राम धनी द्विवेदी-
बीस अगस्त को त्रिलोचन शास्त्री का जन्म दिन था। उन्हें उनके मानस पुत्रों ने मन से याद किया है। मैंने अपने पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में 1973 से 75 तक उन्हें देखा और उनके साथ काम किया है। उनके संबंध में अपना एक संस्मरण यहां दे रहा हूं। यह मेरी आत्मकथा का एक पेज है। पुस्तक तैयार है प्रकाशक की तलाश हो रही है।

जनवार्ता में अपने लगभग ढाई साल के कार्यकाल में मुझे आदरणीय त्रिलोचन शास्त्री जी का भी सानिघ्य मिला। उनकी मुझपर विशेष कृपा रहती रहती थी। छह घंटों के समय में अधिकतर साहित्य चर्चा में ही बीतता। त्रिलोचन जी को सुनना अपने में अलग अनुभव था, इसका स्वाद वही जान सकता है जिसने उन्हें सुना हो। चर्चा चाहे जहां से शुरू हो, किसी न किसी शब्द की व्युत्पति, उसकी व्याख्या, पर्याय, विलोम, समानार्थी शब्द सबकी बात हो जाती। शास्त्री जी चलते -फिरते विश्वकोश थे। वह शब्दों के सही उच्चारण पर विशेष जोर देते।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग श,स और ष के उच्चारण में प्राय: सतर्क नहीं होते। ष को ख कहना तो आम बात थी। शास्त्री जी इसकी शुद्धता पर विशेष जोर देते। यज्ञ को यज्य, संस्कार को सम्स्कार, ज्ञान को ज्नान कहते। आर्यसमाजी और श़ुद्धतावादी आज भी ऐसा ही उच्चारण करते हैं। (ज्ञान मंडल प्रकाशन को ज्नान मंडल कहते। ज्ञान मंडल के बाहर आज भी अंग्रेजी में यही स्पेलिंग लिखी है। कभी-कभी लोग मजाक में इसे ज्नान मंडल न कहकर जनाना मंडल कह देते।) शब्द और भाषा के प्रति वैसा आग्रह और प्यास अब कहां। वह गप्प भी इतनी गंभीरता से मारते कि सुनने वाला यकीन न करे तो क्या करे।
शास्त्री जी अपने में अलग व्यक्तित्व के स्वामी थे। वह विनोद सिन्हा को नहीं पसंद करते थे। एक बार विनोद जी ने कुछ कड़ी बात उनसे कह दी। उन दिनों वह विनोद जी की शिफ्ट मे काम करते थे। शास्त्री जी उठे, एक कागज लिया और उस पर लिखा—मैं कुंजड़ों की भाषा सुनने का अभ्यस्त नहीं हूं, लिहाजा, मेरा त्यागपत्र स्वीकार किया जाए। नीचे उनके हस्ताक्षर थे। वह ईश्वरदेव जी के कमरे में गए। वह नही थे। उनकी मेज पर वह कागज दबाया और घर चले गए। फिर उन्हें उनके घर से बुलाकर मनाया गया तो वर्मा जी की शिफ्ट में काम करने पर राजी हुए।
शास्त्री जी ‘जनवार्ता’ में काम करते थे, इससे ‘जनवार्ता’ का मान बढ़ता था। उनके साथ काम करने का अवसर मिलना मेरे लिए सौभाग्य की बात थी। वह अपने जीवन के संघर्ष की कहानी बीच-बीच में बताते थे। उनके बडे बेटे बीएचयू में उसी कल्चर विभाग में प्रोफेसर थे, लेकिन एक दिन किसी बात से नाराज हो कर वह उनके घर से निकले तो फिर उनके घर नहीं गए। उनके छोटे बेटे अमित कभी-कभी उनके साथ रहते थे। वह बाद में ‘जनसत्ता’ में पत्रकार हुए।
शास्त्री जी बहुत ही निश्छल और साफ हृदय के व्यक्ति थे। एक दिन बरसात में वह हाथ में रबर वाली चप्पल लिए, आफिस आए। नल पर जाकर पैर धोया और फिर चप्पल पहनी। यह पूछने पर कि चप्पल हाथ में क्यों ले लिए, बोले कि बारिश हो रही थी और चप्पल से कुर्ते पर छींटे पड़ रहे थे जिससे वह गंदा हो जाता, तो मैंने हाथ में ले लिए।
पहले वह नागरी प्रचारिणी सभा में काम करते थे। वहां समय से वेतन नहीं मिलता था तो बताते कि कभी ऐसा भी समय आया कि कई दिन तक भोजन नहीं मिला तो भिगोया चना खाकर ही रहे गए। जब वेतन मिलता तो लगभग पूरा पैसा बड़े बेटे को भेज देते और बहुत थोड़े में अपना और पत्नी को गुजारा करते। उनकी बातें सुनना अपने को समृद्ध करना होता था। उनके साथ के बहुत संस्मरण हैं। बरेली आने पर उनपर अलग से मैने एक लेख लिखा जो ‘आधारशिला’ के त्रिलोचन अंक में छपा। वह अंक कहीं खो गया तो दिवाकर भट ने उसकी दूसरी प्रति भेजी। कोरोना ने उन्हें हमसे छीन लिया।



Amitprakash
August 21, 2024 at 8:34 pm
भाई रामधनी जी ने बडी अचछी टिप्पणी लिखी है। उनके लिखे में दो भूलें हैं जिन्हें वे चाहें तो सुधार लें। कवि त्रिलोचन के बडे पुत्र डाक्टर जयप्रकाश सिंह बीएचयू में डिपार्टमेंट आफ हिसट्री एंड आर्कियालाजी में तब सीनियर लेक्चरर थे। शास्त्री त्रिलोचन को उन दिनों नागरी प्रचारिणी सभा से मात्र दो सौ रुपए मिलते थे ।उन्होंनै डाक्टर जय को उन दिनों कोई पैसे नहीं दी ।वजह थी वे सभा से 1969 से बाहर थे।
दूसरी बात मुझसे जुडी है त्रिलोचन जी जब बडे बेटे से अलग हुए तो वे बेरोजगार थे ।जनवार्ता में उन्हें मात्र डेढ सौ रुपए मिलते थे । मैं लगातार उनके साथ रहा ।तब मैंने दसवीं का इमतहान दिया था। बहरहाल।
अमितप्रकाश सिंह ।फोन 9868318552