियों में जो वेतन भत्ते, सुविधाएं आदि अमूमन मिलते ही हैं वह भी पत्रकारिता में मुश्किल है और जिन सुविधाओं के लिए पत्रकार बड़ी और लंबी-चौड़ी खबरें लिखते हैं वे खुद उन्हें नहीं मिलतीं। दुर्भाग्य यह कि वे इसके लिए लड़ते नहीं हैं, बोल भी नहीं पाते और इस तरह लिखना तो अपमान भी समझते हैं। हिन्दी पत्रकारिता बहुत हद तक एक पवित्र गाय की तरह है जिसके खिलाफ कुछ बोला नहीं जाता और उससे कुछ अपेक्षा भी नहीं की जाती है। फिर भी लोग उसकी सेवा करते रहते हैं।

अखबारों या पत्रकारिता की हालत खराब होने का एक कारण यह भी है कि अब पेशेवर संपादक नहीं के बराबर हैं। जो काम देख रहे हैं उनमें ज्यादातर को पत्रकारिता की तमीज नहीं है और पैसे कमाने की मजबूरी ऊपर से। अपने लिए और लाला के लिए भी। नियुक्ति के मामले में संपादकों पर दबाव आज से नहीं है। जनसत्ता ज्वायन करने के बाद विज्ञापन निकला कि एक राष्ट्रीय हिन्दी अखबार को जमशेदपुर में अपने पटना संस्करण के लिए जमशेदपुर में रिपोर्टर चाहिए था। मैंने आवेदन किया। लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के बाद कॉल लेटर नहीं आया तो मैंन कुछ परिचितों से चर्चा की। संयोग से अखबार के उस समय के प्रधान संपादक परिचित के परिचित निकले और इंटरव्यू उन्हीं ने लिया था। परिचित के साथ बात-चीत में उन्होंने स्वीकार किया कि उस समय तक कोई नियुक्ति नहीं हुई थी पर साथ ही यह भी कहा कि मैं किसी राजनीतिज्ञ से अखबार के बड़े लोगों में से किसी को कहलवा दूं तो चुनाव हो जाएगा (उन्होंने दो-चार नाम भी बताए) वरना सिफारिश के बगैर उनके यहां कोई नियुक्ति नहीं होती। हिन्दी में सच पूछिए तो तीन ही राष्ट्रीय अखबार हैं। एक में मैं था ही, दूसरे की हालत यह रही। तीसरा अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया समूह का था जो अखबार को प्रोडक्ट मानने की घोषणा कर चुका था और अब कह चुका है कि वह खबरों का नहीं विज्ञापनों का धंधा करता है। इस संस्थान ने एक नीतिगत फैसला लिया और नवभारत टाइम्स का ब्यूरो बंद कर दिया। अब लगता है कि टाइम्स समूह के मालिकानों की ही तरह जनसत्ता के मालिकानों ने भी उस समय के फैशन के अनुसार अपने हिन्दी प्रकाशन पर ध्यान देना बंद कर दिया होगा।

