सात महिला पत्रकारों ने #metoo किया तो TOI हैदराबाद के संपादक को देना पड़ा इस्तीफा

टाइम्स आफ इंडिया, हैदराबाद के स्थानीय सम्पादक केआर श्रीनिवास ने इस्तीफा दे दिया है. उन पर #MeToo कैंपेन के तहत सात महिला पत्रकारों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे. ऐसा पहली बार हुआ है जब मीटू कैंपेन के कारण वरिष्ठ पत्रकार और शीर्ष संपादक ने इस्तीफा दिया है. Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

TOI को पता है कि कोई किसान टाइम्स आफ इंडिया नहीं पढ़ता, इसलिए वह किसान विरोधी छापता है! देखें

Vibhuti Pandey : आप चाहे कितनी भी बार कह लें, चाहे टाइम्स के संपादक तक आप की बात से सहमत हों, लेकिन The Times of India अपना उच्च मध्यम वर्गीय चरित्र नहीं छोड़ेगा. कल किसान कवरेज पर टाइम्स की हेडलाइन पढ़िए. परसों सोशल मीडिया पर हिट शेयर के लिए इन्होंने जो भी किया हो लेकिन कल किसान और सुरक्षाकर्मियों की भिड़न्त की जो दोनों फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी, दोनों ही टाइम्स ऑफ इंडिया ने नहीं छापी हैं.

Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Misinformation being spread by Times of India’s Senior Diplomatic Editor caught red handed

Respected Indrani Bagchi madam,

Senior Diplomatic Editor

Times of India

if I am not wrong, you happen to be a so called ‘Senior Diplomatic Editor’ working with the Times of India Group. And being a veteran journalist in the print media industry, you are supposed to get your basic facts right when you write an article on high technology areas of nuclear technologies, space and defence through a forum which carries great accountability. Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

क्या टाइम्स आफ इंडिया वालों ने कश्मीर को अलग देश मान लिया!

टाइम्स आफ इंडिया ग्रुप देश का बड़ा अखबार समूह है. इस ग्रुप ने लगता है कि कश्मीर को खुद ही अलग राष्ट्र का दर्जा दे दिया है. तभी तो इस ग्रुप के अखबार मुंबई मिरर ने एक आर्टकिल में जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री लिख दिया. अगर ये मानवीय गलती है तब तो कोई बात नहीं. इसका भी स्पष्टीकरण प्रकाशित कर देना चाहिए. Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दो बड़े अंग्रेजी अखबारों के संपादक दिवाकर अस्थाना और पीआर रमेश ट्रांसफर-पोस्टिंग के खेल में जुटे हैं! (देखें सुबूत)

टाइम्स आफ इंडिया के एक संपादक हैं, दिवाकर अस्थाना. ये हर किसी को ‘बाबू’ कह कर बुलाते हैं. एक रोज (31 मई, शाम चार बजे) इन्होंने गलती से एक मैसेज टाइम्स आफ इंडिया के पत्रकारों के लिए बने ह्वाट्सअप ग्रुप पर पोस्ट कर दिया. इस मैसेज की शुरुआत भी बाबू संबोधन से हुई थी लेकिन आगे जो कुछ लिखा गया था, उसे पढ़कर ह्वाट्सअप ग्रुप से जुड़े सारे पत्रकारों की आंखें फटी की फटी रह गई.

मैसेज का लब्बोलुआब ये था कि संपादक जी एक आईआरएस अधिकारी अनुपम सुमन को बता रहे थे कि तुम्हारे लंदन पोस्टिंग के बाबत हम और इकानामिक टाइम्स के ब्यूरो चीफ पीआर रमेश वित्त मंत्री अरुण जेटली से मिले थे. जेटली जी से तुम्हारी लंदन पोस्टिंग को लेकर चर्चा हुई. असल में आईआरएस अधिकारी अनुपम सुमन इन दिनों निजी वित्त पोषित पढ़ाई पर लंदन में हैं और चाहते हैं कि उनकी पोस्टिंग भी यहीं हो जाए, इनकम टैक्स की ओवरसीज यूनिट (ITOU) में.

आईआरएस अधिकारी अनुपम सुमन 2004 बैच के हैं. टीओआई के एक्जीक्यूटिव एडिटर दिवाकर अस्थाना के इस मैसेज के टाइम्स आफ इंडिया वाले पत्रकारों के ग्रुप में पोस्ट होते ही हड़कंप मच गया. जब तक किसी ने अस्थाना का ध्यान इस गलती की ओर दिलाया, तब तक काफी देर हो चुकी थी और लोग स्क्रीनशाट लेकर मैसेज को दूसरों तक पहुंचाने फैलाने में जुट गए थे. इस मैसेज के सार्वजनिक हो जाने के बाद चर्चा तेज हो गई कि क्या संपादक लोग अब दलाल बनकर रह गए हैं? क्या इनका काम अब ट्रांसफर-पोस्टिंग कराना भर रह गया है?

इस मैसेज को नीरा-बरखा टेप वाले प्रसंग के क्रमिक विकास के तौर पर देखा जा रहा है और माना जा रहा है कि भारतीय बाजारू पत्रकारिता में कोई सुधार आने की जगह इसका रूप धीरे धीरे दिन प्रतिदिन ज्यादा बाजारू और घटिया होता जा रहा है. इस मैसेज से तो यह साफ है कि अंग्रेजी के दो बड़े संपादक लोगों का असल काम ट्रांसफर पोस्टिंग है, वे चौथे खंभे के लिए जन सरोकार के तहत पत्रकारिता कतई नहीं कर रहे हैं. टाइम्स आफ इंडिया के संपादक दिवाकर अस्थाना ने जो मैसेज आईआरएस अफसर को भेजना चाहा था और गलती से टीओआई जर्नलिस्ट्स के आंतरिक ग्रुप में भेज दिया, वह इस प्रकार है-

Babu, met FM along with Ramesh regarding ITOU. He called Dash and in the presence of FM, the latter agreed that CBDT has wrongly held that you are in deputation when you are actually on study leave. It was also clarified in the presence of FM, that your fellowship has not been funded by government. Dash told FM that Arun ji had spoken directly with CBDT chief and , therefore, he was not in the loop. He also told FM that the matter is no longer with finance ministry as the CBDT has referred it to the foreign service board under MEA. Upon this , I said that FM, being the competent authority, can overturn the decision of CBDT. Dash said that we can scrap the entire ITOU panel as recalling the name for just London station may not look good. Upon this FM said ok and told us ‘chalo’. What do you think of it.

मैसेज का स्क्रीनशाट देखें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टाइम्स आफ इंडिया वालों ने चित्रा सिंह को लेकर इतना बड़ा झूठ क्यों छाप दिया!

खबर पढ़ाने के चक्कर में खबरों के साथ जो बलात्कार आजकल अखबार वाले कर रहे हैं, वह हृदय विदारक है. टाइम्स आफ इंडिया वालों ने छाप दिया कि सिंगर चित्रा सिंह ने 26 साल बाद का मौन तोड़ा और गाना गाया. टीओआई में सचित्र छपी इस खबर का असलियत ये है कि चित्रा सिंह ने कोई ग़ज़ल / भजन नहीं गया. उन्हें मंच पर बुलाकर सिर्फ सम्मानित किया गया था. लेकिन खबर चटखारेदार बनाने के लिए छाप दिया कि चित्रा ने गाना गाया.

पढ़िए आप भी टीओआई में छपी झूठी खबर….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टीओआई के राजशेखर झा बताएं, किसके कहने पर नजीब-आईएस वाली ख़बर प्‍लांट की थी?

जेएनयू के लापता छात्र नजीब के बारे में टाइम्‍स ऑफ इंडिया में इसके पत्रकार राजशेखर झा ने फर्जी खबर प्‍लांट की. इस खबर में बताया गया कि दिल्ली पुलिस ने जांच में पाया है कि नजीम यूट्यूब और गूगल पर आईएस (इस्लामिक स्टेट) के बारे में वीडियो आदि खोज देखा करता था, साथ ही वह आईएस की कार्यप्रणाली, विचारधारा, भर्ती आदि के बारे में अध्ययन करता था. खबर में बताया गया कि दिल्ली पुलिस ने नजीब की लैपटाप के जांच के बाद यह जानकारी हासिल की है. उधर, इस खबर के छपने के बाद दिल्ली पुलिस ने खंडन भेज दिया कि उसने ऐसी कोई जांच लैपटाप की नहीं की और न ही ऐसा कोई नतीजा निकला है.

फर्जी खबर की सच्‍चाई सामने आने के बाद सोशल मीडिया में टीओआई के राजशेखर झा के खिलाफ अभियान चला. फिर भी इस शख्स ने माफी नहीं मांगी. हां, जो उससे सवाल पूछता था उसे वह ट्विटर पर ब्‍लॉक किए जा रहा था. बाद में राजशेखर झा ने अपना फेसबुक एकाउंट बंद कर दिया. अपने ट्विटर एकाउंट की सेटिंग ऐसी कर ली कि केवल वेरिफाइड यूजर्स ही उसके एकाउंट तक पहुंच सकते थे.

नजीब को पुलिस अब तक खोज नहीं पाई है. पुलिस को खुद टाइम्‍स ऑफ इंडिया की खबर का खंडन देना पड़ा है. मान लीजिए कि नजीब (कोई और नाम सुविधा के लिए चुन सकते हैं) अगर मौजूद होता और इस अखबार में बिलकुल 21 मार्च वाली खबर छपती कि वह इस्‍लामिक स्‍टेट के बारे में गूगल और यूट्यूब पर खोजता था और उसके नेताओं के भाषण सुनता था, तब कैसा नज़ारा होता? दिल्‍ली पुलिस को उसे गिरफ्तार करने में घंटा भर भी नहीं लगता. उसके खिलाफ़ साक्ष्‍य गढ़ लिए जाते. एक खबर दूसरी खबरों का आधार बन जाती और बड़े-बड़े हर्फों में करार दिया जाता कि आइएस का दिल्‍ली मॉड्यूल जेएनयू से ऑपरेट करता था.

यह कितना खतरनाक हो सकता है, उसे बताने की ज़रूरत नहीं. हम दिल्‍ली के कश्‍मीरी पत्रकार इफ्तिखार गीलानी का हश्र देख चुके हैं जिस मामले में कई पत्रकारों ने गलत रिपोर्टिंग कर के आतंक के मामले में उन्‍हें जेल की हवा खिलवा दी थी. नीता शर्मा ने पुलिस की थ्यूरी के हिसाब से खबर प्‍लांट कर गीलानी को दोषी बना दिया था, जिसकी थर्ड डिग्री सज़ा गीलानी को भुगतनी पडी. इस पत्रकारिता जगत में गीलानी आज भी दिल्‍ली के आइएनएस बिल्डिंग वाले रुफी मार्ग इलाके में दिन-भर दौड़भाग करते पाए जाते हैं जबकि नीता शर्मा सर्वश्रेष्‍ठ रिपोर्टर का तमगा हासिल कर के अपने पाप से मुक्‍त हो चुकी हैं.

चकोलेबाज़ के नाम से एक ट्वीट आया है जिसमें गरीब मुसलमानों की जिंदगी बरबाद करने का आरोप कुछ पत्रकारों पर लगाया गया है. नीता शर्मा का भी उसमें नाम है. नीता शर्मा ने गीलानी की जिंदगी बरबाद की तो नजीब के मामले में टाइम्‍स ऑफ इंडिया के राजशेखर झा ने बहुत गंदा काम किया है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

TOI MUST APOLOGISE FOR FALSE NAJEEB STORY

The Delhi Union of Journalists is shocked that a leading daily like the Times of India should have discredited itself by publishing a malicious and misleading report on the missing JNU student Najeeb. The DUJ demands that the TOI issue an immediate apology for maligning a boy who is ‘missing and unable to defend his reputation.

The TOI report alleged that Najeeb had been surfing the Internet for information on the Islamic State and ways to join it.  It claimed that he had watched many videos on the Islamic State and was “watching a video of the speech of an IS leader on the night of October 14, just before he had a scuffle with ABVP members…” The story by TOI reporter Rajshekhar Jha was published both on the front page and page three on March 21, 2017.

This kiteflying story was attributed to unnamed police sources and claimed the police had received “a report on the browsing history of Najeeb’s laptop from Google and YouTube”.  The following day Deputy Police Commissioner Madhur Verma denied that any report had been received from Google and YouTube and said “investigation conducted so far has not revealed anything to suggest that Najeeb had accessed any site relating to IS”. Special Commissioner of Police and Delhi police spokesperson Dependra Pathak also rubbished the TOI story in his statement to Hindustan Times.

It is apparent that the story was meant to discredit Najeeb and find an alibi for the Delhi Police’s inability to trace the missing boy. The story went into great detail on reported Police moves to search for him.

Jha’s clearly motivated story also went into allegations about Najeeb’s medical history, claiming he had been on drugs for obsessive compulsive disorder, sleeplessness, depression, fits, panic attacks and agoraphobia.  Najeeb’s family has previously denied that he was on such medication but the TOI chose to repeat all this in great detail.

The TOI published the false story on its front page with the heading “Najeeb saw IS videos, websites” on March 21, 2017 and another report on page three with a three-column bold headline “Najeeb searched for information on IS”.  However, the retraction it was forced to publish after criticism on social media was carried as a single column item on page 5 with the neutral headline, “Police deny Najeeb report” on March 22, 2017. This was merely a verbatim report of a statement by DCP Verma.

The Delhi Union of Journalists demands an apology by the TOI for its irresponsible and false reports. It also demands that the story be removed from its website immediately.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

TOI का पेड न्यूज : इससे ज्यादा बिकी हुई राजनीतिक खबर आज तक नहीं पढी

Chandan Srivastava : कुछ पैसे लेकर The Times of India ने आज एक पेड न्यूज अयोध्या विधानसभा से बसपा प्रत्याशी के समर्थन में छापी है। इस पेड न्यूज में मतदाताओं के बयान कुछ इस प्रकार छपे हैं-

‘लड़के की सच्चाई से हम बहुत प्रभावित हैं। पिछले साल पीस पार्टी को वोट दिए थे लेकिन इस बार हाथी को देंगे।‘

‘उसका मुसलमान होना उसके जीत की गारंटी है।‘

हमें उनके मुसलमान होने से कोई मतलब नहीं। हमारा वोट हाथी को ही जाता है।‘

और अंत में प्रत्याशी का बयान है-

‘यहां एससी मतदाताओं की संख्या 80 हजार है और मुसलमान की 60 हजार। यदि इन दोनों का 70% वोट भी हमें मिलता है तो एससी का 55 हजार और मुसलमान का 30 हजार वोट होगा। जिससे हमारी जीत सुनिश्चित है।‘

इससे ज्यादा बिकी हुई राजनीतिक खबर मैनें तो आज तक नहीं पढी है। यदि आपने पढी हो तो बताईएगा।

लखनऊ के पत्रकार और वकील चंदन श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टाइम्स आफ इंडिया में प्रिंट मीडिया मालिकों के पक्ष में छपे संपादकीय का जवाब डीयूजे ने भी भेजा

A Reply to The Times of India

On the eve of the budget session and state elections the newspaper industry has made out a case for financial sops, including exemptions from the forthcoming Goods and Services tax, and higher government advertisement rates. The pretext is the losses it claims it faces as a result of paying journalists and other employees fair wages. This is a case of killing two birds with one stone: make a killing by getting more money from the government and by denying employees the dues ordered by the Majithia Wage Board.

We are alarmed in this context to see the Times of India, which has set itself up as a battering ram of newspaper industry interests, seek through its editorial pages to delegitimise the wage board process which has been a vital part of the protective legislation for press freedom. We also seriously object to this continuing misuse of editorial pages in the press to argue a one-sided case for newspaper industry owners.

We wish to point out that newspaper houses are increasingly splashing out on gala events and promotions, fashion shows, beauty contests and five-star award ceremonies but are unwilling to pay their employees decent wages. Instead, they are cracking down on trade unions in the industry and resorting to large scale contract employment to bypass the Wage Board. They have even questioned the need for wage fixation machinery and the Working Journalists Act itself.  By tradition the Government of India appoints a new Wage Board every ten years; it is time for the next one to be appointed but the employers refuse to honour even the previous Award.

The BJP government’s demonetisation decision of November 8, 2016, is now being misused as a pretext for cracking down on employees. We are shocked to see a number of major national newspapers and several regional players, responding with mass retrenchments of journalists and other industry workers. These retrenchments are being done in secrecy, invariably in violation of existing labour laws, in a manner that exploits the economic and financial vulnerability of workers whose livelihoods are at stake. Many of those retrenched are forced to resign and sworn to secrecy in the process, on pain of losing the measly two months’ salary they are granted as compensation.

The Times of India in its editorial page article of January 19 (“Indian newspaper industry: Red ink splashed across the bottom line”), makes a case that it is doing the readership a great favour by keeping selling price low. This goes against its boasts, propagated through its own news pages, about the affluence of its readers and their high purchasing power. It also glosses over the role it has played over the years in launching a corrosive “price war” within the newspaper industry, which has forced competition to follow suit, driven many other titles to the wall and destroyed pluralism and diversity in the press.

Managements have been pursuing profit at the cost of the integrity of the industry’s basic function of gathering news and presenting it in a credible fashion. The boom and bust cycle of the global economy has therefore impacted an industry that has in its lust for profits, chosen to depend increasingly upon advertisements, rather than seek to expand readership through quality news reporting. This does not mean that it cannot afford to pay legally mandated wages ordered by a government appointed tripartite Wage Board, headed by a retired judge, which went into the industry’s finances in great detail before ordering pay hikes. The newspaper management challenged the Justice Majithia Wage Board Award in the Supreme Court but lost. The Award has the stamp of approval of the Supreme Court. However, the majority of newspaper owners have chosen to flout the judgement and have still not paid the awarded wages, let alone arrears.

Now the Award and the notional losses caused by it are being used as an argument to get government support for the industry and shore up private profits. Media owners are feverishly lobbying for tax exemptions for newsprint which would otherwise be done away with under the impending GST regime. Media houses have thrived on this subsidy for decades. To make employees a scapegoat in this tug of war with the government is malicious and unjust.

We would draw attention to only a few instances where the Times of India seeks to mislead, contrary to the lofty purpose it embraces of educating. At some point in its spiel, it says that an (unnamed) publicly-listed newspaper company has had “revenue growth” of 4 percent compounded annually since 2011-12, while manpower costs have jumped by “over 58 percent”.

This is a deliberate effort at misleading. If the Times of India wants to make a case of unjust manpower cost escalation, it has to provide a calculation on comparable bases. In the five years since 2011-12, 4 percent compound annual growth would amount in aggregate to about 20 percent. So the comparison against the supposed 58 percent growth in manpower costs is not really as terrible as the figure of 4 versus 58 would suggest.

Secondly, we have serious reasons to question the authenticity of the figures that the Times of India presents, since the newspaper entity remains unidentified.

Thirdly, we also have reasons to doubt if the increase in manpower costs – assuming it is accurately calculated – has anything to do with the basic mission of the newspaper. We would like to see the annual report of Bennett Coleman and Co Ltd (BCCL) – publishers of the Times of India. We believe that it is imperative if the company is making a case for policy intervention, that it should adopt this element of transparency.

From a document extracted from the public record, we know that BCCL incurred salary and wage costs of Rs. 551 crore in 2010-11, on “operating revenue” of almost Rs.4,500 crore and “other income” of about Rs. 300 crore. Manpower costs in other words, amounted to just over 11 percent of total revenue for the company.

Breaking down the “manpower cost” component reveals that Rs. 102 crore out of the total, i.e., close to 20 percent, is absorbed in remunerations to just 40 employees. This list of 40 includes only four whose function could be identified as journalism.

BCCL have taken on themselves the mission of arguing for press freedom as a public good.

We call on them to make their records public and allow a full evaluation of their record of decisions that have violated the public interest.

Failing that, we call on the Times of India to honour the basic rules of journalistic ethics and permit journalists’ unions the right to reply in its columns.

We also call on the newspaper industry to cease the campaign for a special policy dispensation from the Government that would be corrosive of workers’ rights. To argue for this dispensation just on the eve of crucial elections to a number of state assemblies, is to surrender the claim to independence and to further erode the public credibility of the press.

(SK Pande)
President

(Sujata Madhok)
General Secretary

Delhi Union of Journalists Delhi

duj.delhi@gmail.com

Press Release

पूरे मामले को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें….

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

झूठ का पुलिंदा है टाइम्स ऑफ इंडिया का संपादकीय

जयपुर। सुबह-सुबह टाइम्स ऑफ इंडिया खोलते ही संपादकीय पेज के Indian newspaper industry : Red ink splashed across the bottom line शीर्षक से प्रकाशित लेख पर निगाह पड़ गई। चूंकि मसला प्रिंट मीडिया से संबंधित था, तत्काल पढ़ डाला। पूरा लेख झूठ का पुलिंदा है। प्रिंट मीडिया के मौजूदा हालात पर आंसू (घड़ियाली) बहाए गए हैं। अपने एक भी कर्मचारी को मजीठिया वेजबोर्ड का लाभ न देने वाले टीओआई ने वेजबोर्ड को लागू करने से हो रहे नुकसानों को बताया है। अखबार लिखता है कि स्थितियां इतनी गंभीर हो चली हैं कि बड़े नेशनल डेली न्यूजपेपर्स को संस्करण (हाल में हिंदुस्तान टाइम्स ने चार संस्करणों पर ताला लगाया है) बंद करने पड़ रहे हैं, स्टाफ की छंटनी हो रही है, कास्टकटिंग जारी है, खर्चे कम करने पड़ रहे हैं। लेख में अखबारों को नोटबंदी से हुए नुकसान और आगामी जीएसटी की टैक्स दरों पर चिंता जाहिर की गई है।

लेख में हास्यास्पद तो यह है कि सरकार ने वेजबोर्ड लागू कराकर प्रिंट मीडिया के जख्मों को हरा करने का काम किया है और एरियर समेत वेतन में 45-50 प्रतिशत तक वृद्धि के लिए मजबूर किया है। द हिंदू (प्रतिद्वंद्वीअखबार) और पीटीआई (समाचार एजेंसी) का उदाहरण देते हुए उनके लाभ में कमी होने की बात कही है। यह सही है कि पीटीआई (वेतन व एरियर में 173 प्रतिशत की वृद्धि हुई) ने वेजबोर्ड लागू किया है और एरियर भुगतान भी किए हैं, पर द हिंदू ने आधा-अधूरा वेजबोर्ड लागू कर ग्रेड के अधिकांश कर्मचारियों को वीआरएस के लिए मजबूर किया है।

सच्चाई तो यह है कि असम ट्रिब्यून जैसे इक्का-दुक्का अखबारों को छोड़ दें तो अधिकांश अखबारों ने मजीठिया वेजबोर्ड लागू नहीं किया है। 11 नवंबर 2011 को केंद्रीय कैबिनेट के नोटिफिकेशन और मार्च 2014 में सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बावजूद अखबारों की हठकर्मिता जारी है, जबकि वो हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई हार चुके हैं। अधिकांश अखबारों (हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के ज्यादा) ने गलत ढंग से कर्मचारियों को डरा-धमाका कर 20जे नामक कागज पर हस्ताक्षर कराएं हैं, जिसको अब वे वेजबोर्ड न देने की ढाल बना रहे हैं। भला सोचिए जिस कर्मचारी कम वेतन पर क्यों राजी होगा?

