आखिर औरतों के मामले में ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की नींद क्यों टूटती है?

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे….

पाकिस्तान की एक लेखिका हैं तहमीना दुर्रानी…. पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के पूर्व गवर्नर गुलाम मुस्तफा खर से शादी और तलाक के बाद 1991 में उन्होंने एक उपन्यास लिखा था माय फ्यूडल लॉर्ड… यानी मेरे आका… यह उनकी आत्मकथा थी… इससे पाकिस्तान की सियासत में भूचाल आ गया था… इसके बाद उन्होंने ब्लास्फेमी लिखा… Continue reading

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इस बचकानेपन से कब बाहर निकलेंगे वाइज़…

वाइज़, निकाह करने दे ‘बैंकवालों’ से चाह कर… या वो रक़म बता जिसमें ‘सूद’ शामिल न हो..

डॉ राकेश पाठक
चार दिन पहले दारुल-उलूम, देवबंद से फ़त्वा जारी हुआ है कि मुसलमान बैंक में बैंक में नौकरी करने वालों के यहां कोई नाते रिश्तेदारी, ब्याह,शादी करने से परहेज़ करें। फ़त्वे में कहां गया है कि बैंक ब्याज़ या सूद का कारोबार करते हैं इसलिए उसकी कमाई हराम है। इससे चलने वाले घर का व्यक्ति अच्छा नहीं हो सकता। इस फ़त्वा को मुसलमानों ने किस तरह लिया इस पर बात करने से पहले यह जान लेना मुनासिब होगा कि आखिर फ़त्वा है क्या बला..? इसकी शरिया में क्या हैसियत है और मुसलमान इसे कितनी तवज्जो देते हैं?
दरअसल फ़तवा उसे कहते हैं जो क़ुरान या हदीस के मुताबिक़ निर्देश या आदेश ज़ारी किया जाए।

फ़तवा कोई मुफ़्ती ही ज़ारी कर सकता है जिसे इस्लाम,शरिया कानून और हदीस की गहन जानकारी हो। कोई इमाम या मौलवी फ़त्वा जारी नहीं कर सकता। वैसे फ़त्वा हुकुम नहीं होता, राय या मशविरा होता है। दारुल उलूम के फ़त्वा विभाग “दारुल इफ्ता” ने एक शख्स के सवाल पर यह फ़तवा ज़ारी किया है कि बैंक में नौकरी करने वाले के यहां कोई शादी ब्याह न करें। बैंक ब्याज़ का कारोबार करते हैं और शरिया कानून में ब्याज़ के लिए रक़म लेना देना हराम है।

फ़त्वे में कहा गया कि हराम दौलत (बैंक की तनख्वाह) से चलने वाले घर का व्यक्ति सहज प्रवृत्ति और नैतिक रूप से अच्छा नहीं हो सकता। मुसलमानों को चाहिए कि वे किसी ‘पवित्र’ घर से ही रिश्ता जोड़ें। इस फ़तवे पर सवाल उठ रहे हैं। पहला तो यह कि आज कौन सा ऐसा कारोबार होगा जिसका बैंक में खाता नहीं होगा। खाता होगा तो ब्याज़ भी लगता ही होगा। तो कोई भी नौकरी ऐसे नहीं हो सकती जिसमें मिलने वाली तनख्वाह में इस तरह ब्याज़ की रक़म शामिल न हो। अगर कोई मुसलमान छोटा मोटा कारोबार। भी करता है तो उसका बैंक में खाता भी होगा ही, तब वो ब्याज़ से कैसे बच सकता है?

इसके अलावा गौरतलब यह भी है कि सरकारी नौकरी करने वालों को जो तनख्वाह मिलती है वह भी तो किसी न किसी रूप में ब्याज़ या सूद से जुड़ी होती है। सरकारें को पूरा कारोबार जिस रक़म से चलता है वह बिना बैंकिंग सिस्टम के सम्भव ही नहीं है। तब तो सरकारी नौकरी वाले हर आदमी के घर “हराम”की ही रक़म पहुंचती है। कुछ इस्लामिक देश ही हैं जहां बैंक ब्याज़ रहित बैंकिंग करते हैं बाक़ी कोई नहीं। इसके अलावा ऐसी कोई रक़म कैसे होगी जिसमें कहीं, किसी तरह का ब्याज़ शामिल न हो!

Saundarya naseem लिखतीं हैं कि “इस बचकानेपन से कब बाहर निकलेंगे वाइज़.. जितनी दिमागी कसरत फ़त्वा ज़ारी करने पर करते हैं उसकी आधी भी खातूने-खान और खातून-महफ़िल की तालीम पर करें तो दुनिया शायद जन्नत बन जाये।”

एक और फ़त्वा ज़ारी हुआ है जिसमें कहा गया है कि औरतें डिजायनर और तंग बुर्के पहनकर घर से बाहर न निकलें। इस पर सौंदर्या नसीम लिखतीं हैं कि ” मेरे ख़याल से हर पैरहन डिजायन का पाबंद है। जैसे ही कपड़े को सुई धागे या सिलाई मशीन के हवाले करते हैं, डिजायन का काम शुरू हो जाता है।” वे सवाल करतीं हैं कि..” फिर उस अल्लाह पर कौन सा फ़त्वा ज़ारी करेंगे जिसने कि दुनिया की सारी औरतों को ही बेलिबास और बिना बुर्क़ा के धरती पर भेज दिया।”

उधर शिक्षा विभाग से रिटायर अधिकारी आई यू खान कहते हैं कि- “ब्याज़ या सूद की रकम हराम मानी गयी है।बैंक में काम करने वाले के घर यह हराम की रकम तनख्वाह के रूप में आती है। मुसलमानों को चाहिए कि वे इस फ़तवे पर गौर ज़रूर करें। उन्होंने कहा कि वैसे देवबंद का फ़त्वा एक मशवरा ही है, कोई पाबंदी नहीं।”

लेखक डॉ राकेश पाठक “कर्मवीर” के प्रधान संपादक हैं. संपर्क : rakeshpathak0077@gmail.com

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मुसलमानों के इस छोटे वाले आसाराम बापू से मिलिए!

Shamshad Elahee Shams : इस बकरमुंह से मिलिए. नाम है इसका हाजी सादिक. उम्र ८१ साल. ये मुसलमानों का छोटा वाला आसाराम बापू है.

इंग्लैण्ड में कार्डिफ मस्जिद का इमाम भी रहा है और कुरआन पढ़ाने का पेशा भी करता था. १३ साल से कम उम्र की ४ बच्चियों के यौन शोषण के मामले में इसे १३ बरस की जेल हुई है. पश्चिम में अक्सर इसाई मुल्लेह, बाल यौन शोषण की ख़बरों में सुर्खियाँ बनाते हैं. ऐसा इसलिए है कि पश्चिमी समाज में वह सामाजिक दिक्कते नहीं कि पीड़ित अपने दुःख को छिपा जाए.

यदि ये सामाजिक दबाव एशिया के समाजो से नदारद हो जाए तो मुल्लाह बिरादरी को इतनी सजाएँ मिले कि जेले कम पड़ जाएँ. अव्वल दर्जे के हरामखोर, बेगैरत और बच्चेबाज़ नस्ल के कीड़े होते है. सिर्फ सडा हुआ समाज ही इनकी परवरिश कर सकता है. लोग मज़हबी अकीदे के चलते इन्हें घर पर बुलाकर अपने बच्चे पढवाते और ये ..
एक अदद अच्छा मौलवी -हाफिज ढूँढना इतना ही मुश्किल है जैसे भूसे के ढेर में सूईं को टटोलना.

मेरठ में पढ़े-लिखे और इन दिनों कनाडा में रहने वाले कामरेड शमशाद एल्ही शम्स की एफबी वॉल से.

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हिंदू राजाओं पर विजय के प्रतीक के रूप में निर्मित है कुतुब मीनार! (देखें वीडियो)

कुतुब मीनार भारत में दक्षिण दिल्ली शहर के महरौली में स्थित है. यह ईंट से बनी विश्व की सबसे ऊंची मीनार है. इसकी ऊँचाई 72.5 मीटर (237.86 फीट) और व्यास 14.3 मीटर है जो ऊपर जाकर शिखर पर 2.75 मीटर (9.02 फीट) हो जाता है. इसमें 379 सीढियां हैं. कहा जाता है कि दिल्‍ली के अंतिम हिन्‍दू शासक की हार के तत्‍काल बाद 1193 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुतुब मीनार को बनवाया. कुतुब मीनार पुरातन दिल्ली शहर, ढिल्लिका के प्राचीन किले लालकोट के अवशेषों पर बनी है. ढिल्लिका अन्तिम हिन्दू राजाओं तोमर और चौहान की राजधानी थी.

इस मीनार के निर्माण उद्देश्य के बारे में कहा जाता है कि यह कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद से अजान देने, निरीक्षण एवं सुरक्षा करने या इस्लाम की दिल्ली पर विजय के प्रतीक रूप में बनी. कुछ पुरातत्व शास्त्रियों का मत है कि इसका नाम प्रथम तुर्की सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक के नाम पर पडा. वहीं कुछ यह मानते हैं कि इसका नाम बग़दाद के प्रसिद्ध सन्त कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर है, जो भारत में वास करने आये थे. इल्तुतमिश उनका बहुत आदर करता था, इसलिये कुतुब मीनार को यह नाम दिया गया.

इसके शिलालेख के अनुसार, इसकी मरम्मत फ़िरोज शाह तुगलक ने (1351–88) और सिकंदर लोधी ने (1489–1517) करवाई. मेजर आर.स्मिथ ने इसका जीर्णोद्धार 1829 में करवाया था. मीनार के निकट भारत की पहली क्‍वातुल-इस्‍लाम मस्जिद है. कहा जाता है कि यह 27 हिन्‍दू मंदिरों को तोड़कर इसके अवशेषों से निर्मित की गई है. इस मस्जिद के प्रांगण में एक 7 मीटर ऊँचा लौह-स्‍तंभ है. यह कहा जाता है कि यदि आप इसके पीछे पीठ लगाकर इसे घेराबंद करते हो जो आपकी इच्‍छा होगी पूरी हो जाएगी.

कुतुबमीनार का निर्माण विवादपूर्ण है. कुछ मानते हैं कि इसे विजय की मीनार के रूप में भारत में मुस्लिम शासन की शुरुआत के रूप में देखा जाता है. कुछ मानते हैं कि इसका निर्माण मुअज्जिन के लिए अजान देने के लिए किया गया है. अफ़गानिस्तान में स्थित, जाम की मीनार से प्रेरित एवं उससे आगे निकलने की इच्छा से, दिल्ली के प्रथम मुस्लिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक, ने कुतुब मीनार का निर्माण सन 1193 में आरम्भ करवाया. मीनार के चारों ओर बने अहाते में भारतीय कला के कई उत्कृष्ट नमूने हैं, जिनमें से अनेक इसके निर्माण काल सन 1193 या पूर्व के हैं. यह परिसर यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर के रूप में स्वीकृत किया गया है.

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=dREDn-zicZ8

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दलाल और धार्मिक माफियाओं का संगठित गिरोह है ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’!

