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मिड-डे की पूर्व संपादक और बहादुर पत्रकार वितुषा ओबरॉय का कैंसर से निधन

सीनियर जर्नलिस्ट वितुषा ओबरॉय के निधन की खबर आ रही है। वह इन दिनों Sheridan College में Advancement Communications विभाग में बतौर संपादक कार्यरत थीं।

इससे पहले वह मिड-डे में स्थानीय संपादक, द ऑब्जर्वर में वरिष्ठ संवाददाता रहीं। नेशनल हेराल्ड में चीफ रिपोर्टर और द इंडियन एक्सप्रेस में सब एडिटर के तौर पर कार्य कर चुकी थीं।


दिल्ली के रामजस कॉलेज और इंद्रप्रस्थ कॉलेज से पढ़ी वितुषा के निधन पर वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन ने लिखा है-

वितुषा ओबरॉय Vitusha Oberoi! यह नाम है एक बहादुर और प्रतिबद्ध पत्रकार का, जो कैंसर से लड़ते हुए हार गईं।

वितुषा ने कोई 17 साल पहले न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व प्रधान न्यायाधीश के भ्रष्टाचरण को उजागर किया था, बल्कि इसके लिए अदालत की अवमानना के मामले में अपने खिलाफ़ हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर सच की लड़ाई को जीता था।

साल 2005 से 07 तक सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश रहे वाईके सभरवाल के भ्रष्टाचार का वितुषा ने अपने अखबार Mid Day में खुलासा किया था। इस पर दिल्ली हाई कोर्ट ने वितुषा और उनके अन्य तीन साथियों को अदालत की अवमानना का दोषी करार दिया था। लेकिन वितुषा न तो डरी और न ही झुकीं।

हाई कोर्ट के फैसले को वितुषा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। वहां आठ साल तक लड़ीं और अंततः सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने फैसला सुनाया कि वितुषा और उनके साथियों के ख़िलाफ़ अवमानना का कोई मामला नहीं बनता।

देश के न्यायिक इतिहास में यह इकलौता फैसला था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही पूर्व प्रधान न्यायाधीश की सारी दलीलों को ठुकराते हुए प्रेस की आजादी को जिंदा रखने और लोकतंत्र को बचाए रखने की नायाब मिसाल पेश की थी। यह फैसला न्यायपालिका के तमाम मौजूदा जजों के लिए एक सबक और संदेश है।

बहरहाल वितुषा के जज़्बे को सलाम करते हुए उन्हें सादर श्रद्धांजलि।

वरिष्ठ पत्रकार उमाकांत लखेरा लिखते हैं-

“दिल्ली मिड डे” की संपादक रहीं वितुषा ओबेरॉय का टोरंटों में दो दिन पहले निधन हो गया । यह देश व दिल्ली की पत्रकारिता की बड़ी क्षति है। देश की राजधानी की पत्रकारिता में करीब दो ढाई दशक तक वे हर छोटी बड़ी राजनीतिक घटना की गवाह थीं।

मेहनती और जुझारू थीं। करीब डेढ़ दशक पहले परिवार के साथ कनाडा शिफ्ट हो गईं थी। लेकिन हमेशा पुराने साथियों के संपर्क में रहना उनकी दिनचर्या थी। कुछ साल पहले भारत आई थी संदेश भेजा कि दिल्ली में हूं। उनके साथ ही उनके पति के साथ खूब बातें हुई।

हंसमुख, मिलनसार और खोज खोज कर खबरें निकालने का उनमें जुनून था। जब वे पत्रकारिता में आईं थीं तो बहुत कम लड़कियां थी, जिन्होंने इस कठिन रास्ते को कैरियर के तौर पर चुना था। मेरा उनके साथ पहली बार परिचय दिल्ली के वी पी हाउस में हुआ, जो सांसदों का हॉस्टल है। बात 1989 की होगी। सीपीएम के सांसद एम ए बेबी (वर्तमान में पार्टी के महासचिव) पहली बार राज्यसभा सांसद बनकर आए थे। उन्होंने संसद में एक मामला उठाया। फिर संसद में पत्रकारों के फोन नंबर लिए और उन्हें उस मुद्दे पर दस्तावेज उपलब्ध कराने के लिए वीपी हाउस अपने आवास पर बुलाया।

वितुषा भी वहीं पहली बार मिली। काफी देर ब्रीफिंग हुई। उसके बाद दिल्ली की सभी बड़ी छोटी इवेंट में वर्षों मिलना जुलना रहा। कल टोरंटो में उनकी असमय मृत्यु ने उन बहुत सारे मित्रों को झकझोर दिया, जो उन्हें एक मेहनती और जुझारू साथी के तौर पर देखते थे।

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