लंबे समय के जद्दोजहद के बाद उपेंद्र राय ने इस्तीफा दे दिया. बात वही थी. सुब्रत राय फंड रिलीज नहीं कर रहे थे और कर्मचारियों की सेलरी की डिमांड बढ़ती जा रही थी. ऐसे में उपेंद्र राय भाग गया. ग्रुप एडिटर इन चीफ और ग्रुप सीईओ के दोनों पदों से इस्तीफा दे दिया है. सहारा के उच्च पदों पर आसीन लोगों ने इस खबर को कनफर्म किया है. यह भी बताया जा रहा है कि अभिजीत सरकार को अब सहारा मीडियाा की भी पूरी जिम्मेदारी दे दी गई है.
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arun
April 30, 2016 at 6:50 am
सहारा मीडिया से बडी खबर। सहारा मीडिया कर्मियों में यह आग जंगल की तरह फैल गई कि उनके विभागीय हेड उपेंद्र राय ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। यह निर्णय उन्होंने तिहाड़ जेल में सहारा प्रमुख सुब्रतो राय से मुलाकात करने के बाद लिया। गौरतलब है कि सहारा मीडिया कई माह से वित्तीय संकट से जूझ रहा है ऐसे में प्रबंधन कई माह से वेतन नहीं दे रहा है, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कर्मचारियों ने कई बार काम रोका, अखबार का प्रकाशन कई दिनों तक बाधित रहा, गत सप्ताह भी लखनऊ में अखबार के कर्मचारियों ने हडताल की थी। हडताल तुडवाने के लिए प्रबंधन ने २८ अप्रैल को वेतन देने का वादा किया था। बताया जाता है कि इसी सिलसिले में उपेन्द्र सुब्रतो राय से मिलने गए थे। सहारा प्रमुख अपने स्रोतों से फंड की व्यवस्था करने पर अडे रहे इस पर उपेन्द्र ने हाथ खडे कर दिये।
BE-Sahara
April 30, 2016 at 4:22 pm
दिनांक 28 अप्रैल 2016 को सहारा मीडिया इंडिया में कार्यरत कर्मचारियों ने प्रबंधन को अपनी मांगों को लेकर एक पत्र दिया था, जिसमें वेतन संबंधी मांगें न माने जाने पर राष्ट्रीय सहारा (हिंदी दैनिक) व रोजनामा राष्ट्रीय सहारा (उर्दू) का 30 अप्रैल 2016 से अगले सात दिनों के लिए मास्टर एडिशन निकालने का निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया था।
सहारा मीडिया के कर्मचारियों ने वेतन संबंधी सभी मांगों को ठोस आधार प्रदान करने के लिए आज यानि 30 अप्रैल 2016 से अगले सात दिन तक के लिए मास्टर एडीशन निकालने का कार्य शुरू कर दिया है। राष्ट्रीय सहारा (हिंदी दैनिक) व रोजनामा राष्ट्रीय सहारा (उर्दू) का मास्टर एडिशन विज्ञापनों को ध्या।न में रखते हुए आवश्य कतानुसार कम से कम 14 पेज और अधिकतम 16 पेज का होगा।
कर्मचारियों की मांग है कि मार्च व अप्रैल माह 2016 की सैलेरी उन्हें आगामी सात दिनों के अंदर मिल जाए। इसके अलावा कर्मचारीगणों की यह मांग भी है कि उनकी विकट सामाजिक व घरेलू समस्यारओं को ध्याान में रखकर उनका अब तक का बकाया वेतन (बैकलॉग) का पोस्ट डेटेड चेक (पीडीसी) भी इन्हीं सात दिनों के भीतर उन्हें मिल जाए। उपरोक्ता मांगें पूरी न होने की स्थिति में कर्मचारी छह मई 2016 को अपने अगले कदम के बारे में सर्वसम्मति से निर्णय लेंगे।
kabeer
May 1, 2016 at 6:29 am
[b]अंधा बांटे रेवड़ी, अपने-अपने को दे[/b]
सहारा मीडिया में आजकल यही चल रहा है। कि अंधा बांटे रेवड़ी अपने-अपने को दे। उपेन्द्र राय भी किसी से कम नहीं हैं। उन्होंने भी अपने सहारा राज में अधिकारियों या यों कह सकते हैं कि अपने चमचों को खूब रेवडी बांटी हैं।
