जल, जंगल, जमीन और जमराज

‘जमराज’ जब गाँव में पहुँचते है तो वहाँ के कुत्ते निहायत समाजवादी ढंग से उनके साथ कोई वर्गभेद किये बगैर वैसे ही दौड़ाते हैं, जैसे वे रात्रिकाल में बड़े ही खतरनाक ढंग से आम इंसान की खोज-खबर लेते हैं। बेचारे यमराज का पारंपरिक वाहन जान बचाकर कहीं भाग जाता है, कुत्ते उनके कुर्ते को चीथ डालते हैं, उनका रत्नजड़ित गदा व मुकुट धराशायी हो जाता है और इस पर भी तुर्रा यह कि एक ग्रामीण उन्हें चोर समझकर दबोच लेता है। 

यमराज जब बड़ी मुश्किल से यकीन दिलाते हैं कि वे ‘ओरिजिनल जमराज’ हैं तो ग्रामीण छूटते ही उनसे पूछता है, ‘‘ आपके नर्क और हमारे भारत देश में क्या फर्क है, भगवन् ! आपके नर्क की सारी सुविधायें तो हमारे गाँव में ही उपलब्ध हैं।’’ संयोग से यह नाटक जिस गाँव में खेला जा रहा था वह मंडला जिले का एक आदिवासी बहुल गाँव और जो देश के विकास के तमाम दावों के बावजूद पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य -संबंधी बुनियादी जरूरतों से महरूम है। गाँव का एक नवयुवक थोड़े संकोच के साथ सवाल करता है, ‘‘सर आप तो कभी हमारे गाँव में नहीं आये, पर आपके नाटक में हमारी सारी बातें कैसे आ गयीं।’’ 

 गाँव का नाम दादर है। जाहिर है कि यह वह दादर नहीं है जो मुंबई में हुआ करता है, जिसमें एक पुल हुआ करता है, पुल के नीचे बच्चे हुआ करते हैं और उन बच्चों पर कृशन चंदर नॉवेल लिखा करते हैं। कृशन चंदर अब नहीं हैं और उनकी गैर मौजूदगी में दादर पुल के बच्चों की खबर लेने के लिये बहुत सारे एन.जी.ओ. पैदा हो गये हैं। दादर की खबर लेने वाला कोई नहीं है जो छत्तीसगढ़ के बड़े शहरों को मंडला से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 12-ए से महज 30 किलोमीटर की और अपने जिला मुख्यालय से केवल 100 किलोमीटर की दूरी पर है। इस भौगोलिक दूरी को अगर विकास के पैमाने पर नापा जाये तो दादर कोई 100 प्रकाश वर्ष की दूरी पर तो होगा ही। इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि इस छोटे-से गाँव में महज दो गायें हैं और ये जब घास खाने का प्रयास करती हैं तो उनके जबड़ों में सिवाय मिट्टी के कुछ नहीं जाता। इस बंजर-सी भूमि को गाँव के बैगा जनजाति के बाशिन्दे जब हाड़तोड़ मेहनत के साथ उपजाऊ बनाने का प्रयास करते हैं तो जंगल महकमे के कारिन्दे उनसे सवाल करते हैं, ‘‘ये जमीन क्या तुम्हारे बाप की है?’’

 हालिया समय में यही सवाल सबसे बड़ा है कि जमीन किसके बाप की है? यह सवाल नयी सरकार की कार्यसूची में सबसे ऊपर है और दौरे-हाजिर की समूची राजनीति इसी सवाल की धूरी पर घूम रही है। नैसर्गिक रूप से किसी भी हल्के में जमीन के असली मालिकान वहां के मूल निवासी होते हैं। यह अधिकार प्रकृति प्रदत्त है। कोई भी सरकार उन्हें पट्टा देने की बात कहती है तो वह एक तरह से जन कल्याण का ढोंग होता है क्योंकि आपने उनके वारिसों से यह अधिकार बल पूर्वक छीना हुआ होता है। लेकिन जब सरकारों ने समरमायेदारों को ही जमीनों का बाप मुकर्रर करने का अनुबंध कर रखा हो तो हाशिये पर पड़े लोग जमीन की मिल्कियत मांगने की गुस्ताखी भला कैसे कर सकते हैं? सरकार उनकी तभी सुनती है जब वे ‘वामपंथी उग्रवाद’ के रास्ते पर चले जाने को मजबूर हो जाते हैं और अक्सर जंगलों मे रहने वाले आदिवासियों के हक की आवाज उठाने वालों को बगैर किसी सोच के ‘नक्सली’ कह देना तो आजकल फैशन जैसा हो गया है। शुरू-शुरू में छोटू परस्ते के साथ भी यही हुआ।

 छोटू परस्ते मंडला जिले के परसेर ग्राम पंचायत के सरपंच है। टोपीविहीन गांधीवादी हैं। मेहनतकश हैं। शराब से दूर रहते हैं और ग्रामीणों के बीच भी इसका प्रचार करते हैं। जनसेवा की लत किशोरावस्था से ही लग गयी थी। बैगाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को देखकर चिंतित रहते थे सो ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होने के बावजूद उनका एक सर्वे कराया। यह सर्वे मेढ़ा ग्राम पंचायत के लूरी नामक गांव में किया गया। इस गाँव में जमीनें ज्यादातर सवर्णों के पास थीं और बैगाओं की हैसियत केवल मजदूरों की। कुछ बैगा बाँस से बनी हुई टोकर-सूपा आदि भी बनाते थे पर वे केवल स्थानीय बाजारों में बिकती थीं और एक टोकरी या सूपा के महज 20-30 मिल पाते थे। सामान नहीं बिका तो फाकाकशी की नौबत आती थी। बच्चों के स्कूल जाने का सवाल ही नहीं था। प्रसंगवश यह बताना असंगत नहीं होगा कि बैगा जनजाति के लोग किसी जमाने में अर्द्ध खानाबदोश की भांति जीवन यापन करते थे और ‘शिफ्टिंग कल्टीवेशन’ पर भरोसा करते थे। इसका मुख्य कारण यह रहा कि ये परंपरा से ही प्रकृति प्रेमी हैं, धरती को सचमुच ही अपनी माँ कहते हैं और एक ही जगह टिककर खेती करना एक तरह से माँ के सीने को चीरने जैसा है। लेकिन अब जंगलों की हदबंदी हो गयी है। वन अभयारण्य हो गये हैं। बाघों के संरक्षण के लिये प्रोजेक्ट टाइगर बन गये हैं। वनभूमि जब सीमित हो जाये और वन का मालिकाना हक वन-विभाग को मिल जाये तो घूम-घूमकर खेती करना संभव नहीं होगा, बल्कि इसके लिये एक जगह टिकना होगा और टिकने के लिये जमीन की दरकार होगी। मजलूमों-वंचितों को जमीन जाहिर है कि कब्जे से ही मिलेगी और इस कब्जे के लिये बैगाओं को छोटू परस्ते ने प्रेरित किया। यही छोटू परस्ते वन विभाग के आँखों की किरकिरी बने हुए हैं।

लूरी गाँव निचली सतह पर है। दादर इसके ठीक ऊपर है। पहाड़ी-पथरीली जमीन है। भूरी-लाल रंगत लिये हुए। इसीलिये कहा गया कि यहाँ गाय जब घास चरने का प्रयास करती है तो मुँह में मिट्टी जाती है। ऐसी जमीन भला उपजाऊ कैसे हो सकती है? और अगर यहीं के मूल निवासी-जिनके पूर्वज यहाँ सदियों से निवास करते हों-जब जमीन को अनथक परिश्रम से खेती लायक बनाकर महज जीने-खाने लायक कोदो, कुटकी, धान उपजाने का प्रयास करते हों तो किसी भी चुनी हुई, जनतांत्रिक, समाजवादी सरकार को भला क्या आपत्ति हो सकती है? लेकिन यह आपत्ति उनके ‘वेज अर्नर्स’ नुमांइदों के माध्यम से सामने आती है और वे इन घरों में यह कहकर आग लगा देते हैं कि ‘जमीन क्या तुम्हारे बाप की है?’

 यह आरोप लूरी-दादर के बैगाओं का है कि वन विभाग के कारिन्दे कम से कम 5 से 6 बार उनकी झोपड़ियों में आग लगा चुके हैं। बैगाओं को जेल की हवा भी खानी पड़ी है। गरीबों के साथ बाकी सरकारी मुलाजिम जैसे बर्ताव करते हैं वह तो रोज ही होता है। पाठकगण क्षमा करें, उच्चतम आदर्शों वाली पत्रकारिता के न्यूनतम नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए यहाँ मैंने दूसरे पक्ष का राय जानने की कोशिश नहीं की है। जब सारा मीडिया सरमायेदारों के हाथों बिक गया हो और वहाँ बड़े-बड़े तीसमार खां पत्रकार रोजाना उनके पक्ष में एकतरफा रिपोर्टिंग कर रहे हों तो हुजूर हमें भी इस मामले में बख्श दिया जाये। भोले-भाले निरीह बैगा अभी अपने जैसे आधुनिक और समझदार नहीं हुए हैं कि वे झूठ बोल सकें।