लेख में डीएवीपी की दरों को अक्टूबर 2010 के बाद से रिवाइज न करने की बात है, पर कमर्शल विज्ञापन दरों पर मौन साध लिया है। ये जगजाहिर है, टीओआई के विज्ञापन देश में सबसे ज्यादा दरों के हैं, इसके क्लासीफाइड विज्ञापन भी हजारों रुपए के होते हैं। सभी अखबारों में कमर्शियल विज्ञापनों की दरें हर साल बढ़ाई जा रही हैं। द इकोनोमिस्ट की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि भारत में प्रिंट बढ़ रहा है और फलफुल रहा है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कॉरपोरेट विज्ञापनों का 43 प्रतिशत प्रिंट को मिलता है। 2010 से 2014 के बीच अखबारों की विज्ञापन बढ़ोतरी 40 प्रतिशत रही।

यहां तक कि अखबारों ने एडवर्टोरियल के नाम पर नियमित परिशिष्ट छापकर पैसा कमाना शुरू कर रखा है। लेख में अखबार की कम कीमत (3-5 रुपए प्रति कॉपी) का रोना भी रोया है। सरकार से सस्ती दरों पर अखबारी कागज और ढेरों सुविधाएं लेने के बाद यह रोना अनुचित है। लेख में प्रिंट जर्नलिस्ट के खत्म होने और एक ही दिन में ऑनलाइन, टीवी, प्रिंट के लिए काम करने पर जोर दिया गया है। हद तो यह है कि कम वेतन में सारे मीडिया हाउस ये सारे काम एक ही कर्मचारी से लेने पर उतारू हैं। एक कर्मचारी से 12-14 घंटे तक काम लिया जा रहा है या उससे करने की उम्मीद की जा रही है।

सच्चाई तो यह है कि अखबारों का व्यापार दिन-प्रति-दिन बढ़ रहा है। टीओआई को ही लें तो यह न केवल प्रिंट मीडिया (अंग्रेजी व क्षेत्रीय भाषाओं में भी) में है, बल्कि आज मैगजीन, टीवी, रेडियो, वेब से भी अरबों रुपए कमा रहा है। यही स्थिति सारे प्रिंट मीडिया की है। दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका आदि प्रिंट, रेडिया, वेब में हैं। पत्रिका तो जल्द टीवी चैनल लाने जा रहा है। क्या यह सब धर्मार्थ हो रहा है, बिना लाभ ये विस्तार किया जा रहा है? सरकार से सस्ती दरों पर मिली जमीनों पर बने ऊंचे भवन किराए लेने का माध्यम बने हुए हैं। राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, लोकमत समेत अधिकांश अखबारों ने सरकारों से सस्ती दरों पर जमीनें ली हैं और आज उनका वाणिज्यिक इस्तेमाल हो रहा है।

हद तो यह है कि जब चंद पत्रकार और गैर पत्रकार मजीठिया वेजबोर्ड न लागू करने पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे तो अखबारों ने प्रताड़ना चक्र शुरू कर दिया (अधिकांश कर्मचारी नौकरी जाने के भय से आज भी शोषण का शिकार हैं)। राजस्थान पत्रिका ने 65 से अधिक कर्मचारियों का या तो ट्रांसफर किया है या उन्हें बर्खास्त कर दिया गया है। इनमें समाचार संपादक और उप समाचार संपादक स्तर के पत्रकार भी शामिल हैं। दैनिक जागरण में बड़ी संख्या में कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है। दैनिक भास्कर में कई कर्मचारी बाहर हैं। कई अन्य अखबारों की भी यही स्थिति है। विडंबना यह है कि कोई अखबार मजीठिया वेजबोर्ड के लिए कोर्ट पहुंचे कर्मचारी को नौकरी नहीं दे रहा है। टीओआई ने प्रिंट मीडिया का दुखड़ा तो रोया है, पर प्रताड़ित कर्मचारियों के हित में दो शब्द तक नहीं कहे।

मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि कर्मचारी वेतन पर अखबार लाभ का 4-5 प्रतिशत ही खर्च करते हैं। यदि अखबार थोड़ा-सा और दे दें तो कर्मचारियों की हालत सुधर जाती। पर, स्थिति बेहद गंभीर है। अब वेतन कम और मल्टीटास्कर कर्मचारी ज्यादा चाहिए। मीडिया के बाहर की स्थिति देखी जाए तो अन्य सेक्टरों में वेतन फिर भी ठीक है। टीओआई ने इस लेख से जो शुरुआत की है, वो जल्द अन्य अखबारों में भी दिखेगी। पहले भी इन मीडिया घरानों ने सुनियोजित तरीके से एक के बाद एक लेख वेजबोर्ड को नकारते हुए लिखे थे। मेरा तो चैलेंज है, 100 ऐसे ड्राइवर और चपरासी टीओआई दिखा दे, जिनका तीन गुना वेतन तक बढ़ा है? सुप्रीम कोर्ट में इन मीडिया घरानों के खिलाफ लड़ाई जारी है। जीत कर्मचारी की होगी, न्याय देर से सही मिलेगा जरूर।

लेखक विनोद पाठक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

इसे भी पढ़ें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Reply to TOI editorial

Given below is the reply sent to the Times of India’s article ‘Indian newspaper industry: Red ink splashed across the bottom line‘ published yesterday.

To
The Editor,
The Times of India

Sir,

Apropos ‘Indian newspaper industry: Red ink splashed across the bottom line’ (TOI Jan19) is a tissue of lies and half-truths. Nothing is farther from the truth to say that by scrapping of the Wage Boards or the Working Journalists Act will solve the problem of the industry. The fact is, that the owners of the big newspaper are top violators of the labour laws and they care too hoots of any Act or Law that tries to regulate the employee-employer relationship. There is not even one newspaper in the country including the Bennett Coleman and Company and the ‘venerable’ Hindu which has truly implemented the Majithia recommendations.

The aforementioned ‘editorial’ has not revealed that how many employees have been working for any ‘medium’ or ‘big newspaper’ before and after the Manisana Wage Boards was notified and how many employees are working in that newspaper after the notification of the Majithia Wage Boards. The unmistakable reality is that the number of employees in all newspapers across country has considerably gone down. Most of the employees in newspapers are working on the contract and they are not only ill-paid but are also denied of the benefits as are available to them under various welfare legislations. This is the main reason that Trade Unions hardly exist in the newspapers, and the Bennett Coleman and Company is the best example of it.

It has been repeated ad nauseam by this esteemed newspaper in many of its previous articles that the Second Labour Commission has suggested for doing away with the Wage Boards in all industries but it has conveniently forgotten that hardly any other recommendations of the Second Labour Commission suggested for the benefits of employees have been followed by the newspaper industry so as to inspire conducive atmosphere for the good employee-employer relationship. The editorial has wrongly stated that the employees of the newspaper industry are getting two-three times more than the employees of other industries. It is a blatant lie. The fact is that the employees, including those of journalists in most of the newspapers of the country, do not get even the minimum wages. Should you need the details of such employees, we will send the list containing the names of not hundreds but thousands of workers.

Freedom of speech and expression is sacrosanct and the journalists have always been in the forefront of the fight for the protection of these hallowed rights, which have been given to all the citizens by the constitution of India. Needless to say, that it is the journalists who are targeted by the anti-social elements and the governments of the day while the owners often make compromises for their advantages. It must also be added here that most of the proprietors are misusing the powerful medium of their newspapers for blackmailing and extorting the undue benefits from the governments. There is no need to read between the lines of the above said article because its intent is clear to get the maximum relaxation under the proposed ‘Goods and Services Tax’ (GST) and other facilities from the present dispensation. If newspapers are incurring losses how are they making huge investments to diversify their businesses?

The editorial has not cited the balance sheet of any one of the newspapers to buttress its theory of running into losses. The article is completely silent on how much is spent on the payment of wages and what is the breakup of the expenditures on other inputs by the newspapers? However, we completely agree with one proposition of the editorial that the journalists have become ‘platform-agnostic, moving from filing for online to writing for print to appearing on television, all in the course of single work day’. This underlines the need for expanding the ambit of the Working Journalists Act to make it all encompassing, which we have been demanding for many years. We expect that you will publish our reply, which is so quintessential for the freedom of the press being espoused by the newspaper.

Parmanand Pandey
Secy. Gen. IFWJ

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टाइम्स समूह ने नहीं सौपा श्रम अधिकारी को कर्मचारियों की सूची और एरियर का डिटेल

शशिकांत सिंह

हो सकती है कानूनी कार्यवाई, आरटीआई से हुआ खुलासा…

मुंबई : देश के नंबर वन समाचार पत्र समूह बेनेट कोलमैन एन्ड कंपनी लिमिटेड अपने कर्मचारियों का ना सिर्फ जमकर शोसण कर रहा है बल्कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीमकोर्ट के आदेश को भी ठेंगे पर रखता है। इस समूह के समाचार पत्रों टाइम्स आफ इंडिया, मुम्बई मिरर, नवभारत टाइम्स और महाराष्ट्र टाइम्स में काम करने वाले हजारों लोग भले गर्व से कहते हों मैं टाइम्स समूह का कर्मचारी हूँ मगर इन्हें शायद ये जानकार काफी दुःख पहुंचेगा कि इस कंपनी ने श्रम अधिकारी को अपने कर्मचारियों की लिस्ट ही नहीं सौंपी है।

श्रम अधिकारियो को ये कंपनी ये भी नहीं बता पाई कि उसकी कंपनी में कितने लोग काम करते हैं और कितने को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार एरियर मिला है। साफ़ कहें तो इन कर्मचारियों के लिए मजीठिया वेज बोर्ड का रास्ता खुद इस कंपनी की तरफ से बंद कर दिया गया है। मुम्बई के निर्भीक पत्रकार और आर टी आई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह ने मुंबई के श्रम आयुक्त कार्यालय से आरटीआई के जरिये ये जानकारी निकाली है।

श्रम आयुक्त कार्यालय द्वारा जो जानकारी उपलब्ध कराई गयी है उसमे बताया गया है कि 28 जून  2016 को श्रम अधिकारी इस समाचार पत्र प्रतिष्ठान में पहुंचे तो मैनेजमेंट ने उन्हें बताया कि मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक़ उन्होंने अपने कर्मचारियो को उनका पूरा एरियर दे दिया है मगर उनके कुछ कर्मचारी इस एरियर से संतुष्ट नहीं हैं जिसके कारण मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। इस समूह ने अपने कर्मचारियों की अनुमानित संख्या सिर्फ 159 बताया मगर जब श्रम अधिकारियों ने निरीक्षण के दौरान कर्मचारियों की पूरी सूची मांगी तो मैनेजमेंट अपने कर्मचारियों की पूरी सूची श्रम अधिकारियों को नहीं दे पाया।

इस कंपनी के कर्मचारियों ने आरोप लगाया था कि उन्हें सही तरीके से एरियर नहीं मिला है। निरीक्षण के दौरान प्रबंधन कर्मचारियों के एरियर का डिटेल भी नहीं दे पाया जबकि उसने क्लेम किया कि स्थाई कर्मचारियों को उसने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार एरियर दे दिया है। श्रम अधिकारियों ने ये भी पाया कि ठेका कर्मचारियों और कैजुअल कर्मचारियो की सूची भी उन्हें नहीं उपलब्ध कराई गयी है और ना ही इन कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड की सुविधा ही दी गयी है। इस जानकारी में बताया गया है कि प्राम्भिक जाँच में साफ़ हो रहा है कि ये कंपनी मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करने में पूरी तरह असफल हुयी है तथा इसके खिलाफ जरूरी कानूनी कार्यवाई की अनुशंसा की जायेगी।

मुंबई के पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह से संपर्क 9322411335 के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टाइम्स आफ इंडिया के दिल्ली आफिस में लगी आग, हड़कंप

दिल्ली में बहादुर शाह जफर मार्ग पर आईटीओ स्थित टाइम्स आफ इंडिया के आफिस में भयंकर आग से सनसनी मच गई है. टीओआई बिल्डिंग के आगे पीछे दोनों तरफ धुआं ही धुआं दिखाई दे रहा है. करीब आधा दर्जन दमकल की गाड़ियां आग बुझाने में जुटी हैं. बताया जा रहा है कि आग शार्ट सर्किट की वजह से लगी है. आग और धुएं की तीव्रता का आलम ये था कि लोग टाइम्स बिल्डिंग के आसपास खड़े नहीं हो पा रहे थे.

