आरटीआई से खुलासा: अखबार मालिकों को सरकार द्वारा दी गयी जमीन के कागजात हुए आग के हवाले

पत्रकारों और गैर पत्रकारों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देने में सुप्रीमकोर्ट के आदेश को भी ठेंगा दिखा रहे महाराष्ट्र के अखबार मालिकों के बारे में सरकारी लापरवाही की एक और दास्ताँ सामने आई है। महाराष्ट में पूर्व की सरकार ने अखबार मालिकों को लाभ देने के तहत कौड़ियों के दाम पर बेशकीमती जमीन आवंटित की थी। इन सरकारी जमीनों को सस्ते दर पर पाकर अखबार मालिकों ने मुंबई से सटे नयी मुम्बई में अपने प्रेस तक बैठा लिए। मगर सरकार के पास इन जमीनों के आवंटन का कोई विवरण नहीं है।वजह बताई गयी है ये कागजात आग के हवाले हो गए हैं।

मुम्बई के निर्भीक पत्रकार और आर टी आई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह ने  4 जुलाई 2016 को आर टी आई के जरिये महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री कार्यालय से जानकारी माँगी थी कि महाराष्ट्र के किस किस समाचार पत्र प्रतिष्ठानों को सरकारी जमीन आवंटित की गयी है और किस दर से और कितनी जमीन आवंटित की गयी।इस पत्र को इस विभाग से उस विभाग घुमाया गया।शशिकांत सिंह ने सुचना न मिलने पर अपील दायर किया जिसके बाद महाराष्ट्र सरकार के

राजस्व एवं वन विभाग के अपर सचिव श्रीकृष्ण पवार ने 12 सितंबर 2016 को भेजे गए पत्र में शशिकांत सिंह को चौकाने वाली जानकारी दी है।श्री पवार ने बताया है कि 21 जून 2012 को महाराष्ट्र के मंत्रालय इमारत के कुछ हिस्सों में आग लग गयी जिसमे इस कार्यालय से जुड़े सभी अभिलेख नष्ट हो गए।जिसके कारण 21 जून 2012 से पहले का कोई भी रिकार्ड हमारे पास उपलब्ध नहीं है। और 21 जून 2012 के बाद किसी भी समाचार पत्र प्रतिष्ठान को कोई भी जमीन आवंटित नहीं की गयी है

अब सवाल ये उठता है कि क्या महाराष्ट्र सरकार के पास इन रिकार्डो का बैकअप नहीं था।अगर नहीं तो ये किसकी लापरवाही थी।अगर सरकार के पास बैकअप नहीं है तो जिलाधिकारी कार्यालय से भी ये जानकारी मंगाई जा सकती थी।जिलाधिकारी के पास तो पक्का रिकार्ड होगा।दूसरा सवाल ये उठता है कि अगर सरकारी रिकार्ड जल गए और इन अखबार मालिकों ने दुबारा सरकारी जमीन के लिए आवेदन किया तो सरकार के पास बचने का क्या उपाय होगा। वो तो उन्हें दुबारा कौड़ियों के भाव जमीन दे देगी ।
फिलहाल सरकार की इस घोर  लापरवाही की हर तरफ  निंदा होगी।इसके लिए सरकार को तैयार होना होगा।

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आर्थिक सुधारों के ढाई दशक में कृषि क्षेत्र ही सर्वाधिक उपेक्षित हुआ है : अखिलेन्द्र

: भूमि अधिग्रहण अध्यादेश नहीं समग्र भूमि उपयोग नीति की देश को जरूरत : आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने वाराणसी में आयोजित स्वराज्य संवाद को बतौर अतिथि सम्बोधित करते हुए एनडीए की मोदी सरकार द्वारा तीसरी बार भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश लाने के फैसले की सख्त आलोचना की और इसे मोदी सरकार का लोकतंत्र विरोधी कदम कहा। उन्होंने समग्र भूमि उपयोग नीति के लिए राष्ट्रीय आयोग के गठन को देश के लिए जरुरी बताते हुए कहा कि जमीन अधिग्रहण का संपूर्ण प्रश्न जमीन के बड़े प्रश्न का महज एक हिस्सा है। 2013 का कानून पूरे मुद्दे को सरकारी और निजी एजेसियों द्वारा उद्योग और अधिसंरचना के विकास बनाम जमीन मालिकों और जमीन आश्रितों के हितों के संकीर्ण व लाक्षणिक संदर्भ में पेश करता है। 2013 का कानून बाजार की तार्किकता के बृहत दायरे के भीतर ही इसकी खोजबीन करता है।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि जमीन-लूट के विरुद्ध किसान-आदिवासी प्रतिरोध सहमति व मुआवजे से आगे बड़े बुनियादी मुद्दों को उठाता है। इस विमर्श में सामाजिक विवेक के आधार पर जमीन एवं खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग शामिल है। बाजार-प्रक्रिया में अंतर्निहित विकृत्तियां सट्टेबाज वित्तीय पूंजी से बढावा पाती है। अंधाधुध निजी मुनाफाखोरी के आगे जनहित के लक्ष्य की प्राप्ति वस्तुतः असंभव है। इस प्रक्रिया में खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण व इकोलाजिकल संतुलन की सामाजिक तौर पर अनदेखी की जाती है। इससे पैदा हो रहे सामाजिक असंतुलन में संपत्ति, संसाधनों व शक्ति के चुनिंदा कार्पोरेट घरानों के हाथों तेजी से संकेन्द्रण के कारण भारी पैमाने पर किसानों-ग्रामीणों की बेदखली व दरिद्रीकरण होता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इन बड़े प्रश्नों का हल तब तक असंभव है जब तक कि बाजार की तार्किकता (Market Rationality) को पूर्णतः सामाजिक विवेक (Social Rationality) के सिद्धांत के मातहत नहीं लाया जाता।

अखिलेन्द्र ने कहा कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मानक वर्ष में बदलाव कर सात प्रतिशत से ज्यादा की जीडीपी दर दिखाकर भले ही मोदी सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है। सच यह है कि पिछले दशक के इस वित्तीय वर्ष में लोगों की क्रय शक्ति में सबसे ज्यादा गिरावट आयी है और रोजगार के अवसर घटे हैं। दरअसल देश की आधी से ज्यादा आबादी खेती किसानी पर निर्भर है। देश की 47.2 करोड़ की श्रमशक्ति में कृषि और उससे संबद्ध क्षेत्र 23 करोड़ लोगों को रोजगार मुहैया कराता है। आर्थिक सुधारों के ढाई दशकों में कृषि क्षेत्र ही सर्वाधिक उपेक्षित हुआ है। मोदी सरकार के एक वर्ष में तो देश की कृषि विकास दर शून्य पर आकर टिक गई है व ऋणात्मक विकास को प्रदर्शित कर रही है।

कृषि की उपेक्षा को सम्पूर्ण बजट में उसकी हिस्सेदारी से समझा जा सकता है। वर्ष 2014- 15 के इस सरकार द्वारा 16.81 लाख करोड़ के बजट में कृषि और सहकारिता के क्षेत्र को जहां केन्द्र व राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में कुल 22651.75 करोड़ रुपए आंवटित हुए थे वहीं इस वर्ष 17.77 लाख करोड़ के बजट में इस क्षेत्र में 17003.85 करोड़ रुपए आवंटित कर सरकार ने 5647.69 करोड़ की कटौती कर दी है। (व्यय बजट, अवस 1, 2015-16) कृषि संकट के कारण हर महीने करीब दस लाख लोग गैर-कृषि क्षेत्र में दाखिल होते हैं मगर निर्माण क्षेत्र को छोड़ दें तो नए रोजगार पैदा नहीं हो रहे है। आईटी, आटोमोटिव एवं दवा जैेसेे क्षेत्र भी भारी श्रमशक्ति को कतई समाहित नहीं कर सकते। कृषि और कृषि आधारित उद्योग ही रोजगार के संकट को हल कर सकते है। कारपोरेट पूंजी के विकास पर निर्भर होकर कृषि और रोजगार के संकट को कतई हल नहीं किया जा सकता। स्पेशल इकनोमिक जोन पर संसद में 2014 में पेश सीएजी की रिर्पोट कहती है कि सेज का मकसद आर्थिक विकास, माल एवं सेवाओं के निर्यात को प्रोत्साहन, घरेलू एवं विदेशी निवेश को बढ़ावा, रोजगार सृजन और अधिसंरचनात्मक सुविधाओं का विकास करना था। जबकि राष्ट्रीय डाटाबेस में यह साफ तौर पर दिखता है कि सेज के क्रियाकलापों से इन क्षेत्रों में कोई विकास नहीं हुआ।

152 सेजों के अध्ययन से सीएजी ने कहा कि रोजगार के अवसर बढ़े नहीं है। दूसरी बात यह भी गौर करने लायक है कि विकास के लिए जमीनें किसानों से ली गयी लेकिन बिल्डरों ने सरकार से मिलकर जमीनों का अच्छा खासा हिस्सा हथिया लिया। सीएजी रिर्पोट कहती है कि सेज के लिए देश में 45635.63 हेक्टयर जमीन अधिग्रहित की गयी जिसमें 28488.49 हेक्टयर जमीन में ही काम शुरू हुआ। सेज के लिए ली गयी जमीनें ‘‘सार्वजनिक उपयोग‘‘ के लिए ली गयी जिनका व्यावसायिक उपयोग किया गया। मोदी सरकार किस कदर झूठ बोलती है इसको इस सरकार के सिंचाई के सम्बंध में किए जा रहे दावे से समझा जा सकता है। सरकार ने पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष सिंचाई के बजट में तीन सौ करोड़ रुपए की कटौती कर दी है और जिस प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की बड़ी बातें हो रही है उसे महज 1000 करोड़ रुपए ही बजट में आवंटित किए गए है।

आइपीएफ राष्ट्रीय संयोजक ने आंदोलन के मुद्दे को सूत्रबद्ध करते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश तत्काल वापस लिया जाए और जनपक्षधर, वैज्ञानिक, आजीविकाहितैषी, खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने वाली और पर्यावरणहितैषी राष्ट्रीय भूमि उपयोग नीति के निर्माण के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन हो जो निश्चित समय सीमा में अपनी संस्तुति दे और तद्नुरुप कानून बनाया जाए, गैर कृषि उपयोग एवं कारपोरेट हितों के लिए कृषियोग्य जमीन के हस्तांतरण पर कड़ाई से रोक लगायी जाए, किसान आंदोलन के रूप में सहकारी आंदोलन, जो क्रेडिट, विपणन, लागत सामग्री की आपूर्ति एवं उत्पाद का प्रसंस्करण, अन्य सेवाएं, और सर्वोपरि खेती को समेटे हुए हो।

राज्य समर्थित कार्यक्रम के मकसद की तर्कसंगत समयसीमा में गारंटी की जानी चाहिए, जो कृषि कार्यशक्ति का शहरी व अर्द्धशहरी इलाकों में पलायन को कम करेगा और कम से कम औसतन राष्ट्रीय आय के बराबर प्रति व्यक्ति की दर से इस कार्यशक्ति को कार्यस्थल या उसी जल संभारक इलाके में ही अतिरिक्त श्रम के जरिए रोजगार की गारंटी की जानी चाहिए। यह हमारी औद्योगिक नीति के दायरे में बदलाव की मांग करेगा। यह ‘‘वैश्विक प्रतिस्पद्र्धी औद्योगीकरण’’ की मौजूदा मोहग्रस्तता से हटने का समावेशन करेगा और ‘‘रोजगार-केन्द्रित, जन उपभोग अनुकूल एवं गांव आधारित औद्योगीकरण’’ के पक्ष में बदलाव का वाहक बनेगा। अखिलेन्द्र ने कहा कि मोदी सरकार के विरूद्ध किसानों में अविश्वास का वातावरण है ऐसी स्थिति में देश की सभी आंदोलन की ताकतों को एक साथ आकर किसान सवालों पर इस सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ आंदोलन तेज करना होगा।

द्वारा जारी
दिनकर कपूर
संगठन प्रभारी
आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ)
उत्तर प्रदेश

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NAPM Request to the Joint Parliamentary Committee for Compensation and Transparency in Land Bill 2015

New Delhi : Responding to the newspaper advertisements inviting submissions from the public at large on “The Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement (Second Amendment Bill, 2015), NAPM, an alliance of 250 plus people’s movements from across the country led by Medha Patkar has asked for extending the time for receiving inputs from public.

In a letter addressed to S S Ahluwalia, Chairperson, of the Committee, they said, After the consistent pressure and opposition, the NDA government has referred this to the Joint Parliamentary Committee headed by you and consisting of members of both the houses. However, your Committee has only given a two week notice to make submissions, which we feel is extremely insufficient for many groups and mass organisations to detail threadbare and bring out their comments, which requires more time.

they said, Through this letter, we also want to suggest that Joint Parliamentary Committee must reach out to the farmers and workers of this country and hold wider consultations, public meetings and public hearings on the Bill. The majority of Indian citizens affected by land acquisition live in rural areas, so it is necessary and important to hold consultations to discuss the current draft in rural areas, especially where local communities have been affected by past or present experiences of land acquisition, rehabilitation and resettlement. From Kalinga Nagar and Dhinkia to Narmada, Sompetta, Raigarh, Madurai, Mundra, Kanhar, Bhatta Parsaul, Jashpur, Dholera, and many others, people resisting illegal land acquisitions will welcome the move of the Committee and democratic spirit of engagement behind that.

they said, We understand that the Committee wants to complete its deliberations at the earliest; however, the matter of this importance can’t be dealt away in such hurry. We believe that 2013 Act, amended after 114 years, and having vetted by two Parliamentary Standing Committees and debated over seven years inside and outside the Parliament should be given more time for deliberation.

they said, We sincerely hope that the Committee would give due recognition to our demand and extend the deadline for the submissions atleast by a month until July 8th and also organise wider public consultations and hearings in affected areas, as has been done on previous occasions by the other Committees.

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जल, जंगल, जमीन और जमराज

‘जमराज’ जब गाँव में पहुँचते है तो वहाँ के कुत्ते निहायत समाजवादी ढंग से उनके साथ कोई वर्गभेद किये बगैर वैसे ही दौड़ाते हैं, जैसे वे रात्रिकाल में बड़े ही खतरनाक ढंग से आम इंसान की खोज-खबर लेते हैं। बेचारे यमराज का पारंपरिक वाहन जान बचाकर कहीं भाग जाता है, कुत्ते उनके कुर्ते को चीथ डालते हैं, उनका रत्नजड़ित गदा व मुकुट धराशायी हो जाता है और इस पर भी तुर्रा यह कि एक ग्रामीण उन्हें चोर समझकर दबोच लेता है। 

यमराज जब बड़ी मुश्किल से यकीन दिलाते हैं कि वे ‘ओरिजिनल जमराज’ हैं तो ग्रामीण छूटते ही उनसे पूछता है, ‘‘ आपके नर्क और हमारे भारत देश में क्या फर्क है, भगवन् ! आपके नर्क की सारी सुविधायें तो हमारे गाँव में ही उपलब्ध हैं।’’ संयोग से यह नाटक जिस गाँव में खेला जा रहा था वह मंडला जिले का एक आदिवासी बहुल गाँव और जो देश के विकास के तमाम दावों के बावजूद पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य -संबंधी बुनियादी जरूरतों से महरूम है। गाँव का एक नवयुवक थोड़े संकोच के साथ सवाल करता है, ‘‘सर आप तो कभी हमारे गाँव में नहीं आये, पर आपके नाटक में हमारी सारी बातें कैसे आ गयीं।’’ 

 गाँव का नाम दादर है। जाहिर है कि यह वह दादर नहीं है जो मुंबई में हुआ करता है, जिसमें एक पुल हुआ करता है, पुल के नीचे बच्चे हुआ करते हैं और उन बच्चों पर कृशन चंदर नॉवेल लिखा करते हैं। कृशन चंदर अब नहीं हैं और उनकी गैर मौजूदगी में दादर पुल के बच्चों की खबर लेने के लिये बहुत सारे एन.जी.ओ. पैदा हो गये हैं। दादर की खबर लेने वाला कोई नहीं है जो छत्तीसगढ़ के बड़े शहरों को मंडला से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 12-ए से महज 30 किलोमीटर की और अपने जिला मुख्यालय से केवल 100 किलोमीटर की दूरी पर है। इस भौगोलिक दूरी को अगर विकास के पैमाने पर नापा जाये तो दादर कोई 100 प्रकाश वर्ष की दूरी पर तो होगा ही। इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि इस छोटे-से गाँव में महज दो गायें हैं और ये जब घास खाने का प्रयास करती हैं तो उनके जबड़ों में सिवाय मिट्टी के कुछ नहीं जाता। इस बंजर-सी भूमि को गाँव के बैगा जनजाति के बाशिन्दे जब हाड़तोड़ मेहनत के साथ उपजाऊ बनाने का प्रयास करते हैं तो जंगल महकमे के कारिन्दे उनसे सवाल करते हैं, ‘‘ये जमीन क्या तुम्हारे बाप की है?’’

 हालिया समय में यही सवाल सबसे बड़ा है कि जमीन किसके बाप की है? यह सवाल नयी सरकार की कार्यसूची में सबसे ऊपर है और दौरे-हाजिर की समूची राजनीति इसी सवाल की धूरी पर घूम रही है। नैसर्गिक रूप से किसी भी हल्के में जमीन के असली मालिकान वहां के मूल निवासी होते हैं। यह अधिकार प्रकृति प्रदत्त है। कोई भी सरकार उन्हें पट्टा देने की बात कहती है तो वह एक तरह से जन कल्याण का ढोंग होता है क्योंकि आपने उनके वारिसों से यह अधिकार बल पूर्वक छीना हुआ होता है। लेकिन जब सरकारों ने समरमायेदारों को ही जमीनों का बाप मुकर्रर करने का अनुबंध कर रखा हो तो हाशिये पर पड़े लोग जमीन की मिल्कियत मांगने की गुस्ताखी भला कैसे कर सकते हैं? सरकार उनकी तभी सुनती है जब वे ‘वामपंथी उग्रवाद’ के रास्ते पर चले जाने को मजबूर हो जाते हैं और अक्सर जंगलों मे रहने वाले आदिवासियों के हक की आवाज उठाने वालों को बगैर किसी सोच के ‘नक्सली’ कह देना तो आजकल फैशन जैसा हो गया है। शुरू-शुरू में छोटू परस्ते के साथ भी यही हुआ।

 छोटू परस्ते मंडला जिले के परसेर ग्राम पंचायत के सरपंच है। टोपीविहीन गांधीवादी हैं। मेहनतकश हैं। शराब से दूर रहते हैं और ग्रामीणों के बीच भी इसका प्रचार करते हैं। जनसेवा की लत किशोरावस्था से ही लग गयी थी। बैगाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को देखकर चिंतित रहते थे सो ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होने के बावजूद उनका एक सर्वे कराया। यह सर्वे मेढ़ा ग्राम पंचायत के लूरी नामक गांव में किया गया। इस गाँव में जमीनें ज्यादातर सवर्णों के पास थीं और बैगाओं की हैसियत केवल मजदूरों की। कुछ बैगा बाँस से बनी हुई टोकर-सूपा आदि भी बनाते थे पर वे केवल स्थानीय बाजारों में बिकती थीं और एक टोकरी या सूपा के महज 20-30 मिल पाते थे। सामान नहीं बिका तो फाकाकशी की नौबत आती थी। बच्चों के स्कूल जाने का सवाल ही नहीं था। प्रसंगवश यह बताना असंगत नहीं होगा कि बैगा जनजाति के लोग किसी जमाने में अर्द्ध खानाबदोश की भांति जीवन यापन करते थे और ‘शिफ्टिंग कल्टीवेशन’ पर भरोसा करते थे। इसका मुख्य कारण यह रहा कि ये परंपरा से ही प्रकृति प्रेमी हैं, धरती को सचमुच ही अपनी माँ कहते हैं और एक ही जगह टिककर खेती करना एक तरह से माँ के सीने को चीरने जैसा है। लेकिन अब जंगलों की हदबंदी हो गयी है। वन अभयारण्य हो गये हैं। बाघों के संरक्षण के लिये प्रोजेक्ट टाइगर बन गये हैं। वनभूमि जब सीमित हो जाये और वन का मालिकाना हक वन-विभाग को मिल जाये तो घूम-घूमकर खेती करना संभव नहीं होगा, बल्कि इसके लिये एक जगह टिकना होगा और टिकने के लिये जमीन की दरकार होगी। मजलूमों-वंचितों को जमीन जाहिर है कि कब्जे से ही मिलेगी और इस कब्जे के लिये बैगाओं को छोटू परस्ते ने प्रेरित किया। यही छोटू परस्ते वन विभाग के आँखों की किरकिरी बने हुए हैं।

लूरी गाँव निचली सतह पर है। दादर इसके ठीक ऊपर है। पहाड़ी-पथरीली जमीन है। भूरी-लाल रंगत लिये हुए। इसीलिये कहा गया कि यहाँ गाय जब घास चरने का प्रयास करती है तो मुँह में मिट्टी जाती है। ऐसी जमीन भला उपजाऊ कैसे हो सकती है? और अगर यहीं के मूल निवासी-जिनके पूर्वज यहाँ सदियों से निवास करते हों-जब जमीन को अनथक परिश्रम से खेती लायक बनाकर महज जीने-खाने लायक कोदो, कुटकी, धान उपजाने का प्रयास करते हों तो किसी भी चुनी हुई, जनतांत्रिक, समाजवादी सरकार को भला क्या आपत्ति हो सकती है? लेकिन यह आपत्ति उनके ‘वेज अर्नर्स’ नुमांइदों के माध्यम से सामने आती है और वे इन घरों में यह कहकर आग लगा देते हैं कि ‘जमीन क्या तुम्हारे बाप की है?’

