Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सियासत

ट्रंप चचा ने दुनिया के पूंजीवाद की दोनों धमनियां काट दीं

सुभाष सिंह सुमन-

पूंजीवाद ने दुनिया को जो सबसे अच्छी चीज दी, वो है वैश्वीकरण. वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण ही पूंजीवाद की धमनियां हैं. ट्रंप चचा ने इन धमनियों को ही काट दिया है. वो भी अपने हिस्से की. सरल शब्दों में कहें तो ट्रंप के अमेरिका ने ताजा टैरिफ लगाकर खुद ही अपनी नसें काट ली हैं और धीमी मौत की राह पर चल पड़ा है.

अमेरिका पूंजीवाद की वैश्विक राजधानी है. और अमेरिका ही पाश्चात्य सभ्यता का झंडाबरदार भी. पाश्चात्य सभ्यता का उत्कर्ष बहुत पुराना नहीं है. इस कारण इस सभ्यता के उत्कर्ष के सारे सबूत साबुत बचे हुए हैं. इतिहास में खोजिएगा तो पाश्चात्य सभ्यता का उत्कर्ष शुरू होता है अटलांटिक ट्रेड शिफ्ट से. यही औद्योगिकरण का कारण था और यही औपनिवेशिकरण का भी कारण था. इसी कारण अमेरिका ब्रिटेन की कॉलोनी बना. इसी के चलते अमेरिका से अमेरिका के मूलनिवासियों का लगभग सफाया हो गया. इसी ट्रेड शिफ्ट ने अमेरिका को आधुनिक दुनिया में लैंड ऑफ फ्री पीपुल बनाया.

अटलांटिक ट्रेड शिफ्ट की वजहें भी दिलचस्प हैं. अभी ज्यादा डीप में नहीं जाएंगे. ऊपर से ये जान लीजिए कि व्यापार और मानव श्रम, ये दो बड़ी वजहें हैं, जिनके चलते दुनिया अपने मौजूदा स्वरूप में है. पाश्चात्य सभ्यता ने सस्ते श्रम और अपने माल के लिए बाजार खोजने की होड़ में विकास किया. पिछली सदी की शुरुआत में इन दोनों काम का झंडा ब्रिटेन से अमेरिका के पास चला गया. अमेरिका ने एक बार 1928 में इसी तरह का प्रयास किया. प्रथम विश्व युद्ध के बाद आर्थिक स्थितियां सामान्य नहीं थीं. अमेरिका ने संरक्षणवादी कदम उठाया. परिणाम इंसानी सभ्यता के रिकॉर्डेड इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक तबाही आई. सबसे ज्यादा झेला भी अमेरिका ने ही उसे.

अभी जो काम ट्रंप कर रहे हैं या कर चुके हैं, यही काम तब भी हुआ था. अमेरिका ने दूसरे देशों के सामानों पर बहुत ज्यादा टैरिफ लगा दिया. इस बार ट्रंप चचा एक कदम और आगे निकल गए हैं. सस्ते श्रम को भी खुद ही अमेरिका से भगा रहे हैं. अब ट्रंप के हिसाब से सबसे अनुकूल स्थिति हो जाए, जो संभव नहीं है, फिर भी कंपनियां अमेरिका में फैक्ट्री नहीं लगा सकती हैं, क्योंकि वहां लागत बहुत ज्यादा है. सबसे ज्यादा लागत मानव संसाधन की ही है.

इसको और अच्छे से एक उदाहरण से समझ सकते हैं. जो सामान चीन में 100 डॉलर में बन रहा है, वही सामान अमेरिका में बनाने पर खर्च 200 डॉलर हो जा रहा है. अब चीन पर 56% टैरिफ जोड़ दें तो चीन में बना 100 डॉलर वाला सामान अमेरिका में 156 डॉलर का पड़ेगा, लेकिन वहां बनाने पर 200 डॉलर का. शायद ही कोई कंपनी 44 डॉलर का नुकसान उठाने वाली मूर्खता करेगी.

ट्रंप चचा को अगर टैरिफबाजी करने का मन था, तो उन्हें पूंजीवाद के पुराने मसीहों से सीखना चाहिए था, जिन्होंने अपने यहां फैक्ट्रियां तो लगाईं, लेकिन सस्ता श्रम जुटाने के लिए दासों का व्यापार तक किया. अब दासों का व्यापार करने की जरूरत नहीं है. खुद ही सस्ता श्रम आपके यहां पहुंच रहा है. लेकिन आप पहले ही उसे भगाने का अभियान शुरू किए हुए हैं.

कुल मिलाकर बात ये निकलती है कि ट्रंप चचा अगले कुछ महीने में या तो अपनी उल्टी खुद से साफ करेंगे, या फिर अमेरिका आधुनिक आर्थिक इतिहास में नया जापान बनेगा.

रही भारत की बात, तो भारत के लिए इस टैरिफ से डरने वाली या घबराने वाली बात कभी थी ही नहीं. 26% की जगह अगर 52% भी टैरिफ होता, तो भी अर्थव्यवस्था पर 1% से कम फर्क पड़ता. लॉन्ग टर्म में (ज्यादा नहीं 2 से 3 साल में ही) इस 1% नुकसान की भरपाई भी हो जाती. इसी कारण भारत के नजरिए से मैं ट्रंप टैरिफ को लेकर कभी चिंतित नहीं हुआ. मुझे बस अपनी सरकार के रवैये से हैरानी हुई. मोदी सरकार ने क्या गणित सोचकर आत्मसमर्पण किया, ये मुझे अभी तक समझ नहीं आया. हो सकता है, कुछ रहस्यमई तथ्य है, जो मुझसे अबतक छूट रहा है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन