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आयोजन

499 रु देकर साहित्यकार उर्फी जावेद और रॉकस्टार पत्रकार सुधीर चौधरी को सुनने में क्या कष्ट है भाई?

गीता यथार्थ-

उर्फी जावेद सेलिब्रिटी है। एक्सेप्ट कीजिए। सेल्फ मेड है इसलिए मुझे पसंद भी है। लिट फेस्ट में जब अफसर, नेता और एक्टर/ एक्ट्रेस आते हैं तो उर्फी जावेद से नफरत क्यों??

कविश अज़ीज-

गाइज़, मशहूर साहित्यकार “ऊर्फी जावेद” साहित्य आज तक के मंच की शोभा बढ़ा रही हैं। हालांकि जब मुझे पता चला था की उर्फी साहित्य आज तक में आएगी तो मुझे लगा था कि वह सुमित्रानंदन पंत, मैथिली शरण गुप्त, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, रामधारी सिंह दिनकर की किताबों से डिजाइन किया हुआ ड्रेस पहन कर आएगी मगर उसने ऐसा नहीं किया. खैर हम जानना चाहते हैं की उर्फी ने साहित्य आज तक में किन बातों पर रोशनी डाली.


स्वतंत्र मिश्रा-

साहित्य के कार्यक्रम में 499 रूपये का टिकट लग रहा है!

मैंने नामवर सिंह, उदय प्रकाश, तुलसीराम, मैनेजर पाण्डेय, कांचा इलैया, वरवर राव, राजेंद्र यादव, पंकज विष्ट, शमशुल इस्लाम, विष्णु नागर, नासिरा शर्मा, राजेश जोशी, जावेद अख्तर, गुलजार जैसे साहित्य और सिनेमा के अनगिनत सितारों को पढ़ने के लिए उनकी किताबें खरीदी। उन्हें सुनने और समझने के लिए घंटों खर्च किए। पैसे खर्च किए। इन सितारों से कई बार मिला, संवाद किया पर कभी टिकट कटाकर नहीं।

अब टिकट लग रहा है तो समझिए कि वहां साहित्य नहीं साहित्य के नाम पर तमाशा ही होगा। तमाशा के लिए तमाशा क्यों?

विश्व पुस्तक मेला या किताबों के मेले को छोड़कर इस तरह के कार्यक्रमों में कभी दिलचस्पी मेरी बन ही नहीं पाई। जिन्हें पसंद हो जाएं , न पसंद हो न जाएं। अपन क्यों इस चार कौवों की काएं, काएं… में पड़ें।


पुनीत शुक्ला-

किसी साहित्य उत्सव में आमन्त्रित दो युवतियों को प्रबुद्ध वर्ग द्वारा ट्रोल करते हुए देख रहा हूँ। इस ट्रोल मुहिम में पुरुष-स्त्री दोनों शामिल हैं।

शायद ऐसे स्त्री-पुरुषों में कुछ ईर्ष्या या कोई ग्रन्थि होगी या खुद को स्तरीय और उनको स्तरहीन मानने का दम्भ होगा। पर यह अपनी परम्परा नहीं रही है।

अपनी परम्परा सुनने और संवाद की रही है। इसके अलावा न यह आधुनिक बात है और न लोकतान्त्रिक। ज़रूरी नहीं है कि सब कुछ आपके खाँचों और साँचों के हिसाब से फिट हो। दुनिया के वैविध्य का सम्मान करिए।

आयोजकों ने किसी भी कारण से बुलाया हो, पर जब बुलाया है तो सहजता से उनकी बात, उनके पक्ष और उनके विचारों को भी सुन लीजिये।

जब तक कोई हिंसक न हो तब तक उसकी पृष्ठभूमि, पेशा, नस्ल, धर्म, जाति, वेश-भूषा और जीवन शैली के बारे में बिना किसी पूर्वाग्रह के और बिना उसके बारे में निर्णयात्मक होते हुए उसको बात रखने का अवसर मिलना चाहिये।

अगर उनकी बातें बेकार और अनुपयोगी होंगी तो समय की धारा में स्वयं नष्ट हो जाएँगी।


बृजेश चौहान-

उर्फी जावेद, जो अपने बोल्ड फैशन और स्टाइल के लिए मशहूर हैं, इस बार ‘साहित्य आज तक 2024’ में भी चर्चा का विषय बनी हुई हैं। यह साहित्यिक मेला नई दिल्ली में 22 से 24 नवंबर तक आयोजित हो रहा है, जहाँ उर्फी जैसी हस्तियों को आमंत्रित करके साहित्य और कला प्रेमियों का ध्यान खींचा जा रहा है। साहित्य आज तक में शिरकत करने वाले वक्ताओं और कलाकारों में कवि, लेखक, और अभिनेता शामिल हैं, जो साहित्य, कला, और संस्कृति पर चर्चा करेंगे।

इससे पहले भी उर्फी जावेद ने अपने पहनावे और व्यक्तित्व को लेकर अक्सर चर्चा बटोरी है, और साहित्य आज तक जैसे मंच पर उनकी भागीदारी ने मीडिया का ध्यान खींचा है।

दो तीन दिनों से देख रहा हूँ। उर्फी के साहित्य आज तक में जाने को लेकर भसड़ मची हुई है। अरे यार ये सवाल तो मेजबान से पूछा जाना चाहिए, उर्फी को क्यों आमंत्रित किया।

और एक बात उर्फी क्या पहनती है क्या करती है ,ये उसकी जिंदगी है। उसके लिए उसके मां बाप परेशान नहीं हैं तो हमें भी परेशान होने की कोई जरूरत नहीं। और हां साहित्य आज तक के मंच पर वो खुद तो जा नहीं रही, मेजबान के बुलावे पर जा रही। तो सवाल तो बनता है पर उर्फी से नही, साहित्य आज तक के आयोजकों से।

उर्फी जावेद जावेद अख़्तर साब के साथ। फ़ोटो इंस्टाग्राम के सौजन्य से…


संदीप नाइक-

उर्फी का संकलन महान प्रकाशको के प्रकाशक जयपुर वाले से आ रहा है या बौद्धिक जगत के प्रकांड पण्डित पंचकूला वालों से या दिल्ली,गाज़ियाबाद से या ऑक्सफोर्ड, पेंग्युईन से बात हो गई है

हिंदी के सभी वरिष्ठ जन जा रहें है उर्फी की अध्यक्षता में कविता पढ़ने तो उस “अल्प सँख्यक कट्टरपंथी असामान्य अवयस्क कवि” को क्यों रौंदा इन लोगों ने पिछले बरस जिसकी तो उम्र ही है गुटखा खाकर थूक देने की है और जो प्यार में फ्रस्ट्रेट होकर उजबक हो गया है

हिंदी का कवि है ससुरा – विश्वरंग में भी जाएगा, गुटखा खाने भी, भड़भूँजे के यहाँ भी और भाजपा के रमणसिंह से भी पूरी बेशर्मी से पच्चीस हज़ार ले आयेगा

इंदौर से लेकर दिल्ली तक सब सेटिंग में लगें हैं – साहित्य उत्सवों के नाम पर मुजरों का दौर शुरू हो रहा है – कोई बुला लें, कोई नचवा लें, हम तो हम पूरा खानदान मारूति 800 में लदकर आ जायेंगे – आप तो हुकुम करो हुजूर

छलकाये जा, आपकी आँखों के नाम

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