 यह आरोप लूरी-दादर के बैगाओं का है कि वन विभाग के कारिन्दे कम से कम 5 से 6 बार उनकी झोपड़ियों में आग लगा चुके हैं। बैगाओं को जेल की हवा भी खानी पड़ी है। गरीबों के साथ बाकी सरकारी मुलाजिम जैसे बर्ताव करते हैं वह तो रोज ही होता है। पाठकगण क्षमा करें, उच्चतम आदर्शों वाली पत्रकारिता के न्यूनतम नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए यहाँ मैंने दूसरे पक्ष का राय जानने की कोशिश नहीं की है। जब सारा मीडिया सरमायेदारों के हाथों बिक गया हो और वहाँ बड़े-बड़े तीसमार खां पत्रकार रोजाना उनके पक्ष में एकतरफा रिपोर्टिंग कर रहे हों तो हुजूर हमें भी इस मामले में बख्श दिया जाये। भोले-भाले निरीह बैगा अभी अपने जैसे आधुनिक और समझदार नहीं हुए हैं कि वे झूठ बोल सकें।

 दादर में कुल 42 परिवार हैं। 40 बैगाओं के, 1 गोंड का और 1 अन्य पिछड़ी जाति का। जैसा कि पहले भी बताया गया छोटू परस्ते द्वारा उन्हें खेती करने के लिये प्रेरित करने से पहले वे लूरी में रहते थे और मजदूरी करते थे। अब उन्होंने दादर की कोई 500 एकड़ जमीन में कब्जा किया है। पानी के लिये स्वयं एक सामुदायिक कुआँ खोदा है। कहीं किसी घर में एकाध पक्का शौचालय भी दिख जाता है पर असल हालात् एक ही नज़र में दिखाई पड़ जाते हैं। बुजुर्ग महिला सुंदरी बाई कहती हैं कि उन्हें बहुत ज्यादा की चाहत नहीं है। दादर में बसने से उन्हें सबसे बड़ा लाभ यही हुआ है कि वे किसी पर आश्रित नहीं हैं और “कृषियुग” में प्रवेश के बाद थोड़ा-बहुत कोदो, कुटकी, धान उगाकर आत्म सम्मान की जिंदगी बसर कर रहे हैं। पर चूंकि उन्हें जमीन का पट्टा हासिल नहीं है इसलिये सरकारी रेकार्ड के अनुसार वे मानव नहीं, बल्कि उपमानव हैं और विकास की पवित्र योजनाएं उन्हें छूकर नापाक हो जायेंगी। छोटू परस्ते के ‘गुरूजी’ चंद्रशेखर गुस्से में कहते हैं कि उन्हें भले ही किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिले पर सरकार को यह तो बताना चाहिये कि वे देश के नागरिक हैं या नहीं और उन्हें नागरिक अधिकार मिलना चाहिये या नहीं? वे कहते हैं कि यह काम कोई संवेदनशील अधिकारी कर सकता है, वेतनभोगी नहीं जिसे सिर्फ महीने के अंत में अपने वेतन-भत्तों की चिंता हो। वे कहते हैं कि अंचल के आस-पास के स्कूलों में भारत का एक नक्शा तक उपलब्ध नहीं है। बच्चे पंजाब, सिंध, गुजरात गाते तो हैं पर ये किस चिड़िया का नाम है, उन्हें नहीं पता। कलेक्टर साहब दौरे पर आते हैं तो कार से नीचे नहीं उतरते। स्कूल का मुआइना नहीं करते। बच्चों से सवाल करते हैं, ‘खाना ठीक मिलता है।’ ऐसा लगता है जैसे वे स्कूल का नहीं किसी होटल का निरीक्षण करने निकले हों। कहते हुए उनकी आवाज तल्ख हो जाती है। गुस्से में कहते हैं, पहले शेरों को मारा गया और अब उनके लिये पड़ोस के जंगलों में प्रोजेक्ट टाइगर बनाया गया है। आदमी की जान की कोई कीमत नहीं है। बैगा यहाँ के मूल निवासी हैं पर उनकी तादाद तेजी से घट रही है। शायद भविष्य में उनके लिये भी कोई प्रोजेक्ट लाया जाए पर फिलहाल उनके बचने की कोई सूरत नजर नहीं आती।

 गुरूजी उर्फ चंद्रशेखर दुर्लभ प्रजाति के जीव हैं। उनका धर्म, उनकी जाति, उनका शौक, उनका व्यवसाय साहित्य का अध्ययन करना है। अध्ययन में बाधा नहीं आये इसलिये जंगलों में कुटिया बनाकर रहते हैं। नित्यकर्म के अलावा दो रोटियाँ बनाने-खाने में जितना वक्त जाया होता है उसे छोड़कर सारा दिन अध्ययन करते हैं, 77 साल की उम्र में ठाठ से जंगलों में पैदल घूमते हैं और जंगली लोगों से बाते करते हैं। उनकी यही सनक उन्हें बैगाओं के बीच ले गयी और अब वे शिद्दत से चाहते हैं कि उन्हें उप-मानव से मानव का दर्जा दिलाया। इप्टा की नाटक मंडली को आमंत्रित करते हुए उन्होंने कहा कि ‘ इनकी जिंदगी कठिन है। मैं इन्हें एक बार मुस्कुराते हुए देखना चाहता हूँ।‘

 और मैं उन्हें नाटक देखते हुए देख रहा था। ‘चूरन साहेब लोग जो खाता, सारा हिंद हजम कर जाता। चूरन पुलिस वाले जो खाते, सब कानून हजम कर जाते’’ – इस गीत पर बैगा नवयुवक धनीसिंग की चेहरे पर मुस्कान नहीं आती। मैंने देखा कि उसके जबड़े कसे हुए थे। मुट्ठियां खुलती थीं और बंद होती थीं। जब ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ में खुद राजा फाँसी पर चढ़ता है तो उसकी आँखों में एक अजीब-सी चमक आती है। इस चमक के पीछे शायद एक भरोसा था कि चौपट राजाओं की अंधेर नगरियों के दिन कभी तो फिरेंगे।

लेखक दिनेश चौधरी से संपर्क : iptadgg@gmail.com

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न्यूज चैनल के संवाद-सूत्र ने हड़पी आदिवासी बुजुर्ग की जमीन

छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के हस्तक्षेप के बाद भी धरमजयगढ़ राजस्व विभाग व जिला प्रशासन का सुस्त रवैया आदिवासी परिवार के लिए परेशानी कारण बना हुआ है। बताया गया है कि ईटीवी न्यूज के इनफार्मर ने एक आदिवासी परिवार की जमीन हड़प ली है और पीड़ित दर ब दर न्याय की गुहार लगाता डोल रहा है। 

आदिवासी किसान दिलसाव राठिया और उनके परिवार का न्याय व्यवस्था से भरोसा उठ गया है। फिर भी उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी है। पचहत्तर वर्षीय दिलसाव दुनिया छोड़ने से पहले अपना हक पाना चाहता है। उनकी जमीन पर गैरआदिवासी सजल मधु और अतुल मधु ने जबरन कब्जा कर लिया है। आरोपी ईटीवी न्यूज के इनफार्मर बताए जाते हैं। मामला एक दशक से राजस्व विभाग के पास विचाराधीन है। अब पीड़ित परिवार ने जनजाति आयोग से गुहार लगाई है। कब्जा करने वालो के बारे उसने आयोग को बताया है कि वे आपराधिक प्रवृत्ति के हैं। विरोध करने पर वे मारपीट करते हैं। इसकी कई बार थाने में भी शिकायत हो चुकी है, लेकिन पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करती है। अब इस मामले पर आयोग ने 30 अप्रैल तक जिला कलेक्टर को कार्यवाही सुनिश्चित करने को कहा है। 

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भूमि अधिग्रहण नहीं, देश को भूमि उपयोग नीति की जरूरत

आजादी के बाद से ही देश में अंग्रेजों के बनाए 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर बहस चल रही है लेकिन नई आर्थिक-औद्योगिक नीतियों के लागू होने के बाद जब देश में बड़े पैमाने पर कारपोरेट हितों में स्पेशल इकनॉमिक जोन, खनिज सम्पदा का दोहन और रियलस्टेट के लिए किसानों की जमीन हड़पने का अभियान प्रारम्भ हुआ तो जगह-जगह जमीन की रक्षा के लिए किसानों और आदिवासियों के तीखे संघर्ष शुरू हुए। जिन्होंने 1894 के कानून में मौजूद राज्य के ‘‘सर्वोपरि अधिकार‘‘ को चुनौती दी। 

किसानों के संघर्षों में बार-बार यह बात उठी कि राज्य को कारपोरेट के लिए बिचौलिये की भूमिका त्याग देनी चाहिए। इसी पृष्ठभूमि में संसद में भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता कानून 2013 पारित हुआ था। यूपीए का 2013 का यह कानून किसानों की जमीन लुटेरों से बचाने में नाकाफी है। यह कानून भी मूलतः किसान विरोधी चरित्र ही लिए हुए था और जमीन को जीविका के संसाधन के रूप में न लेते हुए माल के रूप में लेते हुए बाजार की शक्तियों के हवाले करना चाहता है। यह कानून कारपोरेट हितों के लिए जमीन खरीद में सरकार की बिचौलिये की भूमिका को बरकरार रखता है। इस कानून में भी 1894 के कानून की तरह राज्य के ‘‘सर्वोपरि अधिकार‘‘ को संरक्षित रखा गया है और कहा गया कि निजी व पब्लिक-प्राइवेट पाटर्नरशिप की योजनाओं के लिए भी सरकार ही जमीन का अधिग्रहण करेगी। इतना ही नहीं, धारा 9 और 40 में सरकार को तात्कालिकता के आधार पर जमीन अधिग्रहण का अधिकार भी प्रदान किया गया था, जिसके तहत अधिग्रहित जमीनों पर सहमति और सामाजिक प्रभाव आकलन के प्रावधान लागू नहीं होते। 

