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सुख-दुख

भड़ासी दर्शन : धीरे धीरे परदा गिरने दो और मंच से नेपथ्य की तरफ़ प्रस्थान करो! देखें वीडियो

यशवंत सिंह-

ख़ुद से मोह कभी नहीं रहा क्योंकि बहुत पहले से इस देह और इस जगत की नश्वरता का एहसास है। यही वजह है कि स्थायित्व भरा जीवन पसंद नहीं आया।

नौकरियाँ रास नहीं आईं।

सुख-दुःख के आगे के भाव को समझने जीने को उत्सुक रहा।

आत्ममुग्धता से इतर प्रकृति के वैविध्य पूर्ण रंग रूप में ख़ुद को खोजता महसूसता रहा।

कई रातों को आख़िरी रात मानकर जिया और अपने हाथों अपन को श्रद्धांजलि दे डाली।

अब ठहराव है। बहुत ज्यादा और सतत हिलडुल से समझ आया कि पड़े रहे, बने रहो, फँसो मत, फँसाओ मत।

धीरे धीरे परदा गिरने दो और मंच से नेपथ्य की तरफ़ प्रस्थान करो!

स्मृतियों छवियों से मुक्त होओ।

इसी क्रम में मोबाइल साफ़ करते हुए कुछ प्रयोग करता रहा। ख़ुद की तस्वीरें और ख़ुद की आवाज़ में गाने… ये एक संयोजन सामने आया!

आत्ममुग्धता उबाल मारेगी तो इस पन्ने को पलट लिया करूँगा 😍🙏🏼

देखें सुनें… https://fb.watch/kekK9fVffI/?mibextid=v7YzmG

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