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वक़्फ बोर्ड को लेकर BJP ने एक खास प्रोपेगेंडा के तहत भ्रम फैलाया है! देखें वीडियो

वक़्फ़ के बारे में एक दूसरी अफ़वाह है कि वक़्फ़ किसी भी ज़मीन को अपनी घोषित कर सकता है और पीड़ित इस बारे में कुछ नहीं कर सकता। ये भी भाजपा द्वारा फैलाया पूरी तरह झूठ है…

श्याम मीरा सिंह-

ये भ्रम ख़ास प्रोपोगंडा के तहत भाजपा के लोगों ने फैलाया है कि वक़्फ़ बोर्ड ही वक़्फ़ ट्रिब्यूनल का मालिक है और उसके ख़िलाफ़ किसी दूसरी कोर्ट में नहीं जा सकते। ये पूरी तरह झूठ है।

ट्रिब्यूनल दरअसल एक तरह से कोर्ट्स ही होते हैं, अलग अलग क्षेत्रों जैसे रेलवे टैक्स, एडमिनिस्ट्रेशन आदि में ट्रिब्यूनल बनाए जाते हैं, ताकि- इन मामलों की जल्दी सुनवाई हो सके, और हाई-कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट पर कम से कम बर्डन पड़े, ट्रिब्यूनल बनाने के पीछे सबसे बड़ा कारण उस क्षेत्र की टेक्निकल नॉलेज है, नार्मल जजेस को बहुत से क्षेत्र की नॉलेज नहीं होती, इसलिए सरकार की तरफ़ से ट्रिब्युअल बनाये जाते हैं। जैसे- Industrial Tribunal, Customs, Excise and Service Tax Appellate Tribunal, Armed Forces Tribunal, National Green Tribunal, Railway tribunal.

उसी तरह ही सरकार ने वक़्फ़ ट्रिब्यूनल बनाए हैं। वक़्फ़ एक्ट 1995 के Section 83 के अनुसार- वक़्फ़ ट्रिब्यूनल में- एक सदस्य- State Judicial Service का होगा, मतलब सरकारी जज होगा जो District, Sessions or Civil Judge, Class I लेवल से कम रैंक का नहीं होगा, यही आदमी वक़्फ़ ट्रिब्यूनल का चेयरमैन होगा, एक सदस्य- State Civil Services से होगा, मतलब पीसीएस से आएगा जो ADM लेवल से कम रैंक का नहीं होगा। और एक सदस्य ऐसा होगा जिसे Muslim law and jurisprudence(ज्यूरिसप्रूडेंस) की नॉलेज हो।

साफ़ है ये वक़्फ़ बोर्ड का वक़्फ़ ट्रिब्यूनल से कोई नाता नहीं है, वक़्फ़ ट्रिब्यूनल सरकारी होता है। पूरी तरह ग़ैर मज़हबी और निष्पक्ष। इसका मुस्लिमों से कोई नाता नहीं है। जैसे कस्टम के केस कस्टम ट्रिब्यूनल में जाते हैं, उनकी टेक्नीकलिटी की वजह से, वैसे ही वक़्फ़ प्रॉपर्टी की टेक्नीकलिटी के वजह से वक़्फ़ प्रॉपर्टी के केस वक़्फ़ ट्रिब्यूनल में जाते हैं।

दूसरा भ्रम ये फैलाया जाता है कि वक़्फ़ बोर्ड या वक़्फ़ ट्रिब्यूनल के फ़ैसले के ख़िलाफ़ किसी दूसरे कोर्ट में नहीं जाया जा सकता। ये पूरी तरह झूठ है।

Wakf Act,1995 के सेक्शन 83(9) (last para) के अनुसार- हाईकोर्ट, वक़्फ़ से जुड़े वक़्फ़ ट्रिब्यूनल द्वारा सुने गये मामले के रिकॉर्ड्स को एक्सामिन कर सकती है, जाँच सकती है। ये देखने के लिए कि सब लीगली तरीक़े से हो रहा है या नहीं। अगर हाइकोर्ट को कुछ ग़लत लगता है तो ट्रिब्यूनल के फ़ैसले बदल भी सकती है, संसोधित कर सकती है, हाईकोर्ट जो चाहे वो कर सकता है वक़्फ़ ट्रिब्यूनल के फ़ैसले के ख़िलाफ़.

वक़्फ़ के बारे में एक दूसरी अफ़वाह है कि वक़्फ़ किसी भी ज़मीन को अपनी घोषित कर सकता है और पीड़ित इस बारे में कुछ नहीं कर सकता। ये भी भाजपा द्वारा फैलाया पूरी तरह झूठ है।