इस कानून में सार्वजनिक हित, पब्लिक सेक्टर और लोकप्रयोजन के लिए अधिग्रहीत की जाने वाली जमीनों के लिए मात्र सामाजिक प्रभाव आंकलन की आवश्यकता थी और किसानों की सहमति प्राप्त करना जरुरी नहीं था। फिर भी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप वाली परियोजनाओं के लिए सत्तर प्रतिशत और निजी क्षेत्र के लिए अस्सी प्रतिशत प्रभावित परिवारों की सहमति, सामाजिक प्रभाव का आंकलन, खाद्य सुरक्षा के लिए बहुफसली कृषियोग्य जमीन के अधिग्रहण को प्रतिबंधित करना आदि कई ऐसे प्रावधान थे, जो 1894 के कानून की तुलना में आगे बढ़े हुए थे। 

मोदी सरकार ने कारपोरेट हितों के लिए अपने संशोधनों के जरिए इन्हीं कुछ आगे बढ़े हुए कदमों को खत्मकर पुनः 1894 के कानून की स्थिति में ले जाने का काम किया है। सरकार ने मूल कानून 2013 के अध्याय 3 की धारा 10 जो खाद्यान्न सुरक्षा के संदर्भ में थी, जिसमें बहुफसली जमीन के अधिग्रहण पर रोक लगायी गयी थी, में संशोधित कानून में धारा 10 ’ए’ को जोड़ दिया है। अब पांच उद्देश्यों रक्षा, औद्योगिक गलियारा व इस गलियारे के दोनो तरफ एक किलोमीटर तक सड़क, रेल, वहनीय व गरीबों के लिए आवास, ग्रामीण अधिसंरचना व विद्युतीकरण, बुनियादी ढांचागत प्रोजेक्ट जिसमें पीपीपी माडल भी है, के लिए सरकार जमीन अधिग्रहीत कर सकती है और इसके लिए उसे सामाजिक प्रभाव अध्ययन, खाद्यान्न सुरक्षा सम्बंधी उपबंधों और विस्थापित परिवारों की सहमति लेने की जवाबदेही से बरी कर दिया गया है। 

इसका सीधा सा मतलब है कि सरकार इनमें से कोई भी कारण बता कृषियोग्य बहुफसली जमीन समेत हर तरह की जमीन अधिग्रहीत कर सकती है और पहले सरकारी फिर बंजर जमीनों के अधिग्रहण की बात व बंजर-बेकार पड़ी जमीनों के सर्वे का संशोधित प्रावधान कोरी लफ्फाजी है। इनमें से बुनियादी ढ़ाचागत प्रोजेक्ट में पीपीपी माडल को जोड़कर सरकार ने पीपीपी माडल को सत्तर प्रतिशत सहमति के प्रावधान से बाहर कर दिया है।

22 मार्च को रेडियो पर किसानों से मन की बात करते हुए प्रधानमंत्री का तर्क था कि किसानों से जरूरत के अनुसार जमीन लेगें। अब सवाल है कि यह जरूरत कौन तय करेगा। इसी को तो तय करने के लिए सामाजिक प्रभाव आंकलन का अध्याय कानून में लाया गया था ताकि अधिग्रहण के पूर्व इसका अध्ययन हो और कितनी जमीन की जरूरत है, इसे तय किया जाए। उन्होंने बड़ा जोर देकर बताया कि परमाणु ऊर्जा, रेलवे, राजमार्ग, खनन, पेट्रोलियम और खनिज पाइप लाइन, कोयला खनन व विद्युतीकरण जैसे 13 क्षेत्रों को जो 2013 के कानून के तहत आच्छादित नहीं थे और जिन्हें 120 साल पुराने कानून के तहत मुआवजा मिलता, उसे उनकी सरकार ने 2013 के कानून के तहत मुआवजा का प्रबंध किया है। यह सच नहीं है। 

मूल कानून की धारा 105 स्पष्ट तौर पर कहती है कि चौथी अनुसूची में दर्ज यह सभी 13 क्षेत्रों को इस कानून का लाभ देने के लिए इस कानून के लागू होने के बाद एक वर्ष में सरकार अधिसूचना जारी करेगी। इसलिए मोदी सरकार इसके लिए बाध्य थी जो उसने किया। उन्होंने कहा कि इस संशोधन के जरिए उन्होंने मुआवजा बढ़ाकर 4 गुना कर दिया यह भी पहले से ही कानून में था। कानून की प्रथम अनुसूची और धारा 26 से लेकर 30 तक इस बारे में कहती है कि ग्रामीण क्षेत्रों के लिए मुआवजा बाजार दर का 2 से लेकर 4 गुना और शहरी क्षेत्र के लिए 2 गुना होगा। साथ ही उनका यह कहना कि कोई भी राज्य इन संशोधनों को मानने या न मानने के लिए स्वतंत्र है, भी सही नहीं है।

उन्होंने कहा कि धारा 31 की उपधारा 2 के खण्ड में संशोधन के जरिए परिवार के एक सदस्य को अनिवार्य नौकरी देने का प्रावधान किया गया है परन्तु वास्तव में संशोधन में खेतिहर परिवार के कम से कम एक सदस्य को नौकरी की बात तो कही गयी है परन्तु यह नहीं बताया गया है कि नौकरी का चरित्र क्या होगा। उनका यह कहना कि यह कानून जल्दबाजी में लाया गया है इसलिए इसमें कमियां रह गयी थीं, जिसे संशोधनों के जरिए ठीक किया गया है। यह भी हास्यास्पद है क्योंकि सभी लोग जानते हैं कि यह कानून एक लम्बे संघर्षों के बाद बना है। जबकि सच तो यह है कि कारपोरेट और रियल एस्टेट के कारोबारियों के लिए बार-बार अलोकतांत्रिक ढंग से आनन-फानन में अध्यादेश लाए जा रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ने प्रावधान किया है कि शहरीकरण के लिए जिस भूमि का अधिग्रहण होगा उसमें से 20 प्रतिशत भूमि उन किसानों को दी जायेगी जिनकी जमीन अधिग्रहीत की गयी है। ऐसे तो ऐसा कोई प्रावधान नए संशोधन में नहीं है परन्तु इस सिद्धांत पर अमल करते हुए आंध्र प्रदेश की नायडू सरकार ने राजधानी निर्माण के लिए गुंटूर में कृष्णा-गोदावरी बेसिन की बेहद उपजाऊ 55 हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया है जिसमें किसानों को कोई मुआवजा न देकर यही बात की जा रही है। इसके साथ ही लोकसभा में पारित कराए संशोधन कानून में सरकार ने मूल कानून की धारा 24 (2) के अनुसार ‘‘जिन जमीनों का अधिग्रहण 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार हुआ है परन्तु उन जमीनों पर पांच वर्ष तक सरकार ने कब्जा प्राप्त नहीं किया है या मुआवजा नहीं दिया है। ऐसा अधिग्रहण समाप्त माना जायेगा और सरकार को चाहिए कि वह 2013 के कानून के तहत जमीन अधिगहण करने के लिए अध्यादेश जारी करें।‘‘ को बदल कर ‘पांच वर्ष‘ या ‘कार्यशुरू होने के तिथि’ जो ज्यादा हो कर दिया है। इसी प्रकार मूल कानून की धारा 101 कि पांच वर्ष तक यदि जिस उद्देश्य के लिए जमीन ली गयी उसे पूरा नहीं किया गया तो जमीन उसके वास्तविक मालिक या उसकी अनुपस्थिति में सरकार के भूमि बैंक को वापस हो जायेगी, को मोदी सरकार ने समाप्त कर दिया है। 

संशोधन में मोदी सरकार ने पूरे एक्ट में निजी कम्पनी को बदल कर निजी तत्व कर दिया है और धारा 3 में जोड़कर इसकी परिभाषा में प्रोपराइटरशिप, कम्पनी, कारपोरेशन, गैरलाभप्रद संगठन को लाया गया है। इस प्रकार इसके दायरे को बढ़ा दिया है। भारी दबाव के बाद धारा 87 में केन्द्र या राज्य सरकार के अधीन काम करने वाले किसी भी कर्मचारी के विरुद्ध सरकार से बिना पूर्वानुमति के न्यायालय में मुकदमा न कर पाने के प्रस्ताव को वापस लिया है पर साथ ही धारा 67 में जोड़ दिया है कि अधिग्रहण के सम्बंध में कोई भी शिकायत जिलास्तर पर सुनी जायेगी और निस्तारित की जायेगी। 

कारपोरेट, रियलस्टेट और बिल्डर लाबी के लिए इस कानून को हर हाल में लागू करने पर आमादा मोदी सरकार ने संशोधन विधेयक 2015 को लोकसभा से पास करा लिया था पर राज्य सभा में बहुमत के अभाव में वह इसे कानून का शक्ल न दे सकी। लिहाजा उसने पुनः अलोकतांत्रिक रास्ते को अपनाते हुए राज्यसभा का बीच में ही सत्रावसान करा पुनः 4 अप्रैल को अध्यादेश लाने का काम किया है। सरकार का कहना है कि जो लोग इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं वह देश की सुरक्षा और विकास विरोधी है। तर्क यहां तक दिया जा रहा है इस विधेयक का विरोध करने वाले हवाई जहाज, रेल, सड़क पर यात्रा न करें। सरकार के वित्त मंत्री ने तो संसद में यहां तक कहा कि यदि यह कानून पास नहीं होता तो देश का विकास रुक जायेगा, देश में औद्योगीकरण नहीं होगा और रोजगार के अवसर नहीं पैदा होंगे।

