योगी राज में वनाश्रितों और आदिवासियों की बेदखली की कार्यवाही जारी

चंदौली, सोनभद्र और मिर्जापुर उत्तर प्रदेश का आदिवासी बहुल क्षेत्र है। यह क्षेत्र प्रदेश का प्रमुख औद्योगिक केन्द्र भी है यहां हजारों की
संख्या में ठेका मजदूर है जिनके लिए लम्बे आंदोलन के बाद चेक से मजदूरी भुगतान करने का आदेश लागू कराया गया था आज योगी
सरकार बनने के बाद अनपरा जैसे प्रमुख बिजली उत्पादन गृह में ठेका मजदूरों को पांच-पांच माह से वेतन का भुगतान नहीं हो रहा है।

इस क्षेत्र में आज भी हर वर्ष दर्जनों बच्चे जहरीले पानी से मर जाते है। महिलाएं, बच्चे और बूढ़े कुपोषण का शिकार रहते है। इस क्षेत्र
में लाखों की संख्या में रहने वाली कोल आदिवासी जाति को आज तक आदिवासी का दर्जा तक नहीं मिला जिससे यह वनाधिकार
कानून के तहत अपनी पुश्तैनी जमीन पर अधिकार पाने से वंचित हो गए। जिन लोगों को आदिवासी का दर्जा भी मिला भी उनके भी दावे
विधिक प्रमाण होने के बावजूद बड़े पैमाने पर खरिज कर दिए गए। योगी सरकार बनने के बाद इस क्षेत्र में लगातार वन विभाग और
प्रशासन द्वारा पुश्तैनी जमीन पर रह रहे और कृषि कार्य कर रहे आदिवासियों व वनाश्रितों की बेदखली की कार्यवाही की जा रही है। इस
सम्बंध में अखिलेन्द्र जी द्वारा मुख्यमंत्री को जुलाई माह में पत्रक दिया था जिसमें खानापूर्ति कर वन विभाग ने बिना किसी जांच पड़ताल
के पत्रक को निक्षेप करने की आख्या शासन को भेज दी और इस आख्या के आधार पर मुख्यमंत्री कार्यालय ने पत्रक को निस्तारित कर
दिया। इसके विरूद्ध मुख्यमंत्री को प्रेषित पत्र आपके सम्मुख मूल रूप में प्रस्तुत है-

प्रति,
मुख्यमंत्री
उत्तर प्रदेश सरकार
लखनऊ।
विषय: लोक शिकायत संख्या 15157170394927 के संदर्भ में।
महोदय,
कृपया संलग्न पत्र पत्रांक संख्या 1845/26-25/2016-17 दिनांक 13 अक्टूबर 2017 कार्यालय प्रभागीय
वनाधिकारी, काशी वन्य जीव प्रभाग, राम नगर, वाराणसी का संदर्भ ग्रहण करें। यह पत्र अद्योहस्ताक्षरी द्वारा दिनांक 20/07/2017 को
आपको प्रेषित पत्र के उपरांत आपके कार्यालय के विशेष सचिव द्वारा दिनांक 5 अक्टूबर 2017 को लोक शिकायत संख्या
15157170394927 में अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव, वन विभाग को दिये निर्देश केे संदर्भ में प्रभागीय वनाधिकारी वाराणसी द्वारा
दिया गया है। संलग्न पत्र में यह कहना कि माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा याचिका संख्या 27063/2013 आदिवासी वनवासी
महासभा बनाम यूनियन आफ इंडिया द्वारा सचिव व 10 अन्य में पारित आदेश दिनांक 05.08.2013 के अनुपालन में नियमानुसार
त्रिस्तरीय समिति द्वारा प्रश्नगत दावों को अधिप्रमाणिकता का परीक्षण कर संबंधित दावेदारों को टाइटिल प्रदान किया गया है, सत्य से परे
है। यह एक औपचारिक कार्यवाही है जिसे वन विभाग ने पूरा किया है। पत्र यह नहीं बताता कि माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के
बाद चंदौली जनपद के नौगढ़ तहसील में वनाधिकार कानून के तहत प्राप्त कितने दावों को नियमानुसार निस्तारित किया गया और कितने
लोगों को टाइटिल प्रदान किये गये। अद्योहस्ताक्षरी द्वारा दिए पत्र में उल्लेखित गांवों मझंगाई, गोलाबाद, बोदलपुर, सुखदेवपुर, भैसोड़ा,
जयमोहनी आदि के सम्बंध में भी प्रभागीय वनाधिकारी द्वारा दिए प्रत्युत्तर में उच्च न्यायालय के आदेश के बाद निस्तारित दावों और
टाइटिल प्रदान किए गए दावों की कोई सूची नहीं दी गयी है। स्पष्ट है कि वन विभाग का कथन जमीनीस्तर पर तथ्यों के परीक्षण की
मांग करता है। दरअसल वन विभाग द्वारा शिकायत को निक्षेप किए जाने के लिए ही इस तरह के तथ्यों को गढ़ा गया है और इसलिए
हम उसकी आख्या से पूरी तौर पर असहमत है।

