इस बचकानेपन से कब बाहर निकलेंगे वाइज़…

वाइज़, निकाह करने दे ‘बैंकवालों’ से चाह कर… या वो रक़म बता जिसमें ‘सूद’ शामिल न हो..

डॉ राकेश पाठक
चार दिन पहले दारुल-उलूम, देवबंद से फ़त्वा जारी हुआ है कि मुसलमान बैंक में बैंक में नौकरी करने वालों के यहां कोई नाते रिश्तेदारी, ब्याह,शादी करने से परहेज़ करें। फ़त्वे में कहां गया है कि बैंक ब्याज़ या सूद का कारोबार करते हैं इसलिए उसकी कमाई हराम है। इससे चलने वाले घर का व्यक्ति अच्छा नहीं हो सकता। इस फ़त्वा को मुसलमानों ने किस तरह लिया इस पर बात करने से पहले यह जान लेना मुनासिब होगा कि आखिर फ़त्वा है क्या बला..? इसकी शरिया में क्या हैसियत है और मुसलमान इसे कितनी तवज्जो देते हैं?
दरअसल फ़तवा उसे कहते हैं जो क़ुरान या हदीस के मुताबिक़ निर्देश या आदेश ज़ारी किया जाए।

फ़तवा कोई मुफ़्ती ही ज़ारी कर सकता है जिसे इस्लाम,शरिया कानून और हदीस की गहन जानकारी हो। कोई इमाम या मौलवी फ़त्वा जारी नहीं कर सकता। वैसे फ़त्वा हुकुम नहीं होता, राय या मशविरा होता है। दारुल उलूम के फ़त्वा विभाग “दारुल इफ्ता” ने एक शख्स के सवाल पर यह फ़तवा ज़ारी किया है कि बैंक में नौकरी करने वाले के यहां कोई शादी ब्याह न करें। बैंक ब्याज़ का कारोबार करते हैं और शरिया कानून में ब्याज़ के लिए रक़म लेना देना हराम है।

फ़त्वे में कहा गया कि हराम दौलत (बैंक की तनख्वाह) से चलने वाले घर का व्यक्ति सहज प्रवृत्ति और नैतिक रूप से अच्छा नहीं हो सकता। मुसलमानों को चाहिए कि वे किसी ‘पवित्र’ घर से ही रिश्ता जोड़ें। इस फ़तवे पर सवाल उठ रहे हैं। पहला तो यह कि आज कौन सा ऐसा कारोबार होगा जिसका बैंक में खाता नहीं होगा। खाता होगा तो ब्याज़ भी लगता ही होगा। तो कोई भी नौकरी ऐसे नहीं हो सकती जिसमें मिलने वाली तनख्वाह में इस तरह ब्याज़ की रक़म शामिल न हो। अगर कोई मुसलमान छोटा मोटा कारोबार। भी करता है तो उसका बैंक में खाता भी होगा ही, तब वो ब्याज़ से कैसे बच सकता है?

इसके अलावा गौरतलब यह भी है कि सरकारी नौकरी करने वालों को जो तनख्वाह मिलती है वह भी तो किसी न किसी रूप में ब्याज़ या सूद से जुड़ी होती है। सरकारें को पूरा कारोबार जिस रक़म से चलता है वह बिना बैंकिंग सिस्टम के सम्भव ही नहीं है। तब तो सरकारी नौकरी वाले हर आदमी के घर “हराम”की ही रक़म पहुंचती है। कुछ इस्लामिक देश ही हैं जहां बैंक ब्याज़ रहित बैंकिंग करते हैं बाक़ी कोई नहीं। इसके अलावा ऐसी कोई रक़म कैसे होगी जिसमें कहीं, किसी तरह का ब्याज़ शामिल न हो!

Saundarya naseem लिखतीं हैं कि “इस बचकानेपन से कब बाहर निकलेंगे वाइज़.. जितनी दिमागी कसरत फ़त्वा ज़ारी करने पर करते हैं उसकी आधी भी खातूने-खान और खातून-महफ़िल की तालीम पर करें तो दुनिया शायद जन्नत बन जाये।”

एक और फ़त्वा ज़ारी हुआ है जिसमें कहा गया है कि औरतें डिजायनर और तंग बुर्के पहनकर घर से बाहर न निकलें। इस पर सौंदर्या नसीम लिखतीं हैं कि ” मेरे ख़याल से हर पैरहन डिजायन का पाबंद है। जैसे ही कपड़े को सुई धागे या सिलाई मशीन के हवाले करते हैं, डिजायन का काम शुरू हो जाता है।” वे सवाल करतीं हैं कि..” फिर उस अल्लाह पर कौन सा फ़त्वा ज़ारी करेंगे जिसने कि दुनिया की सारी औरतों को ही बेलिबास और बिना बुर्क़ा के धरती पर भेज दिया।”

उधर शिक्षा विभाग से रिटायर अधिकारी आई यू खान कहते हैं कि- “ब्याज़ या सूद की रकम हराम मानी गयी है।बैंक में काम करने वाले के घर यह हराम की रकम तनख्वाह के रूप में आती है। मुसलमानों को चाहिए कि वे इस फ़तवे पर गौर ज़रूर करें। उन्होंने कहा कि वैसे देवबंद का फ़त्वा एक मशवरा ही है, कोई पाबंदी नहीं।”

लेखक डॉ राकेश पाठक “कर्मवीर” के प्रधान संपादक हैं. संपर्क : rakeshpathak0077@gmail.com

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