इसको बर्खास्त कर आयोग का हो गठन… तलाकशुदा महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों एवम उनको मुख्य धारा में लाने के अधिकारों की आवाज़ बुलंद कर रहे हुदैबिया कमेटी के नेशनल कन्वेनर डॉ. एस.ई.हुदा ने एक बयान जारी कर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर जाम कर निशाना साधा। डॉ. हुदा ने कहा कि मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं की बदहाली और नरकीय ज़िंदगी का पूरी तरह से ज़िम्मेदार मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड है।

डॉ हुदा ने मुखर होते हुए कहा कि कुछ तथाकथित क़ौम के रहनुमाओं ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये “अल्लाह के क़ानून” को ही हाई जैक कर लिया है।पर्सनल लॉ बोर्ड अब दलाल और धार्मिक माफियाओं की हाथ की कठपुतली बन चुका है और ये दलाल “अल्लाह के कानून” का सहारा लेकर अपने ज़ाती मफाद के लिए सूबे व मरकज़ी हुक़ूमत को सालों से ब्लैकमेल करने का काम करते आरहे हैं।

डॉ हुदा ने जफरयाब जिलानी पर हमला बोलते हुए कहा कि जब जिलानी जैसे क़ौम के दलाल मुसलमानो के ज़ज्बात से खेलने वाले और सूबे की पिछली सरकारों में क़ौम की दलाली करके ऐश इशरत की ज़िंदगी बसर करने बड़ी-बड़ी गाड़ियों में और एयर कंडीशन कमरों में बैठ कर क़ौम का मुस्तक़बिल तै करने लगेंगे तो मुसलमान ख्वातीनो को मुस्तक़बिल में इससे ज़्यादा बुरे हालात से दो चार होना पड़ेगा। डॉ हुदा ने कहा कि मुस्लिम समाज मे “मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड” का कोई वुजूद नही है ये सिर्फ़ कुछ दलालो और जिलानी जैसे माफियाओं के एक संगठन है जो 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंद्रा गांधी ने मुसलमानो की समस्याओं को देखते हुए बनवा कर इसका पंजीकरण कराया था…इन्द्रजी की इसके पीछे सियासी मंशा क्या रही होगी इस पर मैं कोई टिप्पणी नही करना चाहता।

डॉ हुदा ने आगे कहा कि सूबे की हुक़ूमत को चहिए की फौरी तौर से ऐसे संगठित और दलाल और माफियाओं के गिरोह को प्रतिबंधित करके मुस्लिम मोआशरे की फ़लाह के लिए एक आयोग का गठन करे जो तलाक़ शुदा मुस्लिम महिलाओं के सामाजिक और शैक्षिक हालात का मुताला कर हुक़ूमत के सामने अपनी रिपोर्ट पेश करे ताकि इन मज़लूम बेसहारा औरतो को इंसाफ़ मिल सके और समाज मे इज़्ज़त के साथ अपनी ज़िंदगी गुज़र बसर कर सकें।

पेट की भूख और बच्चो की परवरिश के लिए ये बेसहारा औरते अगर ग़ैर सामाजिक कामों में लिप्त हो रही हैं तो उसके पीछे इन्ही स्वम्भू धार्मिक ठेकेदारों का हाथ है जिन्होंने आज तक इनकी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक दशा सुधारने की कोई सुध न ली बल्कि इससे इतर “शरिया कानून” का हवाला दे कर डराते धमकाते रहे और हुकुमतों को ब्लैकमेल करके मलाई खाते रहे। मगर अब अवाम के सामने इस माफियाओं के असली चेहरा बेनक़ाब हो चुका है।

आयोग का गठन हो जाने से जब सही तस्वीर हुक़ूमत और अवाम के सामने पेश होगी तो जिलानी जैसे माफ़िया मुँह दिखाने लायक़ नही बचेंगे। डॉ हुदा ने कहा कि मैंने ट्वीट के माध्यम से माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी जी से आयोग बनाने की पुरज़ोर अपील की है और दरख़्वास्त की है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को भंग करके एक ऐसे आयोग का गठन हो जिसने अवकाश प्राप्त हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के जज साहेबान, अवकाश प्राप्त IAS, IPS, शिक्षा, सामाजिक एवम पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ी हस्तियां, मुफ़्ती हज़रात, अलीमे दीन हज़रात को रखा जाए जिससे शरीयत की सही तस्वीर अवाम और व्याख्या अवाम और हुक़ूमत तक पहुँचे।

डॉ. एस.ई. हुदा
नेशनल कन्वेनर
हुदैबिया कमेटी
बरेली

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क्या अब किसी भी डेमोक्रेटिक-सेक्युलर समाज में इस्लाम को accomodate करने की जगह नहीं है?

Rajeev Mishra : किसी भी डेमोक्रेटिक सेक्युलर समाज में इस्लाम को accomodate करने की जगह नहीं है… क्यों? जानने के लिए इतिहास का यह सबक फिर से पढ़ें. मूर्तिभंजक इस्लामिक समाज का एक बहुत बड़ा विरोधाभास है – ईरान में तेरहवीं शताब्दी के एक यहूदी विद्वान् राशिद-उद-दिन की एक विशालकाय मूर्ति. राशिद-उद-दिन ने मंगोल सभ्यता का इतिहास लिखा, और उनका अपना जीवन काल समकालीन इतिहास की एक कहानी बताता है जो भारत के लिए एक बहुत जरुरी सबक है.

मंगोलों ने चंगेज़ खान के समय पूरे एशिया से लेकर यूरोप तक अपना दबदबा बनाया, और मध्य पूर्व एशिया में अपना शासन कायम किया. मंगोल मुख्यतः तांत्रिक धर्म (मंत्रायण) का पालन करते थे जो मूलतः भारत से निकल कर तिब्बत, चीन, जापान और पूरे मध्य एशिया में फैला था. मगोलों ने विश्व का पहला सच्चा धर्म निरपेक्ष राज्य बनाया (भारत के Pseudo Secular राजनीतिक तंत्र जैसा नहीं), जहाँ सभी धर्मों के लोगों को न सिर्फ अपना धर्म मानने की आज़ादी थी, बल्कि सबके बीच स्वस्थ संवाद स्थापित करने का प्रयत्न किया गया. मंगोलों की इस धार्मिक उदारता का सनातन धर्मियों, मंगोल-तुर्क के अदि सभ्यता के लोगों और यहूदियों ने स्वागत किया. इसाई इसके बारे में मिला जुला भाव रखते थे, जबकि मध्य-पूर्व के मुस्लिम इनसे बहुत घृणा करते थे.

इस दौरान चंगेज़ खान के वंशज (परपोते) आरगुन खान ने एक यहूदी डॉक्टर शाद-उद-दौला को अपना वजीर बनाया. शाद-उद-दौला बहुत कुशल और प्रतिभावान था. उसके समय में आरगुन खान ने बगदाद और तिबरिज़ में कई मंदिर बनवाए और मक्का पर कब्ज़ा करने की योजना बनायीं. उसी समय आरगुन खान बुरी तरह बीमार पड़ा, और मौका देख कर मुस्लिमों ने शाद-उद-दौला की हत्या कर दी. शाद-उद-दौला ने अपने समय में अन्य कई यहूदियों को प्रशासन में स्थान दिया था, उन्ही में से एक थे राशिद-उद-दीन, जो बाद में आरगुन खान के उत्तराधिकारी महमूद गजान के वजीर बने.

आरगुन की मृत्यु के बाद मुस्लिम और मंगोलों के बीच लगातार संघर्ष चला, और मुस्लिमों ने मंगोल अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए बाज़ार को नकली नोटों और सिक्कों से भर दिया – यह तरकीब जो आज भी भारत के विरुद्ध प्रयोग की जा रही है.

गजान खान के समय राशिद-उद-दीन ने स्थिति को अंततः नियंत्रण में लिया, अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाया, टैक्स-सुधार किये, और समृद्धि वापस लौटी. लेकिन मुस्लिमों से संघर्ष चलता रहा और और मुसलमान लगातार गजान खान पर इस्लाम स्वीकार करने का दबाव बनाये रहे. अन्तः में स्थिति को शांत करने के लिए गजान खान और राशिद-उद-दीन ने ऊपरी तौर पर इस्लाम स्वीकार कर लिया, और गजान को अमीर-उल-मोमिन घोषित किया गया. अब मुसलमान गजान खान पर दबाव बनाने लगे की वह मंदिरों, चर्चों, और सिनागोग (यहूदि धर्म स्थल) को तोड़े और दूसरे लोगों को भी इस्लाम स्वीकार करने को बाध्य करे.

राशिद-उद-दीन के वजीर रहते गजान खान, और उसके भाई ओल्जितु का शासन लगभग शांति और स्थिरता से गुजर गया. राशिद स्वयं को अरस्तु और गजान को अपना Alexander कहता था. राशिद ने दुनिया के कोने कोने से धर्म-गुरुओं और विद्वानों को बगदाद के दरबार में जगह दी. हालाँकि इस्लामिक गुट ने राशिद-उद-दीन पर लगातार आरोप लगाया कि उसने अपना मूल यहूदी धर्म अभी भी नहीं छोड़ा था.

फिर इल्खानेत वंश के तेरहवें राजा ओल्जितु (धर्म परिवर्तन के बाद मोहम्मद खुदाबन्द) की मृत्यु के बाद इस्लामिक गुट का पूरा नियंत्रण हो गया. राशिद-उद-दीन पर ओल्जितु की हत्या का आरोप लगाया गया और छुप कर अन्दर ही अन्दर यहूदी धर्म से सहानुभूति रखने का आरोप लगाया गया. उसे कैद कर लिया गया, उसकी आँखों के सामने उसके बेटे का सर काट दिया गया. फिर राशिद का सर काट कर उसके कटे सर को तिबरिज़ की सडकों पर घुमाया गया. इतने से ही राशिद-उद-दीन के प्रति उनकी घृणा ख़त्म नहीं हुई. पंद्रहवीं शताब्दी में तैमुर-लंग के बेटे मिरान शाह ने राशिद-उद-दीन की कब्र खुदवा कर उसकी सर कटी लाश पास के यहूदी कब्रिस्तान में फिंकवा दी.

यह था सेक्युलरिज्म का अंत और इस्लाम के प्रति नरम रवैया रखने का परिणाम.

हमारे लिए इस कहानी से यही शिक्षा है की एक धर्म निरपेक्ष राज्य इस्लाम का सामना नहीं कर सकता है. अगर एक सेक्युलर राज्य की सीमाओं के बीच बड़ी मुस्लिम संख्या रहेगी तो धीरे-धीरे ये लोग शासन तंत्र पर हावी हो ही जायेंगे. आज हमारे जो नेता इफ्तार पार्टियों में हरी पगड़ी और गोल टोपी लगाये घूम रहे हैं, कल उन्हें कलमा पढना होगा और सुन्नत करवानी होगी. फिर उन्हें अपने भाई बंधुओं पर तलवार उठाने को कहा जायेगा, और अंत में उनका और उनके बच्चों का वही हाल होगा जो राशिद-उद-दीन का हुआ.
क्या मुलायम सिंह यादव की आँख के आगे यही मुल्ले एक दिन अखिलेश सिंह का सर नहीं काटेंगे? पर इन हिन्दुओं को यह कौन समझाये…..

लंदन निवासी और भाजपा की विचारधारा से जुड़े राजीव मिश्रा की एफबी वॉल से.

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मुस्लिम बहुल क्षेत्र में 30 वर्ष रहने के बाद स्वीडन की पूर्व सांसद नलिन पेकगुल इलाका क्यों छोड़ गईं?

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इस्लामी फासीवाद- दोनों जनता के दुश्मन हैं…. नलिन पेकगुल स्टाकहोम (स्वीडन) के सबअर्ब हस्बी टेंस्टा वाले मुस्लिम बहुल इलाके में 30 साल रहने के बाद किसी दूसरे शहर में चली गयी हैं. नलिन पेकगुल कुर्दिश मूल की सोशल डेमोक्रेट नेता हैं और सांसद भी रही हैं वर्ष 1994 से 2002 तक. उनके इलाके में प्रवासी मुसलमानों ने सामाजिक स्पेस को लगभग नियंत्रण में ले लिया है. ऐसे में वह खुद को महफूज़ नहीं समझतीं. पेकगुल स्त्री विमर्श में स्वीडन का जाना पहचाना नाम है.

(नलिन पेकगुल)

कमोबेश यही हालत जर्मनी, फ़्रांस, ब्रिटेन के उन इलाकों की है जहाँ मुसलमानों की आबादी का घनत्व अधिक है. इनका सबसे पहला शिकार मुस्लिम लड़कियाँ होती हैं. माहौल ऐसा बना दिया जाता है कि बुर्का और हिजाब पहनना स्वत: अनिवार्य हो जाता है. पश्चिम में अक्सर प्रगतिशील ताकते इस्लामोफोबिया को ही एजेंडे पर रखती हैं. बात भी सही है. अमेरिकी साम्राज्यवाद के नेतृत्व में पिछले 25 सालों में हिंसा और विध्वंस का नंगा नाच जिस तरह मध्य पूर्व में हुआ है उसका निशाना मुस्लिम जगत ही है जिसके फलसवरूप इस्लामी आतंकवाद का जन्म हुआ. इसके जन्म और पालन पोषण में अमेरिका की सहायक भूमि को कौन नकार सकता है कम्युनिस्ट होने के नाते पीड़ित के पक्ष में खड़ा होना मानव धर्म है. इसे हम न करेंगे तो कौन करेगा?