आइए देखें, सरकार के इस दावे में कितना दम है। स्पेशल इकॉनोमिक जोन (सेज) पर नवम्बर 2014 को संसद में पेश सीएजी की रिपोर्ट सरकार के विकास के दावे के संदर्भ में क्या कहती है। यह रिपोर्ट कहती है कि सेज का मकसद आर्थिक विकास, माल एवं सेवाओं के निर्यात को प्रोत्साहन, घरेलू एवं विदेशी निवेश को बढ़ावा, रोजगार सृजन और अधिसंरचनात्मक सुविधाओं का विकास करना था, जबकि राष्ट्रीय डाटाबेस में यह साफ तौर पर दिखता है कि सेज के क्रियाकलापों से इन क्षेत्रों में कोई उल्लेखनीय विकास नहीं हुआ है। 152 सेजों के अध्ययन से सीएजी को यह बात साफतौर पर दिखी कि रोजगार के अवसर बढे़ नहीं हैं। सेज के लिए देश में 45635.63 हेक्टयर जमीन अधिग्रहित की गयी जिसमें 28488.49 हेक्टयर जमीन में ही कार्य शुरू किए गए और शेष जमीनें बिल्डरों ने सरकार से मिलकर हथिया ली। गौरतलब है कि सेज के नाम पर ली गयी जमीनें ‘सार्वजनिक उपयोग‘ के लिए ली गयी थी जिनका व्यावसायिक उपयोग किया गया। सीएजी सरकार की सेज के नाम पर अधिग्रहित की जमीन की नीति से संतुष्ट नहीं दिखता। 

इसलिए मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के विरूद्ध आंदोलनरत ताकतों को अपना आंदोलन देसी-विदेशी कारपोरेट, उनके हित में काम करने वाली केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा विकास के नाम पर किसानों की जमीन लूट नीति के खिलाफ केन्द्रित करना चाहिए। मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण कानून संशोधन अध्यादेश के खिलाफ आंदोलन को तेज करते हुए यूपीए शासन द्वारा 2013 में बनाए गए भूमि अधिग्रहण कानून के भी किसान विरोधी चरित्र को उजागर करना चाहिए। इसलिए 2013 में बनाए गए भूमि अधिग्रहण कानून में दिए गए ‘सहमति और सामाजिक प्रभाव‘ के प्रावधानों तक ही आंदोलन को सीमित नहीं रखना होगा बल्कि उस अवधारणा पर चोट करनी होगी जो जमीन को जीविका के संसाधन के रूप में न लेते हुए माल के रूप में बाजार की शक्तियों के हवाले करना चाहती है। 

मनमोहन और मोदी सरकार जमीन को जीविका के संसाधन के रूप में न लेकर इसे बाजार की वस्तु मानती है। इसलिए यूपीए और एनडीए की भूमि नीति में बुनियादी फर्क नहीं दिखता है। वास्तव में जमीन जीविका का है इसलिए आज देश को भूमि अधिग्रहण के लिए कानून की नहीं अपितु राष्ट्रीय भूमि उपयोग नीति की जरूरत है। इसके लिए देश में राष्ट्रीय आयोग का गठन होना चाहिए जो कि तयशुदा समय में अपनी संस्तुति दे और जब तक राष्ट्रीय आयोग की संस्तुति नहीं आ जाती तब तक कारपोरेट और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए जमीन के अधिग्रहण पर रोक लगायी जाए। साथ ही बाजार मूल्य के नाम पर किसानों की जमीन पूंजीपतियों को खरीदने की छूट न दी जाए। पिछले पच्चीस सालों से चल रहे उदार अर्थनीति का भयावह परिणाम किसान आत्महत्या, बेकारी, महंगाई और संसाधनों की लूट है। इसलिए किसानों और देश के सम्पूर्ण विकास के लिए कारपोरेट आधारित विकास मॉडल की जगह किसान आधारित विकास के मॉडल की बेहद जरूरत है, जो सहकारी खेती और कृषि आधारित कल कारखानों के विकास को सुनिश्चित करे और जिससे कि हमारा राष्ट्रीय अर्थतंत्र मजबूत हो, बेकारी, महंगाई और किसानों की आत्महत्या से छुटकारा मिल सके।

लेखक दिनकर कपूर आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (उ. प्र.) के संगठन प्रभारी प्रभारी हैं, उनसे ई-मेल संपर्क : dinkarjsm786@rediffmail.com

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No to Land Acquisition! We Demand Land Rights!!

New Delhi : The Modi Government has once again proven that it is indeed anti-farmer-labourer and pro-corporates by promulgating the land ordinance 2015 on the eve of 3rd April. Turning a complete blind eye to the nation-wide fierce opposition to the ordinance, neither did the government hold any dialogue with people’s movements and affected farmers / labourers groups nor did it pay any attention to the political parties that have opposed this draconian ordinance. With the single-minded agenda of kneeling before the corporates while crores of our citizens are exploited, displaced, disposed and deprived, this government has shown that it simply does not care for the poor and toiling people, for our land, agriculture and nature.

The 2015 ordinance has once again removed important clauses of seeking consent for private projects and from land owners for PPP projects. It has also removed the much required Social Impact Assessment, mandated by the 2013 Act, showing its lack of seriousness to understand the impact of development projects on the lives of the people and affected groups. Rather than addressing the needs of poor and widespread landlessness, the Modi government is using the mandate for taking the country forward  to circumvent all parliamentary procedures and is hell bent on misusing its powers only to ensure private profits, putting the lives of millions of citizens at risk, in the name of development.

However, we the people’s movements, workers unions, farmer organizations and concerned citizens of this country will not allow this government to take this undemocratic and anti-people move and will intensify our opposition in every nook and corner of the country. We want to remind Mr. Modi that it is not merely about the “perception”, but about lives, livelihoods of our people and agriculture and nature of this country!

The protest against the land ordinance has intensified all over the country with several people’s movements, trade unions, farmers and labourer organisations under the banner of Bhoomi Adhikaar Andolan burning copies of this ordinance across villages, blocks, district and state headquarters in Sonbhadra, Lakhimpur Kheri, Chitrakoot, Jaunpur, Saharanpur, Gonda, Lucknow and Allahabad (Uttar Pradesh) on 5th -6th April. Protests and ordinance burning were also organised in Rewa, Chhindwara, Panna, Yawal, Gwalior, Singrauli (Madhya Pradesh); Bhusawal, Jalgaon, Yawal, Chopra, Avalner, Faizpur, Nandurban, Taloda, Akkalkua (Maharashtra); and at Tapi, Songarh, Sagbara, Nijjar, and Dediyapada (Gujarat) and in Narmada Valley. The ordinance was also burnt widely in West Bengal, Tripura, Bhubaneswar, Jaipur etc. It was also burnt yesterday in Haryana and will be done in Himachal Pradesh on 7th April.

Demands for withdrawal of the ordinance and for land rights will continue in every nook and corner of the country with planned State-Level Conventions, Mass Mobilisation, Padayatras, Rail Roko, Rasta Roko and Human Chains in states like Chhattisgarh, Bihar, Jharkhand, Andhra Pradesh, Telengana, Uttarakhand, Himachal Pradesh, Maharashtra, Rajasthan and Tamil Nadu in the upcoming weeks.

In solidarity with protests by people across the country against this anti-democratic and anti-people ordinance, various groups gathered at Jantar Mantar burnt copies of the ordinance to mark their protest. They demanded immediate stopping of the loot of natural resource and recognise the constitutional commitment to people’s rights over land, water and forests and resources.  Vandana Shiva, N D Pancholi, Com. Sunit Chopra, Kavita Krishnan, Anil Choudhary, Rajneesh Gambhir, Rajendra Ravi, Vijoo Krishnan, Amit Bhatnagar addressed the gathering.   

All India Kisan Sabha (36 Canning Lane), All India Kisan Sabha (Ajay Bhavan), National Alliance of People’s Movement, All India Union for Forest Working People, Kisan Sangharsh Samiti, INSAF, All India Agricultural Workers’ Union (36, Canning Lane), Bharatiya Khet Mazdoor Union (Ajay Bhavan), All India Krishak Khet Mazdoor Sanghatan, Bharatiya Kisan Union (Harpal Singh), Chhattisgarh Bachao Andolan, Ghar Banao Ghar Bachao Andolan, Kanjhwal Bhumi Bachao Andolan, Socialist Centre, Mahan Sangharsh Samiti, Lok Sangharsh Morcha, Nimka Thana Bhumi Adhigrahan Virodh Manch, Lokadhikar,  Adharshila Learning Centre, Madhya Pradesh, Delhi Solidarity Group, Uttarakhand Mahila Manch, Yuva Kranti, Sarvahara Jan Andolan And many other Organisations

Bhumi Adhikaar Andolan is a coalition of peoples’ movements, farmers and peasant organisations and trade unions

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‘टाइम्स नाऊ’ चैनल का बॉयकाट होगा, सोशल एक्टिविस्टस की तरफ से अरनब गोस्वामी को खुला पत्र

Dear Mr Arnab Goswami,

We, the undersigned, who have on many occasions participated in the 9:00 p.m. News Hour programme on Times Now, anchored by you, wish to raise concerns about the shrinking space in this programme for reasoned debate and the manner in which it has been used to demonize people’s movements and civil liberties activists.

On 17th  and 18th February 2015, in the News Hour show , a section of activists were invited to contribute to the debate on the “offloading” of Greenpeace representative Priya Pillai. Right from the start, the activists were denied the right to articulate their views. Not only were their mikes at times muted, they were repeatedly heckled and subjected to hate speech, with you, as the anchor, encouraging, even orchestrating and amplifying these responses.

We would like to make it clear here that the point to note is not our personal hurt, humiliation or the lack of respect shown to us from the other panelists, the anchor, or the channel. We also recognize that combative questions could be put to us when we participate in such a programme and that people may express their disagreements in a heated manner.

But we do object, and take serious exception, to the repeated branding of activists as ‘anti-national’ or ‘unpatriotic’ – words that are terms of abuse and hate-speech, and that can, when repeated ad nauseam in an influential media space, have serious repercussions. Rights activists, public figures and defendants in legal cases have been subjected to hate crimes, and even killed, in the country.

The media, which has a duty to conduct itself responsibly, cannot be allowed to aggravate the vulnerability of human rights activists, who are already being targeted, vilified and demonized, by the state and other vested and dominant interests.

We are aware that on earlier occasions, too, many other guests at the News Hour studios have also been subjected to similar treatment by anchors like you or your colleagues. In the process, debates and discussions on important subjects of national import have been reduced to a one-sided harangue, with differing and dissenting voices being deliberately stifled. Loose allegations have been made about them, aspersions cast on their motives, and insinuations made about their patriotism, with all obligations of the media to conduct  themselves in a neutral, fair and accurate manner being flung to the winds.

Our objection is not restricted to the occasions when activists have been subjected to this treatment. We find it equally objectionable when guests with points of view opposed to our own, are at the receiving end. We seek media space for rational presentation of arguments – our own as well as those whom we may disagree with, not for endorsement of our points of view by the media.

