अमित गुप्ता-
टीवी 9 भारतवर्ष डिजिटल में तीन साल १ महीने और ६ दिन पहले जिस सफ़र की शुरुआत की थी, आज वो थम रहा है। इस सफ़र के दौरान तमाम खट्टी – मीठी यादें, अनुभव और बेहतर इंसान बनने की सीख लेकर जा रहा हूं। या यूं कहूं पहले से बेहतर इंसान बनकर जा रहा हूं।
इन तीन सालों के दरमियान तमाम जिम्मेदारियां, चुनौतियां और लक्ष्य हासिल किए। कोशिश रही कि सब में खरा उतरने की, अब वो कोशिशें कितनी कामयाब रहीं, इसका फैसला आप लोगों पर छोड़ता हूं। लेकिन एक बात दावे के साथ जरूर कह सकता हूं कि मेरे काम में बड़ी गलतियां (ब्लंडर्स) नहीं हुईं। जिनकी वजह से संस्थान को किसी भी तरह का आर्थिक नुकसान हुआ हो या फिर प्रतिष्ठा धूमिल हुई हो।
चूंकि इससे पहले मुझे यूट्यूब जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का अनुभव नहीं था लेकिन मैंने इसे भी चुनौती की तरह लिया और इस काम की बारीकियां सीखी। बतौर प्रोड्यूसर स्क्रिप्टिंग तो मेरा काम था ही लेकिन अपलोडिंग से लेकर, थंब और एडिटिंग जैसी बाकी चीजें भी काफी अहम थीं। हां, वॉयस ओवर और एंकर में हाथ तंग रहा। लेकिन जिन साथियों ने मेरी स्क्रिप्ट के वॉयस ओवर और एंकर्स किए उनका एक बार फिर तहे दिल से शुक्रिया। इस संस्थान में हर किसी साथी से कुछ ना कुछ सीखने को मिला। जिन्होंने मुझसे कुछ सीखना चाहा उन्हें सिखाया भी।
ये बताने की जरूरत नहीं है कि मेरे कई वीडियोज ने अच्छा परफॉर्म किया, अभी तक ४० मिलियन का आंकड़ा चैनल के किसी भी वीडियो ने नहीं छुआ है। लेकिन कोफ्त होती है जब आपकी काबिलियत को नजरंदाज कर दिया जाता है। आपको तारीफ के चंद लफ्ज़ तक नहीं मिलते। रिवॉर्ड और बाकी चीजें तो दूर की बात हैं। सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है, जब चंद लोगों की व्यक्तिगत धारणाएं आपकी मेहनत और लगन पर बीस साबित होती हैं। ऐसे सूरत में आपका हौसला टूटता है।
बहरहाल, संस्थान इसे शिकायत या उलाहना के तौर पर ना ले क्योंकि ये हर उस एम्प्लॉय की शिकायत है जिसे उसके बेहतर काम के लिए तवज्जो नहीं मिलती। मेरे मन में भी ये बातें थीं जो मुझे कहनी थीं। अब अगर संस्थान छोड़ते वक्त भी नहीं कह पाया, तो ये बातें मेरे अंदर शोर करेंगी। इसलिए नया संस्थान ज्वाइन करने से पहले मन का बोझ हलका करना ही उचित है।
बहरहाल, आप सभी के साथ ये सफ़र बेहतरीन रहा। इस दौरान कई सहकर्मी ऐसे भी मिले जिनसे आत्मिक लगाव हुआ, वो सहकर्मी कम बड़े भाई या दोस्त ज्यादा बन गए। मैं यहां उनका नाम लिखकर उन्हें असहज नहीं करना चाहता। लेकिन ये वो चंद लोग हैं जिनके साथ मैंने लंच बॉक्स और चाय काफी से लेकर जिंदगी की उलझनें, खुशियां और गम साझा किए। भले ही हमारे बीच छोटे-मोटे मनमुटाव हुए हों लेकिन सब वक्त के साथ सुलझते रहे। बस, ऐसे ही दोस्तों के साथ बिताए उन तमाम अच्छे पलों की बटोरकर साथ ले जा रहा हूं ताकि जब भी टीवी 9 डिजिटल की बात हो इन किरदारों का जिक्र जरूर हो।
अमूमन मैं हर किसी के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता और जिसके साथ बैठता है तो बदकिस्मती से उसका साथ छोड़ना पड़ जाता है। पुरानी चीजों से आप में से तमाम लोगों को लगाव होता होगा, लेकिन मुझे नॉस्टेलजिया है। मैं अपनी पुरानी यादें और चीजें आसानी से छोड़ा नहीं पाता, लेकिन जिंदगी का उसूल है आपको कई बार अपनी सबसे प्यारी चीजें भी कुर्बान करती होती हैं। फिर चाहे वो रिश्ते हों या फिर किसी का साथ…
खैर… ये मई का महीना है और मई का ये महीना मेरे जीवन में कई तरह के बदलाव लेकर आया है। ना केवल संस्थागत रूप से बल्कि व्यक्तिगत तौर पर भी। काफी सोच-समझ कर और गहन चिंतन-मंथन के बाद मैंने वक्त की धारा के साथ बहने का फैसला लिया है।
इस संसार का शाश्वत नियम है कि समय का पहिया किसी के लिए नहीं ठहरता, तो एक जगह ठहरकर मुझे भी इसके अनवरत घूमने के चक्र में अड़चन नहीं बनना चाहिए. धरती गोल हो या ना हो, लेकिन एक बात दावे के साथ कह सकता हूं, कि मीडिया की दुनिया जरूर गोल है। इसलिए फिर मिलेंगे जिंदगी के किसी पड़ाव पर, किसी संस्थान में। तब तक के लिए अलविदा साथियों..!