1970-80 के दशकों में प्रगतिशील मुसलमानों का एक वैकल्पिक रास्ता मुस्लिम आवाम के पास था. मुल्लाह वाणी के बरअक्स नौजवान मुसलमान जार्ज हब्बाश, लैला खालिद, यासिर अराफात को अपना आदर्श समझता था. तमाम मुस्लिम देशों में कमाल पाशा से लेकर सद्दाम हुसैन, अनवर सादात, कर्नल गद्दाफी अपना असर रखते थे. भारत पाक में प्रगतिशील शायरों और लेखकों के बड़े बड़े कद इस बात के सबूत हैं कि उनके समाज में उनकी कद्र थी. 1991 में सोवियत संघ के टूट जाने के बाद इस वैकल्पिक चिंतन धारा को पहला झटका लगा, इस विचार शून्यता को सबसे पहले पहल लेकर भरने की कोशिश इस्लामी ताकतों ने की, इरान की इस्लामी क्रांति ने इसे ठोस वैचारिक आधार दिया, दूसरी तरफ अफगानिस्तान में मुजाहीदीन संघर्ष सुन्नी विकल्प दे रहा था. 9/11 की घटना के आते आते मुसलमान आवाम के सामने से वाम विकल्प लगभग सिरे से गायब हो गया, जो संघर्ष वाली ताकते थी, विकल्पहीनता के कारण उग्र इस्लामी भंवर में समा गयी और दूसरी तरफ इस समुह की प्रगतिशील ताकते पस्त होकर निष्क्रिय हो गयी.

युद्ध की मार झेलता हुआ मुसलमानों का यही तबका 2000 के दशक के बाद यूरोप और अमेरिका में हिजरत कर गया जिसके पास साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ने का वैकल्पिक हथियार सिर्फ और सिर्फ इस्लाम बचा था. सऊदी धन की निर्बाध आपूर्ति से यूरोप और अमेरिका में मस्जिदों का नेट वर्क इन्हें अपनी गिरफ्त में लेने के लिए तैयार हुआ जिसमे सुन्नी जुझारू तबको को समाहित किया दूसरी तरफ इरानी इस्लामी क्रांति में जान पड़ जाने ने शिया मुसलमानों को एक दूसरा प्लेटफार्म मुहैय्या करा दिया. इन ऐतिहासिक परिस्थितियों में समाज का सबसे पीड़ित तबका प्रगतिशील ताकतों के साथ खड़ा न होकर खुद प्रतिक्रियावादी फासीवादी ताकतों का इंधन बन गया . यूरोप से पांच हजार मुसलमान नौजवानों का सीरिया में जाकर आइसिस का समर्थन करना इसका सबसे बड़ा सबूत है.

ऐसा कदापि नहीं कि यूरोप अमेरिका में बसे मुसलमान समुदाय में प्रगतिशील तबके की लौ बुझ गयी हो, ठीक इसी दौर में आप देखें की मुसलमानों में महिला विमर्श और इस्लाम के औरत विरोधी स्वरूप पर इन्ही इलाकों से मजबूत स्वर फूटे हैं, आयान हिसरी, इरशाद मंजी, तस्लीमा नसरीन, नलिन पेकगुल जैसे सशक्त हस्ताक्षर इसी युग की उपज है, वक्त की विडंबना यह है कि इन प्रगतिशील महिला कार्यकर्ताओं लेखिकाओं को कभी किसी वाम शक्ति का समर्थन नहीं मिला. तसलीमा नसरीन को पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की हुकूमत रहते हुए वहां से निष्कासन झेलना पड़ता है, बांग्लादेश और पाकिस्तान में प्रगतिशील लेखको राजनीतिज्ञों की हत्याओं का प्रश्न वाम एजेंडे पर आ ही नहीं पाता है और न कोई मजबूत विरोध सड़क पर देखने को मिलता है .

खासकर पश्चिम के वाम जगत में इस प्रश्न को लेकर एक बुनियादी वैचारिक त्रुटी यह है कि वह धर्म की आज़ादी के सवाल पर नकाब के समर्थन में सड़क पर उतर जाते है और यह भूल जाते हैं कि इस्लाम सिर्फ एक धर्म नहीं एक मुकम्मिल राजनीति भी है. धर्म की आजादी उन्हें पश्चिम में बसे हिज्बोल्लाह, हमास जैसी इस्लामी राजनीतिक ताकतों के साथ खड़ा कर देती है और उनकी नासमझी धर्म का अधिकार और फासीवादी इस्लामी राजनीति में फर्क नहीं देखती.

आज नकाब की वकालत धार्मिक स्वतन्त्रता के नाम पर करने वाले कल टोरोंटो की सडकों पर लंदन जैसा प्रदर्शन ‘शरिया लागू करो’ नहीं करेंगे इस नतीजे पर पहुंचना राजनीतिक आत्महत्या होगी. दो वर्ष पूर्व कनाडा के ओंटेरियो प्रान्त में सैक्स शिक्षा को नए स्वरूप में राज्य सरकार द्वारा लागू करने पर दक्षिणी एशियाई समाज के कुछ तत्वों द्वारा बेहद तीव्र विरोध का सामना हुआ. कनेडियन कम्युनिस्ट पार्टी ने सैक्स शिक्षा का समर्थन किया था और उसके नेताओं को अपने समुदायों में इस प्रश्न को लेकर बेहद प्रतिक्रियावादी विरोध को झेलना पड़ा था. ये वही तबका है जो नकाब और पगड़ी का समर्थक है, यह वही तबका है जो भारतीय जातिवादी विचार को अपने जीवन में सात समंदर पार भी अमल में लाता है, यह वही तबका है जो अपने परिवारों में प्रेम विवाह के विरोध में आनर किलिंग तक कर देता है.

कम्युनिस्टों के एक युवा उत्साही तबके को एक गलत फहमी और है, नकाब के पक्ष में, गाजा पर हमले के विरोध में, इसराइल के विरोध जैसे भावनात्मक प्रश्नों पर प्रदर्शन, विचार गोष्ठियां आयोजित करके उमड़ी भीड़ को वह अपनी ताकत समझ लेता है. यह बुनियादी गलती है जो उन्हें वर्ग संघर्ष के रास्ते से भटकाव की तरफ ले जाती है. कम्युनिस्टों की असल ताकत वह हैं जो बुनियादी प्रश्नों पर सड़कों पर संघर्ष में उतरते हैं. बिजली घरों के निजीकरण, कनाडा पोस्ट के निजीकरण, पूर्व हार्पर सरकार के जनविरोधी बिलों पर उसके संघर्षों में जो ताकत उसके पास थी वही उसकी असल ताकत है. नकाब, फलस्तीन, इस्लामोफोबिया जैसे भावनात्मक मुद्दों पर आने वाले चेहरे हमारे उन कार्यक्रमों, धरना, प्रदर्शनों से गायब रहते हैं जब हम सरकार की जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध मोर्चा संभालते हैं. इस्लामोफोबिया के विरोध में आयोजनकर्ता लैला खालिद, जार्ज हब्बाश, कुर्दिश शहीद महिला आसिया रमजान अंतार, हिकमत , महमूद दरवेश, फैज़ अहमद फैज़ की फोटो भी हाथ में उठायें तब उन्हें अहसास होगा कि वह किन ताकतों के साथ खड़े हैं.

ये अजब इत्तेफाक है कि आज जब स्वीडन से नलिन पेकगुल की यह झकझोर देने वाली खबर आयी कि वह कथित मुस्लिम बहुल इलाके में तीस वर्ष रहने के बाद इलाका छोड़ा रही है. ठीक इसी समय कम्युनिस्ट पार्टी आफ कनाडा के नेतृत्व में टोरोंटों में इस्लामोफोबिया के विरोध में एक प्रदर्शन आयोजित किया जा रहा है और इन पक्तियों का लेखक ठीक इसी समय यह आलेख लिख कर अपना विरोध साम्राज्यवाद और इस्लामी ताकतों के विरुद्ध दर्ज कर रहा है. इस नाजुक दौर में मुझे यह कहने, सोचने और लिखने में कोई आपत्ति नहीं कि अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध भी उतना ही जरूरी है जितना फासीवादी इस्लामी राजनीति का, क्योकि मूलत: दोनों मानव विरोधी हैं.

भारतीय मूल के शमशाद एल्ही शम्स इन दिनों कनाडा में पदस्थ हैं और अपने बेबाक-प्रगतिशील विचारों को मुखरता के साथ सोशल मीडिया पर दर्ज कराने के लिए चर्चित हैं. उनसे संपर्क shamshad66@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है. शमशाद का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

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यूपी की चुनावी तैयारियों का हिस्सा न बन जायें isis के हरामखोर!

ये तो नही पता कि isis के लोगों का धर्म क्या है… किसी को तो छोड़ दो isis के हरामखोरों…

हाँलाकि उनके संगठन के नाम में ‘इस्लाम’ नाम का शब्द जुड़ा है, जैसा कि मथुरा के कंस रामवृक्ष ने नेता जी सुभाषचंद्र बोस जी की आजाद हिन्द फौज के नाम से दहशतगर्दो का कुनबा तैयार करने की गुस्ताखी की थी। पर हाँ इस बात में कोई दो राय नही है कि इन्सानियत के दुश्मन इन वहशी दरिन्दों ने अब तक सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमानों को ही पहुँचाया है। आकड़े बताते है कि इन हरामखोरों (Isis) ने  ईसाइयों, यहूदियो, कुर्दों, यजीदियों इत्यादि से ज्यादा जान-माल का नुकसान मुसलमानों को ही पहुँचाया है। यही नहीं, मुसलमानो के धार्मिक स्थल (मुख्य तीर्थ स्थल भी) तोड़ना isis का मुख्य लक्ष्य है।

भारतीय मुसलमानों शुक्र करो कि तुम मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी और महात्मा बुद्ध के संस्कारों वाले देश भारत मे महफूज हो। तुम आजादी और सहयोग के साथ अपने धार्मिक फरीजे अदा करते हो और इस देश मे तम्हारे करोड़ों धार्मिक स्थल ( औसतन हर दो किलो मीटर के दायरे मे एक मस्जिद या दूसरे धार्मिक स्थल) है। यहाँ कोई Isis तुम पर जुल्म नहीं ढा सकता।

और हाँ, एक बात ध्यान से सुन लो मुसलमान भाईयो।

आत्म रक्षा के लिये…युद्ध कौशल मे दक्ष होने के लिये ..हथियार चलाना सीखने के लिये जो कभी-कभी प्रशिक्षण शिविर लगते है, उस पर तुम लोग आइन्दा कभी ऐतराज का हल्ला मत मचाना। तुम्हारे ये भाई ही isis को कुत्तों की मौत मारेंगे और उनसे तम्हारी जान बचायेंगे।

वैसे इन सुअरो (Isis) की मजाल नहीं है कि वो हमारे देश भारत की तरफ नजर उठाकर भी देखें।

लेकिन हाँ, हम बहुत मुतमईन (निश्चित) होकर भी नहीं बैठना चाहिए है।

यूपी का चुनाव नजदीक है। अपनी हारी हुई बाजी जीतने के प्रयासों में हो सकता है उनका यहाँ छोटा-मोटा टूर लगवाने के लिये कोई TA-DA भिजवा दे।

इन दरिन्दो के अमानवीय कृत्यों से जिनका लाभ होता होगा वैसी तमाम शैतानी शक्तियाँ ही इन शैतानों की आर्थिक सहायता करती ही होगी। तबाही मचाने की सुपारी से ही तो ये वित्त पोषित होते होगे।

आप सब तो समझदार हो.. जानते हो.. इस किस्म की. अमानवीय नापाक हरकतों वाली घटनाओं के माहौल में कहाँ-कहाँ, किसका-किसका, कब-कब और किस मौके पर किस किस्म का  फायदा होता है।

लेखक नवेद शिकोगह लखनऊ के युवा और बेबाक पत्रकार हैं. उनसे संपर्क उनकी मेल आईडी Navedshikoh84@gmail.com या उनके मोबाइल नंबर 08090180256 / 09369670660 से किया जा सकता है.

