चंद्र भूषण-
दुनिया भर के शेयर बाजारों में रक्तपात मचा हुआ है। 7 अप्रैल 2025, दिन सोमवार को ऐसे हर बाजार में, जहां शेयर खरीदे-बेचे जाते हैं, 3 प्रतिशत से लेकर 13 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई। जापान और दक्षिण कोरिया के बाजारों में सर्किट लगा। यानी एक सीमा से ज्यादा गिरावट पर खरीद-बिक्री का काम अपने आप बंद हो गया। भारत में बाजार पहले से ही काफी नीचे आया हुआ है, लिहाजा 3 फीसदी का झटका ही इसके हिस्से पड़ा है।
शेयर बाजार अनिश्चित जगह होते हैं और कुछ नौसिखुओं को छोड़कर बाकी लोग इसमें उतार-चढ़ाव के लिए तैयार होकर ही पैसे डालते हैं। इसलिए उन ज्ञानियों को अभी बैठे रहने दें, जो बता रहे हैं कि बाजार गिरने से इतनी दौलत स्वाहा हो गई। असल चिंता दूसरी है। एक खास तारीख में बाजार गिरने से ज्यादा ध्यान इसके और ज्यादा गिरने और देर तक गिरे रह जाने की आशंका पर दिया जाना चाहिए।
एक अर्से से भारतीय बाजारों को लेकर समझ यह बनी हुई है कि गिरावट आए तो खरीदने पर जोर रहे। अतीत में यह समझ सही साबित होती आई है और यहां यह कहने का प्रयास नहीं किया जा रहा है कि आगे यह गलत साबित होने जा रही है। कहना सिर्फ यह है कि कीमतें खरीदारी के लिहाज से अच्छी होने के बावजूद बाजार में किसी बड़े कमिटमेंट का समय यह नहीं है।
इस गिरावट को पीछे की तीन बड़ी ग्लोबल गिरावटों- ब्लैक मंडे, यानी 19 अक्टूबर 1987, 2008 की मंदी में सितंबर की तीन तारीखों और 20 फरवरी 2020 से 16 मार्च 2020 तक जारी कोरोना सेल-ऑफ से तोला जा रहा है। हालांकि ऐसा कहने में थोड़ी जल्दबाजी की जा रही है। शेयर बाजारों की मौजूदा गिरावट अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा रेसिप्रोकल टैरिफ (कोई देश अमेरिकी सामानों पर जितनी इंपोर्ट ड्यूटी लगाता है, उसके सामानों पर अमेरिका की ओर से भी उसी हिसाब से आयात कर लगाने) की घोषणा का नतीजा है। यह सरकारी पहल है, ऊपर बताई गई तीनों ऐतिहासिक गिरावटों की तरह किसी अपरिहार्य प्रक्रिया का परिणाम नहीं है।
ध्यान रहे, 1987 का ब्लैक मंडे अमेरिकी शेयर बाजारों के लगातार सात साल तक चढ़ते जाने का नतीजा था और उसकी तात्कालिक वजह यह थी कि दुनिया के मुद्रा बाजारों का समायोजन लगातार नाकारा साबित हो रहा था। इस बड़ी गिरावट के बाद बाजार धीरे-धीरे करके इससे उबर भी आए। इसके उलट, 2008 और 2020 की गिरावटें अमेरिकी वित्त ढांचे के ढहने और सदी में बमुश्किल एक बार आने वाली महामारी का नतीजा थीं।
एक झटके में नीचे आने के बाद क्रमशः ऊपर जाने जैसा मामला उनके साथ नहीं जुड़ा था। उनसे उबरने के लिए वैश्विक सहभागिता की जरूरत पड़ी और बाजारों के पुरानी स्थिति में वापस लौटने में काफी वक्त लगा। देखने की बात यह है कि इस बार की गिरावट का स्वरूप क्या बनता है। बाजार राष्ट्रपति ट्रंप की एक घोषित व्यापारिक रणनीति के तहत गिरे हैं। उनसे इसके बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा भी कि वे किसी चीज में गिरावट नहीं चाहते लेकिन बीमारी के इलाज के लिए कड़वी दवा भी कभी-कभी खानी पड़ती है। यानी गिरावट एक कड़वी दवा है, तमाम देशों ने इसके असर में अपने ट्रेड बैरियर हटा लिए तो इलाज हो जाएगा।
