मनीष सिंह-
झोली भरकर घर लौट आया हूँ। इसमे एक ट्रॉफी है। एक प्रशस्ति पत्र, साथ मे पचास हजार का चेक। और गांधी जी से जुड़ी आधा दर्जन किताबें.. सोचता हूँ, सबसे ज्यादा कीमती क्या है? कोई नोबल प्राइज नही मिला है। पर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के उस हॉल में मौजूद सभी- अपने आपमे नोबल शख्स थे। मंच पर साइंटिस्ट गौहर रजा थे। साथ आनंद वर्धन (फाउंडर, पब्लिक इंडिया) और सिद्धार्थ वरदराजन (द वायर), कार्टूनिस्ट मंजुल, (जो पूरे दिन भर मेरे साथ, बेनाम ऐतिहासिक जगहो पर घूमने के शगल मे, साथ थे, और पति पत्नी के फोटोग्राफर बने रहे) के साथ ही हॉल में प्रवेश किया। लेट थे, कार्यक्रम शुरू हो चुका था।
पीछे की सीट पर पर प्रोफेसर अपूर्वानंद दिखे। प्रमाण किया वहीं बैठ गए। उधर आयोजक मंडल से ज्ञानेश जी ने नोटिस किया और आगे आकर बैठने सन्देश भेजा। हम सकुचाते हुए फ्रंट रो में गए। खाली सीट पर नाम की तख्ती थी। पुलित्जर विजेता, सना मट्टू के बगल में बिठा दिया गया।
तब मंच पर अब राहुल देव बोल रहे थे। उन्होंने ही चुने जाने की खबर दी थी। वे पुरस्कार के उद्देध्य, ज्यूरी औऱ कैटगरीज के बारे में बता रहे थे। शायद उन्होंने मुझे देखा न था। तमाम प्रशंसा के साथ मेरी बात की, नाम लिया- पूछा कि कहां बैठा हूँ।
उठा, हाथ जोड़े। घूम कर हॉल की ओर भी नमस्कार किया। और इस क्षण में सिहर गया। सारे बेबाक, खुर्राट, मूर्धन्य, प्रतिभाशाली, और पत्रकारिता की दुनिया के जाने माने लोग, जिन्हें दशकों से स्क्रीन पर ही देखा था।सच कहूं तो हर शख्स के तेज के ताप से जलता महसूस किया।
लेकिन बीच मे वे भी दिखे, जिनका स्नेह लगातार मिला है। डॉक्टर राकेश पाठक, दयाशंकर जी, अभिषेक जी, सीपी राय, अनुमा आचार्य, और तमाम लोग बड़े अपनत्व से निहार रहे थे। थोड़ी जान में जान आयी।
कार्यक्रम बढ़ा। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की अध्यक्ष मैडम बरुआ ने बोला। फिर सिद्धार्थ जी बोले। इसके बाद सम्मान शुरू हुए। सबसे पहले मंजुल जी को सम्मानित हुए। फिर सना मट्टू को, फिर अफरीदा हुसैन।अंत मे मेरा नम्बर आया।
और एक सरप्राइज था।
मैडम सुप्रिया श्रीनेत, जिन्हें अभी तक मैंने नही देखा, ने मंच पर जॉइन किया। प्रोत्साहन भरे शब्द कहे मेरे लिए। वह सुनना कानो के लिए अच्छा था, लेकिन नर्वसनेस भी बढ़ती जा रही थी।
अंततः आनंद बर्धन साहब ने शॉल पहनाई। गौहर रजा ने ट्रॉफी दी। नर्वस देख, कान में कुछ शब्द भी कहे। सिद्धार्थ वरदराजन ने सर्टिफिकेट फोल्डर और किताबो का बंच दिया। मुझसे स्पीच का आग्रह किया गया।
कुछ मिनट, कुछ तो भी बोला मैने। इसके बाद करन थापर को, लाइफटाइम अचीवमेंट को अवार्ड दिया गया। अमेरिकन जर्नलिस्ट, और अवार्डी-सुश्री लीडिया ने ऑनलाइन उद्बोधन किया।
फिर डिनर था। राजीव जादौन सहित बहुतेरे मित्र मिले। अनुमा जी के परिवार से मिला। भीड़ में कुछ के साथ मैंने सेल्फी ली- कुछ ने मेरे साथ..
सुप्रीम कोर्ट के दो वकीलों से मिलना खूब रहा। मुझे पढ़ते है, पसंद करते हैं, और कभी जरूरत पड़े तो उसके लिए कार्ड दे गए हैं।
हालात के मद्देनजर, दोनों कार्ड पत्नी के पास सुरक्षित रखवा दिए हैं। इस्तेमाल, कभी करना हुआ, तो वही करेंगी। हम तो भीतर होंगे। डिनर के बाद वापसी थी। लेकिन चेरी ऑन द केक बाकी था। जब आयोजको से इजाजत लेने गया, वहां सुप्रिया जी मौजूद थी।
खुद अपनी गाड़ी में हमे होटल तक छोड़ा। उस आधे घण्टे की राइड में, मैनें काग्रेस के उद्धार का कोई भी आइडिया देने से गुरेज किया। बस उस फियरलेस फायरब्रांड नेत्री के अनदेखे, बेहद हँसमुख, ग्रेसफुल पहलू का आनंद लिया। तो झोली भरकर आया हूँ।
ट्रॉफी है, प्रशस्ति पत्र, चेक, किताबें.. और सोचता हूँ, सबसे ज्यादा कीमती क्या है? सम्मान-पुरस्कार बहुत मिले हैं- अपने प्रोफेशनल फील्ड में। जो जानते हैं-वो जानते है। लेकिन, पत्रकार, प्रोफेसर, वैज्ञानिक न होते हुए भी- इस फील्ड के तमाम लोगो ने मुझ एमेच्योर, नोबडी को इतनी मोहब्बत से नवाजा- किसी झोली में नही समायेगा। तो कोई नोबेल नही मिला मुझे। मगर बहुत से नोबल लोग मिले हैं। उनकी मुस्कान, हाथ पकड़ना, साथ खड़ा होना, और साथ खड़ा होने की इजाजत देना..
इस बड़प्पन और सराहना से निहाल हूँ। यही कमाई है। यही सबसे कीमती है। द पब्लिक इंडिया, और सभी आयोजनकर्ताओ, ज्यूरी, उपस्थितों का आभार। और मुझे पढ़कर, सराहकर, मुझ पर विश्वास जताकर, उस मंच तक धकेलने वाली, फेसबुक- ट्विटर की मेरी मित्र मंडली में शामिल, आप सभी का भी।
शुक्रिया!