सूत्रों का कहना है कि गर्मी के दिनों में एसी समेत ढेर सारी मशीनों के अत्यधिक उपयोग के कारण की बार शार्ट सर्किट की समस्या आती है और गर्मी व लोड से पिघलते तारों में आग लगकर पूरी बिल्डिंग में फैल जाती है. इस आग से टाइम्स आफ इंडिया को बड़े पैमाने पर नुकसान उठाना पड़ा है. फिलहाल आग पर काबू पा लिया गया है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

औरत के उड़ते वस्त्रों वाली यह तस्वीर छापने पर टाइम्स आफ इंडिया की सोशल मीडिया पर खिंचाई

ये फोटो टाइम्स ऑफ इंडिया के मुखपृष्ठ पर है. कभी विदेशी अतिथियों की उडती ड्रेस की तस्वीर तो कभी दीपिका पादुकोण की क्लीवेज पर चर्चा पत्रकारिता के कौन से मापदंड स्थापित किए जा रहे हैं. पता नहीं. टाइम्स ऑफ इंडिया का यह कृत्य न केवल स्त्री की गरिमा पर वार करता है बल्कि यह यह भी दिखाता है कि उसकी मानसिकता क्या है? खैर, मैं टाइम्स ऑफ इंडिया लेना काफी पहले बंद कर चुकी हूं, पर कभी कभी ई-पेपर पढ़ती हूं.

आज जब से ये तस्वीर देखी है, तब से तमाम तरह के विचार मन में उमड़घुमड़ रहे हैं. मैं हतप्रभ हूं कि एक अंग्रेजी, प्रगतिशील अखबार इस तरह किसी औरत के उड़ते वस्त्रो की तस्वीर अपने मुखपृष्ठ पर लगा सकता है? खैर, रब भला करे सबका, अंग्रेजी अखबार की शर्मनाक हरकत.

लेखिका और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट सोनाली मिश्र के एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यौन उत्पीड़न के कई आरोपों से घिरे आरके पचौरी ने टीओआई और टाइम्स नाऊ के खिलाफ दायर याचिका अदालत से वापस ली

यौन उत्पीड़न के कई मामलों में आरोपी टेरी के कार्यकारी उपाध्यक्ष और जाने माने पर्यावरणविद आरके पचौरी ने टाइम्स आफ इंडिया और टाइम्स नाऊ को संचालित करने वाली मीडिया कंपनी बेनेट कोलमैन कंपनी लिमिटेड के खिलाफ याचिका अदालत से वापस ली. पचौरी ने बेनेट कोलमैन के खिलाफ कार्यवाही करने और जांच के नतीजे से संबंधित खबरों के प्रकाशन पर रोक लगाने की मांग मानने से इनकार करने वाले एकल पीठ के फैसले को चुनौती दी थी.

पचौरी ने अपने खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों का खंडन किया है. उन्होंने अपने वकील के माध्यम से न्यायमूर्ति गीता मित्तल और न्यायमूर्ति आई एस मेहता से कहा है कि क्षति पहले ही हो चुकी है और प्रकाशन अब भी चल रहा है. इसलिए अपील को पीठ के समक्ष लंबित रखने का कोई मतलब नहीं है. पचौरी की तरफ से उपस्थित अधिवक्ता आशीष दीक्षित ने कहा कि आरोपी मीडिया हाउस बेनेट कोलमैन के खिलाफ विचार के लिए निचली अदालत के समक्ष एक दीवानी मानहानि का मुकदमा लंबित है. उस पर गुण-दोष के आधार पर फैसला होगा.

दलीलों का संज्ञान लेने के बाद अदालत ने उन्हें एकल न्यायाधीश के 18 फरवरी 2015 के आदेश के खिलाफ उनकी अपील को वापस लेने की अनुमति दे दी. एकल न्यायाधीश ने पचौरी के खिलाफ जांच के नतीजे की रिपोर्टिंग करने से मीडिया को पूरी तरह रोकने के उनके अनुरोध को खारिज कर दिया था. इस बीच, टेरी के पूर्व प्रमुख आरके पचौरी की पूर्व सचिव होने का दावा करने वाली एक यूरोपीय महिला ने अब उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। इससे पहले टेरी में काम करने वाली दो महिलाओं ने पचौरी के खिलाफ इसी तरह के आरोप लगाये थे। जाने माने पर्यावरणविद पचौरी के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों के मामले में फरियादी का पक्ष रख रहीं जानीमानी वकील वृंदा ग्रोवर को लिखे पत्र में महिला ने कहा कि वह 2008 में पचौरी की सचिव के रूप में ‘द एनर्जी एंड रिसोर्सिस इंस्टीट्यूट’ (टेरी) में काम करती थी। उसने फरवरी 2015 में ग्रोवर से संपर्क किया था, जब उसे यौन उत्पीड़न के एक मामले में पचौरी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने का पता चला था।

ग्रोवर ने महिला के बयान मीडिया संस्थानों को भेजे, जिसमें उसने कहा, ‘मुझे याद है कि फरवरी 2015 के तीसरे हफ्ते में मैंने कुछ खबरें पढ़ी थीं, जिसमें कहा गया था कि टेरी की एक कर्मचारी ने आरके पचौरी के खिलाफ उसके यौन उत्पीड़न की आपराधिक शिकायत दर्ज की थी। इन खबरों को पढ़ने के बाद मैं बिल्कुल भी हैरान नहीं थी। मैं उस चीज को अच्छी तरह समझ सकती हूं जो दूसरी महिला ने अपने बयान में लिखा।’

महिला ने दावा किया कि जब पचौरी ने उसका उत्पीड़न किया, वह 19 साल की थी। उसका पक्ष ग्रोवर और एक और वकील रत्ना आपनेंदर रखेंगी। रत्ना ने कहा कि पुलिस को बयान के बारे में बता दिया गया है और कहा गया है कि महिला उनके सामने मौजूदगी दर्ज कराने के लिए तैयार है, लेकिन उन्होंने उससे संपर्क करने का कोई प्रयास नहीं किया। महिला की राष्ट्रीयता उजागर नहीं की गई है। उसने कहा कि उसने अपने साथ और भारतीय लोगों के साथ पचौरी के व्यवहार में बड़ा अंतर देखा था। भारतीयों के साथ वह विनम्रतापूर्ण दूरी रखते थे।

आरके पचौरी ने बेनेट कोलमैन के खिलाफ जो याचिका दायर की थी, उसे पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें..

Link case open

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टाइम्स ग्रुप के मालिक विनीत जैन का वो ट्वीट पढ़िए जो उन्होंने डर के मारे कुछ ही देर में हटा लिया

सबसे उपर विनीत जैन की तस्वीर और उसके नीचे उनके द्वारा किया गया ट्वीट.

Priyabhanshu Ranjan : देश के सबसे बडे मीडिया ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर ने की RSS प्रमुख मोहन भागवत की गिरफ्तारी की मांग! चौंकिए मत। आप बिल्कुल सही देख रहे हैं। भारत के सबसे बडे मीडिया ग्रुप Bennett, Coleman & Co. Ltd ( The Times of India अखबार की parent company) के मैनेजिंग डायरेक्टर विनीत जैन ने आज ट्वीट किया है-

“Head of ABVP/rss should be arrested for aiding and abetting a call for murder.Its not different from supari killing.”

विनीत जैन ने JNUSU अध्यक्ष Kanhaiya Kumar की हत्या के लिए इनाम घोषित किए जाने पर ये ट्वीट किया है। जब देश के सबसे बडे मीडिया ग्रुप का कर्ता-धर्ता सरकार में बैठे लोगों के खिलाफ खुलकर इस तरह की राय जाहिर कर रहा है, तो इसके मायने समझ रहे हैं न आप? TIMES NOW चैनल को TRP की दुकान बना देने वाले Arnab Goswami को अब वक्त रहते चेत जाना चाहिए। विनीत जैन उनके मालिक हैं। जी हां, अर्णब टाइम्स ग्रुप में काम करने वाले कर्मचारी हैं!

विनीत जैन टाइम्स ग्रुप के मालिक हैं। उन्होंने सरेआम ट्वीट किया है। दफ्तर में नहीं बोला। इसका खेल समझने की कोशिश कर रहे हैं। इस ट्वीट से आम लोगों में तो यही धारणा बनेगी कि विनीत जैन ने सरकार के खिलाफ स्टैंड लिया है। पता नहीं हकीकत क्या है! पर रहस्य तब गहरा जाता है जब कुछ देर बाद ही विनीत जैन (MD, The Times of India group) ने ये ट्वीट हटा लिया है। अब सवाल है, किसके दबाव में?

युवा पत्रकार प्रियभांशु रंजन के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टाइम्स आफ इंडिया प्रबंधन ने अपने मीडियाकर्मियों से ट्विटर व फेसबुक एकाउंट का पासवर्ड मांगा!

Rakesh Praveer : पत्रकारों पर प्रबंधन का पहरा… दुनियाभर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दम भरने वाले एक बड़े मीडिया घराने ने अपने यहां कार्यरत पत्रकारों और स्टाफ से सोशल मीडिया के उनके निजी अकाउंट डीटेल्स मांगे हैं। एक अंतरराष्ट्रीय वेबसाइट क्वॉर्ट्ज के भारतीय संस्करण में प्रकाशित समाचार के अनुसार ‘बैनेट एंड कोलमैन’ अखबार समूह ने अपने तमाम पत्रकारों से कहा है कि वे अपने ट्विटर और फेसबुक के पासवर्ड दफ्तर के हवाले कर दें।

उल्लेखनीय है कि ‘बैनेट एंड कोलमैन’ अखबार समूह भारत का सबसे बड़ा मीडिया समूह है और टाइम्स आॅफ इंडिया, इकॉनॉमिक टाइम्स और नवभारत टाइम्स जैसे अखबार चलाता है। इन पत्रकारों से यह भी कहा गया है कि वे दूसरे समाचार समूह की खबरों को अपने अकाउंट्स पर शेयर नहीं करें। यही नहीं मैनेजमेंट का कहना है कि अपने पत्रकारों के अकाउंट से जो कंपनी को ठीक लगेगा वह ही पोस्ट होगा। क्या यह अभिव्यक्ति की आजादी छीनने की कुत्सित कोशिश नहीं है?

क्वॉर्ट्ज के अनुसार इस बारे में पत्रकारों से बाकायदा कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर कराए गए हैं। समूह के लगभग सभी पत्रकारों को कॉन्ट्रैक्ट दिया गया और हाथों हाथ साइन करने को कहा गया। इसके पहले ‘द हिन्दू’ अखबार समूह ने भी अपने पत्रकारों से कहा था कि वे दूसरे समूहों की खबरों को अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर शेयर करना बंद कर दें। इस खबर के चलते ही इस पर दुनियाभर के सोशल मीडिया पर जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई है और इंटरनेट पर कुछ कंपनियों के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी बहस छिड़ी हुई है। वैसे आजकल सोशल मीडिया को विज्ञापन और लोगों को प्रभावित करने का एक बहुत बड़ा जरिया माना जा रहा है। वर्तमान में किसी भी उत्पाद की मार्केटिंग के लिए बड़ी कंपनियां सोशल मीडिया पर चर्चित ट्रेंड्स का सहारा ले रही हैं।

पत्रकार राकेश प्रवीर के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

ये कैसी पत्रकारिता कर रहा है टाइम्स आफ इंडिया!