एक बात फिलहाल तय जान पड़ती है कि शेयर बाजारों को ढहता देखकर ट्रंप अपनी नीति नहीं बदलने वाले हैं। सच या झूठ, मगर अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड ल्युटनिक का कहना है कि 50 देशों ने अमेरिकी सामानों को लेकर अपने आयात करों में कटौती करने के संकेत दिए हैं और उनकी ओर से इस बारे में बातचीत शुरू भी की जा चुकी है। भारत ने इस बारे में शुरू से ही नरम रुख अपना रखा है, हालांकि अमेरिका को होने वाला कुल निर्यात भारतीय जीडीपी के 2 फीसदी से ज्यादा नहीं है। वार्ता में थोड़ी देर भी हुई तो हम पर कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा।
मामले का दूसरा पहलू यह है कि चीन और यूरोपियन यूनियन जैसी कुछ व्यापारिक महाशक्तियां इसे अमेरिका की जबरदस्ती की तरह देख रही हैं और अपनी पहली प्रतिक्रिया उन्होंने टैरिफ की जवाबी वृद्धि के प्रस्ताव के रूप में दिखाई है। अमेरिकी जीडीपी दुनिया का एक चौथाई है तो चीन और यूरोपियन यूनियन मिलाकर इसका 35 प्रतिशत बनाते हैं। जाहिर है, बांह उमेठने की अमेरिकी योजना आसानी से अपने अंजाम तक नहीं पहुंचने वाली।
डॉनल्ड ट्रंप अमेरिकी सामानों पर लगाई गई ऊंची चुंगियों को अमेरिका के खिलाफ एक साजिश की तरह पेश करते आ रहे हैं। लेकिन ग्लोबलाइजेशन की शुरुआत में यह अमेरिकी अर्थशास्त्रियों की ही समझ थी कि अमेरिका की पूंजी बाहरी बाजारों में अपनी बेहतर टेक्नॉलजी के बल पर सस्ता सामान बेचने के बजाय इन बाजारों से मुनाफा और रॉयल्टी के अलावा इनके पूंजी बाजारों से भी तिहरी कमाई कर सकती है।
अभी दुनिया की पिछड़ी से पिछड़ी अर्थव्यवस्था में भी अमेरिकी पूंजी इन तीनों तरीकों से कमा रही है और ऊंची चुंगियों के रूप में इन बाजारों को दिया गया संरक्षण घुमा-फिराकर उसके भी काम आ रहा है। यह और बात है कि इससे अमेरिकी कारखानों को, वहां मिलने वाले कम कुशल रोजगार को नुकसान हुआ है और पूंजी निवेश से ज्यादा सामान बेचकर कमाने की ट्रंपनीति इस हिस्से को लुभा रही है।
इस पृष्ठभूमि में असल खतरा शेयर बाजार की एक-दो बड़ी गिरावटों से नहीं है। खतरा यहां है कि चीन और यूरोपियन यूनियन अगर अड़ गए और ऐसा ही कटुतापूर्ण व्यापारिक परिवेश दुनिया में लंबा खिंच गया, तो पत्ते पर अटके कमाई के बहुत सारे जरिये मटियामेट हो जाएंगे।
जापान के बैंकिंग इंडेक्स में सीधे 17 प्रतिशत गिरावट का एक मतलब है और इसमें भारत के लिए भी कुछ संकेत हैं। यहां छोटे-मंझोले कारोबारों में लगी हुई लाखों करोड़ की पूंजी पहले ही आशंकाओं से घिरी है। माइक्रोफाइनेंस में साढ़े तीन प्रतिशत डिफॉल्ट की खबर अभी कुछ दिन पहले आई थी। किसी बड़ी अनिश्चितता से इसमें भारी नुकसान हो सकता है।
ध्यान रहे, सरकारें अपना खजाना कोरोना से उबरने में ही खाली कर चुकी हैं और मदद का बड़ा हिस्सा पिछले तीन वर्षों से शेयर बाजार चढ़ाने में काम आ रहा है। बाजारों का गिरना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन यह लंबा खिंच गया तो संकट जैसी शक्ल भी ले सकता है।
(संपादित रूप में यह लेख आज के नवभारत टाइम्स में प्रकाशित है।)


