टीवी न्यूज़ चैनलों पर टीआरपी की दौड़ अब ऐसी भाषा तक पहुंच गई है, जहां पत्रकारिता और उकसावे के बीच की रेखा धुंधली होती दिख रही है। टाइम्स नाउ नवभारत (Times Now Navbharat) के एक शो में स्क्रीन पर चलाया गया सवाल — “जो अतीक का यूपी में हुआ, बंगाल में वैसा ही जहांगीर का होगा?” — सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना का विषय बन गया है। आलोचकों का कहना है कि यह सवाल सिर्फ राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि हिंसा और “बुलडोजर/एनकाउंटर मॉडल” को महिमामंडित करने जैसा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, शो में यूपी के माफिया-राज और पश्चिम बंगाल की मौजूदा राजनीतिक हिंसा को जोड़ने की कोशिश की गई। स्क्रीन पर माफिया से नेता बने अतीक अहमद की तस्वीर के साथ बंगाल के एक स्थानीय नेता “जहांगीर” का संदर्भ दिखाया गया, जिससे बहस और विवाद गहरा गया।
“अतीक अहमद” का नाम उत्तर प्रदेश की राजनीति और अपराध की दुनिया में लंबे समय तक चर्चा में रहा। उनके खिलाफ हत्या, अपहरण और रंगदारी समेत 100 से ज्यादा मामले दर्ज थे। वह पांच बार विधायक और एक बार सांसद भी रहे। 2023 में प्रयागराज में पुलिस सुरक्षा के बीच मीडिया कैमरों के सामने अतीक और उसके भाई अशरफ की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
वहीं बंगाल में “जहांगीर” नाम हाल के राजनीतिक तनाव और हिंसा की घटनाओं के बीच चर्चा में आया है। फाल्टा इलाके में एक स्थानीय TMC नेता जहांगीर के दफ्तर में तोड़फोड़ और राजनीतिक टकराव की खबरें सामने आई थीं। हालांकि, टीवी डिबेट में जिस तरह “अतीक मॉडल” और “जहांगीर” को जोड़कर पेश किया गया, उस पर मीडिया की भाषा और जिम्मेदारी को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
सोशल मीडिया पर कई पत्रकारों और मीडिया वॉचर्स ने आरोप लगाया कि इस तरह की हेडलाइन और विजुअल्स सीधे तौर पर नफरत और भीड़ मानसिकता को बढ़ावा देते हैं। आलोचकों का कहना है कि पत्रकारिता का काम कानून और न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा मजबूत करना है, न कि किसी संभावित हिंसक कार्रवाई को टीवी ग्राफिक्स के जरिए सामान्य बनाना।
भारत में टीवी डिबेट्स पर पहले भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, उकसाऊ भाषा और “स्टूडियो ट्रायल” चलाने के आरोप लगते रहे हैं। मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि अपराध और राजनीति की रिपोर्टिंग करते समय भाषा का संतुलन बेहद जरूरी है, क्योंकि टीवी स्क्रीन पर बोला गया एक वाक्य समाज में तनाव बढ़ाने का कारण बन सकता है।

ये पत्रकारिता नहीं, सीधा-सीधा नफ़रत का व्यापार है.. शर्म आनी चाहिए..
देश के टीवी स्टूडियो अब न्यूज़रूम कम, नफ़रत के कारखाने ज़्यादा लगने लगे हैं.
खुलेआम एक राज्य की घटना को दूसरे राज्य में दोहराने की धमकी देना क्या यही डिबेट है.
ये पत्रकारिता नहीं, भीड़तंत्र को उकसाने की साज़िश है. कानून का राज चाहिए या टीवी एंकरों का फैसला !
अगर स्टूडियो से ही हिंसा के संकेत दिए जाएंगे, तो समाज में जहर ही फैलेगा.
TRP के लिए देश को बांटने वालों को याद रखना चाहिए कि ये आग एक दिन सबको जला देगी..
अब वक्त है कि ऐसी जहरीली भाषा पर सख्त कार्रवाई हो, वरना लोकतंत्र सिर्फ़ स्क्रीन पर बचेगा, ज़मीन पर नहीं.. -संजय शर्मा, संपादक 4पीएम




अनुभव सिन्हा
May 8, 2026 at 1:25 pm
यही तो वामपंथी व्याख्या है जिसे देश ने ताजा मामले में, पश्चिम बंगाल में खारिज कर दिया है बड़े ढंग से। मीडिया और पत्रकारों की बात तो अपनी जगह सही ही है क्योंकि यह उनके गुट की आवाज है। माफियागिरी और गुंडई से नेता बने लोग कभी भी देश के लिए सम्मानित नही हो सकते।