विश्व कैंसर दिवस : कोरोना से भी खतरनाक होने वाला है कैंसर

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और राष्ट्रीय रोग सूचना विज्ञान एवं अनुसंधान केंद्र की माने तो इस साल भारत में कैंसर के मामले 13.9 लाख रहने का अनुमान है, जो 2025 तक 15.7 लाख तक पहुंच सकते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक तंबाकू जनित कैंसर के मामले 3.7 लाख रहने का अनुमान है, जो कैंसर के कुल मामले का 27.1 फीसद होगा। जबकि महिलाओं में छाती के कैंसर के मामले दो लाख (यानी 14.8 फीसद), गर्भाशय के कैंसर के 0.75 लाख (यानी 5.4 फीसद), महिलाओं और पुरूषों में आंत के कैंसर के 2.7 लाख मामले (यानी 19.7 फीसद) रहने का अनुमान है

सुरेश गांधी

देश में हर साल 14.5 लाख मरीज होते हैं शिकार, जिसमें 3.2 लाख केवल यूपी-बिहार से है। इसमें 2.8 लाख मरीज 25 से 40 साल के बीच होते हैं। खास बात यह है कि कैंसर की वजह से 95 प्रतिशत मरीजों एवं उनके परिजनों का रोजगार छिन जाता है। इसमें 3 लाख लोग कैंसर के चलते गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या दुनिया भर में एड्स, मलेरिया और टीबी जैसी बीमारियों से होने वाली मौतों से अधिक है। वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार कैंसर की बीमारी ग्लोबल इकोनॉमी पर मौजूद तीन प्रमुख खतरों में से एक है। देश में कैंसर का इलाज सिर्फ 125 शहरों में होता है। 75 प्रतिशत मरीज 5 मेट्रों शहरों में इलाज कराते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक में वर्ष 2030 तक हर साल करीब 55 लाख महिलाओं (डेनमार्क की कुल आबादी के करीब) की मौत की आशंका जतायी गयी है। जबकि वर्तमान में भारत में 14.5 लाख मरीज कैंसर के हैं। कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या दुनिया भर में एड्स, मलेरिया और टीबी जैसी बीमारियों से होने वाली मृत्यू से अधिक है। भारत में कैंसर से हो रही मौत 10 प्रमुख कारकों में से एक है, जो कि एक लगातार बढ़ती जन स्वास्थ्य समस्या भी है। देश में हर साल कैंसर से करीब पांच लाख से अधिक लोगों की मृत्यु होती है। वहीं देश में रोज 1300 लोग इसकी वजह से मर रहे हैं।

इस आंकड़े पर गौर करें तो पता चलता है कि दो दशक से भी कम समय में ऐसे मामलों में करीब 60 प्रतिशत की वृद्धि होगी। क्योंकि शारीरिक निष्क्रियता, असंतुलित आहार, मोटापा और प्रजनन कारकों से ऐसे मामलों में तेजी से वृद्धि की आशंका है। रिपोर्ट में कहा गया कि वैश्विक आबादी में इजाफे के साथ गरीब और मध्यम आय वाले देशों में मरने वालों में सबसे अधिक संख्या महिलाओं की होगी। फिरहाल, देश में अगर कैंसर के मामले ऐसे ही बढ़ते रहे, तो हिंदुस्तान पूरे विश्व के कैंसर की राजधानी बन जायेगा। सबसे ज्यादा तंबाकू से होने वाले कैंसर के मामले भारत में दर्ज किये जायेंगे। वैसे भी भारत में कैंसर के सभी मामले पारदर्शिता से दर्ज नहीं होते। कस्बों और छोटे शहरों के मामले बड़े शहरों में नहीं पहुंचते। छोटे शहरों में कैंसर मरीज ऑपरेशन, कीमो या रेडिएशन लेता है, कई बार तो उचित इलाज नहीं मिल पाने से उसकी मौत हो जाती है, पर ऐसे मामलों की वास्तविक स्थिति का सही अंदाजा नहीं लग पाता है। बढ़ती मरीजों की संख्या का अंदाजा इस
बात से लगाया जा सकता है कि टीएमसी मुंबई में हर साल करीब 60 हजार नए कैंसर के मरीज पहुंचते हैं। वहीं छह से सात लाख मरीज फॉलोअप के लिए पहुंचते हैं। इनमें ज्यादातर मरीज यूपी, बिहार और झारखंड से होते हैं।