टाइम्स आफ इंडिया की वेबसाइट पर ‘सेलेब ट्विटपिक्स’  नामक एक कालम है. इसमें सेलेब के नाम पर युवतियां हैं और उनकी अधनंगी, नंगी तस्वीरें हैं. ”Here’s a look at the celebs who posted their pics on Twitter. A few days ago, porn star Sunny Leone has posted this topless photo of herself. 15 Jan, 2012” यह वाक्य उस तस्वीर के बाएं तरफ लिखा है, जिसमें पोर्न स्टार सन्नी लियोन अपने खुले स्तन को दोनों हाथ से ढंक रखा है और दूसरा हाथ नीचे पैंटी में. सनी लियोन की तस्वीर का स्क्रीनशाट देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: porn journalism

सनी लियोन की तस्वीर पर तो पाठकों ने टाइम्स आफ इंडिया को इतनी गाली दी है कि पूछिए मत. कुछ कमेंट्स को यहां प्रकाशित किया जा रहा है. यहां ध्यान रहे कि टाइम्स आफ इंडिया जैसी वेबसाइट कामन रीडर के द्वारा भी पढ़ी जाती है, खासकर स्टूडेंट्स, टीनएजर्स, बच्चे आदि. इन साइट्स पर ऐसी तस्वीरें क्या उचित हैं? क्या बड़े मीडया घराने की वेबसाइट्स खुद की पापुलेरिटी बढ़ाने के लिए पोर्न जर्नलिज्म का सहारा नहीं ले रहीं? भड़ास का ध्यान टाइम्स आफ इंडिया की पोर्न पत्रकारिता की तरफ एक पाठक ने दिलाया है. वे अपने मेल में लिखते हैं- 

अपनी साइट पर नग्न तस्वीरें दिखाकर पोर्न जर्नलिज्म करते हुए टाइम्स ऑफ़ इंडिया को यकीन है कि इससे उसके पाठक बढ़ेंगे. और बात भी सच है. पाठक भले गालियां दे, लेकिन वह नंगी चीजें देखना चाहता है. हालांकि कई पाठक बहुत नाराज भी हैं. कइयों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इस तरह की नंगई को बंद करने की मांग की है. कई पाठकों ने तीखे कमेंट्स लिखे हैं. आप भी पढ़िए और पढ़ाइए. एक पाठक ने तो कमेन्ट किया है-  कोई मुझे पोर्न साइट और टाइम्स ऑफ़ इंडिया में अंतर बता सकता है. पोर्न साईट तो पोर्न ही परोसती हैं और जो कहती हैं वही करती हैं लेकिन टाइम्स ऑफ़ इंडिया तो हमें पोर्न और न्यूज़ घोलकर दे रहा है. दूसरे रीडर ने लिखा कि य़े तत्काल बंद होना चाहिए. इधर एक पाठक कहता है कि इन बदन दिखाने वालियों से कहीं टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने पैसा तो नहीं लिया है. मुझे रीडर की य़े प्रतिक्रियाएं अखबारों की गंदगी के प्रति करार जवाब लगी हैं. मैं चाहता हूं कि इन्हें (पाठक के तेवर को) भड़ास पर स्थान मिले और पाठक की जागरूकता व नाराजगी से मीडिया वाले भी रूबरू हों.

: Who wants to see her topless, when people didn’t even google her for porn before!

: Sunny pls remove your hand don’t shy.

: i think sunny leone had paid toi for showing such nudity

: Can anyone tell me what is the differenec between a regular porn site and Times of India? Porn sites provide only Porn whereas TOI provides Porn added with News.

: TOI, Please do not sell nudity…Sell what you are supposed to sell…Thanks

: Must TOI publish such photos to arouse reader’s prurient interests?

: We all knows she is porn business. and she is enjoying her business and we all too after watching same. We should avoid commenting on same.

: This type of publicity will raise nothing but her per personal demand and would definitely corrupt the young minds. Since every site in the web is containing sex is there any need to show her in your site ?

: It is very sad that a reputed newspaper like times of india sells porn.

: Idiotic and rotten Journalism! This picture may become MASALA for the people who have not go a chance to watch her porn films in different websites. But the people who read an English newspaper like TOI can definitely watch her completely nude and having sex with many males. Not only this, you can even see beyond her private parts when she further goes to pull the flesh of two side of her vagina. So what the point in covering nipples and vagina and publishing in TOI when there is much more spicy thing available on the internet? I have already watch her porn film before this picture was published.

: Is this picture considered offensive or porn picture according to High court or HRD Minister.? If TOI can publish this picture what is the problem if social networking websites post such pictures.? Please explain the difference.

: A pros* will remain pros in thought and action

: people let her be. I do not understand what the fuss is. I live in Europe and work in the travel industry. How many times have a met Indians who are looking for flesh here. Its natural and lets all back off here. Its pretty stupid the way we all react to this. Lets all look into our bedrooms first before we make a comment about others

: By publishing such photographs one should not expect a sexual anarchy free life on earth. Remember the sex fire may reach your own home. Is it justified to reveal the sexual act of your father and mother which is the just cause of your birth.

: iski sharm-o-haya dekhke mera dil ispe aa gaya he… ab mein isise ya iske jese kisi ladki se hi shadi karunga

: such ladies bring shame to the parents, and shame to their own children.

: Are Dekho aur enjoy karo yar. Which ever is the site. TOI you are excelent always show this type of pictures so that no need to brouse other site. This web site is too good. Those who don’t want close there eye.

: TOI, Please do not sell nudity…Sell what you are supposed to sell…Thanks

: It feels very glad to be reminded of your adolescent days when you used to watch her films. 😛 However, I am not at all happy that I am reminded this by one of the leading newspapers of India, Times of India. :/

: TOI, newsworthy thing is, when she post pic of herself with some clothes 🙂

: Is this the news TOI should be publishing? And why special interest in SL only. There are thousands of other porn stars, some Indians too. Why not publish about all of them? Atleast our kids will have complete information about the Porn Stars and their day to day activities.

: Dear Editor (Times of India), We love Times of India and we want our best newspaper sud have standard. Now we all r using internet and we all know (and u also know), what we have seen about Sunny Leone on her own website. Her porn video with boys and girls and nothing is left to see. This type of news will make us doubt about standard about TOI. Please dont put thid type of picture and this title. I hope u will publish my comment.

: TOI is back with its porn stuff. After one day of real news about how people are starving and school etc., good work, keep it up TOI

: TOI poses shameless every day.

: this is like a job worth peanuts for sunny…. every1 has seen her videos.. so wat fun is it to watch this…

: We have seen her internal regions of her vagina.Wat is this silly nonsense?

: lol.. everyone has seen her ‘everything-less’ and with everything inside.

: So tame, everyone has seen the whole package!!And fake boobs,YUCK…

: What is wrong with TOI? She is a porn star for goodness sake and she has done worse than this….why is TOI promoting her and why has this become news arent there better things to report than stupid Sunny Leone? TOI please get this through your thick head…she has posed not only topless but she has posed naked…she is a freaking porn star not a superstar…

: Is this even worthy of a link on ToI front page with caption “Sunny Leone” poses topless. She has posed already has many videos that are much more explicit. What is new? Going by the kind of stuff a simple google search on her gives, this picture is very modest and she is not at all exposing in this picture. Hypocrite Sunny.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Shame on you TOI its NIT (An Institute of National Importance), not NIIT

 

Since the time I remember, one thing that comes to my mind is the newspaper vendor flinging Times of India at the main gate of my house. I was an avid reader of prominent national daily, The Times of India. The exclusive coverage of issues of national importance always fascinated me. The idea of switching loyalty to any other national daily didn’t even cross my mind. I would have labelled that an exceedingly absurd thought. Today, in the hustle and bustle of college life, I somehow carve out time to login Times Of India on my laptop and go through the electronic version of it. It was my love for Times Of India that drove me crazy.

One fine morning on 27th September 2015, I was reading TOI’s article on “Single Test for IITs”. The issue was of special interest to me because I had also gone through the competitive engineering exams last year. The crux of the article was that the government is mulling over the idea of common entrance test for IITs and NIITs. Surprised…? Same was my reaction when I read this line. A literate Indian can easily figure out by virtue of his common sense that the government wants to table the proposal of a common examination for IITs and NITs. Sadly, third largest newspaper daily, The Times Of India, doesn’t even know the difference between NITs and NIITs, let alone the claim of being the trendsetter that adheres to the highest standards of journalism. The error was not at a single place. TOI has committed this gaffe three times in an article of barely 400 words. The word NIT did not even feature in the article. They have simply assumed that NIITs are equivalent to NITs.

As a responsible citizen of India, let me clearly draw a line between the NITs and NIITs so that heedless Indians and Times Of India don’t make a blunder in future. NITs are institutes that are funded by the central government of India. They are “Institutes of National Importance” declared by the Ministry of Human Resources and Development. To name a few, courses like Computer Engineering, Mechanical Engineering, and Electrical Engineering are dealt with here. The courses in NITs are accredited by National Board of Accreditation. The labs here are funded by World Bank. The students here belong to top 0.5 percentile of India. The teachers in NITs are globally acclaimed. On the other hand, NIIT is a private computer institute for training people so that software firms can hire them. Here only courses such as Java, C# are offered. Even though both institutes are differentiated by a letter “I” there is a world of difference between them.

Times of India should realise that NITs feature in the best colleges of India. I hold no grudges against NIIT, but it is unethical to link two institutes of completely different stature. Indian society believes that IITs are the only premier institutes of India. Times of India has unfortunately contributed to this myth. If professionals working in Times of India don’t know this, it would be a crime to expect a positive response from 13.5 million readers of Times Of India. NITians have proved that this notion is wide of the mark. NITians are at par with the society labelled prodigious IITians. NITians fetch placements in the elite companies of the world. Many of them are successful entrepreneurs. There is only one NIT in a state and a student is expected to burn the midnight oil to get into it. Combating for a seat in it takes a toll on the mental level of a student. In return, NIT is compared with nascent NIIT which is an insult to NITs and the setup which is more than half a decade old.

