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विनोद कापड़ी की फिल्म ‘द पायर’ धरती का आसमान के नाम एक खूबसूरत प्रेमपत्र है!

अशोक पांडे-

स्टोनिया की राजधानी टालिन में होने वाले ब्लैक नाइट्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भारत की इकलौती एंट्री के तौर पर विनोद कापड़ी (Vinod Kapri) की नई फिल्म ‘द पायर’ को शामिल किया गया है. दुनिया भर के आलोचकों ने उसकी खुल कर तारीफ़ की है. इससे भी बड़ी ख़बर यह है अगले कुछ महीनों के दौरान यह फिल्म कुछ दूसरे अंतर्राष्ट्रीय समारोहों में दिखाई जाएगी. उसके बाद अगले साल इसे सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रिलीज़ किया जाएगा.

विनोद और उसकी फिल्म की इतनी बड़ी कामयाबी ने भीतर तक खुशी से भर दिया है – हमारे पहाड़ों में इसे छपछपी लगना कहते हैं.

इस फिल्म को बिल्कुल शुरुआत से बनते हुए देखना किसी तिलिस्म को घटते देखना था. हर वक़्त नई कथाओं-किस्सों की तलाश में रहने वाले विनोद ने जब इस निपट अनछुए विषय को अपनी फिल्म का विषय बनाने का फ़ैसला किया तो एकबारगी मुझे भी अचरज हुआ था. फिर फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी गई. उसे हज़ार बार बदला-सुधारा गया. एक-एक डायलॉग पर कई-कई दिन काम हुआ.

शूटिंग शुरू होने से पहले मुख्य कलाकार खोजे जाने थे. कहानी के लिहाज से उपयुक्त अभिनेता मिलने में शुरुआती मुश्किलों का लंबा दौर चला लेकिन उसके बाद जैसे एक चमत्कार घटा – सबको चौंकाते हुए विनोद ने फिल्म के मुख्य किरदारों का रोल करने के लिए सत्तर-पार के दो ऐसे बूढ़े स्त्री-पुरुषों को छांटा जिन्हें अभिनय का कोई अनुभव न था. पहाड़ी गाँवों की पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले हीरा देवी और पदम सिंह ने अपने नैसर्गिक अभिनय से फिल्म के एक-एक फ्रेम में जिस तरह प्राण फूंके हैं, उसे समझने के लिए फिल्म को देखा जाना निहायत ज़रूरी है.

कुमाऊँ की एक सुदूर और अतीव सुन्दर ग्रामीण लोकेशन में बिल्कुल बुनियादी सुविधाओं के बीच विनोद ने फिल्म की शूटिंग शुरू की. मानसून के मुश्किल दिनों में डेढ़-दो माह शूटिंग हुई. लोकेशन पर या उसके तीस-चालीस किलोमीटर के दायरे में कोई होटल इत्यादि न थे. सो एक-दो ठेठ ग्रामीण घरों को किराए पर लिया गया जिनमें पूरी यूनिट को टिकाया गया. एक घर का एक कोना बतौर फिल्म-निर्देशक विनोद को भी हासिल हुआ. यूनिट के एक-एक सदस्य से विनोद का सीधा संवाद था और सबके बीच आपस में ऐसी अंतरंगता थी कि बारिश, जोंक, कीचड़, रपटीले रास्तों और अनिश्चित मौसम के बावजूद हर किसी ने बिना शिकायत किये अपना-अपना काम किया.

उस दौरान हुए अनुभवों को सुनाता हुआ विनोद अब भी बहुत भावुक हो जाता है. मुझे उम्मीद है एक न एक दिन वह उन अनुभवों को किताब की सूरत अवश्य देगा.

शूटिंग के बाद पोस्ट-प्रोडक्शन का लंबा दौर चला – इस मुश्किल दौर की शुरूआत में ही बड़ा आर्थिक दचका लगा जब मूल निर्माता ने अपने हाथ खींच लिए. फिल्म को पूरा करने की धुन में विनोद के अपनी गाड़ी तक बेचनी पड़ी. फिल्म की एडिटिंग का काम जर्मनी की अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पैट्रीशिया रोमेल ने किया. जिस दिन फिल्म में संगीत देने के लिए ‘लाइफ़ ऑफ़ पाई’ जैसी फिल्मों के संगीत निर्देशक रहे, कैनेडियन मूल के ऑस्कर विजेता माइकेल डाना ने हामी भरी, मुझे फिल्म की सफलता पर कोई संदेह नहीं रह गया था.

एक फिल्म-निर्देशक के तौर पर विनोद ने हमेशा अपने विषय-चयन से हैरान किया है. हमेशा यूं भी होता है कि उसने सामने आशातीत मुश्किलों के अम्बार खड़े हो जाते हैं लेकिन अपनी विकट पहाड़ी ज़िद और समर्पण के चलते वह हर बार फतहयाब होकर निकलता है. इस बार भी ऐसा ही हुआ है. बल्कि इस बार तो अभूतपूर्व घटा है.

विनोद की इस फिल्म की संरचना तो कविता जैसी है लेकिन विषयवस्तु और ट्रीटमेंट के लिहाज से उसके भीतर किसी पुराने महाकाव्य की सुदीर्घ गाथा जैसा विस्तार और ठहराव है. हिमालय के एक सुदूर गाँव में, एक इंतज़ार से दूसरे इंतज़ार में अपना जीवन भोगते-जीते एक बूढ़े दंपत्ति की मर्म को छू लेने वाली इस दास्तान को विनोद कापड़ी ने अपनी संवेदनशील और पैनी निगाह से दुनिया के हर इंसान की दास्तान बना दिया है.

‘द पायर’ धरती का आसमान के नाम लिखा गया एक खूबसूरत प्रेमपत्र है!

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