रंगनाथ सिंह-
दि प्रिंट की टीम एडिटोरियली पुअर है। इंग्लिश मीडियम एजुकेशन ने भारत में मानसिक गुलामों की पूरी फौज खड़ी कर दी है। ऐसा न होता तो यहाँ हर दूसरे दिन कोई न कोई नया नीरद सी चौधरी अपनी हीनता ग्रन्थि यूँ उजागर न करता। चलिए लेखक वैशाखनन्दन है कोई बात नहीं मगर क्या दि प्रिन्ट के एडिटर सो रहे थे जो ऐसी अहमकाना हेडिंग दे दी। कुछ और नहीं कर सकते थे तो प्रश्नवाचक या विस्मयादिबोधक चिह्न ही लगा देते।
कल ही मैं कोक स्टूडियो के पहले छह अंक के प्रोड्यूसर रोहेल हयात का साल 2015 का एक संवाद सुन रहा था। रोहेल बता रहे थे कि किस तरह पश्चिमी संगीत में पगे उनके जेहन पर हिन्दुस्तानी संगीत का रंग चढ़ा था। मैं संगीत का जानकार नहीं हूँ, श्रोता भर हूँ। रोहेल जानकार हैं। उन्होंने पश्चिमी नोट और आक्टेव की हिन्दुस्तानी संगीत के सुरों से तुलना करके बताया कि शुरू में उन्हें हिन्दुस्तानी संगीत के नोट ग्रहण करने में क्या दिक्कत हुई।
यह ठीक बात है कि आर्थिक और मानसिक गुलामी ने भारत को बहुत से मामलों में गरीब कर दिया है मगर गुलामी के दौर में भी हिन्दुस्तानी संगीत ऐसे जीनियस पैदा करती रही है जिनको दुनिया के किसी अन्य महान संगीतकार के बराबर रखा जा सकता है। हालाँकि भारत के आजाद होने के बाद हर उस चीज पर ग्रहण लग गया जिसमें हिन्दुस्तानी परम्परा झलकती है।
दि प्रिन्ट का लेख पढ़कर आपको पता चलेगा कि बन्दे का असल दर्द संगीत नहीं है बल्कि विदेशी बैण्डबाजा वालों के लिए भारत में पर्याप्त मार्केट न तैयार होना है। बन्दे का दुख ये है कि एक ब्रिटिश बैण्ड की टिकट भारत में नहीं बिकी। भाई तुम्हारा दुख हम समझ सकते हैं मगर इंग्लिश म्यूजिक की मानसिक गुलामी को लेकर निराश होने की जरूरत नहीं है। चाहो तो एक बार “के पॉप” के नौनिहालों को भारत में बुलाकर देख लो। माँ-बाप से तलाक लेकर बच्चे-बच्चियाँ बम्बई या दिल्ली जाम कर देंगे!
ऐसा भी नहीं है कि इंग्लिश गवैयों से कोई दिक्कत है। भारत के सबसे अमीर लोग उन्हीं के गाने सुनते हैं। गरीब लोग मनोरंजन के लिए शाहरुख खान के गाने सुनते हैं और शाहरुख खान एड शीरन के गाने सुनते हैं। सीधा समीकरण है। अब अमीरों का क्राउड तो होता नहीं है। आज भी वे कुल आबादी के दो प्रतिशत ही हैं तो इतने थोड़े से लोग किस-किस का और कितना टिकट खरीदेंगे। अमीरों की आबादी में मिडिल क्लास को भी जोड़ दो तो कुल 10-20 प्रतिशत होते हैं। मगर मिडिल क्लास की दिक्कत ये है कि वह इतना अमीर भी नहीं होता कि ब्रिटेन से बैण्ड आने की खबर सुनकर टिकट लेने दौड़ पड़े! उसके पास पैसे हैं, मगर इतने नहीं कि हर किसी पर लुटा सके।
बाबा कार्ल मार्क्स ने भाषा को मनुष्य की व्यावहारिक चेतना कहा है। भाषा बदलने से मनुष्य की व्यावहारिक चेतना बदल जाती है। यह बात अरब और ब्रिटिश भलीभांति समझते थे। युद्ध के मैदान में हारने के बावजूद ईरानियों ने कल्चर के मैदान पर अरब को बैकफुट पर धकेल दिया। ब्रिटिश इस मामले में ज्यादा होशियार निकले। उन्होंने अरबों से अलग लम्बा मगर ठोस रास्ता चुना। इंग्लिश मीडियम मनुष्य की चेतना बदल सकती है इसका उन्हें विश्वास था और यह सच साबित हुआ मगर इसमें थोड़ा सा पेंच ये आ गया कि वह बदली हुई चेतना अपनी जड़ों से कटकर हवा में लटकेगी तो उसका मुँह कब किधर घूम जाएगा, यह जानना किसी के वश की बात नहीं है।
अब ये जरूरी नहीं है कि जड़ों से कटे मानसिक गुलाम का सांस्कृतिक आस्वाद ब्रिटेन या ब्रिटिश कॉलोनियों की तरफ ही घूमे। वह फ्रांस, स्पेन, इटली, जर्मनी या कोरिया की तरफ भी घूम सकता है। आजकल कोरिया की तरफ ज्यादा घूमा हुआ है। मगर ऐसा भी नहीं है कि भूरे अंग्रेज ब्रिटिश संगीत से भेदभाव करते हैं। बीटल्स के कई गाने मेरे भी फेवरेट गानों में हैं। एड शीरन का शेप मुझे भी पसन्द आया था। बाकी देश में उनके चाहने वाले लाखों में होंगे। भारत अपने मूल दर्शन में अतिथि को देव समझने वाला देश रहा है। संगीत के मामले में भी यह परमसत्य है मगर संगीत में भारतीय उपमहाद्वीप इतना धनी है कि उसके पास नई दुकान से पकवान खरीदने की उतनी जरूरत नहीं है। पकवान पसन्द भी हो तो ब्रिटेन द्वारा 200 साल तक लूटे जाने कारण हर टिकट खरीदने के पैसे नहीं हैं।
अगर बात कटिंग-एज टेक्नोलॉजी से बने वाद्ययंत्रों की करें तो इस मामले में भी भारतीय उपमहाद्वीप के लोग खुले विचार के रहे हैं। इसका सर्वोत्तम उदाहरण हिन्दी फिल्म संगीत और ताजा उदाहरण कोक स्टूडियो है। अमीर देशों में बने कथित कटिंग-एज ढोल, ताशे, हारमोनियम, संतूर इत्यादि का इस्तेमाल करके हिन्दी सिनेमा का संगीत और कोक स्टूडियो का संगीत सुनकर जड़कटी इंग्लिश मीडियम टाइप पीढ़ी भी ब्रिटेन से बेवफा हो जाती है। फ्लुएंट इंग्लिश वाली पीढ़ी भी पसूरी गा रही है। हर दम आपकी महँगी टिकट कब तक खरीदेंगे!
कुछ चीजों में भारतीय उपमहाद्वीप जीनियस रहा है, उनमें एक है, संगीत। हो सकता है कि ब्रिटेन वालों के खून में केवल आरबीसी और डब्ल्यूबीसी होता हो मगर इस खित्ते वालों के ब्लड में संगीत भी होता है। यही कारण है कि भारत में संगीत सीखने वाले आते रहे हैं, मगर किसी भारतीय को संगीत सीखने कहीं बाहर नहीं जाना पड़ता। कटिंग-एज वाद्ययंत्र सीखना और उसका इस्तेमाल करना एक बात है, संगीत सीखना दूसरी बात है। यूरोप घूमने के बाद रविशंकर को संगीत सीखने बाबा अल्लाउद्दीन खाँ के पास मैहर जाना पड़ा था। यूरोप ने महान संगीतकार दिये हैं मगर उनके 12 नोट और हमारे सात सुर के बीच अमीरी-गरीबी का कोई भेद नहीं है। न हमारी जनता में संगीत के कद्रदानों की कमी रही है।
यह कहने की बात नहीं है कि हमारा संगीत पर्याप्त अमीर है। अब अगर कोई सऊदी अरब को पेट्रोल बेचना चाहता है तो उसे उसमें कुछ अतिरिक्त प्रस्तुत करना होगा। जिन ब्रिटिश संगीतकारों ने कुछ अतिरिक्त पेश किया, उनका भारत में स्वागत हुआ। मगर वो यहाँ टिक न सके क्योंकि हर पौधे की अपनी प्रिय मिट्टी, अपनी प्रिय आबोहवा होती है। मिट्टी से उपजा संगीत इकतारे पर मन मोह सकता है। मिट्टी से कटा संगीत मौसम की तरह आता है, चला जाता है। अगर किसी को टेक्नोलॉजी और संगीत में फर्क नहीं समझ आ रहा है, तो उसे इन विषयों पर लिखने से परहेज करना चाहिए मगर जब फूफा सम्पादक हों तो फिर ऐसे लेख छपने से कौन रोक सकता है!



कवि
October 6, 2024 at 11:29 am
ये कहना बिल्कुल गलत है कि आजादी के बाद भारतीय संस्कृति और परम्परा पर ग्रहण लग गया। वास्तविकता ये है कि देश की सभ्यता संस्कृति पिछले एक हज़ार साल में आज सबसे ज्यादा फल फूल रही। सरकार से ज्यादा अब आम नागरिकों की जिम्मेदारी है कि हम अपनी परम्परा को कायम रखें।