दरअसल देश में मुस्लिम समाज से आने वाले बहुत से लोगों ने गरीब लोगों और समाज हित के लिए बहुत सी संपत्तियाँ दान में दीं। जिन्हें वक़्फ़ कहा जाता है। जिनमें से बहुत सी संपत्ति पर आज भूमाफ़ियाओं का क़ब्जा है। इसलिए पहले एक छोटा सा कॉनसेप्ट समझना ज़रूरी है। अगर कोई अपनी संपत्ति समाज हित या धर्म के काम में दान करना चाहता है तो ये आसान काम नहीं है। पहले वक़्फ़ बोर्ड की तरफ़ से उस संपत्ति का सर्वे किया जाता है, बाद में प्रशासन की तरफ़ से सर्वे किया जाता है, और जब ये क्लियर हो जाता है कि अमुक संपत्ति उसी व्यक्ति की है तभी कोई संपत्ति वक़्फ़ की जा सकती है अन्यथा नहीं।

वक़्फ़ होने के बाद वह संपत्ति अल्लाह के नाम हो जाती है। लेकिन अगर किसी ने उस ज़मीन का अतिक्रमण कर रखा है, या पहले से वक़्फ़ की हुई ज़मीन पर क़ब्ज़ा करके बैठा है, तो इसकी सूचना मिलने पर- सरकार द्वारा बनाए गये वक़्फ़ बोर्ड की तरफ़ से Chief Executive Officer यानी वक़्फ़ का सीईओ उस व्यक्ति को नोटिस भेजेगा जिसने वक़्फ़ की ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर रखा है। इसके साथ ही वक़्फ़ की तरफ़ से इनक्वायरी की जाएगी कि वह ज़मीन वक़्फ़ की ही है या नहीं। डॉक्युमेंट्स देखे जाएँगे। अगर वक़्फ़ बोर्ड इस बात से कन्विंस हो जाएगा कि हाँ ये संपत्ति वक़्फ़ की है और इसपर क़ब्ज़ा किया हुआ है तो वक़्फ़ बोर्ड, वक़्फ़ ट्रिब्यूनल के पास एक एप्लिकेशन देगा कि वक़्फ़ की हुई ज़मीन से क़ब्ज़ा हटवाया जाए। वक़्फ़ ट्रिब्यूनल एक सरकारी कोर्ट है जिसमें सरकारी अधिकारी और सरकारी जज होता है। सरकारी जज ही इसका चेयरमैन होता है। कोई मुस्लिम मौलाना नहीं;

अब ये सरकारी- वक़्फ़ ट्रिब्यूनल तय करेगा कि ज़मीन वक़्फ़ की है कि नहीं, और उसके अकॉरडिंग ही डिसिजन देगा।

इसके बाद भी अगर किसी को लगता है कि उसके साथ ग़लत हुआ है तो वो हाईकोर्ट जा सकता है। और ये चीज किसी भी धर्म से जुड़ी ज़मीन/संपत्ति को लेकर हो सकती है। हर जगह लगभग यही प्रोसेज है, इसलिए ऐसा कुछ नहीं है कि वक़्फ़ बोर्ड में अलग से है।

वक़्फ़ बोर्ड वैसे ही है जैसे बाक़ी धर्मों के मंदिर मठों के लिए क़ानून और ट्रस्ट बनाए गये- जैसे- Shri Jagannath Puri ACt 1955, Shri SiddhiVinayak Ganpati Temple Trust Act, Jammu and Kashmir Mata Vaishno Devi Shrine Act, अभी हाल ही में जैन बोर्ड बनाए जाने की बात की गई। सिखों के गुरुद्वारों को चलाने का काम भी गुरुद्वारा कमिटी करती है। सब धर्मों के ट्रस्ट और बोर्ड्स को उनके ही धर्म से जुड़े लोग चलाते हैं, ऐसा इसलिए ताकि किसी भी धर्म या वर्ग को ये ना लगे कि सरकार उनके धर्म के काम में हस्तक्षेप कर रही है। वैसे ही वक़्फ़ में है।

ये स्पष्ट है कि कोई ज़मीन वक़्फ़ है या नहीं ये तय करने का काम- वक़्फ़ ट्रिब्यूनल का है। ना कि वक़्फ़ बोर्ड का इसमें इकतरफ़ा अधिकार है। वक़्फ़ ट्रिब्यूनल पूरी तरह सरकारी ट्रिब्यूनल है, जैसे बाक़ी ट्रिब्यूनल होते हैं।

दूसरी बात अगर आप वक़्फ़ ट्रिब्यूनल के फ़ैसले से सहमत नहीं हैं तो इसके ख़िलाफ़ हाईकोर्ट जा सकते हैं। हाईकोर्ट देखेगा कि वक़्फ़ ट्रिब्यूनल (सरकारी जज) ने फ़ैसला सही दिया है या नहीं? लीगली दिया है कि नहीं? अगर हाईकोर्ट को इसमें कुछ भी गड़बड़ लगती है तो हाईकोर्ट उस फ़ैसले को बदल सकता है। संसोधित कर सकता है।

अगर वक़्फ़ बोर्ड के कहने से ज़मीन उसकी हो जाती तो आज वक़्फ़ बोर्ड सैकड़ों मामलों के लिए कोर्ट्स में नहीं लड़ रहा होता। ये सिर्फ़ अफ़वाहें, ताकि आप सरकार का समर्थन करने लगें।

वक़्फ़ बोर्ड के मामले को समझने के लिए मेरी वीडियो देख सकते हैं। वीडियो का लिंक-

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