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टाइम्स आफ इंडिया में खबर दब सकती है लेकिन फेसबुक पर नही : दीपक शर्मा

Deepak Sharma : टाइम्स ऑफ़ इंडिया देश का सबसे रसूखदार अख़बार है. इसके मालिक की हैसियत मोदी जैसी नही तो मोदी से कम भी नही. टाइम्स के देश में 7.20 करोड़ पाठक है. टाइम्स की एक प्रति का दिल्ली में मूल्य 4.50 रूपए है. एक पाठक के तौर पर आपकी हैसियत टाइम्स में वैसी ही है जो किसी दूकान से कोई सामान खरीदते वक़्त किसी की होती है. यानी आप एक ग्राहक है.

Deepak Sharma : टाइम्स ऑफ़ इंडिया देश का सबसे रसूखदार अख़बार है. इसके मालिक की हैसियत मोदी जैसी नही तो मोदी से कम भी नही. टाइम्स के देश में 7.20 करोड़ पाठक है. टाइम्स की एक प्रति का दिल्ली में मूल्य 4.50 रूपए है. एक पाठक के तौर पर आपकी हैसियत टाइम्स में वैसी ही है जो किसी दूकान से कोई सामान खरीदते वक़्त किसी की होती है. यानी आप एक ग्राहक है.

टाइम्स से तीन करोड़ ज्यादा यूजर आज देश में फेसबुक के हैं. फेसबुक बिलकुल मुफ्त है. आप यहाँ ग्राहक नही खुद मालिक है और किसी भी मुद्दे पर सीधे हस्तक्षेप कर सकते हैं. लेकिन इन सब बातों से भी कहीं ज्यादा बड़ा अंतर है टाइम्स और फेसबुक में.

टाइम्स में खबर रुक सकती है फेसबुक में नही.

टाइम्स में खबर दब सकती है फेसबुक पर नही.

टाइम्स जैसा हाल बाकी कारपोरेट मीडिया का भी है.

तो आईये फेसबुक को देश की जनता का अखबार बनाए.

आईये अखबार को अपना बनाए.

देश बदल सकता है.

भरोसा करिए.

आजतक में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.

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2 Comments

2 Comments

  1. इंसान

    January 4, 2015 at 2:02 pm

    इन पन्नों पर प्रस्तुत “बुढ़ापे में पैसे के लिए पगलाया अरुण पुरी अब ‘पत्रकारीय वेश्यावृत्ति’ पर उतर आया है… ” शीर्षक में अरुण पुरी के स्थान पर दीपक शर्मा लिख विषय वस्तु कुछ इस प्रकार होनी चाहिए| मूल निवासियों में दीपक शर्मा जैसी मानसिकता के कारण भारतीय उप महाद्वीप में भारतीय क्षेत्र सदियों से गुलामी में फंसा रहा है| लगता है भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रकार से दीपक शर्मा का गरेबान पकड़ इसे पत्रकार बना दिया है| अन्यथा इसमें पत्रकार के लक्षण अथवा परिपक्वता छू तक नहीं पाए हैं|

  2. Amitabh

    January 5, 2015 at 10:52 am

    Exits from ET
    Today, thehoot.org reported that five financial journalists have moved on from the Economic Times over the past two months, four in the space of a month. Three are headed for large corporate houses while two are joining or planning their own start-ups. Changes in the editorial management, stagnation in the top-heavy ET editorial team and better pay packages in the industry have led to the exits.

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