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सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने TRP का नया मतलब समझाया- “तत्व रहित पत्रकारिता”

अखिलेश यादव-

TRP = ‘तत्व रहित पत्रकारिता’ का हश्र

आस्तीनी न्यूज़ चैनल कह रहे हैं कि हुक्मरानों ने पहले तो ख़ुद के द्वारा दिये जानेवाला ‘दाना’ बंद कर दिया, अब ‘टीआरपी’ से बाहर से मिलनेवाला ‘खाना’ भी बंद कर दिया, आख़िर अपनों पर ये सितम क्यों?

सच तो ये है कि भाजपा सरकार की नाकामी की वजह से पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर जा चुके इन बिगड़े हालातों में चाहकर भी आस्तीनी मीडिया सत्ता का ‘स्तुति गान’ नहीं कर पा रहा है, इसलिए मजबूरी के कारण कुछ न्यूज़ चैनल अंगड़ाई के बहाने पलट रहे हैं और कुछ करवट बदलने के बहाने हुक्मरानों से मुँह फेर ले रहे हैं। इसीलिए आदान-प्रदान और लेन-देन का कारोबारी रिश्ता अब एक-दूसरे के लिए बेमतलब-बेमानी हो गया है।

कुछ नामी चमचमाते चैनलों का सच तो ये है कि उनका मुनाफ़ा कुछ रीढ़दार भूतपूर्व पत्रकारों के निजी यूट्यूब चैनलों से भी कम है। जो सरकार पिछले दरवाज़े से लेटरल एंट्री की साज़िश रच रही थी, आज उसके ही राज में न्यूज़ चैनलों में पिछले दरवाज़े से बड़े पैमाने पर छँटनी हो रही है।

अब तो डर ये है कि कहीं न्यूज़ चैनल ही बीते कल की न्यूज़ न बन जाएं।


जो भारतीय पत्रकार इज़राइल में फँसे हैं वो प्रधानमंत्री जी के साथ गये तो ‘पॉलिटिकल जर्नलिस्ट’ की तरह थे पर अब वो ‘वॉर जर्नलिस्ट’ बनने पर मजबूर हैं। उनके परिजन और शुभचिंतक सभी बेहद चिंतित और परेशान हैं और भाजपा सरकार से नाराज़ भी। वो कह रहे हैं, जब साथ लेकर गये थे तो साथ लेकर आना भी चाहिए। ये कहाँ की नैतिकता है कि ख़ुद तो आ गये और युद्ध के भयावह हालातों में पत्रकारों को बेसहारा छोड़ आए।

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