Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

हिंदी के सबसे ख़ुश, निर्लज्ज और कमाऊ बेरोज़गार थे वरिष्ठ पत्रकार विष्णु खरे

अविनाश मिश्रा-

वह जागरूकता का प्रथम क्षण होता है, जब लगता है कि अब रोज़गार की ज़रूरत है। यह जागरूकता अगर बचपन में हो तब बचपन बीत जाता है, अगर तरुणाई में हो तब तरुणाई और अगर यह वृद्धावस्था में हो तब जीवन बीत जाता है।

इस जागरूकता में बहुत सारी कामनाएँ और स्वप्न बिखर जाते हैं। ये क़तार में ले आने वाले पल होते हैं। वे जिन्होंने जीवन में कभी रोज़गार की खोज नहीं की, मृत्यु तक कच्चे रहेंगे।

रोज़गार को खोजने की प्रक्रिया और अवधि ही बेरोज़गारी है। साल 2017 की एक शरद दुपहर में एक संवाद से बाहर आए संवाद में मैंने विष्णु खरे से प्रश्न किया था कि आप 1993 से बेरोज़गार हैं। इस बीच आपने कोई पत्रिका भी नहीं निकाली और न ही कोई प्रकाशन शुरू किया। इतनी लंबी अवधि तक इस प्रकार बेरोज़गार रहने वाले हिंदी कवियों-लेखकों के क्लब में आपके साथ देवी प्रसाद मिश्र भी शामिल होंगे, जिन्होंने रोज़गार-संस्थानों को दासताओं के अड्डे कहा है। मैं यहाँ आपसे जानना चाहता हूँ कि बेरोज़गारी में सबसे ज़्यादा क्या चीज़ काम आती है? इस सवाल का यह सोचकर जवाब दें कि सामने एक बेरोज़गार बैठा हुआ है।

मैंने इस प्रश्न के बहुत अमूर्त और दार्शनिक उत्तर की अपेक्षा की थी, लेकिन विष्णु खरे इसलिए ही स्मरणीय हैं कि वह अपेक्षाओं के पार चले जाने वाले व्यक्तित्व हैं।

उन्होंने कहा : “बेरोज़गारी में सबसे ज़्यादा काम आती है—फ़्रीलांसिंग और उसकी मेहनत और कर सको तो अनुवाद। मेरा उदाहरण वैसे तुम्हारे प्रश्न के उत्तर में थोड़ा भिन्न है, क्योंकि मैंने विदेशी भाषाओं से हिंदी में लाखों रुपए के अनुवाद किए हैं। इसके लिए मुझे मेडल भी मिले हैं और नाइट और सर की उपाधि भी। मैं यह करके भारत से बाहर बहुत सम्मानित हुआ हूँ। लेकिन क्या है कि मेरे साथ एक लाभ यह रहा कि मुझे इस प्रकार के वेल पेड काम एक के बाद एक बराबर मिलते गए। मेरे प्रकाशकों ने भी मेरे साथ कई वर्षों तक बेईमानी नहीं की, बहुत बाद में की।

लेकिन अब ध्यान से सुनो : फ़्रीलांसिंग बहुत अजीब चीज़ है, इसके लिए आपको प्रतिभाशाली होना पड़ेगा। फ़्रीलांसिंग का एक बहुत बुरा उदाहरण हिंदी में सुरेश सलिल हैं, क्योंकि उनमें प्रतिभा नहीं है। वह अनुवादक बहुत बड़े हैं, लेकिन कोई उन्हें मानता नहीं है। देखो, कितना काम किया है उन्होंने; लेकिन सब का सब साधारण। हालाँकि वह अशोक (वाजपेयी) से बेहतर हैं। वह तो बहुत ही ख़राब अनुवादक है। वह इसे समझता भी है।

एक और बात कि फ़्रीलांसिंग के लिए आपको अपनी गृहस्थी में यक़ीन होना चाहिए। अपनी जीवनसंगिनी, उसकी मेहनत और उसकी समझदारी पर यक़ीन होना चाहिए। इस प्रकार परस्पर प्रेम और समर्पण होना चाहिए कि अभाव कलह का रूप न ले सके। मेरी पत्नी ने मुझसे कभी नहीं कहा कि अब क्या होगा? वह जानती थी कि ये आदमी कहीं से भी पैसे लाए, लेकर आएगा। मैं तुम्हें यहाँ एक बेहद हृदयविदारक दृश्य दिखाने जा रहा हूँ, देखो :

जब मैंने नवभारत टाइम्स छोड़ा- जयपुर में, तब हुआ यों कि किराए का मकान ख़ाली करना है। मैं वहाँ अकेले रहता था, इसलिए थोड़ा ही सामान था मेरे पास। मैंने पत्नी को बताया कि नौकरी छूट गई है। मैंने उसे दिल्ली से बुलाया कि यहाँ आ जाओ और मेरी थोड़ी मदद करो- पैकिंग-वैकिंग में, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि अब दफ़्तर की या किसी और की कोई मदद लूँ।

वह आई और हमने एक-एक चीज़ पैक की। एक बड़े बोरे में रखी और ऑटो मँगाया। ऑटो में बोरा रखा और हम लोग भी बैठे। जयपुर बस-स्टैंड पहुँचे। दिल्ली वाली बस खड़ी थी। मैं ऊपर चढ़ गया और पत्नी ने नीचे से बड़े प्यार से बोरा पकड़ाया। मैंने बोरा जहाँ रखना चाहिए था, वहाँ रख दिया। अब बस चलने लगी। पत्नी मुझसे बार-बार पूछे कि बोरा ठीक से रखा था न?

मैं कहूँ- हाँ भई! लेकिन उसका संशय सफ़र भर बरक़रार रहा। रात गए हम लोग बोरे सहित सकुशल दिल्ली पहुँचे।

मैं कहना यह चाह रहा हूँ कि उस औरत ने कभी उफ़् तक नहीं की कि यार तुम फिर बेकार हो गए। मैंने भी उसे कभी भूख से मरने नहीं दिया। मेरे बच्चों को तो कभी पता ही नहीं चला कि पापा अब बेरोज़गार हैं। मैं बेकारी में भी ख़ूब विदेश जाता रहा। मैंने इस काल और अवधि के दरमियान ख़ूब कमाई की। मेरा मतलब यह है कि मैं अपने बेरोज़गार होने का रोना नहीं रो सकता। मैं हिंदी का सबसे ख़ुश, निर्लज्ज और कमाऊ बेरोज़गार हूँ।

मैं इसलिए विलाप कर ही नहीं सकता। मेरे साथ हुए अन्याय का विलाप तो कर सकता हूँ जिस तरह साहित्य अकादेमी और नवभारत टाइम्स से मुझे निकाला गया; लेकिन मेरे घर में खाना नहीं है, बीमार होने पर इलाज नहीं है, मेरे बच्चे पढ़ नहीं पा रहे हैं, मेरी बेटियाँ फटी फ्राक पहनकर घूम रही हैं… इस प्रकार का कुछ नहीं हुआ। हम बहुत बेहतर ढंग से रहते थे। बहुत बेहतर ढंग से खाते-पीते थे। बेरोज़गारी पर रुदन मेरे जीवन में इसलिए ही अनुपस्थित है। हाँ, यह सदमा ज़रूर है कि मुझसे नौकरियाँ छीन ली गईं। लेकिन इसके लिए किया क्या जाए, छीन ली गईं तो छीन ली गईं। यह बताओ कि आख़िर ग़ुलामी करने से आपको रोकता कौन है? कौन रोकता है जूते चाटने से? कोई नहीं!

आज अधिकांश मीडिया संस्थानों में जूते चाटने वाले लोग बैठे हुए हैं। वे रोज़ जूते चाट रहे हैं और अच्छे से चाट रहे हैं। मीडिया ही क्यों, सब जगह, कहाँ नहीं चाट रहे हैं यह बताओ? उन्हें कोई रोक नहीं रहा- न उनका परिवार, न उनका ज़मीर। क्योंकि सबको पता है कि ये जूते चाटने वाला महीने के आख़िर में इतना पैसा लेकर आएगा- लाख, डेढ़ लाख, दो लाख, तीन लाख… कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता ग़ुलामी करने से, जूते चाटने से। अगर पड़ता है तो जाओ घर बैठो, ऐसी-तैसी कराओ अपनी। मुझसे किसी ने कहा नहीं नौकरी छोड़ने को। मेरा ग्यारह पेज का इस्तीफ़ा है- नवभारत टाइम्स को दिया हुआ। सुप्रीम कोर्ट में मुक़दमा लड़ा मैंने- साहित्य अकादेमी के विरुद्ध। ये पेपर आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं। ये हवाई बातें नहीं हैं। मैं बस रोता नहीं हिंदी साहित्य के सामने, क्योंकि रोने से कुछ होता नहीं है। रोने से और बुरा हश्र होता है। इसलिए गरिमापूर्ण ढंग से इस्तीफ़ा दो, कष्ट सहो और अपना काम करो। एक ही बार तो अपमानित होओगे, बार-बार तो नहीं।

हाँ, अब इस उम्र में थोड़ी दिक़्क़त है; लेकिन मैं अब भी फ़्रीलांसिंग कर रहा हूँ। तुम देख ही रहे हो। मैं थोड़ा और स्वस्थ हो जाऊँ फिर बहुत बड़े पैमाने पर फ्रीलांसिंग शुरू करूँगा। मेरे पास रोने का समय नहीं है। दरअस्ल, रोने के लिए कुछ है ही नहीं। मैं कई बार छिपाता हूँ चीज़ों को, वरना लोग कहेंगे कि कमीना हूँ।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन