वे केवल मजदूर थे… यही उनकी जाति थी और यही धर्म!

‘मजदूर’ शब्द मनन करते ही एक तस्वीर एैसे परिवार की भी उभरती है जो किसी छोटे से मकान से लेकर आलीषान कोठी के र्निमाण के लिये तपती धूप में अपना पसीना बहाता है। मजदूर महिला देश के बचपन को पीठ पर बांधे अपने पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दो वक्त की रोटी कमाती है । ईंट-पत्थरों के टूटे टुकड़ों से खेलते हुये इस परिवार के बच्चों का बचपन जाने कब गुजर जाता है, पता ही नहीं चलता। बहुत जल्दी छोटे मजदूर काम के लिये तैयार हो जाते हैं। कई दिनों, महीनों बाद इन मजदूरों के श्रम योगदान से जब घर या इमारत बन जाती है तो मजदूर परिवार फिर किसी और का घर बनाने चला जाता है।

किसी संत ने कहा था कि अपनी बनाई हुई हर चीज से भगवान बहुत प्रेम करता है। वैसे, कोई भी, कोई भी कुछ बनाता है या उसके बनने में अपना योगदान देता है तो उसे उस कृति से प्रेम हो जाना लाजिमी ही है। इसमें कोई अचरज नहीं है। किसी भी र्निमाण से जुड़े रहने पर उससे एक अजीब सा लगाव हो जाता है। कार्य समापन पर उसे यूँ ही छोड़कर चले जाना या भुला देना इतना आसान भी नहीं है। अपनी मेहनत और पसीने को साकार होते देख एक मजदूर को उतनी ही खुषी होती है जितनी उस भवन या इमारत को बनवा रहे उसके स्वामी को होती है। एक मजदूर का कहना था ‘मालिक पैसा खर्च करता है, घर बनवाता है, हम काम करते हैं, पैसे लेते हैं लेकिन जब बने हुये सुन्दर घर को देखते हैं तब अपने काम की असल कीमत पाते हैं।’

मैने कई चित्र देखें हैं, बढ़िया डिजायन देखी हैं, जिनके नीचे उसे बनाने वाले का नाम लिखा होता है। लेकिन अभी तक एक भी भवन एैसा नही देखा जिसके किसी कोने पर उसे बनाने वाले मजदूर का जिक्र हो। सुना है कि शाहजहाँ ने भी ताजमहल बनवाने के बाद अपने मजदूरों के हाथ काट दिये थे। आज पूरी दुनियाँ उस ताज की दिवानी है लेकिन उन मजदूरों की कोई निषानी मौजूद नहीं हैं जिन्होनें अपने राजा की एक इच्छा के लिये अपना पूरा हुनर, श्रम, जीवन उस अनुपम कृति को बनाने में लगा दिया था। उस बेमिसाल र्निमाण पर तोहफे में राजा ने उनके हाथ ले लिये और गुमनामी के अंधेरे में ढकेल दिया । उन मजदूरों ने सपने में भी एैसे मेहनताने की उम्मीद ना की होगी।

हमारे आस-पास से लेकर पूरी दुनियाँ में निर्मित होने वाली इमारतें, भवन, स्कूल, अस्पताल सबके सब गवाह हैं कि उनकी नींव की ईंट पर किन्हीं गरीब मजदूरों के हाथों की छाप भी दबी पड़ी है। लेकिन उन मजदूरों का पता नहीं है। इन मजदूर परिवारों में से बहुत से एैसे होते हैं जो पूरा जीवन दूसरों का घर बनाने में गुजार देते हैं लेकिन अपने लिये एक ढंग का आषियाना नहीं बना पाते। आस्था के प्रगाढ़ केन्द्रों में तमाम धार्मिक, जाति, वर्ण-वर्ग आदि के नियम, कायदे और परम्पराओं के पहरे लगते हैं लेकिन कौन जानता है कि इनके र्निमाण के समय ईंट-गारा ढोने वाले मजदूर किस वर्ण-जाति-धर्म से आये थे।

वे केवल मजदूर थे यही उनकी जाति थी और यही धर्म। आज कई पुराने मंदिर-मस्जिदों में स्त्रियों के प्रवेश के लिये नैतिक और कानूनी जंग सरीखी चल रही है लेकिन कोई पूरे दावे से नहीं कह सकता कि इन्हें बनाने में बहे पसीने में किसी मजदूर महिला का पसीना शामिल नहीं था। इस मुद्दे से इतर हकीकत ये है कि आज भी आस्था के नये केन्द्रों के निर्माण में महिला-पुरूष और उनके बच्चे अपनी मेहनत से चमक ला रहे हैं। ऐसे मेहनती मजदूरों के श्रम से ना जाने कितने मंदिर-मस्जिद, चर्च-गुरूद्वारे अपनी भव्यता और दिव्यता के लिये प्रसिद्ध हुये लेकिन लोकापर्ण से पहले ही इन्हें किनारे कर दिया गया। यकीनन इनकी दिन-रात की मेहनत के लिये मेहनताना दिया जाता है लेकिन क्या हो जायेगा अगर इन्हें भव्य निर्माण के योगदान पर कुछ क्षण के लिये ही सही, थोड़ा सा सम्मान दे दिया जाये। विश्वास मानिये दो शब्दों के आभार की पूजीं ये जीवनभर संभाल कर रखेंगें। मालिक का दिया हुआ मेहनताना कम पड़ जायेगा लेकिन उसका स्नेह ये गरीब अपने पूरे जीवन में खर्च ना कर सकेगें।

केवल घर-मकान ही नहीं, बहुत सारी चीजें हैं जो आप और हम प्रयोग करते हैं ये छोटे-छोटे मजदूर, श्रमिक हमारे लिये बनाते हैं। हमारी बहुत सी सेवायें हैं जिनके लिये हम इनका समय कुछ पैसों में खरीदकर इनके स्वामी बन जाते हैं। तब इनके वजूद, स्वाभिमान को बनायें रखने की नैतिक जिम्मेदारी हमारी भी बनती है। आईये हम शुरुआत करें, बड़े बनें, श्रम का सम्मान करें, श्रमिकों का अभिनन्दन।

जगदीश वर्मा ‘समन्दर’
metromedia111@gmail.com



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