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मध्य प्रदेश

विजय शाह को पार्टी से निकालने की बजाय भाजपा कवच बनी हुई है, इसके पीछे बड़ी वजह है!

प्रवीण दुबे-

विजय क्यूँ हुए “शाह” ये सवाल एमपी से लेकर देशभर के न केवल सियासी समझ रखने वाले बल्कि आम लोग भी पूछ रहे हैं.. हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक फटकार रहे हैं। उन्हीं की पार्टी की बेहद वरिष्ठ नेत्री उमा भारती साफ़ कह रही हैं इस्तीफ़ा लें या बर्खास्त करें।

इंडियन एक्सप्रेस जैसा अखबार उन पर सम्पादकीय लिख रहा है…भाजपा भारत-पाक युद्ध (यदि युद्ध था तो) का माइलेज लेने के लिए ये जो तिरंगा यात्रा निकाल रही है, उससे जितना सियासी फायदा होगा उससे कई गुना ज्यादा नुकसान अकेले विजय शाह कर गए…मगर पार्टी अभी तक उनके लिए इस सीमा तक कवच बनी हुई है कि हाई कोर्ट ने आज भी सरकार की पुलिस को फटकारा कि FIR इस तरह से लिखी गई कि इसमें बचाव का मार्जिन छोड़ दिया गया है।

कोर्ट को कहना पड़ा कि वो खुद मॉनिटर करेगी… सरकार और पार्टी दोनों की मज़बूरी है ट्राइबल वोट बैंक.. भाजपा और संघ ने ढेरों करतब कर लिए.. आदिवासी इलाकों में संघ तो बीते कई सालों से बहुत काम कर रहा है लेकिन उसे वोट में तब्दील नहीं करवा पाया।

मंडला, डिंडोरी, अनुपपुर, उमरिया, शहडोल, सिवनी, छिंदवाड़ा, बालाघाट, झाबुआ, अलीराजपुर सहित कई जिले ऐसे हैं जहां बिना अतिरिक्त प्रयास के भी कांग्रेस को वोट मिलते हैं।

भाजपा ने ट्राइबल के कई सारे आराध्य और देवी देवता की समारोहपूर्वक पूजा पाठ शुरू कर दी.. उनके वीर योद्धाओं को महिमामंडित करना शुरू कर दिया मगर हासिल अभी तक वो नहीं हुआ, जिसकी उन्हें दरकार है। यही एकमात्र वजह है कि पार्टी हिम्मत नहीं कर पा रही है विजय शाह से इस्तीफ़ा मांगने की।

शाह गोंड हैं और गोंड जनजाति नाराज़ न हो जाए ये फ़िक्र भाजपा को भरपूर आलोचना चुप रहकर झेलने के लिए विवश कर रही है.. जबकि शाह गोंड़ों के सर्वमान्य नेता नहीं हैं… कई गोंड युवक भी शाह की टिप्पणी से बेहद नाराज़ हैं… फिर भी पार्टी को चिंता ट्राइबल वोट बैंक की है..

शाह के बजाय कोई गुप्ता, श्रीवास्तव, राजपूत, दुबे, शुक्ला, तिवारी वगैरह होता, तो अब तक न केवल इस्तीफा होता बल्कि जेल में होता… भाजपा भले इसे हलाहल समझकर पी जाए लेकिन ऐसा करने से उसका ट्राइबल वोट बैंक बढ़ जाएगा इसमें संशय है मुझे…

होना ये चाहिए था कि उदाहरण प्रस्तुत करती भाजपा और बयान सार्वजनिक होते ही पद से हटा देना चाहिए था, भले उस ख़ाली सीट पर किसी आदिवासी विधायक को मंत्री बनाकर बैठा देते, मगर ऐसा हुआ नहीं… इससे समझ लीजिए कि चुनावी जातिगत समीकरण आपके सारे गुनाहों को कितनी आसानी से धो देता है..

हाँ एक बात लिखना भूल गया था… दिग्विजय सरकार में वन और पर्यावरण राज्य मंत्री थे दयाल सिंह तुमराची… गोंड जनजाति के थे मगर भ्रष्टाचार के आरोप में उनसे सरकार ने इस्तीफा ले लिया था.. यहाँ मैं दिग्विजय सिंह का महिमामंडन नहीं कर रहा हूँ सिर्फ ये तुलना कर रहा हूँ कि वोट बैंक की फ़िक्र जब तब नहीं थी एक पार्टी को तो अब भी नहीं होना चाहिए दूसरी पार्टी को।

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