उन्नाव। कभी कलम के धनी माने जाने वाले पत्रकार खुद ही पत्रकारिता की बैंड बजाने पर तुले हुए हैं। इनमें कुछ उठाईगीरे किस्म के लड़के जो पत्रकारिता का चोला तो ओढ़ लिए लेकिन उनकी “पत्रकार-गिरी” असल में होती कुछ और है। ताज़ा मामला उन्नाव से है, जहां दो पत्रकारों की बातचीत इतनी ‘संस्कारी’ है कि सोशल मीडिया पर लोग गालियों की वैरायटी सुनकर धन्य-धन्य हैं।
भड़ास को मिले इनपुट के मुताबिक, अंशू गुप्ता नामक एक हिस्ट्रीशीटर पर एसपी दीपक भूकर ने शिकंजा कस दिया। इसके बाद असली बवाल पुलिस और गुंडे के बीच नहीं, पत्रकारों के बीच मच गया है। एक तरफ वे पत्रकार हैं जो पुलिसिया कार्रवाई की ख़बरें चला रहे हैं, दूसरी तरफ वो पत्रकार हैं जो कथित तौर पर अंशू गुप्ता पर पत्रकारिता का हाथ रखकर सुरक्षा में लगे हैं।
इसमें सबसे दिलचस्प मोड़ आया जब प्रेस क्लब अध्यक्ष धर्मेंद्र मिश्रा (ब्यूरो चीफ, जनसंदेश) और जय सिंह (विधान केसरी के ब्यूरो चीफ) के बीच संवाद हुआ—संवाद नहीं, ‘संघर्ष संवाद’। इस संघर्ष में भाषा ने असली बलिदान दिया। एक-दूसरे की मां-बहन से लेकर सोशल मीडिया तक, सबको घसीट लिया गया।
ऑडियो वायरल हो गया और पत्रकारिता शर्म से नहीं, गर्व से सिर झुकाए खड़ी है—क्योंकि ये वही पत्रकार हैं जो खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहते हैं और अब दीवार पर गालियों की रंगोली बनाकर बैठे हैं।
जय सिंह के खिलाफ पहले से कई केस हैं, लेकिन अब वो ‘दबंग पत्रकार’ कहलाते हैं—संभवतः सलमान खान को कॉपीराइट का नोटिस भेजना पड़ेगा! दूसरी ओर, धर्मेंद्र मिश्रा भी प्रेस क्लब की कुर्सी पर बैठकर कोई रवीश कुमार नहीं बन पाए, बस कुर्सी को ही ‘संघर्ष स्थल’ बना बैठे हैं।
सवाल ये नहीं है कि कौन सही है, सवाल ये है कि पत्रकारिता कहां है? जब संवाददाता धमकीबाज़ बन जाए और ब्यूरो चीफ ‘ब्यौरों’ के बजाय ‘बदज़ुबानों’ का जखीरा लिए घूमें, तो जनता किस पर भरोसा करे?
उन्नाव की इस घटना ने साफ कर दिया है कि पत्रकारिता अब मिशन नहीं, कमीशन और पोजीशन का खेल बन चुकी है। कलम नहीं चलती अब—कॉल रिकॉर्डिंग वायरल होती है।
नोट – उन्नाव के पत्रकारों द्वारा भड़ास को मिले इनपुट के आधार पर। यदि किसी को अपना पक्ष या अपनी बात कहनी बतानी हो तो- [email protected] पर मेल कर सकते हैं।