 दादर में कुल 42 परिवार हैं। 40 बैगाओं के, 1 गोंड का और 1 अन्य पिछड़ी जाति का। जैसा कि पहले भी बताया गया छोटू परस्ते द्वारा उन्हें खेती करने के लिये प्रेरित करने से पहले वे लूरी में रहते थे और मजदूरी करते थे। अब उन्होंने दादर की कोई 500 एकड़ जमीन में कब्जा किया है। पानी के लिये स्वयं एक सामुदायिक कुआँ खोदा है। कहीं किसी घर में एकाध पक्का शौचालय भी दिख जाता है पर असल हालात् एक ही नज़र में दिखाई पड़ जाते हैं। बुजुर्ग महिला सुंदरी बाई कहती हैं कि उन्हें बहुत ज्यादा की चाहत नहीं है। दादर में बसने से उन्हें सबसे बड़ा लाभ यही हुआ है कि वे किसी पर आश्रित नहीं हैं और “कृषियुग” में प्रवेश के बाद थोड़ा-बहुत कोदो, कुटकी, धान उगाकर आत्म सम्मान की जिंदगी बसर कर रहे हैं। पर चूंकि उन्हें जमीन का पट्टा हासिल नहीं है इसलिये सरकारी रेकार्ड के अनुसार वे मानव नहीं, बल्कि उपमानव हैं और विकास की पवित्र योजनाएं उन्हें छूकर नापाक हो जायेंगी। छोटू परस्ते के ‘गुरूजी’ चंद्रशेखर गुस्से में कहते हैं कि उन्हें भले ही किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिले पर सरकार को यह तो बताना चाहिये कि वे देश के नागरिक हैं या नहीं और उन्हें नागरिक अधिकार मिलना चाहिये या नहीं? वे कहते हैं कि यह काम कोई संवेदनशील अधिकारी कर सकता है, वेतनभोगी नहीं जिसे सिर्फ महीने के अंत में अपने वेतन-भत्तों की चिंता हो। वे कहते हैं कि अंचल के आस-पास के स्कूलों में भारत का एक नक्शा तक उपलब्ध नहीं है। बच्चे पंजाब, सिंध, गुजरात गाते तो हैं पर ये किस चिड़िया का नाम है, उन्हें नहीं पता। कलेक्टर साहब दौरे पर आते हैं तो कार से नीचे नहीं उतरते। स्कूल का मुआइना नहीं करते। बच्चों से सवाल करते हैं, ‘खाना ठीक मिलता है।’ ऐसा लगता है जैसे वे स्कूल का नहीं किसी होटल का निरीक्षण करने निकले हों। कहते हुए उनकी आवाज तल्ख हो जाती है। गुस्से में कहते हैं, पहले शेरों को मारा गया और अब उनके लिये पड़ोस के जंगलों में प्रोजेक्ट टाइगर बनाया गया है। आदमी की जान की कोई कीमत नहीं है। बैगा यहाँ के मूल निवासी हैं पर उनकी तादाद तेजी से घट रही है। शायद भविष्य में उनके लिये भी कोई प्रोजेक्ट लाया जाए पर फिलहाल उनके बचने की कोई सूरत नजर नहीं आती।

 गुरूजी उर्फ चंद्रशेखर दुर्लभ प्रजाति के जीव हैं। उनका धर्म, उनकी जाति, उनका शौक, उनका व्यवसाय साहित्य का अध्ययन करना है। अध्ययन में बाधा नहीं आये इसलिये जंगलों में कुटिया बनाकर रहते हैं। नित्यकर्म के अलावा दो रोटियाँ बनाने-खाने में जितना वक्त जाया होता है उसे छोड़कर सारा दिन अध्ययन करते हैं, 77 साल की उम्र में ठाठ से जंगलों में पैदल घूमते हैं और जंगली लोगों से बाते करते हैं। उनकी यही सनक उन्हें बैगाओं के बीच ले गयी और अब वे शिद्दत से चाहते हैं कि उन्हें उप-मानव से मानव का दर्जा दिलाया। इप्टा की नाटक मंडली को आमंत्रित करते हुए उन्होंने कहा कि ‘ इनकी जिंदगी कठिन है। मैं इन्हें एक बार मुस्कुराते हुए देखना चाहता हूँ।‘

 और मैं उन्हें नाटक देखते हुए देख रहा था। ‘चूरन साहेब लोग जो खाता, सारा हिंद हजम कर जाता। चूरन पुलिस वाले जो खाते, सब कानून हजम कर जाते’’ – इस गीत पर बैगा नवयुवक धनीसिंग की चेहरे पर मुस्कान नहीं आती। मैंने देखा कि उसके जबड़े कसे हुए थे। मुट्ठियां खुलती थीं और बंद होती थीं। जब ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ में खुद राजा फाँसी पर चढ़ता है तो उसकी आँखों में एक अजीब-सी चमक आती है। इस चमक के पीछे शायद एक भरोसा था कि चौपट राजाओं की अंधेर नगरियों के दिन कभी तो फिरेंगे।

लेखक दिनेश चौधरी से संपर्क : iptadgg@gmail.com

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