हिन्दी पत्रकारों के लिए एक संभावना आजतक चैनल शुरू होने की योजना से बनी। कुछ लोगों ने मुझे वहां जाने की सलाह दी। कुछ ही दिनों में वहां जान पहचान निकल आई और मैं पूरी सिफारिश (यह सिफारिश पत्रकारों की थी, मंत्री या ऐसे किसी शक्तिशाली की नहीं) के साथ उस समय वहां जो काम देख रहा था उनसे बातचीत के लिए पहुंचा। अच्छी बातचीत हुई और मामला ठीक लग रहा। चलते समय उन्होंने पूछा कि मुझे जनसत्ता में कितने पैसे मिलते हैं और इसके जवाब में मैंने जो पैसे मिलते थे वह बताया तो उन्होंने ऐसा मुंह बनाया जैसे मैं कहीं बेगार कर रहा था। जनसत्ता में मेरी नौकरी सिर्फ छह घंटे की थी और मैं खुद को अर्ध बेरोजगार मानता था। ऐसे में मेरी कम तनख्वाह पर उन्होंने जो मुंह बनाया उसपर मुझे गुस्सा आ गया और मैंने बहुत ही खराब ढंग से कहा कि उतने पैसे मुझे सिर्फ छह घंटे काम करने के मिलते हैं और टीवी में चूंकि कम से कम 12 घंटे काम करने की बात हो रही है इसलिए मैं ढाई से तीन गुना तनख्वाह की अपेक्षा करूंगा। मुझे उस समय भी पता था कि इस तरह नहीं कहना चाहिए पर जो मैं हूं सो हूं। बाद में इस चैनल के सर्वेसर्वा मशहूर पत्रकार सुरेन्द्र प्रताप सिंह हुए और उन्हें जिन्हें नहीं रखना था उनके लिए बड़ी अच्छी शर्त रखी थी – अनुभवी लोग चाहिए। उन दिनों उमेश जोशी के अलावा गिनती के लोग थे जो अखबार और टीवी दोनों में काम करते थे। पर इनमें से कोई आजतक में नहीं रखा गया। आज तक जब शुरू हुआ था तो देश में हिन्दी के समाचार चैनलों में काम करने वाले या कर चुके बहुत कम लोग थे। उनमें उसे अनुभवी कहां और कैसे मिले यह अलग विषय है। हां, आज तक शुरू होने पर जो प्रेस विज्ञप्ति जारी हुई थी वह अंग्रेजी में बनी थी और एक पीआर एजेंसी के लिए उसका हिन्दी अनुवाद मैंने किया था।

इसके बाद चैनलों की एक तरह से बाढ़ आई और प्रिंट मीडिया के कई लोगों ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का रुख किया और कई बगैर अनुभव के लोग खप गए। कइयों की मोटी तनख्वाह हो गई और पत्रकारों की तनख्वाह इतनी बढ़ गई थी कि इंडिया टुडे ने इसपर स्टोरी भी की थी। जुगाड़ और जान-पहचान के साथ मुमकिन है, योग्यता से भी काफी लोग इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में चले गए पर मुझे मौका नहीं मिला। सच कहूं तो आज तक वाली घटना के बाद मैं किसी टीवी चैनल में नौकरी मांगने गया भी नहीं। एक मित्र अब बंद हो चुके चैनल में अच्छे पद पर थे। काफी लोगों को रखा भी था। मेरे एक साथी ने बहुत जिद की कि उस साझे मित्र से नौकरी के लिए बात करने में कोई बुराई नहीं है और ज्यादा से ज्यादा वह मना कर देगा। मैं भी उसके साथ चलूं। मैं नहीं गया। लौटकर साथी ने बताया ने कि उस मित्र ने जितनी देर बात की उसके पैर मेज पर ही रहे। नौकरी तो उसने नहीं ही दी। वह मित्र है तो हिन्दी भाषी पर नौकरी अंग्रेजी की करता है।

इधर जनसत्ता में तरक्की हो नहीं रही थी। प्रभाष जोशी रिटायर हो गए। नए संपादक ने तरक्की की रेवड़ी बांटी और कुछ लोगों को दो तरक्की दी। मुझे एक ही तरक्की मिली थी। मैं फिर निराश ही रहा। संपादक जी कुछ दिन में छोड़ गए। उनके बाद ओम थानवी आए। लगा नहीं कि ज्यादा समय चल पाउंगा। इसी बीच वीआरएस लेने का ऑफर आ गया और मैंने उसे गले लगा लिया। हिन्दी अखबार में आने से पहले मैं जमशेदुपर में अमृत बाजार पत्रिका के लिए रिपोर्टिंग करता था और दि टेलीग्राफ में मेरी रिपोर्ट प्रकाशित हो चुकी थी। मैं अंग्रेजी पत्रकारिता में भी जा सकता था – पर वहां शायद कमजोर होता या उतना मजबूत नहीं जितना हिन्दी में था या हूं। इसलिए मैंने अंग्रेजी पत्रकारिता में जाना ठीक नहीं समझा और अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद को प्राथमिकता दी। मुझे लगता है मेरे स्वभाव और मेरी सीमाओं के लिहाज से यह ठीक ही रहा।

