सुख-दुख
सुनील चतुर्वेदी- खर्च कम, आमदनी ज्यादा फिर भी बाबू ठन-ठन गोपाल! लो भला ऐसा भी कहीं होता है! कुछ तो भी! मेरी बात पर...
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सुनील चतुर्वेदी- खर्च कम, आमदनी ज्यादा फिर भी बाबू ठन-ठन गोपाल! लो भला ऐसा भी कहीं होता है! कुछ तो भी! मेरी बात पर...
सुनील चतुर्वेदी- यह साल 2007-08 की बात होगी। मुझे देवास ज़िले के गाँव हरणावदा से पानी पर केंद्रित एक अनूठे कार्यक्रम का आमंत्रण मिला।...
सुनील चतुर्वेदी- मैं सन् नब्बे के दशक में अपने काम के सिलसिले में मध्यप्रदेश के कई गावों में घूमते हुए पानी को लेकर बदलता...
सुनील चतुर्वेदी- बात 1985 की है। यह साल भू-जल वैज्ञानिक के रूप में मेरे काम का शुरुआती साल था। मध्यप्रदेश के राजगढ़ ज़िले के...
सुलोचना आजकल “जलोपाख्यानम” लिख रही हैं। चेन्नई के जल संकट से धीरे धीरे पूरी दुनिया वाकिफ हो चुकी है। आईटी फील्ड की सुलोचना को...
Nilotpal Mrinal : गाँव में हूं, पहले ये बता दूँ। रात का खाना है। पत्तल में खा रहा हूं। इसका कारण ये सब बिलकुल...
‘जमराज’ जब गाँव में पहुँचते है तो वहाँ के कुत्ते निहायत समाजवादी ढंग से उनके साथ कोई वर्गभेद किये बगैर वैसे ही दौड़ाते हैं,...