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दिल्ली

‘द वायर’ के खिलाफ समन आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली HC ने फैसला सुरक्षित रखा

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार (7 मई) को ‘द वायर’ और इसके डिप्टी एडिटर अजय अशरफ महाप्रस्था की उस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें उन्होंने पूर्व जेएनयू प्रोफेसर अमिता सिंह द्वारा दाखिल मानहानि केस में उनके खिलाफ जारी क्रिमिनल समन को चुनौती दी है। यह याचिका फाउंडेशन ऑफ इंडिपेंडेंट जर्नलिज्म की ओर से दाखिल की गई थी, जो ‘द वायर’ का संचालन करता है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फारासत ने दलील दी कि भारतीय न्याय संहिता (BNSS) की धारा 223 के तहत अब समन जारी करने से पहले आरोपी को नोटिस देना अनिवार्य है, जो इस मामले में नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि यह प्रावधान नए कानून में जोड़ा गया है, जो पहले दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में नहीं था।

लाइव लॉ की वेबसाइट में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए पूछा, “आपका तर्क यह है कि चूंकि नोटिस नहीं दिया गया, इसलिए समन आदेश गलत है?” फारासत ने पुष्टि की कि यही उनका मुख्य आधार है।

फारासत ने यह भी कहा कि ‘द वायर’ कोई कानूनी इकाई नहीं है, ऐसे में नोटिस ‘चीफ एडिटर के माध्यम से द वायर’ को भेजा जाना भी प्रक्रिया की त्रुटि है। वहीं, अमिता सिंह की ओर से पेश वकील ने कहा कि इस मामले में धारा 202 CrPC के तहत पूर्व-समन जांच वर्ष 2016 में पूरी हो चुकी थी और यह मुकदमा पहले ही सुप्रीम कोर्ट तक जा चुका है।

BNSS और CrPC के टकराव पर बहस

फारासत ने तर्क दिया कि BNSS की धारा 531(2) मौजूदा मामले पर लागू नहीं होती क्योंकि 1 जुलाई 2024 को जब नई न्याय संहिता लागू हुई, उस समय यह मामला उच्च न्यायालय द्वारा खारिज किया जा चुका था और 24 जुलाई 2024 को ही सुप्रीम कोर्ट ने इसे पुनः बहाल किया। यानी 30 जून तक CrPC के तहत कोई कार्रवाई लंबित नहीं थी, इसलिए BNSS की नई व्यवस्था लागू होती है और उसके अनुसार समन से पहले नोटिस अनिवार्य था।

दूसरी ओर, अमिता सिंह के वकील ने कहा कि एसएलपी (विशेष अनुमति याचिका) को भी मुकदमे की निरंतरता माना जाता है और inquiry की प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी थी, इसलिए यह केस CrPC के दायरे में ही आता है।

न्यायाधीश नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि मुख्य प्रश्न यही है कि क्या यह मामला BNSS के तहत आता है या CrPC के तहत, और इसी तकनीकी बिंदु पर फैसला लिया जाएगा। उन्होंने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आदेश को अपने चैंबर में सुरक्षित रख लिया।

पूरा मामला क्या है?

यह मामला 2016 का है, जब द वायर के डिप्टी एडिटर अजय अशरफ महाप्रस्था ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसका शीर्षक था: “Dossier Calls JNU ‘Den of Organised Sex Racket’; Students, Professors Allege Hate Campaign”।

इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि अमिता सिंह द्वारा जेएनयू के बारे में एक ‘डोजियर’ तैयार किया गया, जिसमें विश्वविद्यालय को ‘संगठित सेक्स रैकेट का अड्डा’ बताया गया। अमिता सिंह ने आरोप लगाया कि रिपोर्ट में बिना पुष्टि के उनके खिलाफ आपत्तिजनक बातें छापी गईं, जिससे उनकी छवि को ठेस पहुंची।

इस मामले में 2017 में दिल्ली की एक मेट्रोपोलिटन अदालत ने ‘द वायर’ के संपादक सिद्धार्थ भाटिया और डिप्टी एडिटर अजय अशरफ के खिलाफ समन जारी किया था।

अब हाईकोर्ट यह तय करेगा कि नई न्याय संहिता लागू होने के बाद समन से पहले नोटिस नहीं देने पर प्रक्रिया दोषपूर्ण मानी जाएगी या नहीं

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