arun
May 1, 2016 at 5:15 pm
उपेंद्र राय के लिए खुला प्रस्ताव… उपेन्द्र राय (नाम के आगे आदरसूचक शब्द श्री लगाने के लिए मैं बाध्य नहीं हूं क्योंकि अब सहाराकर्मी नहीं रहा शिष्टाचार के नाते भी नहीं कि वे कभी शिष्ट रहे नहीं) ने इस्तीफा दिया या उनसे लिया गया फिलहाल इसे बहस या विवाद का मुद्दा नहीं बनाना चाहता। सिर्फ उन्हें एक सलाह देना चाहता हूं वो भी बिल्कुल मुफ्त की। फिर आज मेरी और उपेन्द्र की स्थिति एक जैसी है। वो भी सहारा में नहीं हैं और मैं भी । यानी मैं और उपेंद्र चोर चोर मौसेरे भाई हुए। आज हम दोनों सडक पर हैं। अब यह अलग बात है कि मुझे उनके ही कार्यकाल में मुझे २४ साल की नियमित सेवा के सडक पल लाया गया। एक कहावत है कि ” घायल की गति घायल जाने” इसलिए भी मुझे उपेंद्र से हमदर्दी है। फिर काफी समय तक राष्ट्रीय सहारा लखनऊ में मैं था और उन्होंने वहीं से अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की थी। हर नए लडके की तरह उनमें भी स्थापित होने की छटपटाहट थी। स्थापित होने के लिए वे उसी तरह हाथ पांव मार रहे थे जैसे कोई डूबता हुआ व्यक्ति किनारे आने के लिए हाथ पांव मारता है, प्रसंगवश उनको स्थापित करने में सर्वश्री हेमंत शुक्ल, योगेश मिश्रा और राजेंद्र द्विवेदी का बहुत बडा योगदान रहा है। उनको स्थापित करने/ कराने में मेरा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में कोई योगदान नहीं रहा है। बस कभी एक सहकर्मी रहने के नाते ही यह सलाह है। सलाह यह है कि वे सारे किंतु परंतु को ताक पर रखकर अपने हक की लडाई लडें, वे नियमित कर्मचारी हैं और काफी पुराने भी। आखिर किसी भी कर्मचारी को कोई संस्थान हटा कैसे सकता है या इस्तीफा देने को कैसे कह सकता है? अखबार है कोई खाला जी का घर तो है नहीं ” मालिक कह दे कि भैया अब आप इस्तीफा दे दो”। क्यों दे दें ? फिर किसी को भी इस्तीफा देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। हाँ अगर उन्होंने अति उत्साह में भावुकता में या नैतिकता से प्रेरित होकर अपना इस्तीफा दिया हो तो भी वे कानून की शरण में जा सकते हैं । वे कानूनन के दायरे में रहते हुए भी कह सकते हैं कि ” उनसे दबाव में इस्तीफा लिखवाया गया। अब पुलिस की पिटाई के बाद अपराधी अपना जुर्म कबूल करता है लेकिन अदालत में अपने बयान से मुकर जाता है तो उपेंद्र भाई कोई अपराधी हैं क्या? मैं उपेन्द्र भाई को अपराधी नहीं मानता बावजूद इसके कि उनके कार्यकाल में ही मैं २४ साल की नियमित सेवा के बाद बिना आरोप के बिना जांच के निकाल दिया गया। अब बात मुद्दे की। उपेंद्र जी के लिए प्रस्ताव है अब वे आंदोलनकारियों के पाले में आयें और उनके हक की लडाई में शामिल हों। आखिरकार उन्हें भी उन्हें भी तो महीनों से पगार नहीं मिली होगी, उनका भी तो डीए दो तीन साल से शून्य होगा। उनका भी पीएफ का शेयर मालिकानों ने जमा नहीं किया होगा। रही बात आंदोलनकारियों और निकले गए कर्मचारियों के गुस्से कि तो सरकारी गवाह बन जाने पर सरकार का रवैया भी लचीला हो जाता है सो कर्मचारी भी आपके सारे गुनाह माफ कर देंगे फिर आप कोई स्वतंत्र मिश्र तो हुए नहीं।
आपका
शुभचिंतक
अरुण
राष्ट्रीय सहारा से निकाला गया कर्मचारी