(अपनी अप्रकाशित अनाम पुस्तक का संपादित अंश, साथी Sumant Bhattacharya के आग्रह पर।)

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं…

    Shivnath Jha जिन सुविधाओं के लिए पत्रकार बड़ी और लंबी-चौड़ी खबरें लिखते हैं वे खुद उन्हें नहीं मिलतीं।
 
    Shivnath Jha क्षमा याचना के साथ: इंडियन एक्सप्रेस समूह से प्रकाशित समाचार-पत्रों में मालिक से मुख्तार (संपादकों) और कुछ प्रमुख पत्रकारों ने जितनी “अपनी-अपनी दुकानदारी चलायी” शायद इसका प्रतिक है JOURNALISM of DISCOURAGE
 
    Sumant Bhattacharya संजय भाई,,.जब आापकी आपबीती को पढ़ रहा था तो लगा कि खुद को बयां कर रहा हूं कहीं ना कहीं….फिलहाल अपनी सारी टिप्पणियां सुरक्षित रखते हुए इतनी भर गुजारिश करूंगा कि दास्तां में शामिल घटनाओं को और विस्तार दें और किरदार साफ करें..आखिर यह आपका पेज है..और यहां कोई आपकी राह में अवरोध नहीं है।
   
    Pramod Shukla सुमंत जी के आग्रह को मैं दोहरा रहा हूं…… विस्तार देने और किरदार साफ करने में संकोच कैसा….. वैसे भी जब जनसत्ता के रिपोर्टर रिपोर्ट लिखने में संकोच नहीं करते रहे हैं, और संपादक संपादन में कोई संकोच न करने की परंपरा डाले थे…. तो फिर संकोच कैसा……. खुलासा होना ही चाहिए कि ….. औरो को दो ….. आप को एक ही क्यो….. वीआरएस को गले लगाने की जरूरत…. या मजबूरी क्यो आन पड़ी गले… विस्तार लोग पढ़ना चाहते हैं….. ये सिर्फ आप की आत्मकथा नहीं है… इसमें समाहित है हिन्दी के सर्वाधिक महत्वपूर्ण दैनक की अंदरूनी कथा… सत्य… जो अंदर के ही नहीं, बाहर के लोग भी पढ़ना चाहेंगे, पसंद करेंगे……
    
    Kishore Kumar एसपी सिंह को मसीहा मानने वालों की कमी नहीं और आप उनकी पत्रकारिता पर भी सवाल खड़ा कर रहे हैं!
    
    Sanjaya Kumar Singh Pramod Shukla जी, किरदारों के नाम और पहचान किताब में स्पष्ट हैं। यहां नहीं देने के दो कारण है – एक तो बहुत पुरानी बात है, संबंधित लोगों को याद दिलाने की जरूरत है। और दूसरे किताब के लिए कुछ नया, अनकहा, अनजाना रहना चाहिए। संकोच कोई नहीं है। मेरे ख्याल से पात्रों को भी नहीं होगा।
    
    Sanjaya Kumar Singh किशोर जी, एसपी सिंह को जो, जो मानते थे मानें। मेरी उनसे एक मुलाकात भी नहीं है। आजतक में मेरी भिड़ंत उनके संपादक बनने से पहले हुई थी और उसके बाद मुझे वहां जाना भी नहीं था। लेकिन उनकी शर्त पर उन्हें लोग कहां मिले और जिनके मामले में उन्होंने अपनी ही शर्त तोड़ी – उसका कारण मुझे बहुत बाद में एक लेख में मिला आपको मेल कर रहा हूं। पढ़िए और आनंद लीजिए। एसपी सिंह के बारे में जनपथ डॉट कॉम पर जितेन्द्र कुमार का यह आलेख, “टेलीविज़न पत्रकारिता: संदर्भ एसपी सिंह” शीर्षक से एक प्रकाशित हुआ। उसे पढ़कर लगा कि एसपी सिंह के बारे में लेखक की राय तकरीबन वही है जो मेरी है।
 

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