So, as a NIT student from the platform of “Proud To Be An NITian” on the behalf  of NIT fraternity comprising of 50000 students presently studying in them and thousands who have passed in the last 50 years, I would request you to not use this in future. Confusion between NIT and NIIT just shows your utter ignorance about technical education institutes in India. Had Times Of India added the letter “I” in IIT and printing it as IIIT, massive protests would have erupted. The Times Group would have tendered an apology. But no outrage was observed after TOI committed this blunder. It doesn’t give Times Of India a leeway. We expect an apology from the Times Group. It would, in fact, be a step by TOI towards regaining the confidence in NITians and its readers. (साभार- ptbn.org)

ptbn.org में प्रकाशित श्याम कौशिक की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादकों ने तो शर्म भी बेच दी

Dhiraj Kulshreshtha : आज टाइम्स ऑफ इंडिया में संपादकीय पेज पर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का लीड आर्टिकल छपा है…..यह आर्टिकल अखबार और राजनेता दोनों की गिरावट का बेहतरीन नमूना है… ‘अ रिवोल्यूशन इन सब्सिडीज’ यानि आर्थिक सहायता में क्रांति…के हैडिंग से छपा यह लीड आलेख सरकार के विभिन्न विभागों की संयुक्त सालाना रिपोर्ट से ज्यादा कुछ नहीं है…जिसे वसुंधरा राजे नहीं बल्कि नौकरशाह तैयार करते हैं, और जनसंपर्क विभाग विज्ञप्ति के रूप में जारी करता है….पर बहुप्रतिष्ठित अखबार के संपादकजी क्या कर रहे हैं…अगर सेटिंग (मार्केटिंग) के तहत इस विज्ञप्ति को छापना ही था, तो अखबार के किसी भी पेज पर छाप सकते थे।

संपादकीय पेज तो अखबार का मुख्य पॉलिसी पेज होता है…इस पेज का लीड आर्टिकल इसकी प्राणवायु….छोटे तो बेचारे बिक ही जाते हैं पर इतने बड़े अखबार के संपादक ने भी अपना स्पेस बेच दिया। और तो और …आलेख और हैडिंग में कोई तालमेल नहीं है, हैडिंग तो जरूर संपादकजी ने ही दी होगी…सब्सिडी क्रांति के गीत गाने वाले हैडिंग के आलेख में ही दूसरे पैरे से ही पीपीपी मॉडल की आरती शुरु हो जाती है यानि कि यह आलेख सिर्फ उनके लिए काम का है जो सिर्फ हैडिंग ही पढ़कर आगे बढ़ जाते है.. (ये मार्केटिंग वाले भी संपादकों को क्या-क्या पढ़ा देते हैं) पर तीसरे छोर पर मुख्यमंत्री की टीम पर भी तरस आता है कि उसमें एक भी कायदे का आदमी नहीं है, जो मुख्यमंत्री के नाम से एक प्रभावी लेख लिखकर इस अवसर(सौदे) को ठीक से भुना पाता…..कम से कम वसुंधरा राजे की चिंतक, लेखक जैसी छवि तो बनती…. विज्ञप्ति लेखन ने सब धो डाला…. अब तो बस यह जानना बाकी बचा है कि छपने की डील कितने में हुई थी…

राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार धीरज कुलश्रेष्ठ के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अनिल अंबानी ने TOI पर ठोका 5 हजार करोड़ की मानहानि का मुकदमा

अनिल अंबानी ने टाइम्स ऑफ इंडिया पर पाँच हज़ार करोड़ की मानहानि का दावा ठोका है। भारतीय मीडिया के इतिहास में अब तक किसी मीडिया ग्रुप पर लगाया गया मानहानि का ये सबसे बड़ा दावा है। सीएजी यानी कैग की ड्राफ्ट रिपोर्ट के आधार टाइम्स ऑफ इंडिया ने 18 अगस्त को अपने अखबार में कई लेख प्रकाशित किए थे। जिसमें अंबानी की बिजली कंपनी बीएसईस के खातों में कई तरह की गड़बड़ियाँ पाए जाने की बात कही गई थी।

अनिल अंबानी की बीएसईएस कंपनी की तरफ से बेनेट कोलमैन कंपनी (BCCL) द्वारा संचालित टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार पर आरोप लगाया गया है कि TOI में प्रकाशित आलेखों में बीएसईएस पर गलत आरोप लगाए गए हैं और कंपनी को बदनाम करने की कोशिश की गई है। साथ ही जिस कैग रिपोर्ट के जिन तथ्यों को आधार बनाकर कंपनी के बारे में आलेख लिखे गए हैं। उन सभी तथ्यों का सार्वजनिक होना दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश की सीधे तौर पर अवमानना है।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपना पक्ष रखते हुए बताया है कि उनके अखबार में प्रकाशित सभी लेख पूरी तरह से विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से हैं । साथ ही प्रकाशन के सभी नियम कानूनों को ध्यान में रख कर पूरी निष्पक्षता के साथ प्रकाशित किए गए है। जिसमें कैग रिपोर्ट के तथ्यों के साथ-साथ बीएसईएस कंपनी के पक्ष को भी रखते हुए बैलेंस रिपोर्टिंग की गई है और कंपनी को किसी भी तरह से बदनाम करने की किसी तरह से साजिश नहीं की गई है। गौर करने वाली बात तो यह है कि मानहानि के नाम पर मुआवज़े की इतनी बड़ी रकम की मांग करना हर्जाना वसूलने से ज्यादा मीडिया को धमकाने-डराने की कोशिश दिखलाई देती है।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

धार्मिक जनगणना के डाटा पर टीओआई और द हिंदू के इन शीर्षकों को गौर से पढ़िए

See how two of India’s leading newspapers have today reported the same data (of the latest Census)

Nadim S. Akhter : इसे देखिए, पढ़िए और समझिए. देश के दो प्रतिष्ठित अखबारों निष्ठा. किसकी निष्ठा पत्रकारिता के साथ है और किसकी चमचई में घुली जा रही है, खबर की हेडिंग पढ़ के समझा जा सकता है. मैंने कल ही फेसबुक की अपनी पोस्ट में लिखा था कि अलग-अलग चम्पादक, माफ कीजिए सम्पादक धार्मिक जनगणना के इस डाटा का अपने अपने हिसाब से इंटरप्रिटेशन करेंगे. आज फेसबुक पर एक ही खबर के दो एंगल, बिलकुल जुदा एंगल तैरता हुआ देखा तो आपसे साझा कर रहा हूं.

एक The Times of India नामक का देश का सबसे बड़ा अखबार है तो एक The Hindu नाम का प्रतिष्ठित अखबार. चूंकि टाइम्स ग्रुप में 6 साल नौकरी की है. Times Building में ही तो पता है कि वहां हेडिंग लगाने में कितनी मेहनत होती है. कितना इस पे विचारा और सोचा जाता है. नीचे से लेकर ऊपर तक के सभी पत्रकार इसमें involve होते हैं. और अंत में हेडिंग सम्पादक-मुख्य सम्पादक को भी बताई जाती है. सो benefit of doubt के आधार पर Times of India को ये छूट नहीं दी जा सकती कि news editor या page one incharge यानी night editor टाइप की कोई चीज ने ये किया हो और ऊपर के लोगों को इसके बारे में पता ही ना हो. वो भी तब, जब अंग्रेजी वाले अखबार यानी Times of India पर विनीत जैन और समीर जैन की सीधी नजर होती है. मैं ये नहीं कह रहा कि टाइम्स ऑफ इंडिया की हेडिंग गलत है. बस अखबार ने सरकारी डाटा का इंटरप्रिटेशन अपने हिसाब से कर दिया है.

The Hindu अखबार ने उसी डाटा का इंटरप्रिटेशन अपने हिसाब से किया है लेकिन हेडिंग पढ़कर पाठकों को लगेगा कि दोनों अखबार परस्पर विरोधाभासी हैं. कोई एक अखबार गलत सूचना दे रहा है. लेकिन ऐसा है नहीं. यही तो डाटा इंटरप्रिटेशन का कमाल है. चुनाव के वक्त ऐसे ही थोड़े सेफोलॉजिस्ट बैठकर मनमाफिक पार्टी को टीवी पर जितवा देते हैं. सब डाटा का ही तो कमाल होता है. अपने हिसाब से रिजल्ट निकाल लो. बहरहाल. पत्रकारिता के छात्रों के लिए ये खबर और दोनों अखबारों की हेडिंग एक केस स्टडी है. और भारतीय लोकतंत्र तथा चौथे खंभे के लिए आईना. अब ये आप है कि आप इन दोनों में से कौन सा अखबार रोज पढ़ना चाहेंगे. क्योंकि -दैनिक जागरण- पढ़ने वालों को -हिन्दुस्तान- अखबार रास नहीं आएगा. मेरी खुशकिस्मती कि मैंने इन दोनों अखबारी ग्रुप में भी काम किया है. घोषित तौर पर कुछ नहीं होता, बहुत कुछ अघोषित होता है.

Nietzsche ने सच ही कहा है- “There are no facts, only interpretations!”

कुछ समझे !!! लोकतंत्र का चौथा खंभा डोल रहा है. मन डोले-तन डोले. और धन तो सबकुछ डोलावे रे. पैसा खुदा तो नहीं पर उससे कम भी नहीं. जूदेव बाबू यूं ही नहीं कहे थे ये बात. अखबारों और टीवी चैनलों का अर्थशास्त्र समझे बिना पत्रकारिता के चौथे स्तम्भ की हकीकत कहां समझ पाएंगे आप !!! मैं ये नहीं कह रहा कि सबकुछ गंदा है, पर जो कुछ बचा है, उतना ही बचा रह जाए आगे तो ये इस लोकतंत्र के लिए शुभ होगा. जय हो!

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.


इसे भी पढ़ें…

एक खास धार्मिक समुदाय की सकल जनसंख्या विकास दर 24 प्रतिशत है जो राष्ट्रीय औसत से भी 7 फीसद ज्यादा है

xxx

भारतीयों में भगवान-अल्ला के भरोसे अधिकाधिक बच्चे पैदा करने की प्रवृत्ति कम हो रही है

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कलाम और याकूब की खबरों के साथ खिलवाड़ की आलोचना

याकूब मेमन की फांसी और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्‍दुल कलाम के निधन से जुड़ी खबरों पर इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया के रवैये को लेकर देश के बौद्धिक जगत में जमकर आलोचना का सिलसिला सोशल मीडिया पर अभी थमा नहीं है। 

 

आलोचना इस बात की रही कि उस दिन की खबरों में उन्हें प्राथमिकता की दृष्टि से किसे महत्व दिया। ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ ने अपने फर्स्ट पेज पर याकूब मेमन को टॉप न्यूज का स्थान दिया था और कलाम की खबर को मामूली स्थान दिया था। इंडियन एक्‍सप्रेस ने याकूब की खबर को लीड प्रजेंटेशन दिया और कलाम की खबर को अन्य पेज पर महत्व दिया था। 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

इतनी बड़ी कॉरपोरेट जालसाज़ी के आरोपियों में टाइम्‍स ऑफ इंडिया समूह के मालिक समीर जैन भी

कोई भी कहानी कभी भी खत्‍म नहीं होती। बस, हम उसका पीछा करना छोड़ देते हैं। पचास साल पुरानी एक लंबी और जटिल कहानी से मेरी मुलाकात दस साल पहले 2005 में हुई थी जिसका नायक उस वक्‍त 84 साल का था। निर्मलजीत सिंह हूण नाम के इस एनआरआइ के इर्द-गिर्द मुकदमों का जाल था। एक ज़माने में कॉरपोरेट जगत पर राज करने वाले शख्‍स को इस देश के कारोबारियों, पुलिस और न्‍याय व्‍यवस्‍था ने पंगु बनाकर छोड़ दिया था। फिर इस शख्‍स ने इस देश की न्‍याय प्रणाली का परदाफाश करने को अपना मिशन बना लिया। उसके मिशन में से एकाध कहानियां हमने भी उठाकर 2005 में ‘सीनियर इंडिया’ में प्रकाशित की थीं, जिसके बाद प्रतिशोध की कार्रवाई में संपादक आलोक तोमर समेत प्रकाशक और मालिक सबको जेल हो गई। पत्रिका बंद हो गई, आलोकजी गुज़र गए, हूण से हमारा संपर्क टूट गया, लेकिन उनका मिशन जारी रहा।

अचानक इतने दिन बाद जब उनकी याद आई और मैंने कहानी के छूटे सिरे को पकड़ना शुरू किया, तो इस खबर पर नज़र पड़ी। पिछले पचास साल से दर्जनों मुकदमे लड़ रहे हूण को 48 साल बाद कलकत्‍ता उच्‍च न्‍यायालय से एक छोटा सा इंसाफ मिला है। उन्‍हें ठगने वाले कारोबारियों के ऊपर कलकत्‍ता पुलिस ने एफआइआर दर्ज की है। हूण अब 18,402 करोड़ रुपए की वसूली के लिए एक और मुकदमा करने जा रहे हैं। भारत के कॉरपोरेट इतिहास में यह सबसे महंगा दीवानी मुकदमा होगा।