यही वजह है कि मुंह, गले, फेफड़े, आहार नली, ब्लड कैंसर हो रहे हैं। वायुप्रदूषण भी फेफड़े के कैंसर का कारण बन रहा है। धूम्रपान नहीं करनेवालों के लिए भी यह चिंताजनक है। मिट्टी और जल प्रदूषण की वजह से आजकल सब्जियां और खाद्य पदार्थ विषाक्त हो रहे हैं। सब्जियों में आर्सेनिक, कैडमियम, मरकरी, लेड की मात्रा आ रही है, क्योंकि सिंचाई के पानी में फैक्ट्रियों और रसायनों की गंदगी खेतों में पहुंच रही है। अच्छी जीवनशैली, हरी सब्जियां खाने और कोई नशा नहीं करने के बावजूद भी लोग इस बीमारी का शिकार हो रहे हैं। एक बड़ा कारण घर से लेकर वातावरण तक फैला प्लास्टिक भी है। इसमें जीएसए कैंसर का कारण बनता है। आजकल फास्टफूड, पिज्जा, बर्गर आदि खाने का चलन बढ़ रहा है। इनमें सैचुरेटेड फैट होता है। भारतीय खाने की तरह में इसमें फाइबर नहीं होता है। इससे आंत का कैंसर, महिलाओं में स्तन का कैंसर, पुरुषों में प्रोस्टेट का कैंसर होने लगा है। मेलामाइन से बननेवाला नकली दूध भी खतरनाक है। तरह-तरह के केमिकल मानव शरीर में पहुंच रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक पुरुषों में कैंसर से होने वाली मृत्यु का कारण 31 फीसदी फेफड़े के कैंसर, 10 फीसदी, प्रोस्टेट कैंसर, 8 फीसदी कोलोरेक्टल, 6 फीसदी पैंक्रिएटिक, 4 फीसदी लीवर कैंसर है।

मालवीय कैंसर अस्पताल में पंजीकृत हुए अब तक 30 हजार नए मरीज

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय कैंसर केंद्र और होमी भाभा कैंसर अस्पताल के प्रिवेंटिव ऑन्कोलॉजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नवीन खार्गेकर ने बताया कि वाराणसी में ज्यादातर मुंह गर्भाशय ग्रीवा और स्तन कैंसर के मामले देखने को मिलते हैं। आंकड़ों के अनुसार, 2020 में दोनों अस्पतालों में 15,518 नए मरीज पंजिकृत हुए थे, जबकि साल 2019 में इसी समयावधि में 14,079 मरीजों का पंजीकरण हुआ था। अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि बेहतर जांच की सुविधा उपलब्ध होने के चलते समय रहते कैंसर मरीजों की पहचान हो रही है, जो कि अच्छे संकेत हैं। सर्जरी विभाग के प्रभारी डॉ. असीम मिश्र ने बताया कि कैंसर मरीजों को अत्याधुनिक इलाज मुहैया कराने के लिए महामना पंडित मदन मोहन मालवीय कैंसर केंद्र और होमी भाभा कैंसर अस्पताल प्रतिबद्ध है। इसी प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाते हुए हमने अस्पताल में टोवास सर्जरी की शुरुआत की है, जिससे मुंह और गले के कैंसर का बगैर दाग के ऑपरेशन हो रहा है।
कैंसर