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रसूल को मुहम्मद लिखने पर लखनऊ नदवा के एक मौलाना ने मुझे जान से मारने की धमकी दी थी :

Tabish Siddiqui : अमजद साबरी, पाकिस्तान के क़व्वाल, जिनकी कल गोली मार कर ह्त्या कर दी गयी थी, उन पर पहले से एक ईशनिंदा का केस चल रहा था.. ईशनिंदा इस वजह से उन पर लगाई गयी थी क्यूँ कि उन्होंने पाकिस्तान के Geo टीवी पर सुबह के वक़्त आने वाले एक प्रोग्राम में क़व्वाली गायी.. और उस क़व्वाली में पैग़म्बर मुहम्मद के चचेरे भाई अली और बेटी फ़ातिमा की शादी का ज़िक्र था.. ज़िक्र कुछ ज़्यादा डिटेल में था जो कि मौलानाओं को पसंद नहीं आया.. और Geo टीवी समेत अमजद साबरी पर ईशनिंदा का मुक़दमा कर दिया गया.. और फिर एक आशिक़-ए-रसूल ने अदालत से पहले अपना फैसला दे दिया क्यूंकि उनके हिसाब से ईशनिंदा की सज़ा सिर्फ मौत थी जो पाकिस्तान की अदालत शायद ही देती एक क़व्वाली के लिए किसी को…

ये ईशनिंदा और बेअदबी का इलज़ाम लगाने वाले हमारे आस पास बहुत हैं.. मगर इस तरह की मानसिकता को जहाँ सपोर्ट मिल जाता है वहां ये अपने सबसे घिनौने रूप में दिखाई देते हैं.. कल एक दोस्त के कमेंट पर मैंने ख़लीफ़ा “उमर” को “उमर” लिखे बिना आगे “हज़रत” लगाए तो वहां कुछ लोग इतना ज़्यादा मुझ से नाराज़ हो गए कि मुझ से सीधे ये कहा कि आप “उमर” को गाली दे रहे हैं.. मैंने जब इस्लाम का इतिहास लिखना शुरू किया था जिसमे मैं पैग़म्बर मुहम्मद को हमेशा “मुहम्मद” ही लिखता था तो इतने बड़े बड़े सेक्युलर और मॉडरेट मुसलमानों ने मुझे सिर्फ इसलिए गाली दी और मुझे ब्लाक कर दिया क्यूंकि इतिहास लिखने में मैं “मुहम्मद” के बाद “सलल्लाहो अलैह वसल्लम” नहीं लगाता था..

मैंने कितनों को समझाने की कोशिश की कि जितनी भी इस्लामिक इतिहास की किताब मेरे पास हैं अंग्रेजी में सब में “मुहम्मद” को मुहम्मद ही कहा गया है क्यूंकि इतिहास की किताबें हर किसी धर्म के लिए होती हैं मगर जिनको नहीं मानना था उन्होंने नहीं माना.. क्योंकिं इनके हिसाब से ये सब ईशनिंदा है और इस्लामिक रूल होता तो अब तक मेरे खिलाफ केस कर चुके होते या इतनी ही बात के लिए मार चुके होते…

आज के इस्लामिक संस्करण में सब कुछ ईशनिंदा है, रोज़ेदार के सामने आप कुछ खा लें (पाकिस्तान में अभी एक पुलिस वाले ने इसी बात को लेकर मारा था एक शख्स को), जिसको गाना बजाना न पसंद हो उसके आगे आप गा बज लें, मतलब अगर इस्लामिक एस्टेट ऐसा सख्त रूल हो कहीं तो ईशनिंदा का आरोप किसी भी तरह से कहीं से भी घुमा के लगाया जा सकता है.. क्यूंकि जिस “सच्चे” मुसलमान को कुछ भी न पसंद हो और आप वो कर दें तो वो ईशनिंदा होती है.. पाकिस्तानी लिबरल लोग इसके खिलाफ खड़े हो रहे हैं क्यूंकि सबसे ज़्यादा इसी क़ानून का दुरूपयोग होता है वहां…

ईशनिंदा का सबसे पहला कांसेप्ट “ख़लीफ़ा उमर” का था.. मगर अभी इस इतिहास और इस से जुडी जानकारियां लिख दूं तो अच्छे से अच्छा मुसलमान नाराज़ हो जाएगा.. और ये ईशनिंदा वाले बहुसंख्यक हैं.. यहाँ भी और पाकिस्तान में भी.. ये सारे क़व्वाली और मज़ार पर जाने को ईशनिंदा ही बोलते हैं मगर अमजद साबरी से जुडी पोस्टों पर ख़ूब घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं कल से.. मगर जिसने गोली मारी है उसने इनके दिल का ही काम किया है और ये अंदर से इसे बख़ूबी जानते और मानते हैं…

रही भारत की बात तो भारत को इस्लामिक राज्य बना दीजिये फिर देखिये… वही पाकिस्तान वाला इस्लाम यहां भी आपको मिलेगा.. यहां भी वही सब हैं जो वहां पाकिस्तान में हैं.. बस उन्हें यहां मौक़ा नहीं मिल पा रहा है.. किसी मुगालते में मत रहिए… रसूल को मुहम्मद लिखने पर यहीं लखनऊ नदवा के एक मौलाना ने मुझे जान से मारने की धमकी दी थी.. वो तो कहिये जब उसे लगा कि मेरी हैसियत उस से निपटने की है तब जाके चुप हुवा वो.. पाकिस्तान तो यहीं से लोग गए हैं.. यहां कानून का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि हम लोग सलामत हैं… इस्लाम लपेटे में न आता तो आज न अहमदिया अलग होते, सूफी अलग होते, शिया अलग होते और न कोई और.. सैकड़ों पंथ बना के लोगों ने खुद को आज के इस इस्लाम से अलग कर लिया है मगर इन लोगों को अभी नहीं समझ आ रहा है कि गलती कहाँ है.. इनके हिसाब से आज के इस्लाम को गलत कहना पैग़म्बर को गलत कहना हो गया क्यूंकि मौलाना यही सिखाते और समझाते हैं इन्हें…

इस एफबी पोस्ट के लेखक ताबिश सिद्दीकी से संपर्क https://www.facebook.com/delhidude के जरिए किया जा सकता है.

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खाड़ी देशों की मजबूरी थी औरतों को ढंकना, गलती से बिना ढंकी स्त्री दिख जाती तो वो कामोत्तेजक हो जाते

Tabish Siddiqui : पहले हमारे यहाँ ब्लैक एंड वाइट टीवी होता था “बेलटेक” कंपनी का जिसमे लकड़ी का शटर लगा होता था जिसे टीवी देखने के बाद बंद कर दिया जाता था.. चार फ़ीट के लकड़ी के बक्से में होता था वो छोटा टीवी.. शटर बंद करने के बाद उसके ऊपर से एक पर्दा और डाला जाता था क्रोशिया से बुना हुवा.. लोगों के यहाँ फ्रिज टीवी और हर उस क़ीमती चीज़ पर पर्दा डाल के रखा जाता था जो उन्हें लगता था कि धूल और गर्मी से खराब हो जाएगा.. बाद में जब बिना शटर के टीवी आया तो वो मुझे बहुत अजीब सा नंगा नंगा दिखता था.. क्यूंकि मुझे उसी शटर में बंद टीवी की आदात थी.. फ्रीज़ से कपड़ा हट जाता तो वो भी नंगा दिखने लगता था…

खाड़ी देशों की मजबूरी थी अपनी सुंदर औरतों को ढांकना.. क्यूंकि अगर ढंकते न तो जानलेवा धूप और गर्मी से उनकी त्वचा झुलस जाती.. औरतें भी अपनी सुंदरता को बचाने के लिए अपनी त्वचा और पूरे बदन को लपेट कर ही बाहर निकलती थीं.. बहार लपेटकर निकलने का मतलब ही होता है कि आप धूप और धूल से बचाव कर रहे हो अपने आपका.. समय के साथ साथ उनके मर्दों की आदत पड़ गयी ढकी हुई स्त्रियों को देखना और अगर कोई उन्हें गलती से बिना ढकी स्त्री दिखा जाती तो वो कामोत्तेजक हो जाते थे.. सभी नहीं.. मगर ज़्यादातर…

ये ढंकना उनकी संस्कृति बन गयी धीरे धीरे और औरतें भी एक कवच के बिना खुद को नंगा महसूस करने लगीं.. इसी तरह का ओढ़ना मिस्र से लेकर सीरिया तक भी चलन में था.. मगर जब समय बदला और घर और सार्वजनिक स्थान वातानुकूलित होने लगे तो अपने आपको इतना ढंकना समझदार लोगों को बेवकूफ़ी लगने लगा.. मिस्र से लेकर अन्य खाड़ी के देशों में औरतों ने इस ढंकने का विद्रोह करना शुरू किया.. और मर्दों को समझाना शुरू किया कि जिस “तम्बू” को आप लोगों ने संस्कृति समझना शुरू कर दिया था वो दरअसल एक बचाव था हमारी त्वचा और सेहत का.. मगर अब हम विकसित हैं.. हमारे पास पुलिस है, सेना है, क़ानून है हमारी हिफाज़त के लिए.. त्वचा के लिए “सन स्क्रीन लोशन”… जिस बुर्के को आप लोगों ने हमारी हिफाज़त समझ के रखा था अब उसकी कोई ज़रूरत नहीं है.. ये सातवी शताब्दी नहीं ये इक्कीसवीं शताब्दी है…

मिस्री लेखक लायला अहमद और उन जैसी अन्य ने पूरा अभियान चलाया अपने मर्दों को समझाने के लिए कि जिस “तम्बू” को तुम इस्लाम समझ कर हम औरतों पर लपेटते हो वो दरअसल वहां की संस्कृति है.. क्यूंकि अरब के उस दौर में ग़ुलाम भी होते थे, गुलामों की मंडियां लगती थी, गुलाम औरतें अपने स्तन खोलकर चलती थीं घरों में अपने मालिक और उनके मिलने जुलने वालों के सामने.. कुरआन इसीलिए “हिजाब” वाली आयत में “स्तन” ढंकने को बोल रहा है.. लायला अहमद और उन जैसी अन्य क्रांतिकारी स्त्रियों की बात धीरे धीरे वहां के मर्द समझने लगे और बहुत हद तक औरतों को आज़ादी मिलनी शुरू हुई…

जिनके यहाँ दुपट्टा ओढ़ा जाता है उन्हें टी शर्ट पहने हुवे औरत “अजीब” और भौंडी दिखती है.. जिनके यहाँ घूंघट का रिवाज है उन्हें बिना घूंघट की औरतें बेशर्म दिखती हैं.. अरबों और उन जैसे अन्य को जो औरत “लबादा” न ओढ़े नंगी दिखती है.. मगर भारत के लोगों की क्या मजबूरी है? उनकी संस्कृति अपना लो और मर्द भी चोगा पहनना शुरू कर दें तो कुछ दिन बाद बिना चोगे के नंगा और भौंडा महसूस करने लगेंगे.. जो लोग कुछ दिन दाढ़ी रख के कटवा देते हैं वो भी शरमाते हुवे घुमते हैं क्यूंकि दूसरों को “अजीब” लगता है उनका लुक…

अब LED का ज़माना है.. वातानिकूलित और ऐसे घर होते हैं हमारे जहाँ धूल और धुप का इतना असर नहीं होता है और अब LED और वातुनुकूलित घरों में ढँक के रखने की कोई ज़रूरत नहीं है.. क़ानून भी अब मज़बूत है जहाँ आपको ये भी सोचने की ज़रूरत नहीं है कि किसी गलत निगाह वाले “चोर” ने हमारा टीवी देख लिया तो उठा ले जाएगा.. पहले लोग कंप्यूटर रूम में भी जूता चप्पल उतार के जाते थे ताकि खराब न हो जाए.. क्या वहां जूता चप्पल उतार के जाना धर्म का हिस्सा था? संस्कृति और धर्म में अंतर करना समझिये.. समझदार बनिए…

फेसबुक के चर्चित लेखक ताबिश सिद्दीकी के वॉल से.

इन्हें भी पढ़ें….

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पैगम्बर के घर पर बुलडोजर क्यों चला?

अभी हाल में सऊदी अरब का दौरा करके लौटे हैं। सुना है उन्होंने अरब के बादशाह सलमान बिन अब्दुल अजीज को एक गजब का तोहफा दिया। वह केरल में दुनिया में अरब के बाहर बनी दुनिया की पहली मस्जिद की प्रतिकृति थी। इस मस्जिद को केरल के एक हिंदू राजा ने मुहम्मद साहेब के जीवनकाल में ही 629 ईसवी में बनवाया था। 14वीं सदी में मशहूर यात्री इब्नाबतूता वहां गया था और उसने लिखा कि मुसलमान वहां कितने सम्मानित हैं।

इस तोहफे को पाकर अरब के शाह कितने खुश हुए होंगे इसका अंदाजा मैं कतई नहीं लगा सकता। क्योंकि पिछले कुछ सालों में सऊदी सरकार ने वह तमाम ऐतिहासिक निशानियां मिटा दीं जो पैगम्बर मुहम्मद साहेब से जुड़ी थीं। मेरे एक मित्र पिछले साल हज से लौटे तो वह बहुत दुखी थे। उन्होंने बताया जहां कल तक पैगम्बर साहब के शुरूआती साथियों की कब्रें थीं वे अब नजर नहीं आतीं। कई ऐतिहासिक मस्जिदें जिन्हें हम पवित्र मानते थे वहां अब बिजनेस सेंटर या शाही परिवार का महल नजर आता है। कहीं-कहीं तो इन प्राचीन इमारतों को तोड़ कर भव्य पार्किंग बना दी गई।

राम का जन्म अयोध्या में हुआ इसके अब तक कोई ठोस पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिले हैं क्योंकि यह हजारों साल पुरानी घटना है जिसके प्रमाण मिल पाना तकरीबन नामुकिन है। लेकिन मक्का में हजरत मोहम्मद पैगम्बर साहब का जन्म जिस घर में हुआ उसके तमाम पुरातात्विक प्रमाण मौजूद हैं। क्योंकि यह घटना बहुत पुरानी नहीं। मोहम्मद साहेब का जन्म 570 ईसवी में हुआ था। इसमें कोई विवाद भी नहीं है। बाद में उसे लाइब्रेरी में तब्दील कर दिया गया था। उस घर को गिरा दिया गया।

हजरत के दौर की कई मस्जिदें और इमारतें मक्का में अभी दो चार साल पहले तक मौजूद थीं जिन पर अरब के बादशाह ने बुलडोजर चला कर जमींदोज कर दिया। इसमें पैगम्बर की पहली नेकदिल बेगम खदीजा का घर भी शामिल था। इसमें इस्लाम के पहले खलीफा अबू बकर का घर भी शामिल है जहां आज होटल हिलटन खड़ा है। जिस ऊंची पहाड़ी की चोटी “फारान” से हजरत मोहम्मद साहब ने अपने पैगम्बर होने की घोषणा की थी, आज वहां सऊदी शाह ने अपना आलीशान महल बनवा दिया है। मक्का से लौटे अपने दोस्त की इस बात पर मुझे यकीन नहीं हुआ। मैंने अपने दूसरे हिन्दुस्तानी मुस्लिम दोस्तों से इस बारे में पूछा तो जैसी की उम्मीद थी उनका कहना था कि ये गप्प है बकवास है। मैंने नेट खंखाला तो उसमें इस तरह की कई सूचनाएं थीं। फिर भी मुझे यकीन नहीं हुआ तो मैंने सऊदी में रहने वाले अपने दोस्त रेहान भाई को फोन लगाया। उन्होंने मुझसे कहा ये सच है। मेरा दिल बैठ गया।

नेट पर ही मैंने सऊदी सरकार का इस पर बयान पढ़ा कि पैगम्बर साहब का मकान इन भव्य इमारतों के पास पार्किंग के स्थान में अवरोध पैदा करता था। इस मकान के कारण रास्ता तंग हो गया और वाहनों के आने-जाने में लगातार बाधा होती थी। इसलिए इस घर को ध्वस्त करना जरूरी हो गया था। हैरत की बात है कि पैगम्बर साहब का घर तोड़ते वक्त विरोध की एक भी आवाज दुनिया के किसी कोने से नहीं सुनाई दी। इस्लामिक जगत में ऐसी चुप्पी और खामोशी अजब है। मैंने अपने एक मुसलमान दोस्त से पूछा तो उनका जवाब था-किस मुसलमान में हिम्मत है कि वह अरब के शाह के खिलाफ आवाज उठाए। जो उठाएगा वह दोजख में जाएगा। उसकी आने वाली नस्लों का हज पर जाना बंद हो जाएगा। फिर आगे वह बोले कि वैसे इसमें गलत क्या है? पैगम्बर का पुश्तैनी घर, उनकी बेगमों के घर, पुरानी मस्जिदें, ये सब इमारतें हाजियों की सुविधा के लिए गिराई गईं। इस्लाम प्रतीक पूजा की इजाजत नहीं देता। हम मुसलमानों की श्रद्धा हज यात्रा में है प्रतीकों में नहीं।

मैंने सिर्फ तर्क के लिए कहा-फिर बाबरी मस्जिद के ढहाने पर पूरी दुनिया का इस्लाम नाराज क्यों है? उसके नाम पर क्यों दंगे हुए? कुछ उन्मादियों की हरकत के बदले सड़क पर दोनों तरफ के लोगों के खून क्यों बहाए गए? (हालांकि निजी तौर पर उसके ढहाए जाने को गैर अखलकी कदम मानता हूं क्योंकि हमारा संविधान इसकी इजाजत नहीं देता) वे जवाब नहीं दे पाए। मैं अपने अन्य मुस्लिम और कम्युनिस्ट दोस्तों से इस सवाल का जवाब मांगता हूं। इस्लाम की निशानियां मिटाने का विरोध क्यों नहीं होना चाहिए? अरब के ऐसे शाह का हाथ क्यों चूमा जाए जिसने इन पवित्र स्‍थानों को नेस्तानबूद कर दिया? उम्मीद है मुझे तर्कपूर्ण जवाब मिलेगा।

लेखक दयाशंकर शुक्ल सागर अमर उजाला अखबार के शिमला संस्करण के स्थानीय संपादक हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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देश के मुसलमानों को दलितों से सीखना चाहिए राजनीति का सबक

इमामुद्दीन अलीग

इतिहास के अनुसार देश के दलित वर्ग ने सांप्रदायिक शोषक शक्तियों के अत्याचार और दमन को लगभग 5000 वर्षों झेला है और इस इतिहासिक शोषण और भीषण हिंसा को झेलने के बाद अनपढ़, गरीब और दबे कुचले दलितों को यह बात समझ में आ गई कि अत्याचार, शोषण,सांप्रदायिक पूर्वाग्रह और भेदभाव से छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका यही है कि राजनीतिक रूप से सशक्त बना जाए। देश की स्वतन्त्रता के बाद जब भारत में लोकतांत्रिक शासन की स्थापना की गई तो दलितों ने इसे  अपने लिए एक बहुत बड़ी नेमत समझा। इस शुभ अवसर का लाभ उठाते  हुए पूरे के पूरे दलित वर्ग ने सांप्रदायिक ताकतों के डर अपने दिल व दिमाग से उतारकर और परिणाम बेपरवाह होकर अपने नेतृत्व का साथ दिया, जिसका नतीजा यह निकला कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जनसंख्या के आधार 18-20% यानी अल्पसंख्यक में होने के बावजूद भी उन्होंने कई बार सरकार बनाई और एक समय तो ऐसा भी आया कि जब दलितों के चिर प्रतिद्वंद्वी मानी जाने वाली पार्टी भाजपा को भी दलित नेतृत्व के सामने गठबंधन के लिए सिर झुकाना पड़ा।

देश के मुसलमानों के सामने अपनी स्थिति को बदलने के लिए यह एक जीता जागता और स्पष्ट उदाहरण है। अगर दलितों ने भी मुसलमानों की तरह सांप्रदायिक शोषक शक्तियों को सत्ता से दूर रखने की चिंता पाल ली होती और वह भी अपने नेतृत्व की स्थापना करने के बजाय अन्य राजनीतिक दलों की पूंछ पकड़ कर बैठे रहते तो आज दलितों का भी वही हाल होता जो मुसलमानों का है। जबकि दलितों ने दूरदृष्टि से काम लिया, आगामी चुनावों के परिणाम और सांप्रदायिक ताकतों के खौफ से बेपरवा होकर उन्होंने अपने नेतृत्व का साथ दिया और आज इसका नतीजा सब के सामने है। लोकतांत्रिक भारत में मुसलमानों के पास भी अपने पैरों पर खड़े होने के लिए इससे हटकर कोई दूसरा रास्ता नहीं है कि वे अपने नेतृत्व को मजबूत करें और सभी कठिनाइयों, संदेह, और शिकायतों को पीछे छोड़ कर अपने नेतृत्व का साथ दें। राजनीतिक रूप से सशक्त होने से ही देश के मुसलमानों अनगिनत समस्याओं का समाधान निकल सकता है। दलितों की तरह मुसलमानों को भी अपने सभी मतभेदों को भूलकर और अपने दिल व दिमाग से सांप्रदायिक ताकतों के डर का बोझ उतार कर अपने टूटे फूटे नेतृत्व को मजबूत करना होगा। वैसे देखा जाए तो मुसलमानों ने दलितों की तुलना में साम्प्रदायिक शक्तियों की बर्बरता का एक हिस्सा भी नहीं झेला है। दलित वर्ग तो आज भी सांप्रदायिक पूर्वाग्रह और भेदभाव के जहर को पी रहा है। ऐसे में जब दलित सांप्रदायिक ताकतों के डर को अपने मन से उतार कर अपना नेतृत्व स्थापित कर सकते हैं तो फिर मुसलमान क्यों नहीं?

