शीतल पी सिंह-
कुछ घर की खबर… कल देर शाम सुल्तानपुर जिले के अपने घर पहुँचा। व्हाट्सएप पर तमाम संदेश जो मेरे गृह जनपद सुल्तानपुर से संबंधित हैं, भरे हुए थे। बहुत देर में देखा। कोशिश करता हूँ कि स्थानीय मसलों से स्वयं को दूर रक्खूं। दशकों तक घर से बाहर रहा हूँ तो इस बीच हमारे जनपद को सींचती गोमती नदी में इतना कुछ बह कर आगे निकल चुका है जिसका मुझे पता नहीं है।
खैर, यह मामला जिले के दो सबसे प्रमुख राजनीतिक परिवारों का है। एक पक्ष जिले से निकलकर देश के बड़े पदों (केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य) तक पहुँचे और कांग्रेस के महासचिव रहे बाबू केदार नाथ सिंह जी का है, दूसरे उनके ही सहयोगी रहे बाबू शारदा सिंह का परिवार है।
शारदा सिंह का परिवार मेरे परिचय में उनके पुत्र (अब दिवंगत) इंद्रभद्र सिंह के ज़रिए आया जो जनपद की सबसे बड़ी शिक्षण संस्था KNI में ही सेवारत थे। KNI की स्थापना बाबू केदार नाथ सिंह को अमर कर गई। उनके बड़े बेटे अरविंद जी मेरे शुभचिंतक और मित्र हैं और उनके विस्तारित परिवार के ओ पी सिंह और मेरा छोटा भाई साथ-साथ इंटरमीडिएट कालेज में शिक्षा ग्रहण करते रहे और मेरे छोटे भाई के रूस में बस जाने के बावजूद उनमें प्रगाढ़ संबंध बने हुए हैं। मेरे छोटे भाई से बाबू केदार नाथ सिंह के कनिष्ठ पुत्र अशोक सिंह भी प्रगाढ़ परिचय में हैं क्योंकि वे भी JNU और रूस में पढ़ने गए थे जहां मेरा भाई भी रहा।
स्व० इंद्रभद्र जी जनता दल से विधायक बने थे तब तक मैं लखनऊ में पत्रकार के रूप में पाँच छः साल गुजार चुका था। खिलाड़ी थे, स्वस्थ शरीर के मालिक थे और कोई व्यसन नहीं था। हर समय क्षेत्र की समस्याओं के कागज़ों का पुलिंदा लिए लखनऊ में मिलते रहते थे। उस समय जनता दल के मेरे जनपद से ही कई विधायक थे, सबसे ही मेल मुलाक़ात थी। मेरा अख़बार (साप्ताहिक चौथी दुनिया) जनता दल के उद्भव में एक हद तक हिस्सेदार रहा था इसलिए भी सारे जनतादली रोज़मर्रा के संपर्क में थे।
मुझे वर्ष याद नहीं पर मैं परदेस में था जब स्व० इंद्रभद्र सिंह को जिले की कचहरी में कुछ अपराधियों द्वारा बम फेंक कर जान से मार दिया गया। उनके बच्चों या परिजनों से मेरा संपर्क नहीं था तो मैं दुख व्यक्त भी न कर पाया। दशकों बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र सोनू सिंह ने अचानक संपर्क कर चकित किया, वे भी अपने पिता की सीट से विधायक बने।
बाबू केदारनाथ सिंह के दूसरे पुत्र विनोद कुमार सिंह ने राजनीतिक क़िला सँभाला। कांग्रेस, बसपा और भाजपा में रहते हुए वे राज्य मंत्रिपरिषद में रहे और संप्रति सुल्तानपुर से विधायक हैं।
फ़िलहाल इस पोस्ट और ऊपरी वृतांत को लिखने की वजह यह है कि पिछले दो दिनों से सुल्तानपुर का लोकल सोशल मीडिया इन दोनों परिवारों की तनातनी की खबरों से अटा पड़ा है।
इस बात के ढेर सारे वीडियोज हैं (यूट्यूब के कई चैनल सुल्तानपुर में भी मौजूद हैं) और सोशल मीडिया पोस्ट्स हैं लेकिन इससे इतर जिस वजह से यह बात राजनीतिक रूप ले चुकी है वह बीजेपी के ही एक MLC देवेन्द्र प्रताप सिंह के 03/09/25 के ज़िलाधिकारी को लिखे पत्र (संलग्न )से गंभीर हो गई है। उनके अनुसार स्व० इंद्रभद्र सिंह की प्रतिमा धनपतगंज बाज़ार में सड़क के किनारे लगी हुई है जिसका अनावरण लंबित है, इस प्रतिमा को हटाने का प्रयास किया जा रहा है।
लोकल यूट्यूब चैनलों के वीडियोज के अनुसार विधायक विनोद सिंह ने इस बाबत ज़िलाधिकारी को लिखा था और प्रतिमा हटाने की मांग की थी। विनोद सिंह का एक पत्र भी सोशल मीडिया में वायरल है जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री से देवेन्द्र प्रताप सिंह की शिकायत की है।


सुल्तानपुर के जिन लोगों ने इस मामले से संबंधित वीडियोज और पत्र आदि मेरे पास भेजे हैं उसमें इस घटना विकास क्रम में उनकी चिंता झलकती है। वे चाहते हैं कि मैं हस्तक्षेप करूँ। मेरी सीमाएं हैं और मुझे यह भरोसा भी नहीं है कि मेरे हस्तक्षेप का कोई फ़ायदा होगा।
मुझे लगता है कि बाबू केदार नाथ सिंह का सम्मान उनके द्वारा KNI जैसी संस्था को जनपद को सौंपने से है न कि निजी प्रसंग को विस्तार देने से। स्व० इंद्रभद्र सिंह के साथ जो जैसे घटा था वह अमानुषिक है और सर्वत्र निंदनीय होना चाहिए। इस भयंकर घटना की पृष्ठभूमि में बड़े हुए उनके बच्चों से कुछ ऊंचनीच हो भी गई हो तो बड़ों में उस पर क्षमा भाव होना चाहिए।
लंबे समय से सुल्तानपुर राज्य की राजनीति में अपनी राजनीतिक पहचान खो रहा है। पिछले कार्यकाल में यहां की सांसद रहीं मेनका गांधी तक को मंत्रिमंडल में नहीं शामिल किया गया था। मुझे लगता है कि हमारे राजनेताओं को छोटी-छोटी बातों को बड़ा करने या मान अपमान जैसे मसलों को तूल देने से बचना चाहिए।
इंद्रभद्र सिंह मेरे बड़े भाई थे । मित्र जैसे बड़े भाई । तब राजनीति में इतनी कटुता नहीं थी । आलोचनाएँ कभी निंदा या नुकसान की परिधि नहीं पार करती थीं । वैचारिक मतभेद में भी लोग विरोधी नहीं प्रतिद्वंदी होते थे । कैसे अच्छे लोग गुज़र गए कैसा अच्छा वक्त गुज़र गया ।
आज भाई इंद्रभद्र सिंह जी की प्रतिमा तोड देने की सिफारिश हो रही है । प्रतिमाएँ प्रेरणा पैदा करती हैं आने वाली नस्लों को सिखाती है पीढ़ियाँ तैयार करती हैं ।जो समाज अपने महापुरुषों का संरक्षण नहीं कर सकता वो कभी विचार वान नस्लें नहीं पैदा कर पाता।
ये संरक्षण एक पत्थर की मूर्ति का नहीं है एक विचार का है , एक पुरखे का है एक युवा तुर्क का है जिसे कभी काल के कुचक्र ने मारा अब गंदी राजनीति मार देना चाहती है ।
डीएम मिश्रा जी सुल्तानपुर के शायर हैं उन्ही का शेर याद आ रहा है
फूल तोड़े गए टहनियाँ चुप रहीं
पेड़ काटे गए बस इसी बात पर-सुरेश बहादुर सिंह (वरिष्ठ पत्रकार)




Ashok Tiwari
September 7, 2025 at 8:20 pm
श्रीमान सुरेश बहादुर सिंह जी
क्या आप लोगों ने कभी जनता की भी सुनी है.. चौथा स्तंभ तो वाइब्रेंट होता है