We believe it is important to seek transparency and accountability from the media. We are concerned when journalistic ethics outlined by the National Broadcasting Authority are willfully and habitually violated. We would like to cite here relevant portions of the Code of Ethics issued by the NBA.

    “News shall not be selected or designed to promote any particular belief, opinion or desires of any interest group….

    “Broadcasters shall ensure a full and fair presentation of news as the same is the fundamental responsibility of each news channel. Realizing the importance of presenting all points of view in a democracy, the broadcasters should, therefore, take responsibility in ensuring that controversial subjects are fairly presented, with time being allotted fairly to each point of view….

    “TV News channels must provide for neutrality by offering equality for all affected parties, players and actors in any dispute or conflict to present their point of view. Though neutrality does not always come down to giving equal space to all sides (news channels shall strive to give main view points of the main parties) news channels must strive to ensure that allegations are not portrayed as fact and charges are not conveyed as an act of guilt.”

    “… avoid… broadcasting content that is malicious, biased, regressive, knowingly inaccurate, hurtful, misleading….”

The television shows cited here were designed to canvas certain views held by the Government and the Intelligence Bureau and appeared as a platform for the public heckling and jeering of the activists involved, not just by other panelists but by the  anchor himself. Far from maintaining neutrality and professionalism, you as the anchor were blatantly and aggressively opinionated, and never once provided the space for guests, whose views differed with yours, to voice their own opinions without continuous interruption and heckling. Apart from the fact that a fair allotment of time to them was never made, never once did you as the anchor consider the legitimate questions they raised as worthy of a response.

Not surprisingly then, an opportunity to question the accusations raised by the Government was not allowed. Instead, Government allegations were presented as self-evident facts by you as the anchor. You went on to claim that you had the ‘facts’ to prove the ‘anti-national’ character of one organization in particular and activists in general. While the responses of the activists on these panel were deliberately distorted, you as the anchor insinuated baselessly that the said activists were employing ‘hackers’, and that they had ‘deposed against India’.

We know that a similar scenario has been played out on many other occasions on the Newshour. The label ‘anti-national’ is attributed to invited guests without any basis in fact or law, as a term of abuse and hate-speech. Similar terms, used as forms of hate-speech, include, ‘Naxal’, ‘terrorist’, ‘terrorist sympathiser’.

It is inappropriate and irresponsible for channels to label anyone as ‘nationalist’ or ‘anti-national’ or ‘terrorist’ or the like. If panelists indulge in such terms, it is in fact the duty of the anchor to rein them in, and to ensure that such loaded and provocative words are not used to drown out the substantive points of the discussion or disagreement.

For moderators of the debate to allow such terms to be hurled at participants, and in fact to endorse and repeat such terms, is a gross abuse of the media’s immense power.

On one previous Newshour show on sexual violence in December 2013, intended ironically to mark the first anniversary of the ‘Nirbhaya’ rape, a prominent panelist on your programme repeatedly shouted that the two feminists on the panel were ‘Naxals who believed in free sex’. As such, the words ‘Naxalite’ and ‘free sex’ need not be pejorative. All sex should indeed be free. But in this case the terms were used as tools of abuse, equivalent to ‘terrorist’ and ‘slut’, in order to detract from reasoned argument.

Surely, even debates involving  panelists’ views on, or association with, the Naxalite movement in India, have to be conducted fairly and reasonably, without allowing the term ‘Naxal’ to be used as a form of abuse or to heckle a participant. Surely, even if participants and guests support self-determination in Kashmir; or are representatives of another country; or hold an abolitionist view on the death penalty; a news channel inviting them to express their views has the obligation to allow them to do so without being branded as ‘terrorists’ or ‘anti-nationals.’ If the Government can have talks with organisations who hold these opinions, or with leaders of these countries, they are surely entitled to be heard on national television with a modicum of dignity?

In protest against the vilification of activists and dissenting opinions, and the violation of the basic norms of professionalism, neutrality, reasonableness and fairness, we have for the present decided to stay away from Times Now debates. The purpose of this gesture of protest is to demand accountability of the television media, including Times Now, to the norms outlined by the NBA’s Code of Ethics. We take this step as an effort to promote public debate and a responsible engagement with opposing ideas and stances in order to deepen democracy.

Sincerely,

Vrinda Grover – Lawyer, Supreme Court of India

Sudha Ramalingam, Lawyer, Madras High Court and Civil liberties Activist

Pamela Philipose, Feminist and Senior Journalist

Aruna Roy, Right to Information, NREGA and Democratic Rights Activist

Anjali Bharadwaj, Right to Information Activist

Kavita Krishnan, Women’s movement and Left Activist

Kavita Srivastava, Women’s movement and Civil Liberties activist

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यूपी में जंगलराज : MBSC ग्रुप के बिल्डर को अपनी जमीन औने-पौने दाम में नहीं बेचने पर जान के लाले

अमिताभ ठाकुर


(आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने अपनी जनपक्षधरता और जनसक्रियता से उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में एक क्रांति ला दी है. आमतौर पर यूपी पुलिस विभाग के अफसर सत्ता के दबाव और सत्ता के इशारे पर संचालित होते हैं. लेकिन अमिताभ ठाकुर किसी भी जेनुइन मामले को बिना भय उठाते हैं भले ही उससे सीधे सीधे सत्ता के आका लोग निशाने पर आते हों. ऐसे ही एक मामले में आज अमिताभ ठाकुर ने पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिलाने के लिए मुहिम शुरू की. पढ़िए इस नए प्रकरण की कहानी उन्हीं की जुबानी.  -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


आज मैंने एसएसपी, लखनऊ यशस्वी यादव से मुलाकात कर मिर्जापुर, थाना गोसाईंगंज में एमबीएससी ग्रुप के लोगों के आपराधिक कृत्यों तथा उस गांव के पोसलाल पुत्र परीदीन की जमीन को जबरदस्ती खरीदने के प्रयास के बारे में शिकायत दिया. एसएसपी ने एसओ गोसाईंगंज को तत्काल मामले में एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए. शिकायत के अनुसार एमबीएससी ग्रुप ने बीएससी होम्स नाम से लगभग 170 लोगों से बुकिंग के नाम पर करोड़ो रूपये ले भी लिए हैं जबकि अभी उसके पास न तो आवश्यक जमीन है और न ही उसका नक्शा एलडीए से स्वीकृत है.

इस कंपनी के चेयरमैन अखण्ड प्रताप सिंह, उनके भाई ग्रुप डायरेक्टर विष्णु सिंह ने अन्य लोगों के साथ दूसरों की जमीनों पर जबरिया बोर्ड लगा लिया है और गुंडई के बल पर गरीब लोगों की जमीन बहुत कम दाम में खरीदने की कोशिश कर रहे हैं. इन लोगों ने पोसलाल को अपनी 5 बीघा पुश्तैनी जमीन बहुत ही कम दाम में बेचने का दबाव डाला और मना करने पर 12 दिसंबर 2014 को उन्हें जबरन पकड़कर  रजिस्ट्री कराने मोहनलालगंज तहसील ले गये जहां से वे किसी तरह निकल पाए.

पुनः 16 दिसंबर को दिन के 12 बजे ये पोसलाल को गोंसाईगंज कस्बे से हथियारों के बल पर अगवा कर अर्जुनगंज में अखण्ड प्रताप सिंह के घर ले आये जहां उसे यातनायें दी गयी. जब बात फ़ैल गयी तो पुलिस हरकत में आई और वे अपने घर आ सके. रात में भी उनके घर के अन्दर और बाहर पहरा रहा जहां से वे मेरे मित्र अमेरिका में रहने वाले अजय मिश्रा की मदद से निकल सके. पोसलाल का आरोप है कि अहमामऊ चौकी के कुछ पुलिसवाले भी इसमें शामिल हैं. इन लोगों ने 17 दिसंबर को गोसाईगंज थाने में तहरीर दी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई. आज हमने एसएसपी आवास जा कर एफआईआर दर्ज कराने और इनकी सुरक्षा करने के लिए प्रार्थनापत्र दिया है जिसपर उन्होंने तत्काल कार्यवाही के निर्देश दिए हैं.

ये है एसएसपी लखनऊ को दिया गया प्रार्थनापत्र…

सेवा में,
एसएसपी,
लखनऊ

विषय- ग्राम मिर्जापुर, पो-अहमामऊ, थाना गोसाईंगंज,  लखनऊ में एमबीएससी ग्रुप और और उसके पदाधिकारियों द्वारा किये जा रहे भारी आपराधिक अनियमितता तथा श्री पोसलाल, पुत्र परीदीन, निवासी-ग्राम-मिर्जापुर के अपहरण, उनकी जमीन पर जबरदस्ती कब्जा करने और उन्हें जान-माल की धमकी देने के सम्बन्ध में एफआईआर दर्ज कर कठोर विधिक कार्यवाही किये जाने विषयक

महोदय,

निवेदन है कि मेरे एक मित्र श्री अजय मिश्रा पुत्र श्री आरके मिश्रा, निवासी-बी-2/52, जानकीपुरम्, सेक्टर-एफ, लखनऊ, जो आमतौर पर अमेरिका में रहते हैं और वर्तमान में अपने माता-पिता से मिलने लखनऊ आये हैं, ने कल दिनांक 01/01/2015 को श्री पोसलाल, पुत्र परीदीन, निवासी-ग्राम-मिर्जापुर, थाना गोसाईंगंज के साथ मुझसे मिलकर एक बहुत ही गंभीर प्रकरण के सम्बन्ध में बताया. श्री मिश्रा ने बताया कि एमबीएससी ग्रुप/बीएससी होम्स नामक एक कथित कंपनी के द्वारा ग्राम मिर्जापुर और उसके आस-पास के इलाके में भारी आपराधिक अनियमितता की जा रही है.

अभिलेखों के अनुसार इसका ग्रुप कॉर्पोरेट ऑफिस निकट निर्वाण प्रोजेक्ट ऑफिस, निर्वाण सिटी, सेक्टर 49-50, गुडगाँव 122002, हरियाणा तथा रीजनल ऑफिस ए–3/113, साईं वाटिका काम्प्लेक्स, विभूति खंड, गोमतीनगर, लखनऊ है. साथ ही टेलीफैक्स नंबर +91 124 4271405, कस्टमर केयर नंबर  +91 522 3199595, ईमेल info@mbscgroup.in, अन्य संपर्क नंबर 9336759595, 9336659595 हैं.

श्री मिश्रा ने बताया कि इस कंपनी के चेयरमैन श्री अखण्ड प्रताप सिंह, उनके भाई श्री विष्णु सिंह, ग्रुप डायरेक्टर, पुत्रगण श्री विमल सिंह तथा अन्य कई सारे लोग जैसे श्री राजन सिंह, राजन शुक्ला, कमलेश यादव, शिवनाम पुत्र राजाराम आदि द्वारा स्वयं को एक हाउसिंग कम्पनी बताते हुए ग्राम मिर्जापुर और आसपास में बिना कोई जमीन खरीदे ही दूसरों की जमीनों पर जबरिया हथियारों के बल पर कब्जा करके अपना बोर्ड जबरदस्ती लगाकर तमाम लोगों को प्लाट/मकान/फ्लैट देने के नाम पर खुले आम धांधली कर रहे हैं.

श्री मिश्रा के अनुसार इन लोगों ने बिना कोई जमीन अपने पास हुए ही दूसरे की जमीनों पर अपना बोर्ड लगा कर स्वयं को बिल्डर घोषित कर लोगों को फ्लैट/प्लाट आदि के लिए फंसाना शुरू कर दिया है. इसके लिए इन लोगों ने अपना एक वेबसाइट (www.mbscgroup.in) भी खोल रखा है. इसके अलावा इन्होंने पूरे शहर में बड़े बड़े चकाचैंध वाले बोर्ड लगा रखे हैं. इन्होंने कथित रूप से इस योजना की शुरूआत बताने के नाम पर होटल ताज में एक भारी भरकम पार्टी भी की. सारांशतः यह लोग हर प्रकार से लोगों को बरगला कर और लुभाकर बिना जमीन हुए ही उन्हें प्लाट/फ्लैट्स आदि बेच दे रहे हैं. बताया गया कि इन लोगों ने अपने काफी भव्य बुकलेट/पम्फलेट भी बना रखे हैं जिसमें अनगिनत फर्जी और झूठे तथ्य लिखे हुए हैं. इसमें खासकर बिना जमीन हुए जमीन का मालिक बताने के अलावा बिना लखनऊ विकास प्राधिकरण से नक्शा स्वीकृत कराये ही कई प्रकार के भविष्य में बनाये जाने वाले बिल्डिंगों के नक्शे भी लगाये गये हैं जबकि बिना एलडीए के नक्शा स्वीकृत हुए इन्हें यह अधिकार नहीं था कि वे इस प्रकार से बिल्डिंग के नक्शे दिखाकर लोगों को बरगलायें और बिना नक्शा और प्रोजेक्ट स्वीकृत हुए तमाम लोगों से बिल्डिंग/फ्लैट/प्लाट के लिये लोगों से बुकिंग लें.

श्री मिश्रा के अनुसार इन लोगों ने अब तक लगभग 170 लोगों से बुकिंग के नाम पर करोड़ो रूपये ले लिये हैं जिन्हें न मालूम कब कोई भी सम्पत्ति मिलेगी क्योंकि इन लोगों के पास न तो जमीन है और न ही एलडीए द्वारा उस पर निर्माण की स्वीकृति. 

उन्होंने बताया कि इन लोगों ने ग्राम मिर्जापुर में अनुसूचित जाति के तमाम गरीब लोगों की जमीनों पर हथियारों और दबंगई के बल पर भौतिक कब्जा कर अपनी कम्पनी का बोर्ड लगा दिया है और उस इलाके में अपने तमाम हथियार बंद लोगों को भी छोड़ रखा है जो जमीन के असली मालिक गरीब लोगों को डरा धमका कर रखते हैं और ये लोग इन्हीं बोर्डों और इन्ही जमीनों को गलत तरीके से अपना बताकर देश विदेश के लोगों को प्लाट/फ्लैट्स के नाम पर आये दिन ठग रहे हैं.

श्री मिश्रा के साथ आये श्री पोसलाल पुत्र श्री परिदीन, जो अनुसूचित जाति के हैं, पढ़े-लिखे तक नहीं हैं और देखने से ही अत्यंत ही निर्धन दिख जाते हैं, ने श्री अखंड प्रताप सिंह तथा अन्य व्यक्तियों द्वारा उनके साथ किये जा रहे आपराधिक कृत्यों का विस्तार से विवरण बताया. उन्होंने बताया कि उनके और उनके भाईयों की पुश्तैनी जमीन खसरा सं0-929, 939, 940 कुल रकबा 5 बीघा है. इस जमीन पर श्री अखण्ड प्रताप सिंह आदि द्वारा जबरन कब्जा करने तथा उसका बैनाम करने हेतु प्रार्थी व उसके परिवार को जान से मारने की धमकी दी जा रही है.

उन्होंने बताया कि यह जमीन समय के साथ सड़क पर आ जाने के कारण काफी महत्वपूर्ण हो गयी है लेकिन उनकी जमीन पर एमबीएससी ग्रुप्स/बीएससी होम्स वालों ने बिना उन लोगों की अनुमति लिये उनकी इच्छा के खिलाफ जबरिया बलपूर्वक अपना बोर्ड लगा लिया है. साथ ही श्री अखण्ड प्रताप सिंह, श्री विष्णु सिंह पुत्रगण श्री विमल सिंह तथा उनके साथी श्री कमलेश यादव (पुत्र श्री हरीप्रसाद), श्री शिवनाम (पुत्र श्री राजाराम), श्री राजन सिंह, श्री राजन शुक्ला समेत कुछ लोग उनसे लगातार यह जमीन बेचने का दबाव डालते रहे हैं. चूंकि एक तो इन लोगों की शोहरत अच्छी नहीं है और दूसरे इन लोगों ने बहुत ही कम पैसा देने की बात कही थी और श्री पोसलाल को यह भी भरोसा नहीं है कि जितना पैसा वे कह रहे हैं उतना भी यह देंगे या नहीं देंगे इसलिये उन्होंने लगातार इन्हें अपनी जमीन देने से मना किया है.

श्री पोसलाल के मना करने के बाद भी ये लोग लगातार दबाव डालते रहे हैं कि उन्हें जमीन बेच दें अथवा उनकी हत्या कर दी जायेगी.  कई बार लोग मेरे घर पर हथियार के साथ आयें हैं और उन्होंने इस प्रकार की धमकी दी है. अत्यंत कष्ट का विषय है कि श्री पोसलाल के अनुसार श्री अखंड प्रताप सिंह आदि के इन कार्यों में स्थानीय पुलिस चौकी और गोसाईंगंज थाने के कुछ लोग भी खुल कर उनका समर्थन और सहयोग कर रहे हैं जो न सिर्फ कई बार स्वयं इन हथियारबंद लोगों के साथ श्री पोसलाल को धमकी देने आये बल्कि श्री पोसलाल के बार-बार गुहार लगाने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं कर रहे हैं जिसमे पुलिस चौकी अहमामऊ के श्री तिवारी का नाम विशेष रूप से बताया गया है.

श्री पोसलाल के अनुसार दिनांक 12/12/ 2014 को उन्हें जबरन पकड़कर वे लोग हथियारबंद लोगों की सहायता से कचहरी, मोहनलालगंज ले गये और वहीं के वहीं बिना पैसा दिये बैनामा कराने के लिये दबाव डालने लगे किन्तु वे बड़ी मुश्किल से किसी तरह से वहां से भागने में सफल रहे. पुनः दिनांक 16/12/2014 को दिन के 12 बजे श्री अखण्ड प्रताप सिंह के लोगों ने श्री पोसलाल को गोंसाईगंज कस्बे से हथियारों के बल पर अगवा कर लिया और एक चार पहिया गाड़ी में डालकर श्री अखण्ड प्रताप सिंह के घर ले आये.  प्रार्थी को अर्जुनगंज में श्री अखण्ड प्रताप सिंह के घर ले जाकर यातनायें दी गयी और बैनामा करने हेतु बुरी तरह डराया धमकाया गया, उन्हें रात दस बजे तक बंधक बनाकर रखा गया. इसी बीच जब बात चारों ओर फ़ैल गयी तो पुलिस हरकत में आई और तब जाकर वे अपने घर आ सके.

श्री पोसलाल ने मुझे बताया कि घर पर भी रात्रि में चारों तरफ और घर के अंदर हथियारबंद लोगों का पहरा लगाया गया था और उन्हें यह कहा गया था कि सुबह होते ही वे जाकर तहसील में रजिस्ट्री कर दें, बैनामा न करने पर जान से मारने की धमकी दी गई. वे किसी तरह श्री मिश्रा की मदद से वहां से जान बचा कर भाग सके. उनकी बहन सुश्री गीता रावत और बहनोई श्री सुखदेव रावत को भी प्रताडि़त किया गया और धमकाया गया.

श्री पोसलाल इस घटना की शिकायत करने दिनांक 17/12/2014 को गोसाईगंज थाने गए. उन्होंने अपने प्रार्थनापत्र में पुलिसवालों की भूमिका का भी उल्लेख किया था जिसमे ख़ास कर श्री तिवारी का जिक्र था. थाना इंचार्ज श्री विनोद यादव ने पुलिस वालों का नाम काट कर दुबारा तहरीर लिखवाया और आवश्वासन दिया कि उनका एफआईआर दर्ज हो जाएगा पर फिर भी अब तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुआ है. आज स्थिति यह है कि श्री अखण्ड प्रताप सिंह को जमीन बेचने से मना करने के कारण न सिर्फ दो बार श्री पोसलाल को अगवा किया जा चुका है बल्कि इस समय भी उन्हें अपनी जान का भारी खतरा बना हुए है. वर्तमान में वे श्री अजय मिश्र के आवास पर अपनी स्वेच्छा से रह रहे हैं पर उन्हें भारी आशंका है कि जैसे ही वे गाँव आयेंगे उनकी हत्या कर दी जायेगी.

अतः आपसे अनुरोध है कि इस अत्यंत गंभीर प्रकरण में एफआईआर दर्ज करने तथा अगवा कर धमकी देने वाले लोगों के विरूद्ध कार्यवाही करने तथा श्री अजय मिश्रा और श्री पोसलाल के जान माल की सुरक्षा करने हेतु कठोर आवश्यक कार्यवाही करने का कष्ट करें. 

पत्र संख्या-AT/Complaint/46                                                               
दिनांक- 02/01/2015
भवदीय,                                                                                                           
(अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 94155-34526
amitabhthakurlko@gmail.com

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प्रशासन ने अभय छजलानी से जमीन छीनी

‘नईदुनिया’ के मालिक होने के कारण जिस अभय छजलानी (उर्फ़ अब्बूजी’) की इंदौर और मध्यप्रदेश में तूती बोलती थी, अब वे ही नई-नई परेशानियों में घिरते जा रहे हैं. इंदौर जिला प्रशासन ने अभय छजलानी की मिल्कियत वाले टेबल टेनिस ट्रस्ट के ‘अभय खेल प्रशाल’ को जमीन नपती में सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे का दोषी पाया और करीब आधा एकड़ से ज्यादा जमीन छीन ली.

 

अर्जुन सिंह के शासनकाल में ‘अब्बूजी’ को इंदौर में टेबल टेनिस खेल को बढ़ावा देने के लिए 3 एकड़ जमीन खेल परिसर बनाने के लिए लीज पर आवंटित की गई थी. लेकिन, अब्बूजी ने टेबल टेनिस के लिए हॉल बनाने के साथ उसका व्यावसायिक उपयोग शुरू कर दिया और 3 एकड़ को बढ़ाकर 3.26 एकड़ कर लिया. जिला प्रशासन ने 26 हज़ार 572 वर्गफीट जमीन ‘अब्बूजी” से वापस ले ली है. ये बात महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि जिस छजलानी परिवार के सामने 5 दशक तक सरकार और प्रशासन झुककर खड़ा होता था, आज उसी प्रशासन के एक अफसर ने ‘अब्बूजी’ को अपनी ताकत का अहसास करा दिया. ये खबर आज इंदौर के सभी अख़बारों में प्रमुखता से छपी है. उस ‘नईदुनिया’ में भी, जो कभी छजलानी-परिवार का ही था. 

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हिन्दी दैनिक जन माध्यम के मुख्य सम्पादक और पूर्व आईपीएस मंजूर अहमद का फर्जीवाड़ा

: जन माध्यम के तीन संस्करण चलाते हैं मंजूर अहमद : दूसरे की जमीन को अपने गुर्गे के जरिए बेचा, खुद बने गवाह : ताला तोड़कर अपने पुत्र के मकान पर भी कराया कब्जा, पुलिस नहीं कर रही मुकदमा दर्ज : लखनऊ, पटना व मेरठ से प्रकाशित होने वाले हिन्दी दैनिक समाचार पत्र जन माध्यम मुख्य सम्पादक, 1967 बैच के सेवानिवृत्त आई0पी0एस0 अधिकारी एवं लखनऊ के पूर्व मेयर एवं विधायक प्रत्याशी प्रो0 मंजूर अहमद पर अपने गुर्गे के जरिए दूसरे की जमीन को बेचने व खुद गवाह बनने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। प्रो0 मंजूर अहमद के इस फर्जीवाड़े का खुलासा खुद उनके पुत्र जमाल अहमद ने किया।

जमाल अहमद ने बताया कि अपनी नौकरी के दौरान मंजूर अहमद ने अरबों रूपयों की नामी-बेनामी सम्पत्ति बनाई है। लखनऊ के नजदीक जनपद बाराबंकी, कुर्सी रोड के ग्राम गुग्गौर में मंजूर अहमद ने अपने सगे भांजे मों0 निजामुद्दीन पुत्र एनुलहक निवासी खालिसपुर जिला सीवान बिहार, जो ड्रग्स बेचने का धंधा करते थे, कई साल तिहाड़ जेल में बंद रहे, के नाम ग्राम गुग्गौर में गाटा सं0 385 क्षेत्रफल 1.481 हेक्टेयर भूमि खरीदी। मों0 निजामुद्दीन का लोकल पता सी-189, इन्दिरानगर लखनऊ यानि मंजूर अहमद के अपने घर का पता लिखाया। इसी बेशकीमती करोड़ों-अरबों  की जमीन पर अब प्लाटिंग की जा रही है। इस जमीन को दिनांक 27.08.2013 को बही सं0 1, जिल्द सं0 3099, पृष्ठ सं0 347 से 400 क्रमांक 5881 पर रजिस्टर्ड किया गया है।

श्री मंजूर अहमद ने इस जमीन को धोखे से बेचा है एवं जालसाजी की है, जिस व्यक्ति को मंजूर अहमद ने मों0 निजामुद्दीन निवासी बिहार बताया है, वह कोई बहुरूपीया है एवं मंजूर अहमद का गुर्गा है, क्योंकि रजिस्ट्री में गवाह मंजूर अहमद स्वयं हैं। मों0 निजामुद्दीन ने स्वयं रजिस्ट्री नहीं की है, बल्कि उनके नाम से किसी फर्जी आदमी को खड़ा करके रजिस्ट्री की गई है। उप निबंधक कार्यालय में इस फर्जी निजामुद्दीन की डिजिटल फोटो व डिजिटल अंगूठे के निशान मौजूद हैं।  जमाल अहमद ने बताया कि उनके पिता ने तीन शादियां की एवं तीनों पत्नियां जीवित हैं, वह उनकी पहली पत्नी के पुत्र हैं। जमाल ने बताया कि उनके सगे नाना स्व0 खुर्शीद मुस्तफा जुबैरी बिहार कैडर के 1953 बैच के आई0ए0एस0 अधिकारी थे, उनकी मौत एक किराए के मकान में हुई थी, आज भी उनकी नानी, मां एवं उनकी अविवाहित बहन किराए के मकान (गौतम कालोनी, आशियाना नगर फेस-2, पटना) में ही रहते हैं।

जमाल ने बताया कि मंजूर अहमद अपनी हवस के चलते गैंग बनाकर आदतन अपराध करते हैं। दूसरे की सम्पत्ति पर कब्जा करना, व्यवधान डालना इनकी आदत है। जमाल ने बताया कि उनके मकान 1/140 विश्वास खण्ड, गोमती नगर, लखनऊ पर भी मंजूर अहमद की नीयत खराब है। मकान का ताला तोड़कर श्री मंजूर अहमद, श्री यूसुफ अयूब व अन्य लोगों ने कब्जा कर लिया, जिसके खिलाफ वह लगातार दिनांक 14.05.2014 से एफ़0आई0आर0 दर्ज कराने का प्रयास कर रहा है।

इसी क्रम में उन्होंने दिनांक 28.10.2014 को महामहिम राज्यपाल महोदय, से मिलकर न्याय की गुहार लगाई थी। महामहिम जी ने अपने ए0डी0सी0 श्री गौरव सिंह, आई0पी0एस0 के माध्यम से एस0एस0पी0 लखनऊ को फोन कराकर जमाल के साथ न्याय करने के लिए कहा था। एस0एस0पी0 लखनऊ ने दिनांक 31.10.2014 को थानाध्यक्ष गोमती नगर, जहीर खान को फोन पर निर्देश दिए कि प्रकरण में एफ़0आई0आर0 दर्ज की जाए। थानाध्यक्ष गोमतीनगर ने उनके प्रार्थना पत्र को देखते ही कहा कि मंजूर साहब तो अच्छे अधिकारी रहे हैं, एफ़0आई0आर0 दर्ज होने से साहब की बड़ी बदनामी हो जाएगी। थानाध्यक्ष ने कहा कि वह एस0एस0पी0 साहब से बात कर लेंगे। एफ़0आई0आर0 दर्ज नहीं होने पर ही जमाल ने दिनांक 03.11.2014 को मुख्य सचिव उ0प्र0 से मुलाकात की, जिस पर उन्होंने प्रमुख सचिव गृह को कार्यवाही के निर्देश दिए। प्रकरण पर प्रमुख सचिव गृह ने स्वयं दिनांक 03.11.2014 को ही एस0एस0पी0 लखनऊ से वार्ता कर उनको न्याय देने की बात कही।

जमाल ने बताया कि अभी तक एफ0आई0आर0 इसलिए दर्ज नहीं हो सकी क्योंकि  उनके पिता मंजूर अहमद, आई0पी0एस0, ए0डी0जी0 उ0प्र0 के पद से रिटायर अधिकारी हैं, मंजूर अहमद लखनऊ से मेयर एवं विधायक का चुनाव लड़ चुके हैं, कई विश्व विद्यालयों के कुलपति रह चुके हैं एवं वर्तमान में शुभार्ती वि0वि0 मेरठ के कुलपति हैं। उनके पिता के खास गुर्गे यूसुफ थाना क्षेत्र गोमतीनगर लखनऊ में ही जीरो डिग्री बार, रेस्टोरेन्ट व डिस्कोथेक चलाते है। इनकी दबंग छवि व बार आदि के चलते स्थानीय पुलिस से उनके अच्छे संबंध जगजाहिर हैं।

मंजूर अहमद किस हद तक सम्पत्ति के भूखे हैं, इसका अंदाजा इसी से होता है कि इन्होंने अपनी एक कोठी शेरवानी नगर, मडि़यांव, लखनऊ से ठीक सटे एक प्लाट दस हजार वर्ग फीट पर लिखा दिया कि प्लाट बिकाऊ नहीं है, ताकि लोग विवादित समझकर प्लाट न खरीदें। इनके पास एक मकान बी-102, वसुन्धरा इन्क्लेव दिल्ली में है। सी-189, इन्दिरा नगर, लखनऊ में मकान है, इसके अलावा कई सम्पत्तियां हैं। मंजूर अहमद के खास गुर्गे यूसुफ के पास लखनऊ में ही करोड़ों रुपये की अपनी सम्पत्ति है। यूसुफ का लखनऊ में ही नाका क्षेत्र में जस्ट 9 इन नाम का होटल, गोमतीनगर, लखनऊ में जीरो डिग्री बार व रेस्टोरेन्ट है, अपना स्वयं का मकान 107 गुरू गोविन्द सिंह मार्ग, लालकुआं, लखनऊ के साथ ही और भी कई सम्पत्तियां हैं। साथ ही यूसुफ लगभग पांच कम्पनियों के मालिक भी हैं।   जमाल ने बताया कि वह पुनः दिनांक 08.11.2014 को एस0एस0पी0 से मिले तो एस0एस0पी0 ने पूरे मामले को समझने के बावजूद कहा कि प्रकरण सिविल नेचर का है, वह जांच करवा लेंगे, जबकि सबको पता है कि ताला तोड़कर जबरन कब्जा किया गया है।  जमाल के अधिवक्ता विनोद कुमार ने एस0एस0पी0 से मांग की है कि तत्काल एफ0आई0आर0 दर्ज करके जमाल के साथ न्यायोचित कार्यवाही की जाए।

दिनांक 15.11.2014

(जमाल अहमद)
पुत्र श्री मंजूर अहमद
निवासी- 1/140, विश्वास खण्ड,
गोमतीनगर, लखनऊ
09654871990 (मो0)

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