अगर दूरदृष्टि से काम लिया जाए और आगामी चुनावों के परिणाम और सांप्रदायिक ताकतों के डर से ऊपर उठकर सोचा जाए तो यह बात दिन के उजाले की तरह स्पष्ट हो जाती है कि मुसलमानों के पास राजनीतिक दिवालियापन से बाहर निकलने का एकमात्र यही रास्ता है कि जो भी थोड़ा बहुत प्रभावी मुस्लिम नेतृत्व और मुस्लिम राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों के बीच मौजूद हैं, उन्हीं को मजबूत किया जाए। अन्य समुदायों के नेतृत्व पर भरोसा करने या उनकी राजनीतिक गुलामी करने से मुसलमानों का राजनीतिक दिवालियापन दूर होने से रहा। वैसे भी मुसलमानों ने अपनी राजनीतिक पार्टियों को मजबूत करने के अलावा अन्य सभी विकल्पों को आजमा कर देख लिया है। इन विकल्पों में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों से लेकर दलित व पिछड़े नेतृत्व सहित सभी क्षेत्रीय पार्टियां शामिल हैं, जिन्हें मुसलमानों ने कई कई बार अपना एकमुश्त वोट देकर सफल किया मगर सत्ता प्राप्त करने के बाद उन सभी ने मुसलमानों की समस्याओं को हल करने के बजाय मुसलमानों को अपना राजनीतिक गुलाम बनाए रखने के लिए दिन रात एक कर दिया और सांप्रदायिक ताकतों के अनजाने भय में डाल कर मुसलमानों को हमेशा ही उभरते मुस्लिम नेतृत्व से शंकित करने का काम किया जिसका परिणाम  यह निकला कि मुसलमान राजनीतिक रूप से विकलांग होकर रह गए।

मुसलमानों को यह बात समझनी होगी कि इस दावे में कोई दम नहीं है कि मुसलमानों के एकजुट होने और अपनी पार्टी बनाने से हिंदू समुदाय एकजुट हो जाएगा और सांप्रदायिक शक्तियां मजबूत होंगी। अगर इस धारणा को मान भी लिया जाए तो इस तथ्य से कौन इनकार कर सकता है कि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता है, कोई भी उतार चढ़ाव हमेशा के लिए नहीं होता है बल्कि सब कुछ क्षणिक (वक़्ती) होता है। वैसे तो मुसलमानों के एकजुट होने से पहले तो हिंदू समुदाय के एकजुट होने की संभावना बहुत कम है लेकिन अगर हो भी जाए तो यह भी एक वक़्ती बात होगी, क्योंकि कि बसपा, सपा, कांग्रेस और वामपंथी दलों सहित अन्य कई पार्टियां मुसलमानों के चिंता में अपने अस्तित्व (वजूद) से समझौता नहीं करेंगी। यह तो केवल देश के मुसलमानों की विशेषता रही है कि वह सांप्रदायिक शक्तियों की चिंता में अपने राजनीतिक अस्तित्व से समझौता करके बैठ गए और देश की आजादी के बाद से अपने गौरवशाली अतीत पर गर्व करने और दूसरों के नेतृत्व की राजनीतिक गुलामी करने अलावा उन्हें और कुछ सुझाई नहीं दे रहा है।

बहरहाल मुस्लिम नेतृत्व की चिंता में देश की अन्य सभी पार्टियां सांप्रदायिक शक्तियों से हाथ मिला कर अपने अस्तित्व को मिटाने का खतरा नहीं मोल ले सकती हैं बल्कि इसके विपरीत यही पार्टियां अपना अस्तित्व बचाने की खातिर मुस्लिम नेतृत्व से गठबंधन करने के लिए खुद आगे आएंगी और तब मुसलमान अपने शर्तों पर इन पार्टियों को झुकने के लिए मजबूर कर सकेंगे। इस बात से भी कोई इनकार नहीं कर सकता है कि देश के अधिकतर पार्टियां अवसरवादी हैं। जब दो पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी बसपा और भाजपा सत्ता के लिए गठबंधन कर सकते हैं तो आगे चलकर अन्य दलों का मुस्लिम नेतृत्व के साथ गठबंधन क्यों नहीं हो सकता? और अगर आगे चलकर कोई भी पार्टी मुस्लिम नेतृत्व के साथ गठबंधन करने के लिए तैयार न हो तब भी उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के मुसलमान अपनी 20-22 प्रतिशत आबादी के दमखम पर मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में होंगे और अपने खिलाफ वाली किसी भी आवाज़ या कार्रवाई का जोरदार तरीके से विरोध कर सकेंगे और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की स्थिति में होंगे।

लेकिन याद रखें, यह सब तभी संभव है जब मुसलमान अपने नेतृत्व और अपनी राजनीतिक दलों को मजबूत कर लें और उनका लगातार साथ दें, इसी एक तरीके से मुसलमानों को राजनीति में हिस्सेदारी मिल सकती है। मुस्लिम नेतृत्व स्थापित होने से पहले न तो मुसलमानों को राजनीति में हिस्सा मिल सकता है और न ही इससे पहले कोई प्रभावी प्रेशर ग्रुप बनने की संभावना है। अगर कोई प्रेशर ग्रुप बना भी लिया गया तो भी वह किसी काम का नहीं होगा,  कोई पार्टी मुसलमानों की एक न सुनेगी और न ही उनकी समस्याओं को हल करने के लिए गंभीर होगी, मुसलमान चाहे जितना चीख़ते चिल्लाते और विरोध करते रहें…..।

जब देश के सात आठ प्रतिशत आबादी वाले वर्गों से लेकर दो ढाई प्रतिशत आबादी वाले वर्ग भी अपना नेतृत्व स्थापित कर और एकजुट होकर सत्ता की कुर्सी तक पहुंच सकते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर 15 प्रतिशत जनसंख्या वाले मुसलमान ऐसा क्यों नहीं कर सकते?  जबकि कई राज्यों और क्षेत्रों में मुसलमानों की आबादी 30-40 और कहीं कहीं तो उस से भी ऊपर है। मुसलमानों को इस विषय में गहनता से विचार करने की आवश्यकता है।

लेखक इमामुद्दीन अलीग Imamuddin Alig युवा और स्वतंत्र पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 8744875157 के जरिए किया जा सकता है.

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मुस्लिम लड़के से प्यार में धोखा खाई तो मरने के पहले पूरे कौम को कमीना बता गई (पढ़ें पत्र)

Sanjay Tiwari : वह दलित होकर भी वेमुला नहीं थी। न ही अखलाक हो पायी थी। आनंदी होती तो टीवी रोता। सोशल मीडिया भी निंदा ही करता लेकिन उसका दुर्भाग्य यह था कि वह न रोहित थी, न टीवी की आनंदी, इसलिए बिहार के एक जिले में सिंगल कॉलम की खबर बनकर रह गयी। लेकिन पूनम भारती की मौत का एक संदेश है। उसी तरह का संदेश जैसे रोहित वेमुला की मौत में एक संदेश था। पूनम भारती एक ऐसे झूठे फरेब का शिकार हुई जिससे वह प्यार के आवेग में बच नहीं पायी।

बिहार में जहानाबाद की पूनम भारती जिस कोचिंग इंस्टीट्यूट में पढ़ने जाती थी वहां जाल बिछाये एक बहेलिये ने उसे फंसा लिया। “प्यार” के इस फंदे में फंसकर पूनम वहां तक चली गयी जहां कोई लड़की शादी से पहले जाने से बचती है। लेकिन जहांगीर ने तो उसे अपनी पत्नी बता ही दिया था लिहाजा जहांगीर ने उसे बिना शादी के “पेट” से कर दिया। यहां से आगे का रास्ता पूनम के लिए या तो जहांगीर के साथ जाता था, नहीं तो फिर कहीं नहीं जाता था। पूनम ने घर में कुछ भी नहीं बताया था कि वह एक ऐसे लड़के के प्यार में पड़ चुकी है जो उसकी जाति और धर्म का नहीं था। पेट का बच्चा गिराकर जहांगीर उसका साथ पहले ही छोड़ चुका था। इसके बाद वह कहां जाती? उसने एक छोटी सी चिट्ठी लिखी और पटना गया रेलवे लाइन को अपनी जिन्दगी का आखिरी मुकाम बना लिया।

उसने जो चिट्ठी लिखी है उसमें एक पूरी कौम को कसूरवार ठहराया है। “मियां जात कमीना होता है। इसकी जुबान पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए।” रोहित वेमूला की तरह पूनम दलित होकर भी किसी ब्राह्मणवाद का शिकार नहीं हुई है। वह एक और वाद का शिकार हुई है जिसकी बुनियाद में ऐसे मौलवी और उनकी मानसिक संतान बैठे हुए हैं जो एक खास किस्म के “जिहाद” पर है। यह “जिहाद” एक मुशरिक को “पाक” बनाने की प्रक्रिया है। पूनम भारती शायद इसी मानसिकता का शिकार हो गयी। अगर ऐसा न होता तो इतनी बड़ी बात वह कभी न लिखती कि “मियां जात” पर कभी भरोसा मत करना।

लेकिन पूनम भारती की मौत पर सवाल के सारे दरवाजे हमारी बौद्धिक दुनिया ने “लव जिहाद का झूठा प्रलाप” बताकर पहले ही बंद कर दिया है। हमारे समय की त्रासदी यही है कि हमने धोखा, फरेब और मौत का भी मजहबीकरण कर दिया है। ऐसे हालात में पूनमों के हिस्से में भले ही मौत हो लेकिन जहांगीरों के हिस्से में पूरी आजादी है। वे जो चाहें कर सकते हैं उसको बौद्धिक संरक्षण देनेवाले लोग दो मिनट का मौन तो रखेंगे लेकिन श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं बल्कि चुप्पी साधने के लिए।

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Shahnawaz Malik : दिल्ली में हर दिन शादी का झांसा देकर रेप और ख़ुदकुशी की कहानी छपती है। आरोपी सारे तिवारी शर्मा होते हैं। ख़ैर नफ़रत कम फैलाएं वरना इतिहास में नफ़रत फ़ैलाने वालों में.

Gaurav Sharma : Shehnawaj ji Delhi main Ek bhi crime ki khabar dikhao Jis main koi musalman na ho.

Shahnawaz Malik : शर्माजी…या तो रिकॉर्ड खंगालिए या फिर योगा करिए

Saurabh Dwivedi : इतिहास में नफरत फ़िलहाल एक ही कौम फैलाती आई और फैलाती रहेगी. रोज़ हज़ारो लाखो मासूमो को अपना निशाना बना कर कभी सुसाइड बॉम्बर बन के तो कभी आतंकवादी हमले करके उससे भी जी नहीं भरा तो लव जिहाद पे उतारू है

Shahnawaz Malik : तिवारीजी की वाल पर ट्रैफिक का स्टैंडर्ड काफी लो है। रेटोरिक कब तक करेंगे।

राकेश कुमार मिश्रा : कोई आवाज़ नहीं उठेगी कहीं से। अगर कोई विरोध करेगा भी तो उसे सेक्यूलर लोग संघी कह कर दो समुदायों में दरार पैदा करने की साज़िश कह कर ख़ारिज कर देंगे। वैसे मुझे इस लड़की के साथ कोई सहानुभूति नहीं है। अवैध सम्बन्ध बनाते समय तो इसने कुछ नहीं सोचा अपने माँ बाप और परिवार की इज़्ज़त के बारे में और लेटर में लेक्चर झाड़ रही है।

Yusuf Ansari : संजय भाई, आपने पूनम की आवाज बुलंद करके अच्छाी काम किया है। मरने वाले का बयान सच्चा माना जाता है। मैं भी चाहता हूं कि पूनम को खुदकुशी के लिए मजबूर करने वाले को सज़ा मिले। मैं भी आपकी पोस्ट शेयर कर रहा हूं।

Shahnawaz Malik : यूसुफ़ साब…दिल्ली समेत पूरे देश में हर दिन इसी तरह के रेप और मर्डर के मामले होते हैं, आप उसे क्यूं नहीं शेयर करते?

Yusuf Ansari : भाई Shahnawaz Malik, मैं न्याय के पक्ष में हूं और अन्याय के ख़िलाफ़। मेरा मानना है कि सबको इंसाफ़ मिलनमा चाहिए। बग़ौर घार्मिक और जातीय भेदभाव के। मैंने पहले भी ऐसी कई पोस्ट शेयर की हैं। आगे भी करूंगा। आपने याद दिलाया है तो और ज़्यादा ध्यान रखूंगा।

Shahnawaz Malik : न्याय के पक्ष में कौन नहीं है। तिवारी की इस पोस्ट में घृणा है और तर्क सारे खोखले। रोहित या अख़लाक़ अपनी पहचान की वजह से मारे गए, जबकि इस मामले में ऐसा नहीं है। रेप और मर्डर के सामान्य केस में जाति और धर्म जोड़ने से न्याय होगा या नहीं लेकिन अन्याय ज़रूर होगा।

Yusuf Ansari : भाई Shahnawaz Malik, आपकी बात सही है। लेकिन क्या सिर्फ़ इसी वजह से हम इंसाफ के लिए आवाज़ छोड़ देें। पूनम को प्यार में धोखा मिला है। ये धोखा उसे जहंगीर की जगह कोई जसबीर भई दे सकता था। उसके साथ नाइंसाफ़ी तो ङुई है।

Shahnawaz Malik : ये एक नॉर्मल क्राइम है जो दिल्ली और देश के हर कोने में हर दिन होता है। आप आवाज़ उठाएंगे तो मैं पूछूँगा कि बाक़ियों के लिए क्यों नहीं उठाया। तिवारी का तो मकसद समझ आता है क्योंकि इसमें आरोपी मुस्लिम है। ये लोग दिनभर यही करते हैं।

Yusuf Ansari : भाई Shahnawaz Malik, सबके लिए इंसा की आवाज उठनी ही चाहिए। हम हिंदू और मुसलमान छोड़कर इंसान की बात करें तो बेहतर है।

Shahnawaz Malik : काश आप जैसा तिवारी महाशय भी सोचते। मैं इस लड़की के लिए आवाज़ फिर भी उठा सकता हूँ लेकिन ये पोस्ट नहीं शेयर करूँगा।

Yusuf Ansari : हमें शुरुआत अपने से करनी चाहिए। हमने शुरुआत कर दी है। इंशाल्लाह नतीजे अच्छे ही होंगे। Shahnawaz Malik भाई, कोई बात नहीं आप आवाज़ उठाइए। पोस्ट शेयर मत कीजिए। आपकी आवाज़ यहीं से दूक तर जाएगी।

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तुर्की के धर्मगुरु का बयान- अगर हस्‍तमैथुन किया तो मरने के बाद हाथ प्रेगनेंट हो जाएगा!

मुकाहिद सिहाद हान


इस्लाम के धर्म गुरु लोग जाने कैसे कैसे फतवे बयान देते रहते हैं. ताजा हास्यास्पद बयान तुर्की के एक धर्मप्रचारक ने दिया है. ये महोदय इस्‍लाम को बढ़ावा देने हेतु टीवी पर काफी सक्रिय रहते हैं. हस्तमैथुन पर इनके ताजे फतवे ने सोशल मीडिया में विवाद खड़ा कर दिया है. इनका कहना है कि जो लोग हस्‍तमैथुन करते हैं, मरने के बाद उनका हाथ गर्भवती हो जाता है और अपने अधिकारों की मांग करता है. इस मूर्खतापूर्ण बयान के बाद ट्वीटर पर लोग खूब मजे ले रहे हैं. एक शख्स ने ट्वीट कर पूछा है कि क्‍या मृत्‍यु के बाद कोई हैंड-गायनोकोलॉजिस्‍ट होता है? क्‍या वहां पर गर्भपात की इजाजत होती है? वहीं, एक दूसरे यूजर ने पूछा कि क्‍या आप मानते हैं कि प्रैगनेंट होना अल्‍लाह की दी गई सजा है?

इस्‍तांबुल के धर्मप्रचारक मुकाहिद सिहाद हान से एक टीवी कार्यक्रम में एक दर्शक ने हस्तमैथुन पर सवाल पूछा. यह सवाल जवाब 24 मई को हुआ. हान टि्वटर पर काफी सक्रिय रहते हैं और उन्होंने इस सवाल जवाब को ट्विटर पर भी इसे पोस्‍ट किया है. ट्विटर पर उनके 12 हजार से अधिक फालोवर्स हैं. हान का अपना यू-ट्यूब चैनल भी है. एक दर्शक ने हान से कहा कि वह शादीशुदा है, लेकिन हस्‍तमैथुन करता रहता है. मुस्लिमों के पवित्र स्‍थल मक्‍का में जब वह उमरा करने गया था, तो भी उसने हस्‍तमैथुन किया था. इस बात को सुनकार हान थोड़ा उलझन में पड़ गए. बाद में उन्‍होंने कहा कि इस्‍लाम में हस्‍तमैथुन को हराम माना जाता है और ऐसा करना सख्‍ती से मना है. उन्‍होंने कहा कि जो ऐसा करता है, मृत्‍यु के बाद उसका हाथ प्रेगनेंट हो जाता है और अल्‍लाह से इसकी शिकायत करते हुए अपने अधिकार की मांग करता है. उन्‍होंने दावा किया कि ऐसा मोहम्‍मद साहब ने कहा है.

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इनके बेशर्म फतवे से पूरा मुस्लिम समाज खुद को शर्मसार महसूस करता है

Asrar Khan : मतदान से एक दिन पहले मुसलमानों से किसी पार्टी विशेष को वोट देने की अपील करना जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी साहब के मजहबी धंधे का हिस्सा है… इनके बेशर्म फतवे से पूरा मुस्लिम समाज खुद को शर्मसार महसूस करता है लेकिन इनका यह पुश्तैनी धंधा बदस्तूर जारी है ….मेरा ख्याल है कि भारतीय जनता पार्टी ने अपनी हार के भय से मतदान में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने के मकसद से इमाम साहब के आगे कुछ टुकड़े फेंक दिये होंगे और इमाम साहब ने मुसलमानों से आम आदमी पार्टी के पक्ष में मतदान करने की अपील कर दिया ….? मित्रों जैसा की आप सभी को मालूम है कि दिल्ली के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी अपने वैचारिक दिवालियापन और मोदी के U-Turn की वजह से हारने जा रही है और आम आदमी पार्टी अरविंद केजरीवाल और आप की विश्वसनीयता की वजह से जीत की ऐतिहासिक चौखट पर खड़ी है, ऐसे में अहमद बुखारी जैसे बिकाऊ व्यक्तियों की बातों को तरजीह न देते हुए अपने क्रांतिकारी विचारों से प्रेरित होकर आम आदमी की इस लड़ाई को कामयाब बनाने के लिए मिलजुल कर भाईचारे के साथ जमकर मतदान करें और अपने सच्चे भारतवासी होने का परिचय देते हुए धर्म और जाति की राजनीति के किसी भी प्रयास को विफल कर दें ……!

Mohammad Anas : इमाम बुखारी इमामत ही करें तो बेहतर रहेगा। इमामत का मन नहीं है तो छोड़ दें। कुछ और करें। जैसे कि, अवैध रेहड़ी- ठेला लगवाएं, दुकान- मकान कब्जा करवाएं। आम आदमी पार्टी को उनके द्वारा दिया समर्थन ठुकराए जाने के बाद अचानक से आया ख्याल।

Nadim S. Akhter : आम आदमी पार्टी ने बुखारी के समर्थन को ठुकराकर सही समय पर उचित फैसला लिया. मुसलमानों के नाम पर राजनीति करने वाले बुखारी जैसे लोगों को औकात बताना जरूरी है. लेकिन सवाल ये है कि कांग्रेस समेत अन्य राजनीतिक दल आम आदमी पार्टी के इस साहसिक फैसले से कोई सबक लेंगे?? बीजेपी तो पहले ही डेरा सच्चा सौदा के राम-रहीम की गोद में बैठ चुकी है. यानी धर्म के नाम पर वोट मांगने की उसकी राजनीति इस दौर में भी जारी है. देखते हैं दिल्ली वाले किसका साथ देते हैं.

Wasim Akram Tyagi : इमाम साहब अहमद बुखारी ने AAP को वोट देने की अपील करके हारती हुई भाजपा को जितवाने की कोशिश की है । इसे ही ‘सियासत’ कहा जाता है जो आम आदमी के सर के ऊपर से गुजर जाती है अगर आप दस, पंद्रह, पच्चीस, साल पीछे जायेंगे तो आपको पता चल जायेगा कि भारत के इस ‘शाही’ खानदान का भाजपा से कितना गहरा नाता रहा है । और उसी नाते को इन्होने मुस्लिम परस्ती का नाम दिया है जबकि सच्चाई यह है इस ‘शाही’ द्वारा कभी किसी मुस्लिम विधवा का राशन कार्ड तक नहीं बन सका हालांकि खुद के पास पैट्रोल पंप तक भी है। आप संयोजक अरविंद केजरीवाल भाजपा के इस दांव में घिर चुके हैं। वे न तो अब बुखारी की अपील नकारेंगे और न ही उस वोट बैंक से यह कहने का सासह कर सकेंगे (जो भाजपा से छिटककर उनके पास आ रहा था ) कि उन्हें बुखारी का समर्थन नहीं चाहिये। कुर्सी और दिल्ली की सत्ता संभालने का मोह उन्हें यह कहने नही देगा कि उनको बुखारी का समर्थन नहीं चाहिये। पहले आरएसएस द्वारा अरविंद केजरीवाल को लिखी गई चिठ्ठियां दिखाई जा रहीं थी और अब भाजपा पर्दे के पीछे से बुखारी को सामने ले आई है । केजरीवाल के नुकसान पहुंचाने के लिये दोनों ही काफी हैं । यह सियासत है साब यहां कभी प्यादे वजीरों से पिटते हैं तो कभी खुद को सच्चा कौम का हमदर्द साबित करने के लिये वजीर प्यादो से पिटता है । कुर्सी तू क्या क्या करवा देती है ।।।।

चार वरिष्ठ और युवा पत्रकारों असरार खान, मोहम्मद अनस, नदीम एस. अख्तर और वसीम अकरम त्यागी के फेसबुक वॉल से.

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ये हार बहुत भीषण है म्हराज!

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आज़म खान का शिया मुसलमानों के खिलाफ जिहाद, शिया धर्मस्थल गिरवाया!

उत्तर प्रदेश के वक्फ मंत्री आज़म खान ने इन दिनों शिया वर्ग के खिलाफ जिहाद छेड़ दिया है। जब से आज़म खान ने यूपी की सत्ता में भागीदार हुए हैं, उन्होंने शिया वर्ग का जीना दुशवार कर दिया है। कल उन्होंने बर्बरता की सारी हदें पार करते हुए रामपुर में हुसैनी सराय नाम के एक शिया धर्म स्थल को ध्वस्त करा दिया।  इस धर्म स्थल को गिराए जाने का मक़सद तो यह था कि रामपुर के शिया नवाबों के परिवार से अपनी राजनीतिक खुन्नस निकाली जाए लेकिन साथ ही साथ समस्त शियों को भी बताना था कि तुम्हारी कोई हैसियत नहीं है।

आप को याद होगा जब गत रमज़ान में लखनऊ के शिया वर्ग ने आज़म खान के विरुद्ध आवाज़ उठायी थी तब जिला प्रशासन ने शियों की जुलूस पर ऐसा लाठी चार्ज करवाया था कि दर्जनों घायल हुए थे और एक शिया युवक की मौत हुई थी।  हम आप को बताना चाहेंगे कि आज़म खान की कोशिश यह है कि वह शिया और सुन्नी वक़्फ़ बोर्डों को एक कर दें। शिया वर्ग इसका घोर विरोध कर रहा है। उनका मानना है की शिया सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को एक कर दिए जाने से शिया वर्ग के वक़्फ़ में सुन्नी वर्ग के अधिकारी नियुक्त होने लगेंगे और वह शिया धर्म को नुकसान पहुंचाएंगे।

शिया सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को एक करने के कोशिश में ही आज़म खान के निर्देशों पर शिया वक़्फ़ बोर्ड ने पिछले एक महीने में 60 शिया लोगों को वक़्फ़ बोर्ड से हटा दिया है और वक़्फ़ का मुतव्वली अपने चहेते लोगों को बना दिया है। असल में हमारे धर्म गुरु मौलाना कल्बे जवाद इन दिनों बीमार चल रहे हैं और कई बार लॉरी कार्डियलोजी में भर्ती हो चुके हैं। उसी का फायदा उठा कर आज़म खान शियों को तबाह करने की कोशिश में लगे हैं। हम उत्तर प्रदेश के शिया पत्रकार अपने पत्रकार भाइयों से निवेदन करते हैं कि वह आज़म खान के ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाने में अपना सहयोग दें.