आप पूछ सकते हैं कि इसमें हमारे काम का क्‍या है? मित्रों, 1967 के इस कॉरपोरेट जालसाज़ी वाले मुकदमे में जिन लोगों के खिलाफ़ एफआइआर दर्ज हुई है उनमें इंद्र कुमार गुजराल के भतीजे अमित जाज, उनकी पत्‍नी, टाइम्‍स ऑफ इंडिया समूह के मालिक समीर जैन और उनके दिवंगत पिता अशोक जैन भी हैं। क्‍या किसी मृत व्‍यक्ति के ऊपर एफआइआर हो सकती है? हूण ने एक बार हमें बताया था कि अशोक जैन के जिस विमान हादसे में मारे जाने की खबर बहुप्रचारित है, वह दरअसल फर्जी थी। उन्‍हें फेमा/फेरा में अंदर जाने से बचाने के लिए यह कहानी गढ़ी गई है। अशोक जैन जिंदा हैं।

ऐसे दावों को हम तब भी एक बुजुर्ग की सनक मानकर खारिज करते थे और आज भी इस पर विश्‍वास नहीं होता। सवाल उठता है कि कलकत्‍ता उच्‍च न्‍यायालय के आदेश और कलकत्‍ता पुलिस के एफआइआर का क्‍या मतलब निकाला जाए? इच्‍छुक पत्रकार मित्र अगर इस स्‍टोरी को फॉलो करना चाहें तो उनका स्‍वागत है। अपने जीते जी भारतीय कॉरपोरेट जगत की रंजिशों का ऐतिहासिक दस्‍तावेज बन चुके एन.एस. हूण को आज भी चार दर्जन मुकदमों में इंसाफ़ का इंत़जार है।

अभिषेक श्रीवास्तव के एफबी वाल से

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जस्टिस काटजू और टाइम्स ऑफ इंडिया को कोर्ट का नोटिस

इलाहाबाद की जिला अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कण्डेय काटजू के खिलाफ क्रिमिनल केस की अर्जी मंजूर करते हुए उन्हें नोटिस जारी कर दो हफ्ते में जवाब तलब किया है। गाय के मांस संबंधी काटजू के बयान पर जस्टिस काटजू जवाब मांगते हुए कोर्ट ने टाइम्स ऑफ इंडिया को भी नोटिस जारी कर दिया है, क्योंकि उसने खबर प्रकाशित की थी। 

गौरतलब है कि जस्टिस काटजू ने गाय के मांस को सस्ता प्रोटीन होने का बयान दिया था। जिला अदालत के ही वकील आर. एन. पाण्डेय ने जस्टिस काटजू के खिलाफ आईपीसी की धाराओं में क्रिमिनल केस दर्ज किये जाने की मांग की है। उन्होंने कोर्ट को बताया है कि फ्रीडम आफ स्पीच का दायरा तोड़कर जस्टिस काटजू लोगों की भावनाएं भड़काने और समाज में नफरत फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। जिला अदालत ने जस्टिस काटजू से 11 अगस्त तक जवाब मांगा है। 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टीओआई के मालिकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने वाले हूण को मिली एक सफलता

Abhishek Srivastava : कोई भी कहानी कभी भी खत्‍म नहीं होती। बस, हम उसका पीछा करना छोड़ देते हैं। पचास साल पुरानी एक लंबी और जटिल कहानी से मेरी मुलाकात दस साल पहले 2005 में हुई थी जिसका नायक उस वक्‍त 84 साल का था। निर्मलजीत सिंह हूण नाम के इस एनआरआइ के इर्द-गिर्द मुकदमों का जाल था। एक ज़माने में कॉरपोरेट जगत पर राज करने वाले शख्‍स को इस देश के कारोबारियों, पुलिस और न्‍याय व्‍यवस्‍था ने पंगु बनाकर छोड़ दिया था।

फिर इस शख्‍स ने इस देश की न्‍याय प्रणाली का परदाफाश करने को अपना मिशन बना लिया। उसके मिशन में से एकाध कहानियां हमने भी उठाकर 2005 में ‘सीनियर इंडिया’ में प्रकाशित की थीं, जिसके बाद प्रतिशोध की कार्रवाई में संपादक आलोक तोमर समेत प्रकाशक और मालिक सबको जेल हो गई। पत्रिका बंद हो गई, आलोकजी गुज़र गए, हूण से हमारा संपर्क टूट गया, लेकिन उनका मिशन जारी रहा।

आज अचानक इतने दिन बाद जब उनकी याद आई और मैंने कहानी के छूटे सिरे को पकड़ना शुरू किया, तो इस खबर पर नज़र पड़ी जिसका लिंक नीचे है। पिछले पचास साल से दर्जनों मुकदमे लड़ रहे हूण को 48 साल बाद कलकत्‍ता उच्‍च न्‍यायालय से एक छोटा सा इंसाफ मिला है। उन्‍हें ठगने वाले कारोबारियों के ऊपर कलकत्‍ता पुलिस ने एफआइआर दर्ज की है। हूण अब 18,402 करोड़ रुपए की वसूली के लिए एक और मुकदमा करने जा रहे हैं। भारत के कॉरपोरेट इतिहास में यह सबसे महंगा दीवानी मुकदमा होगा।

आप पूछ सकते हैं कि इसमें हमारे काम का क्‍या है? मित्रों, 1967 के इस कॉरपोरेट जालसाज़ी वाले मुकदमे में जिन लोगों के खिलाफ़ एफआइआर दर्ज हुई है उनमें इंद्र कुमार गुजराल के भतीजे अमित जाज, उनकी पत्‍नी, टाइम्‍स ऑफ इंडिया समूह के मालिक समीर जैन और उनके दिवंगत पिता अशोक जैन भी हैं। क्‍या किसी मृत व्‍यक्ति के ऊपर एफआईआर हो सकती है? हूण ने एक बार हमें बताया था कि अशोक जैन के जिस तरह मारे जाने की खबर बहुप्रचारित है, वह दरअसल फर्जी थी। उन्‍हें फेमा / फेरा में अंदर जाने से बचाने के लिए यह कहानी गढ़ी गई है। अशोक जैन जिंदा हैं!

ऐसे दावों को हम तब भी एक बुजुर्ग की सनक मानकर खारिज करते थे और आज भी इस पर विश्‍वास नहीं होता। सवाल उठता है कि कलकत्‍ता उच्‍च न्‍यायालय के आदेश और कलकत्‍ता पुलिस के एफआइआर का क्‍या मतलब निकाला जाए? इच्‍छुक पत्रकार मित्र अगर इस स्‍टोरी को फॉलो करना चाहें तो उनका स्‍वागत है। अपने जीते जी भारतीय कॉरपोरेट जगत की रंजिशों का ऐतिहासिक दस्‍तावेज बन चुके एन.एस. हूण को आज भी चार दर्जन मुकदमों में इंसाफ़ का इंत़जार है।

खबर का स्क्रीनशाट ये है…

जनपक्षधर पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.


अभिषेक का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

‘बजरंगी भाईजान’ मोहन भागवत और उनके ”हिंदू राष्‍ट्र” को दिया गया सलमान का रिटर्न गिफ्ट है

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

गाजियाबाद में निजी फ्लैट पर टाइम्स ऑफ इंडिया का जबरन कब्जा, मालिक का अपहरण कराया, पीएम से गुहार

गाजियाबाद (उ.प्र.) : बड़े अखबार घराने भी अब किस तरह माफिया तत्वों की तरह अपराध जगत में घुस चुके हैं, इसका एक ताजा वाकया संज्ञान में आया है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने राजेंद्रनगर (साहिबाबाद) सेक्टर-2 में एस के ठाकुर पुत्र जे एन ठाकुर के आरएच-47 एचआईजी डुपलेक्स फ्लैट पर कब्जा कर लिया है। ठाकुर ने अपना फ्लैट खाली कराने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गुहार लगाई है। 

सबसे उपर भड़ास को लिखा गया पत्र. नीचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गए प्रार्थनापत्र की छाया-प्रति

पीएम को लिखे प्रार्थना पत्र में ठाकुर ने बताया है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सरकारी नीलामी के तहत वर्ष 1992 में साहिबाबाद के इंडस्ट्रियल स्टेट स्थित 13/2 साइट-4 की एक बंद (sick) यूनिट को खरीदा था। उन्होंने 17 जुलाई 1992 को उसकी अपने नाम रजिस्ट्री करा ली थी। वह संपत्ति आज भी उनके नाम से रजिस्टर्ड है। पूरी सरकारी-प्रशासनिक कार्यवाही पूरी करते हुए उन्हें उस संपत्ति पर कब्जा भी दे दिया गया। कुछ समय बाद पड़ोस की यूनिट के कब्जाधारी टाइम्स ऑफ इंडिया प्रबंधन के मालिक विनीत जैन, समीर जैन और इंदु जैन ने गैरकानूनी तरीके से जबरन ठाकुर की संपत्ति पर कब्जा कर लिया। 

ठाकुर ने पीएम को लिखी चिट्ठी में आगे बताया है कि कब्जा करने के बाद टाइम्स ऑफ इंडिया प्रबंधन उसे बेचने के लिए उन पर दबाव डालने लगा। बेचने से इनकार कर देने पर वह अपराधी तत्वों से उनका उत्पीड़न कराने लगा। कुछ दिन बाद उनका अपहरण करा लिया और सारे कागजात जबरन उनसे ले लिए गए। टाइम्स आफ इंडिया के गुंडे ठाकुर से उनके विजया बैंक, विज्ञान विहार के चेक भी छीन ले गए। उसके बाद गुंडे उनकी हत्या करने की कोशिश करने लगे। संयोग से किसी तरह उनकी और उनके परिवार वालो की जान बच गई। गुंडे उन्हें चेतावनी दे गए कि आइंदा उस मौके पर कभी दिखे तो तुम्हारे समेत तेरे परिवार का सफाया कर दिया जाएगा। 

ठाकुर के मुताबिक वह पिछले 22 वर्षों से अपने हक के लिए लड़ रहे हैं। जब उन्होंने अब फिर से अपनी आवाज सार्वजनिक की है तो उन्हें वे गुंडे फिर जान लेने की धमकियां देने लगे हैं। जब वह स्थानीय पुलिस के पास सुरक्षा की गुहार लगा जाने जाते हैं तो उल्टे उन्हें ही फटकार कर भगा दिया जाता है। ठाकुर ने बताया है कि पूरे घटनाक्रम से उन्होंने सीबीआई को भी अवगत करा रखा है, जो डायरी नंबर-3580-सी, दिनांक 05.11.14, सीबीआई हेडक्वार्टर में दर्ज है।  

ठाकुर ने पीएम से गुहार लगाई है कि कब्जाधारी टाइम्स ऑफ इंडिया प्रबंधन के मालिक विनीत जैन, समीर जैन और इंदु जैन के गुंडों से उनकी रक्षा करते हुए उनकी संपत्ति को कब्जा-मुक्त कराया जाए। ठाकुर ने लिखा है कि टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप (बीनेट एंड कोलमेन कंपनी लिमिटेड) की माफियागिरी के वे शिकार हैं। उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं कि समझौता कर लो और जमीन पर अपना हक छोड़ दो। उन्हें तीन पर अगवा कराया जा चुका है। संपत्ति के सारे जरूरी कागजात उनके पास हैं। उन्हें डर है कि टाइम्स ऑफ इंडिया प्रबंधन जाली कागजातों के माध्य से उनकी संपत्ति पर मालिकाना हक न प्राप्त कर ले। 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पांच महिलाओं की लाश की जगह एक महिला से जुड़ी हस्तमैथुन की खबर को तूल दे रहा टाइम्स ऑफ इंडिया!