मानव शरीर कईं अनगिनत कोशिकाओं यानी सैल्स से बना हुआ है। इन कोशिकाओं में निरंतर ही विभाजन की प्रक्रिया चलती रहती है। यह एक सामान्य प्रक्रिया है जिस पर शरीर का पूरा नियंत्रण होता है। लेकिन कभी-कभी जब शरीर के किसी विशेष अंग की कोशिकाओं पर शरीर का नियंत्रण बिगड़ जाता है जिसके बाद कोशिकाएं बेहिसाब तरीके से बढ़ती चली जाती है। इस प्रक्रिया को कैंसर कहा जाता हैं।

शुरुआत

मानव शरीर में जब कोशिकाओं के जीन में परिवर्तन होने लगता है, तब कैंसर की शुरुआत हो जाती है। ऐसा नहीं है कि किसी विशेष कारण से ही जीन में बदलाव होने लगता है, बल्कि यह स्वंय भी बदल सकते हैं। नहीं तो कुछ दूसरे कारणों की वजह से ऐसा हो सकता है। जैसे- गुटका-तंबाकू जैसी नशीली चीजें खाने से, अल्ट्रावॉलेट रे या फिर रेडिएशन आदि इसके लिए कारक हो सकते हैं

लंग कैंसर

धूम्रपान एक ऐसी लत है जो व्यक्ति को समय से पहले ही मौत के मुंह में पहुंचा देती है। तंबाकू सेवन सिर्फ शरीर के लिए ही हानिकारक नहीं बल्कि यह व्यक्ति की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को भी कमजोर कर देता है। यूं तो तंबाकू का उपयोग पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बना हुआ है, लेकिन आपको यह जान कर हैरानी होगी कि इसका कारोबार और उपयोग विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार विश्वभर में हर साल 1.2 मिलियन फेफड़ों के कैंसर के नये मामले सामने आते हैं। इनमें 90 फीसदी मामलों में धूम्रपान को लंग्स कैंसर का जिम्मेवार माना जाता है। इस लत के कारण देश में लंग्स कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। भारत में हर साल करीब 70 हजार लोग लंग्स कैंसर की चपेट में आ जाते हैं। तंबाकू के कारण न केवल लंग्स कैंसर बल्कि हृदय व श्वसन तंत्र से संबंधित बीमारियों के भी होने की संभावना बनी रहती है।

बचाव

इसके बचाव के लिए जरूरी है कि नियमित भोजन, उचित नींद, शारीरिक व्यायाम, नशे की वस्तुओं से दूरी यानी आहार, व्यवहार और विचार तीनों ही चीजों में सकारात्मक बदलाव की जरूरत है। शुद्ध भारतीय भोजन करें। तंबाकू, सिगरेट, शराब से दूर रहें। जल्दी जगें, व्यायाम करें, प्लास्टिक के बर्तनों के इस्तेमाल से बचें, साफ सफाई का ध्यान रखें। महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर गंदगी के कारण होता है। सही विचार रखें यानी तनाव मुक्त रहें। यह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तौर पर कैंसर का कारण बनता है। आहार, विचार और व्यवहार को सही रखें, तो कैंसर जैसी बीमारी को बिल्कुल रोक सकते हैं।

मुंह और गले का कैंसर

मुंह और गले में होने वाले कैंसर का मूल कारण तंबाकू का सेवन है। हर साल इस कैंसर की वजह से न जाने कितनी जानें चली जाती हैं। बावजूद इसके लोग जागरूक नहीं हो रहे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार यूपी में 49 फीसद पुरुष तंबाकू का किसी न किसी रूप में सेवन करते हैं। 17 फीसद महिलाएं भी तंबाकू खाती हैं।