शबीहुल हसन नक़वी
दरयाई टोला
चौक, लखनऊ
shnaqavi@gmail.com

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It is hard to be loved by Idiots… मूर्खों से प्यार पाना मुश्किल है…

Arun Maheshwari : ग्यारह जनवरी को दस श्रेष्ठ कार्टूनिस्टों के हत्याकांड के बाद आज सारी दुनिया में चर्चा का विषय बन चुकी फ्रांसीसी व्यंग्य पत्रिका ‘शार्ली एब्दो’ पर सन् 2007 एक मुकदमा चला था। तब इस पत्रिका में डैनिस अखबार ‘जिलैट पोस्तन’ में छपे इस्लामी उग्रपंथियों पर व्यंग्य करने वाले कार्टूनों को पुनर्प्रकाशित किया गया था। इसपर पूरे पश्चिम एशिया में भारी बवाल मचा था। फ्रांस के कई मुस्लिम संगठनों ने, जिनमें पेरिस की जामा मस्जिद भी शामिल थी, शार्ली एब्दो पर यह कह कर मुकदमा किया कि इसमें इस्लाम का सरेआम अपमान किया गया है। लेकिन, न्यायाधीशों ने इस मुकदमे को खारिज करते हुए साफ राय दी कि इसमें मुसलमानों के खिलाफ नहीं, इस्लामी उग्रपंथियों के खिलाफ व्यंग्य किया गया है।

उसी समय, सन् 2008 में फिल्मकार डैनियला लिकोंत ने इस मुकदमे पर एक डाक्यूमेंट्री बनाई – It is hard to be loved by Idiots ( मूर्खों से प्यार पाना मुश्किल है)। फ्रांस के वर्तमान राष़्ट्रपति फ्रांस्वा ओलेंद ने उसी डाक्यूमेंट्री में यह बात कही थी – ‘कुछ स्वतंत्रताएं ऐसी है जिन पर कोई बात नहीं हो सकती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किसी प्रकार की सौदेबाजी नहीं की जा सकती है।’’

डैनियला लिकोंत की इस डाक्यूमेंट्री पर तब लोगों का विशेष ध्यान नहीं गया था। लेकिन आज यही डाक्यूमेंट्री फ्रांस के लोगों के प्रतिवाद और ‘शार्ली एब्दो’ के प्रति एकजुटता का प्रतीक बन गयी है। वहां के फिल्म समाज ने यह निर्णय लिया है कि देश भर के सौ से भी ज्यादा सिनेमागृहों में इस डाक्यूमेंट्री का पूरे एक हफ्ते तक प्रदर्शन किया जायेगा। इसमें पेरिस, मार्सै, स्ट्रासबेरी, ले हाफ्रे की तरह के बड़े शहरों से लेकर वहां के ब्रिटेनी की प्लुएस्केत जैसे छोटे शहरों के सिनेमागृह भी शामिल है। इससे होने वाली आमदनी को ‘शार्ली एब्दो’ को सौंप दिया जायेगा।

अरुण माहेश्वरी के फेसबुक वॉल से.

Mukesh Kumar : ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कैमरून ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करते हुए पोप के तर्क को खुले आम खारिज़ कर दिया है। पोप ने आस्था के अपमान का सवाल उठाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विरोध किया था। कैमरून का कहना है कि किसी स्वतंत्र समाज में किसी धार्मिक आस्था को आहत करने का अधिकार होना चाहिए। फ्रांस के राष्ट्रपति ने शार्ली एब्दो पर हुए हमले के बाद भी यही रुख़ अख़्तियार किया ता। विडंबना देखिए कि ऐसा साहस छप्पन इंच की छाती वाले नहीं दिखाते। साधु-संतों के ऊल-जलूल बयानों पर मनमोहन सिंह और नरसिम्हा राव टाइप चुप्पी साध जाते हैं।

मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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नमाज शुरू होने से पहले रस्मी दुआ “मुसलमानों की काफिरों की कौम पर जीत हो” का मतलब क्या है?

Chandan Srivastava : तारेक फतह का एक लेख पढ़ा जिसमें वे लिखते हैं कि… 

”वे टोरंटो (कैनाडा) जहाँ वे रहते हैं, जुम्मे के नमाज को मस्जिद में जाना पसंद नहीं करते. उसमें से एक कारण ये है कि नमाज शुरू हो उसके पहले जो भी रस्मी दुआएं अता की जाती है उसमें एक दुआ “मुसलमानों की काफिरों की कौम पर जीत हो” इस अर्थ की भी होती है. बतौर तारेक फतह, यह दुआ सिर्फ टोरंटो ही नहीं लेकिन दुनियाभर में की जाती है. अब आप को पता ही है काफ़िर में तो सभी गौर मुस्लिम आते हैं – यहूदी, इसाई, हिन्दू, बौद्ध, सिख और निरीश्वरवादी भी. यह दुआ अपरिहार्य नहीं है. इसके बिना भी जुम्मे की नमाज की पवित्रता में कोई कमी नहीं होगी.”

आगे तारेक फतह के शब्दों में:

”मैंने अपने रुढीचुस्त मुसलमान मित्रों से चर्चा – विवाद किया कि चूँकि हम सब गैर मुस्लिम देशों में रहते हैं, तो यह दुआ नहीं करनी चाहिए. वे सभी सहमत होते तो हैं, लेकिन बिल्ली के गले में घंटा बांधे कौन? गत शुक्रवार, जब दुनिया जब शार्ली एब्दो के हादसे से उबरी भी नहीं थी तब और एक हमले की खबर आई कि एक जिहादी आतंकवादी ने एक यहूदी मार्किट में एक यहूदी को गोली मार दी है. मैंने सोचा, बस बहुत हो चुका अब. सो मैंने अपने मित्रों से कहा कि ये चुनौती अब हम ही उठाते हैं, चलिए “I am Charlie Hebdo” लिखे बोर्ड ले कर खड़े हो जाते है अपने लोकल मस्जिद के बाहर. गिनती के चार लोग आये. बाकी सभी मेरे इस्लामी जूनून से जिंदगीभर लड़ते साथी भी अखरी मिनट को डर कर भाग गए. और आतंक की निंदा करने के बजाय इमाम साहब दहाड़े कि इस्लाम इस मुल्क मैं सभी धर्मों के ऊपर स्थापित होगा. और मस्जिद के भीतर, मुझे उम्मीद थी कि अभी अभी ये हादसा ताजा है तो मुल्ला जी अक्ल से काम लेंगे और इस वक़्त गैर मुस्लिमों को दुश्मन करार नहीं देंगे, लेकिन मेरी उम्मीदों को टूटना ही नसीब था. आतंकियों की निंदा करना तो दूर की बात. इमाम साहब इंग्लिश में दहाड़े कि इस्लाम “will become established in the land, over all other religions, although the ‘Disbelievers’ (Jews, Christians, Hindus and Atheists) hate that.” मुझे मेरे कानों पर यकीन नहीं हो रहा था. उसी सुबह एक फ्रेच जिहादी ने यहूदियों को बंधक बनाने की खबर आई थी, उस पर भी कोई नाराजगी नहीं जताई उन्होंने. इमाम साहब ने हम सभी को कह कि अपमान पर प्रतिक्रिया के समय हम सभी मुसलमान रसूल के नक्शेकदम पर चलें. अब ये सुझाव के साथ दिक्कत ये है कि ऐसे कुछ मौकों पर रसूल ने उनका उपहास करनेवालों को माफ़ किया था, लेकिन कई ऐसे भी मौके हैं जहाँ उन्होंने ऐसे लोगों को मार डालने के भी निर्देश दिए थे. खुतबे के आखिर में इमाम साहब ने वो दुआ फिर से दोहराई जिसमें अल्लाह से दुआ की जाती है कि वे मुसलमानों को काफिरों की कौम पर फतह दिला दे. फिर हम सभी साफ़ सुथरी कतारों खड़े हुए, और मक्का की तरफ मुंह कर के सब ने इमाम साहब के निर्देश में जुम्मे की नमाज अता की. मस्जिद से जब निकला तब मैंने ठान ली थी कि मैं तो वहां वापस नहीं जानेवाला.”

नोट- पोस्ट कॉपी किया हुआ है जो कि इंग्लिश आर्टिकल का हिन्दी अनुवाद है. मूल आर्टिकल का लिंक ये है: 

http://www.meforum.org/4974/muslims-shouldnt-pray-to-defeat-non-muslims

आपको खतरे का अहसास अब से हो जाय इसलिए मेहनत की जा रही है.

लखनऊ के पत्रकार चंदन श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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शार्ली अब्‍दो की महिला पत्रकार से आतंकियों ने कहा था- इस्लाम धर्म अपना कर कुरान पढ़ोगी, इस शर्त पर जिंदा छोड़ रहे हैं

पेरिस। फ्रेंच पत्रिका शार्ली अब्दो में आतंकियों का निशाना बनने से बचे पत्रकारों ने आंखों देखा हाल सुनाया। दिल दहला देने वाली इस वारदात को शुरू-शुरू में सभी ने कहीं आतिशबाजी होना समझा था। लेकिन थोड़ी ही देर में पत्रकारों का नाम पूछकर उन्हें मारा जाने लगा। इनमें से जीवित बची एक महिला पत्रकार का कहना है कि उसे इसलिए जिंदा छोड़ा गया कि वह महिला है। महिला रिपोर्टर सिंगोलेन विनसन ने बताया कि आतंकियों ने उसे ये कह कर छोड़ दिया कि वह महिला है। लेकिन उसे बुर्का पहनने को कहा। साथ ही उसे हिदायत दी कि वह उसे इस शर्त पर जिंदा छोड़ रहे हैं कि वह इस्लाम धर्म को अपना ले और कुरान पढ़े।

रेडियो फ्रांस को दिए साक्षात्कार में विनसन ने बताया कि एक आतंकी ने उसके सिर पर बंदूक तानी थी। लेकिन उसे आखिर में जिंदा छोड़ दिया। उसने कहा कि वह महिलाओं को नहीं मारते। इसलिए उसे छोड़ रहे हैं। वह आतंकी अल्लाह हो अकबर चिल्लाते हुए आगे बढ़ गया। इस हमले में जीवित बचे एक अन्य पत्रकार लॉरेंट लेगर उसी कमरे में थे जहां उनके ज्यादातर साथियों को मार दिया गए। लेगर ने बताया कि उन दोनों को देख कर एक क्षण के लिए लगा कि ये कोई मजाक है। बाहर से गोलियों की आवाजें आने पर हम में से कुछ ये सोचकर मुस्कुरा रहे थे कि बाहर कहीं आतिशबाजी हो रही है। बाद में एक आतंकी काले लिबास में बैठक वाले कमरे के अंदर घुसा और संपादक व कार्टूनिस्ट स्टीफेन शारोबोनेयर को शार्ब नाम से बुलाया। उसके बाद उसने समूहों पर गोलीबारी की। हमलावरों की नजरों से बचने के लिए वह गिरकर मेज के नीचे छिप गए। तभी एक आतंकी ने चिल्लाकर बाहर वाले को बताया कि सबको मार दिया है बस एक महिला को छोड़ दिया है।

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पैगंबर मोहम्मह और अबु बकर बगदादी का कार्टून छापने वाली मैग्जीन के आफिस पर आतंकी हमला

पेरिस में ‘शार्ली एब्दो’ नामक एक व्यंग्य मैग्जीन के आफिस पर आतंकियों ने हमला कर दिया. कुल ग्यारह लोगों के मरने की खबर है. मरने वालों में दो पुलिसवाले भी शामिल हैं. मैग्जीन के कार्यालय पर एके-47 धारी नकाबपोश लोगों के एक समूह ने हमला किया. ‘शार्ली एब्दो’ नामक व्यंग्यात्मक मैगजीन में साल 2012 में पैगंबर मोहम्मद का कार्टून छपा था. हाल ही में मैग्जीन ने आतंकी संगठन आईएस के चीफ अबु बकर अल-बगदादी का भी कार्टून छापा था.

मैग्जीन ने ईसा मसीह, ईसाइयत और फ्रांस के नेताओं पर भी करारे व्यंग्य व कार्टून छापे हैं. पत्रिका अपने तीखे कार्टूनों की वजह से पहले भी चर्चा और विवादों में रही है. काले रंग के नकाब पहने कई हमलावर एके-47 लेकर इमारत में घुसे और अंधाधुंध फायरिंग कर दी. हमलावर ‘पैगंबर का इंतकाम पूरा हुआ’ चिल्ला रहे थे.  आशंका है कि हमला इस्लाम से जुड़े विवादास्पद कार्टूनों को लेकर नाराज लोगों ने किया होगा.

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