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सुख-दुख

यूपी में सूचना विभाग पानी की तरह बहा रहा है पैसा, चैनल मालिक नहीं देते संवाददाताओं को उचित सेलरी!

आनंद मिश्रा-

पत्रकारिता को अगर जिंदा रखना है तो सूचना विभाग से करोड़ों का माल जो हर महीने चैनल मलिक पी रहे हैं वह सही जगह पहुंचना आवश्यक है। चैनल मालिक जब तक जिले में संवाददाताओं को उचित सैलरी नहीं देंगे तब तक पत्रकारिता का कुछ नहीं हो सकता। लाखों करोड़ों रुपए हर महीने सूचना विभाग चैनल मालिकों को दे रहा है। पानी की तरह बहाया जा रहा है पैसा विज्ञापन के नाम पर…

सरकार को चाहिए कि इसकी जांच की जाए कि सूचना विभाग जो पैसा चैनलों को दे रहा है वह कहां जा रहा है। सूचना विभाग पानी की तरह पैसे टीवी चैनलों पर बहा रहा है। ना कोई जांच है ना कोई पड़ताल और चैनल मलिक बैठकर इस पैसे पर मौज मार रहे हैं। नौजवानों का भविष्य खराब कर रहे हैं ना तो उनको पैसे दे रहे हैं ना सही से महीने की सैलरी जिले में पत्रकारों की स्थिति बहुत खराब है।

लोग मानसिक पीड़ा के तहत काम कर रहे हैं और अपनी जान तक गंवा रहे हैं सरकार को चाहिए कि जो पैसा सूचना विभाग के द्वारा चैनलों को दिया जा रहा है उनका क्या किया जा रहा है लेबर विभाग पता करें कि क्या चैनल में काम करने वाले लोगों को उचित सैलरी दी जा रही है या नहीं तभी जाकर वास्तविक पत्रकारिता हो पाएगी अन्यथा दलाली वसूली रंगदारी में पत्रकारिता जिले में जिंदा हो रही है।

प्रदेश में पत्रकारिता एकदम तबाही की कगार पर है जिले के पत्रकार दलाली घूसखोरी और रंगदारी की तरफ अग्रसर हैं, जिला पत्रकारिता एकदम बर्बाद हो चुकी है जिले में ईमानदार पत्रकार खोजने पर भी नहीं मिल रहे हैं जिले में कुछ इमानदार पत्रकार हैं भी तो उनको दरकिनार कर दिया गया है यह सब मात्र प्रदेश सरकार की बेरुखी से उत्पन्न हुआ है।

देश का महत्वपूर्ण स्तंभ मीडिया जो बेसहारा बेरोजगारों गरीबों की आवाज हुआ करता था आज वह एक बेरहमी के साथ तबाह किया जा रहा है। प्रदेश सरकार का सूचना विभाग हर चैनल को हर महीने में एक राशि देता है चैनल को चलाने के लिए विज्ञापन को चलाने के लिए सरकार को दिखाने के लिए यह एक सरकार में नहीं हर सरकार में पैसा चैनलों को दिया जाता है। चैनल मलिक सारा पैसा डकार जाते हैं और जिले में बैठे पत्रकारों को एक चवन्नी भी नहीं दी जाती ना तो कोई सैलरी है और ना ही कोई मेहनताना।

पहले तो कुछ चैनल जिले में पैसे देते भी थे लेकिन अब तो वह भी बंद हो गया है तो जिला पत्रकारिता क्या करें। दलाली करें घूसखोरी करें अधिकारियों की चापलूसी करें या रंगदारी करें क्या करें सरकार को चाहिए कि जो पैसे सरकार चैनल के मालिक को हर महीने सूचना विभाग द्वारा दिया जा रहा है उसको पूछे कि वह उस पैसे को कहां खर्च कर रहे हैं किसको दे रहे हैं।। जिले में अपने पत्रकार को मालिक क्या दे रहा है और कैसे पता करता कर रहा है प्रदेश का लेबर विभाग पूरी तरीके से सोया हुआ है सब अधिकारी मौज मार रहे हैं।

जब तक सूचना विभाग के पैसे से, सरकार के पैसे से जिले में बैठे पत्रकारों को सैलरी नहीं दी जाएगी तब तक आप पत्रकारिता से भ्रष्टाचार को नहीं मिटा सकते हैं। दिनभर जिले का पत्रकार निकल कर 50 किलोमीटर टहलकर चैनल को खबरें उपलब्ध कराता है। वह यह सब कैसे कर रहा है, भगवान ही मालिक है। लेकिन चैनल मालिक एक चवन्नी भी जिला पत्रकार को देने को राजी नहीं है। लेबर विभाग सूचना विभाग और सरकार में बैठे ऊपर के अधिकारियों को चाहिए कि पत्रकारिता के भ्रष्टाचार को भी खत्म करें और जिला संवाददाताओं को जो पैसा सरकार दे रही है उसमें से कुछ हिस्सा अवश्य जिला पत्रकारों को दिलाने का कष्ट करें।

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