प्रोस्टेट कैंसर

प्रोस्टेट कैंसर कई कारणों से हो सकता है। वृद्धावस्था में इसके होने की संभावना अधिक देखी गयी है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में इसके मरीजों की संख्या में भिन्नता पायी गयी है। अनुवांशिक कारण और खाने-पीने की आदतें भी प्रोस्टेट कैंसर का कारण हो सकती हैं। पारिवारिक पृष्ठभूमि भी इस रोग के कारणों में एक प्रमुख कारक है। अगर किसी के पिता, चाचा या भाई को कैंसर है, तो ऐसे मामलों में रिक्स दो से ग्यारह गुना ज्यादा बना रहता है। मोटे लोगों में प्रोस्टेट कैंसर होने की संभावना अधिक देखी गयी है। एशियाई देश जहां लोग वसायुक्त भोजन कम लेते हैं, उनमें इसके कम मामले देखने को मिलते हैं। नये अनुसंधानों के अनुसार लाइकोपिन, ऐलेनियम और विटामिन-ई युक्त पदार्थ लेने से कैंसर की संभावना कम हो जाती है। पके टमाटर में लाइकोपिन ज्यादा होता है, जो एंटी-ऑक्सीडेंट होने के कारण कैंसरस सेल के विकास को रोकते हैं। शुरुआती अवस्था में इसके लक्षण पता नहीं चलते। कुछ लोगों में कुछ लक्षण, जैसे- मूत्र त्याग में अस्थिरता जैसे चीजों का पता चलता है। लेकिन ये लक्षण उनमें भी दिखते हैं, जिनके प्रोस्टेट ग्लैंड का आकार असामान्य रूप से बढ़ जाता है। प्रोस्टेट कैंसर होने पर पेशाब में खून आना और दर्द उठने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। यह समस्या तकलीफदेह तो होती ही है, लेकिन थोड़ी भी कोताही बरती जाये तो कैंसर में परिवर्तित होकर जानलेवा भी हो सकता है। इसलिए समय रहते इसकी पहचान और चिकित्सा जरूरी है, क्योंकि प्रोस्टेट ग्रंथि जब ज्यादा बढ़ जाती है, तो कई बार वह मूत्र नली को बिल्कुल ही बंद कर देती है। इसकी वजह से बहुत देर तक पेशाब नहीं आता और पेशाब की थैली पूरी तरह से भर जाती है। इससे पेशाब के गुर्दों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। बहुत देर तक पेशाब न हो पाने की वजह से सिरदर्द, उल्टी आना, बेचैनी होना, सुस्ती आना जैसी शिकायतें भी सामने आ सकती हैं।

आधुनिकतम उपचार है आरएफए

आरएफए (रेडियो फ्रीक्वेंसी एब्लेशन) प्रोस्टेट कैंसर का आधुनिकतम उपचार है। यह प्रक्रिया ट्यूमर को घटाकर उस आकार में ले आती है, जिसे बाद में सर्जरी करके आसानी से निकाला जा सके। इससे दर्द से आराम मिलता है और अन्य दुष्प्रभावों को भी कम किया जा सकता है। कैंसर से ग्रस्त मरीजों के जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है। आरएफए से केवल 4 सेमी के ट्यूमर का उपचार किया जा सकता है। बड़े ट्यूमरों के उपचार के लिए केमो एंबोलाइजेशन करके बाद में आरएफए किया जा सकता है। ये दोनों ही प्रक्रियाएं शल्य रहित हैं और इनमें मरीज को केवल एक दिन के लिए ही हॉस्पिटल में रुकना पड़ता है। इस प्रक्रिया के दौरान एंबो लाइजेशन से ट्यूमर का आकार घटाया जा सकता है, जबकि आरएफए से कैंसर के सेलों को नष्ट किया जा सकता है। यह कैंसर सेलों को नष्ट करता है, जिससे किसी प्रकार के दुष्प्रभाव का खतरा नहीं रहता है, साथ ही कोई टॉक्सिक दुष्प्रभाव भी नहीं होता है। इसमें शल्य प्रक्रिया का कोई निशान नहीं पड़ता है। पर इस थेरेपी की मदद से ही लिवर कैंसर का उपचार किया जायेगा।

बिहार में कैंसर

डॉक्टरों के मुताबिक बिहार के वैशाली, औरंगाबाद, जमुई व पूर्णिया जिले में सबसे अधिक महिलाएं कैंसर की शिकार हो रही है। इनमें सबसे अधिक सर्वाइकल और स्तन कैंसर के मामले सामने आ रहे हैं। पूरे बिहार भर में प्रतिवर्ष 35 हजार महिलाएं सर्वाइकल कैंसर की पहचान होती है और इनमें 25 हजार महिलाओं की मौत हो जाती है। वहीं, पूरे बिहार से 80 हजार कैंसर के नये मरीज आते हैं। कुल मरीजों की संख्या लगभग ढ़ाई लाख है। इनमें महिलाओं का प्रतिशत सबसे अधिक करीब 61 फीसदी है और पुरुषों का 38 फीसदी है।

यूपी बिहार के लिए तारणहार बना बीएचयू कैंसर हास्पिटल

बीएचयू में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय कैंसर हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर का निर्माण ही नहीं, संचालन भी बिल्कुल टाटा मेमोरियल कैंसर हास्पिटल (टीएमसी) की तर्ज पर हो रहा है। इसका संचालन टीएमसी ही कर रही है। टीएमसी की ही तरह यहां कैंसर का इलाज पूरी तरह मुफ्त है। इससे न सिर्फ वाराणसी और पूर्वांचल बल्कि आसपास के प्रांतों के हजारों गरीब मरीजों को बड़ी राहत और सहूलियत मिल रही है। एक तो उन्हें मुंबई तक की दौड़ नहीं लगानी होगी, दूसरे यहां कैंसर की अंतरराष्ट्रीय स्तर की सभी चिकित्सा सुविधाएं एक ही जगह मुहैया हो रही है।

टीएमसी के डॉ. केएस शर्मा ने बताया कि टीएमसी मुंबई में हर साल करीब 60 हजार नए कैंसर के मरीज आते हैं। वहीं छह से सात लाख मरीज फॉलोअप के लिए आते हैं। टीएमसी में 60 फीसदी मरीजों का इलाज पूरी तरह मुफ्त होता है। 40 फीसदी पेड मरीज वो होते हैं, जो अलग से सुविधाओं की मांग करते हैं। उन्होंने बताया कि मुंबई में यूं तो देश भर से कैंसर मरीज आते हैं लेकिन इनमें ज्यादातर मरीज यूपी, बिहार और झारखंड से होते हैं। ऐसे में बीएचयू में इस कैंसर हास्पिटल के शुरू होने से पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों को फायदा हो रहा है। साथ ही, टीएमसी का दबाव भी कम हो गया है।

बता दें, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत 22 दिसंबर को बीएचयू में 580 करोड़ के प्रोजेक्ट कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर की आधारशिला रखी थी। सेंटर में 150 बेड के आईसीयू ब्लॉक के साथ एक कॉर्डियक सेंटर है, जहां बाईपास सर्जरी से साथ ही हृदय रोग के उपचार की सभी उच्चतम सुविधाएं मौजूद है। यहां आर्गन ट्रांसप्लांट सेंटर के साथ न्यूरो साइंस सेंटर भी है। इंडोक्राइनोलॉजी, गैस्ट्रोलॉजी विभाग और पेन एंड पैलिएटिव मैनेजमेंट यूनिट भी इसी सेंटर में है। इंफर्टिलिटी आईवीएफ सेंटर की भी सुविधा है। डीन प्रो.जेपी ओझा, चिकित्सा अधीक्षक डा. ओपी उपाध्याय, विभागाध्यक्ष प्रो. एसपी शर्मा, डा. वैभव पांडेय ने कहा कि आने वाले दिनों में टीएमसी से और सहयोग लिया जाएगा। डा. पांडेय ने कहा कि टाटा मेमोरियल के साथ मिलकर इलाज को नई दिशा दी जाएगी।

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