ज्ञातव्य हो कि चंदौली जनपद में 14088 दाखिल दावों में से 13998 दावे, सोनभद्र जनपद में 65526 दाखिल दावों में से
53506 और मिर्जापुर जनपद में 3413 दाखिल दावों में से 3128 दावे खारिज कर दिए गए है। चंदौली, सोनभद्र और मिर्जापुर जनपदों
में इतने बड़े पैमाने पर ग्रामीण गरीबों के खारिज किए गए दावे के आदेश के विरूद्ध आदिवासी वनवासी महासभा द्वारा माननीय उच्च
न्यायालय में जनहित याचिका संख्या 27063/2013 दाखिल की गयी थी। जिसमें माननीय उच्च न्यायालय ने दिनांक 05.08.2013 को
यह आदेश दिया कि अनुसूचित जनजाति व अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 (2007) व
संशोधन नियम 2012 के अनुसार जिले, तहसील व ग्राम सभाओं में वन भूमि पर प्रस्तुत दावों के संदर्भ में विधिक प्रक्रिया अपनायी
जाए। इस निर्णय में दावेदार को ग्राम सभाओं में दावा करने को कहा गया था जिससे कि वनाधिकार समितियां उनके दावे का परीक्षण करे
और इस प्रक्रिया में यदि कोई दावेदार त्रिस्तरीय समिति के निर्णय से असंतुष्ट है तो संशोधित नियम 2012 के प्रावधानों के तहत राहत
के लिए अगली कार्रवाई कर सकता है। हमने जमीनीस्तर पर उपरोक्त तीन जिलों के दावों का गहन परीक्षण किया है और पाया है कि
किसी भी दावेदार के दावे को खरिज करने की कोई लिखित सूचना नहीं दी गयी है और न ही उनके दावों के निरस्तीकरण का किसी भी
स्तर पर कारण बताया गया है। मनमाने ढ़ग से उप खण्ड़ स्तरीय समिति ने बहुतायत दावों का निरस्तीकरण कर दिया और दावेदारों को
निरस्तीकरण का कारण भी नहीं बताया गया जिससे कि वह उच्च स्तरीय समिति में अपनी अपील कर सके। यदि ऐसा नहीं है तो वन
विभाग यह बताएं कि कितने ऐसे लोग है जिनके दावों को निरस्त कर दिया गया है और उन्हें लिखित सूचना दी गयी है। जबकि
वनाधिकार कानून के संशोधन नियम 2012 की धारा 12 (क) की उपधारा (3) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ‘ग्राम सभा द्वारा
दावे को उपातंरण या उसे खारिज करने की दशा में या उपखंड स्तर समिति द्वारा अग्रेषित दावे को उपांतरण या उसे खारिज करने की
दशा में दावे पर ऐसे विनिश्चय या सिफारिशों को व्यक्तिगत रूप से दावेदार को संसूचित किया जाएगा जिससे वह यथास्थिति, उपखंड
स्तर समिति या जिला स्तर समिति को साठ दिन की अवधि जिसे तीस और दिन के लिए उक्त समितियों के विवेक पर विस्तारित
किया जा सकेगा, के भीतर याचिका करने के लिए समर्थ बनाया जा सके।’ इसी की उपधारा (5) के अनुसार ‘किसी व्यथित व्यक्ति की
याचिका को तब तक नहीं निपटाया जायेगा जब तक कि उसे अपने दावे के समर्थन में कुछ प्रस्तुत करने का युक्तियुक्त अवसर न प्रदान
कर दिया गया हो।’ उपधारा (7) के अनुसार ‘उन दशाओं में जहां ग्राम सभा द्वारा किसी दावे की समर्थनकारी दस्तावेजों और साक्ष्य के
साथ सिफारिश करने सम्बंधी संकल्प को उप खंड स्तर की समिति को उपांतरणों के साथ या उसके बिना मान्य ठहराया जाता है किन्तु
उसे जिला स्तर समिति द्वारा अनुमोदित नहीं किया जाता है, तो जिला स्तर समिति यथास्थिति, ग्राम सभा या उपखंड स्तर समिति की
सिफारिशों को स्वीकार न करने के ब्यौरेवार कारण लिखित रूप में अभिलेखबद्ध करेगी और जिला स्तर समिति के आदेश की प्रति उसके
कारणों सहित, यथास्थिति, दावाकर्ता या ग्रामसभा या समुदाय को उपलब्ध करायी जायेगी।‘

वनाधिकार कानून संशोधन नियम 2012 में आदिवासियों और अन्य परम्परागत वन निवासियों को जो अधिकार दिए गए है
उनकी पूरी तौर पर अवहेलना की गयी है और अभी ढे़र सारे उनके दावे ग्रामस्तर पर ही है और उन्हें उप खण्ड़ स्तर की समिति द्वारा
स्वीकार ही नहीं किया गया है। वनाधिकार कानून को पूरी तौर पर प्रशासन ने निष्प्रभावी बना दिया है और विधि के प्रतिकूल जाकर
आदिवासियों और अन्य परम्परागत वनाश्रितों को उनकी पुश्तैनी जमीनों से बेदखल किया जा रहा है। गौरतलब हो कि यहीं वह इलाका है
जिसे प्रदेश में नक्सल प्रभावित क्षेत्र कहा जाता है, यहां बच्चे बूढ़े और महिलाए कुपोषण का शिकार है, प्रति वर्ष दर्जनों बच्चे जहरीला
पानी पीकर बेमौत मरते है और वन उत्पादों पर भी आदिवासियों व वनाश्रितों को अधिकार नहीं है।

अतः हमारा आपसे अनुरोध है कि चंदौली, सोनभद्र और मिर्जापुर जनपदों में वनाधिकार कानून के तहत वन भूमि प्राप्त करने
का जो अधिकार वहां के आदिवासियों और परम्परागत वनाश्रितों को मिला है उसकी रक्षा की जाए, इस क्षेत्र की विशिष्ट स्थिति को ध्यान
में रखते हुए पूरे दावे प्रकरण की जांच कराने के लिए उच्चस्तरीय जांच समिति नियुक्त की जाए जो समयबद्ध निर्णय दें जिसके आलोक
में त्रिस्तरीय समिति वन भूमि पर लोगों को टाइटिल प्रदान करे और जब तक यह न हो तब तक वन विभाग को पुश्तैनी जमीनों पर
बसे लोगों की बेदखली की कार्यवाही पर रोक लगाने का निर्देश दिया जाए।
सधन्यवाद!

अखिलेन्द्र प्रताप सिंह
राष्ट्रीय कार्य समिति सदस्य
स्वराज अभियान।

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