दो-चार दिनों से बहुत परेशान हूं। वजह है अखबारों की समझ, अदा, शैली और उनकी संवेदनशीलता। लगातार मनन-चिन्‍तन के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि अब बोलना जरूरी है। यह है लखनऊ से प्रकाशित अखबार टाइम्‍स ऑफ इण्डिया। विश्‍वविख्‍यात है, और अंग्रेजी-दां लोगों का पसन्‍दीदा भी। पांच महिलाओं की लाश की जगह एक महिला से जुड़ी हस्तमैथुन की खबर को तूल दे रहा है ये अखबार।

दिल्‍ली की एक खबर इस अखबार में दो पन्‍नों में अलग-अलग छापी है। मजमून यह है कि दिल्‍ली में जब एक युवती को साथ लेकर एक टैक्‍सी-ड्राइवर जा रहा था, अचानक उसने उस युवती की ओर कामुक मुस्‍कुराहट फेंकते हुए हस्‍त-मैथुन करना शुरू कर दिया। इस पर इस युवती ने विरोध किया और गाड़ी रुकवा कर चली गयी। बाद में उसने सोशल साइट्स पर हल्‍ला मचाया तो टैक्‍सी-मालिक ने उस ड्राइवर को बर्खास्‍त कर दिया। हैरत की बात है कि इस युवती ने अब तक पुलिस को इसकी सूचना देने की जरूरत नहीं समझी। 

मेरी समझ में नहीं आता है कि लखनऊ में मोहनलालगंज में एक साल पहले बरामद हुई रक्‍तरंजित युवती की लाश और उसके बाद ताबड़-तोड़ पांच अन्‍य युवतियों की लाश पर अपनी चिन्‍ता जताने के बजाय इस अखबार ने दिल्‍ली में हस्‍तमै‍थुन की घटना को इतना तूल क्‍यों दिया। क्‍या इसलिए कि लखनऊ में बरामद हुई युवतियों की लाशें बेहद गरीब परिवार की थीं और जो ड्राइवर के हस्‍तमैथुन और उसकी मुस्‍कुराहट से तिलमिला गयी थी, वह कम से कम एक हजार रूपये टैक्‍सी वाले को देने वाली थी।

मुझे खुद पर शर्म आ रही है कि मैं इस समय महिला-अस्मिता के आर्थिक मूल्‍यांकन जैसा घटिया काम कर रहा हूं। लेकिन टाइम्‍स ऑफ इण्डिया क्‍या कर रहा है दोस्‍तों

कुमार सौवीर के एफबी वाल से

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टाइम्स ऑफ इंडिया के पतन की पराकाष्ठा… सलमान खान पर 5 पेज बिछा दिया!

Nadim S. Akhter : TIMES NOW वाले अर्नब गोस्वामी भी कमाल है. हमेशा लाइमलाइट में रहना चाहते हैं. ये देखकर ताज्जुब हुआ कि कल रात के थकाऊ News Hour शो के बाद आज सुबह-सुबह एंकरिंग करने स्टूडियो में बैठ गए हैं. माने के Live हो गए हैं. बॉम्बे हाई कोर्ट में आज सलमान खान मामले की सुनवाई होनी है, सो अर्नब पूरी फौज के साथ तैयार हैं. और एक मैं हूं कि खामोख्वाह इस इवेंट को लाइटली ले रहा था. जब अर्नब ने इतनी बड़ी तैयारी कर रखी है तो दूसरे चैनलों, खासकर हिन्दी के चैनलों ने क्या किया होगा, अंदाजा लगा रहा हूं.

वैसे एक सवाल मन में उठ रहा है कि क्या सलमान खान इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनके एक अपराध पर बन रही स्टोरी पर बड़े मीडिया संस्थान इस तरह की तैयारी करें!!! रिपोर्टरों की फौज तैनात कर दें मैदान में. पल-पल की खबर दें!!! कल मुंबई से एक मित्र का मैसेज आया कि तुम पत्रकार लोग ये कर क्या रहे हो??!! आज मुंबई के The Times of India के शुरुआती पांच पेज सलमान खान के ऊपर हैं. क्या टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे बड़े और प्रतिष्ठित अखबार का इतना पतन हो चुका है कि सलमान खान पर वह 5 पेज बिछा दे!! उसका संदेश पढ़कर मैं भी दंग रहा गया. सोचने लगा कि क्या वाकई Times of India ने ऐसा किया है!!!

समझ नहीं आ रहा है कि मीडिया संस्थानों और उनके धीर-गम्भीर सम्पादकों को हो क्या गया है!!! एक खबर अचानक से नैशनल हेडलाइन्स बनती है, उसे खूब रगड़ा-चलाया जाता है और फिर अचानक से वह सिरे से गायब हो जाती है. ना कोई फॉलोअप, ना कोई याद. और फिर आती है चमचमाती एक नई स्टोरी, रगड़े जाने के लिए. उसे भी दमभर धुना जाता है और फिर एक नई स्टोरी की तलाश शुरु हो जाती है…

ताजा-ताज उदाहरण दे रहा हूं. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की रैली में एक किसान सीएम के सामने खुदकुशी कर लेता है और पूरा का पूरा मीडिया उस खबर पर पिल पड़ता है. पूरे देश में गुस्सा भर दिया जाता है और ऐसा लगने लगता है कि मानो अब किसानों के अच्छे दिन वाकई में आने वाले हैं, उनके दिन बहुरेंगे. संसद तक में सवाल उठने लगते हैं. मीडिया के माइकवीर खेतों में जा-जाकर किसानों का हाल पूछने लगते हैं…टीवी की स्क्रीन पर मैला-कुचैलां गांव दिखने लगता है, लेकिन तभी, लेकिन तभी…

अचनाक खबर आती है कि नेपाल में एक बड़ा भूपकम्प आया है और टीवी कैमरों के तोपनुमा मुंह का रूख किसानों से हटाकर नेपाल भूकम्प पर फोकस कर दिया जाता है. अचानक से किसान, उनकी आत्महत्याएं, उनका मुआवजा, फसल की खरीद जैसे सुलगते सवाल और उन सवालों पर सवाल उठाते एंकरों के तमतमाए चेहरे टीवी स्क्रीन से गायब हो जाते हैं. लड़ाई का मैदान बदल चुका होता है और अब टीवी के माइकवीर नेपाल की धरती पर लैंड कर जाते हैं. कोई हेलिकॉप्टर पर सवार दिखता है, कोई दबे मकानों से अपना बचा-खुचा सामान निकालते लोगों के जख्मों पर नमक लगाकर ये पूछता हुआ कि ये आपका ही मकान था क्या??!! पूरा समान दब गया क्या??? और कोई विध्वंस के बीच झूल रहे शहर के खंडहर मकानों के बीच खड़ा होकर फोटुक खिंचवाता है और फेसबुक-ट्विटर पर अपलोड करके ये घोषणा करता है कि देखों !! हम अब नेपाल में हैं. त्रासदी का तमाशा बनाने को तैयार.

भारतीय मीडिया इस कुदरती हमले पर जिस तरह की कवरेज करता है, उससे नेपाली आवाम और वहां की मीडिया भी आजिज आ जाता है. वो घोषणा कर देते हैं कि भारतीय मीडिया अपने टोटा-टंटा लेकर यहां से उखड़े और घर का रास्ते नापे. कुछ लोग नेपाल की जनता के इस स्वाभिमानी कदम में चीन की साजिश ढूंढते हैं लेकिन ये नहीं देखते कि दूसरे देशों की मीडिया से नेपाल की जनता को कोई शिकायत नहीं. फिर भी हमारा स्वनामधन्य मीडिया उस अतिरेक से कोई सबक नहीं सीखता. कोढ़ में खाज ये कि BEA यानी ब्रॉडकॉस्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव एनके सिंह ये कहते दिखते हैं कि भारतीय मीडिया नें नेपाल में अच्छा काम किया. कोई आत्ममंथन नहीं, कोई विचार नहीं. सब के सब ये मानकर चल रहे हैं कि जो किया, वो बहुत अच्छा किया. खैर !!!

नेपाल से भगाए जाने के बाद भारतीय मीडिया अचानक से उस त्रासदी को भूल जाता है. टीवी पर 24 घंटे आसन जमाए नेपाल की तस्वीरें यकायक गायब हो जाती हैं. अरे भाई, माना कि आपको खदेड़ दिया गया लेकिन क्या इतना बुरा मान गए कि आप अपने पेशे से न्याय करके भूकम्प की खबर ही दिखाना बंद कर दोगे??!! जिस भूकम्प और उससे जुड़े मानवीय संवेदनाओं से अब तक बहुत सारा सरोकार दिखा रहे थे, अचानक से वे सरोकार क्या उड़न-छू हो गए आपके??!! आपके रिपोर्टर वहां ना सही, कम से कम एजेंसी की खबर-विजुअल लेकर ही खबर दिखा देते भाई. लेकिन ये हो ना सका और नेपाल भूकम्प का तमाशा बनाती खबरें भारतीय टीवी स्क्रीन से फुर्र हो गईं…

नए मसाले की तलाश में लगे मीडिया की उस समय चांदी हो गई जब ये खबर आई कि हिंट एंड रन मामले में सलमान खान पर फैसला आना है. फिर क्या था!!! किसान की आत्महत्या और नेपाल भूकम्प को दुह चुका मीडिया सलमान खान पर बरस पड़ा. सलमान कब घर से निकले, वे किससे गले मिले, उन्होंने क्या पहन रखा है, मामले की सुनवाई के दौरान वे खांसे कि नहीं, उन्हें पसीने आए कि नहीं (शुक्र है इन लोगों ने ये नहीं बताया कि वे टॉयलेट गए कि नहीं और गए तो कितनी बार गए !!!) वगैरह-वगैरह जैसी बातें बताकर सभी चैनल-सम्पादक धन्य महसूस करने लगे. और इन सबके बीच वाट लगी बेचारे रिपोर्टरों की. एक चैनल ने तो बाकायदा टीवी स्क्रीन का स्क्रीन शॉट दिखाकर ये ढोल बजाया कि हमने सलमान खान की हर खबर सबसे पहले आप तक पहुंचाई. शायद औरों ने भी किया हो. लेकिन ये बात बताइए भाई लोगों. बतौर एक दर्शक मुझे क्या फर्क प़ड़ता है कि मैंने सलमान को 5 साल जेल की सजा की खबर 11 बजकर 24 मिनट पर सुनी-देखी या 11 बजकर 30 मिनट पर.

टीवी का स्क्रीन ना हुआ कि कोई स्पेस शटल हो गया, जहां एक-एक सेकेंड का हिसाब रखना पड़ता है. आपको बता दें कि मंगल ग्रह पर भेजे गए यान को उसके आखिरी चरण में मंगल की धरती पर लैंड करने के लिए सिर्फ 15 सेकेंड मिले थे और ये 15 सेकेंड ही उस अभियान की सफलता या असफलता तय कर देती है. लेकिन टीवी का स्क्रीन कोई स्पेस शटल है क्या कि आप घड़ी दिखाकर अपनी कामयाबी का ढिंढोरा पीट रहे थे??!!! अरे पत्रकारिता ही करनी थी तो सलमान की स्टोरी से जुड़े गंभीर तथ्यों की विवेचना करते ना आप लोग??!! ये क्या बता रहे थे कि सलमान को पसीना आ रहा था आदि-आदि.

खैर, लिखना तो बहुत कुछ चाहता हूं लेकिन बहुत लम्बा हो जाएगा. सुबह-सुबह अर्नब गोस्वामी को स्टूडियो में बैठकर सलमान की सुनवाई मामले पर एंकरिंग करते देखा तो रहा ना गया. सलमान का मामला अभी कुछ दिनों तक और दुहा जाएगा. और जब गन्ने का रस निचोड़ लिया जाएगा तो सलमान नामक यह -राष्ट्रीय आपदा- फिर अचानक से आपके टीवी स्क्रीन से गायब हो जाएगी. फिर किसी नए मसाले को कूटा जाएगा और उसकी फ्रेश बिरयानी बनाई जाएगी. तब तक आप इस ग्रेट इंडियन मीडिया ड्रामे का मजा लीजिए. जय हो.

लेखक नदीम एस. अख्तर कई न्यूज चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों आईआईएमसी में अध्यापन के कार्य से जुड़े हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: