यशवंत सिंह-
16 अप्रैल 2025, लखनऊ : हमारे समय के जाने माने चिंतक और विश्लेषक सत्येंद्र पीएस की लखनऊ यात्रा के प्रसंगों में अक्सर डॉक्टर अनिल गंगवार का जिक्र आता है। सोशल कंसर्न से भरा एक्टिविस्ट किस्म का एक तेजस्वी डॉक्टर!
पीजीआई और केजीएमयू में शिक्षण प्रशिक्षण के वर्षों बरस खपाने के बाद डॉ अनिल गंगवार ने इस्तीफा देकर अब स्वतंत्र प्रैक्टिस शुरू कर दी है। विवेकानंद अस्पताल समेत कुछ अन्य जगहों पर भी बैठते हैं। गैस्ट्रो के एमडी और डीएम हैं।



मुझे अपने इरोसिव गैस्ट्राइटिस के बारे में सेकंड ओपिनियन लेनी थी। सत्येंद्र भाई ने डॉ अनिल जी से बात कर मुझे कनेक्ट किया। मैं पहुँच गया विवेकानंद अस्पताल जहाँ डॉ अनिल गंगवार एक बच्ची की एंडोस्कोपी की तैयारी में थे। उसी कक्ष में मुझे बुलाकर विस्तार से सुना और पर्चा लिख दिया। बोले- “कुछ भी अलार्मिंग नहीं है।”
प्रोबायोटिक समेत कुछ दवाएं दी, गट मजबूत करने के लिए। उन्होंने आईबीएस बताया। इरिटेबल बाउल सिंड्रोम। पंद्रह दिन का चार दवाओं का कोर्स है। एहतियातन, पेट के अल्ट्रासाउंड के लिए बोला है।
विवेकानंद अस्पताल ग़रीब मरीजों से ठसाठस भरा था। पता चला कि ये विशालकाय अस्पताल एक ट्रस्ट द्वारा संचालित है। जाँच इलाज दवा सब यहाँ सस्ता है। इसीलिए ग़रीब लोग खूब दिखे। ऐसे अस्पताल में डॉ अनिल गंगवार जैसे काबिल डॉक्टर का सेवा के लिए वक्त निकालना सुंदर बात है।
हर प्रोफेशन में सामाजिक सरोकार रखने वाले बहुत कम लोग होते हैं। डॉ अनिल गंगवार जैसे युवा, काबिल और विशेषज्ञ डॉक्टर उम्मीद बचाए रखते हैं सिस्टम में, कि हैं कुछ लोग, सब कुछ बिगड़ा नहीं है।
दिल्ली एनसीआर में हम लोग फाइव स्टार अस्पतालों में डॉक्टरों को ख़ुद को दिखाते हुए अपना एक एंटिना अलर्ट मोड पर रखते हैं कि कहीं ये डॉक्टर हमको सूतिया तो नहीं बना रहा। इस लेवल का संदेह पैदा हो गया है मन में। ज्यादातर प्राइवेट अस्पताल और इसके डॉक्टर धन खींचने में लगे रहते हैं, इलाज सेकेंडरी टास्क होता है।
मुझे बहुत पहले एक सज्जन ने कहा था कि हर व्यक्ति को अपने जीवन में एक अच्छे डॉक्टर एक सच्चे पत्रकार एक ईमानदार पुलिस अफसर एक दबंग वकील को मित्र ज़रूर बना कर रखना चाहिए। न जाने कब सच्ची सलाह की ज़रूरत पड़ जाए। इस लिहाज़ से मैं भाग्यशाली हूँ। हर कैटगरी के लोग मित्र हैं! कई डॉक्टर भी मित्र हैं। डॉ अनिल गंगवार जी लिस्ट में नवीनतम हैं। डॉ अनिल को बेहतर भविष्य के लिए शुभकामनाएँ!
16 मई 2025, नोएडा : पचास की उम्र के पहले मैंने शरीर को शरीर नहीं माना। मशीन माना। वैसे मशीनें भी सर्विसिंग की डिमांड करती हैं लेकिन हमने सर्विसिंग के लिए वक्त कभी नहीं निकाला। नए नए टास्क देते गए।
अध्यात्म और अराजकताओं के दो छोरों पर प्रयोग करते गए। नतीजा ये हुआ कि कई किस्म की व्याधियाँ शुरू हो गई। अब सारा कंसंट्रेशन शरीर पर है। अद्भुत ये कि सब चकाचक है। सब कुछ बॉर्डरलाइन पर है जिसे एहतियात-परहेज़ के ज़रिए साधा जा सकता है।
डॉ अनिल गंगवार समेत उन सभी ज्ञात अज्ञात चिकित्सकों और साधकों का दिल से आभार, जिन्होंने गाइड किया, ट्रीट किया। क्रांति से शांति का मेरा नारा सिर्फ़ नारा नहीं बल्कि एक जीवनशैली है।
शांति काल की जीवनशैली सात्विक होनी चाहिए। समय से सोना जगना, वॉक, संतुलित खानपान, ऑयली स्पाइसी बाहरी भोजन से परहेज आदि, ये सब धीरे-धीरे जीवन का सहज हिस्सा हो गया है। वैचारिक रूप से बुद्ध के मध्यम मार्ग के करीब पाता हूँ ख़ुद के। तो ज़रूरी खुराक भाई सत्येंद्र जी से मिलता रहता है। कुल मिलाकर जीवन में जय जय है!
ग़लतियाँ अतियाँ करने को मन कभी कभी मचलता है! इस मन का ही तो सब खेल है! तन की ज्यादातर व्याधियाँ मन की उपज होती हैं! तो आवारा मन काबू में रहे, इसके प्रयास जारी हैं!!
गैस्ट्रो के जाने माने डॉक्टर डॉ अनिल गंगवार जी ने कुछ टेस्ट कराए! नतीजा बता रहा कुछ भी स्ट्रक्चरल डैमेज नहीं है! कुछ कुछ चीजें बढ़ी हुई हैं जिन्हें स्वस्थ जीवनशैली से ठीक कर लिया जाएगा!


आप सब भी सुखी रहें, आप सबका भी मंगल हो!!
जय जय!
भड़ास एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से!



AshokKumar Sharma
May 16, 2025 at 6:44 pm
जीते रहो भाई। सदा खुश रहो। सदा स्वस्थ रहो।