
अभिषेक श्रीवास्तव-
बात मई 2003 की है। जनसत्ता में मुफ्त सेवा देकर जीवन चलाना दूभर हो चला था। इसी बीच कॉमरेड येचुरी के पास किसी जानने वाले अदीब ने यह कहकर भेजा कि कुछ अनुवाद का काम मिल जाएगा। पता नहीं मंडी हाउस के पास कौन सा मकान था, शायद वही वाला जिसमें आजकल सीपीएम के किसान संघ का दफ्तर चलता है। हरी घास वाले लॉन में सुबह साढ़े आठ बजे के आसपास का दृश्य देखकर मन आतंकित हो पड़ा। माला हाशमी थीं, सुधन्वा थे, शायद एक और महिला थीं लंबी सी, नाम भूल रहा हूं, सुधा या ऐसे ही कुछ। परिचय देने पर काफी पैट्रनाइजिंग ढंग से कहा गया बैठो, बैठो। चाय पियोगे? डरा हुआ बेरोजगार मन ना कर दिया, फिर ओके कर दिया। एक चाय आई। पी गए। बहुत खराब थी। तब तक वैसी चाय से पाला नहीं पड़ा था। बहुत देर इंतजार करने के बाद पूछने को मन उकसा- कामरेड येचुरी? बताया गया कि आ रहे हैं।
वे बाहर आए। गर्मजोशी से हाथ मिलाए। लगा कि आदमी तो सही है। आवाज में काफी बेस भी था। देह-मुद्रा में ग्रेस भी। लोकतांत्रिक मिजाज था, बाकी तीनों से अलग। कॉमरेड सीधे किताब लेकर आए थे। सफदर की जीवनी थी अंग्रेजी में। बोले, कर दो। मैंने हां कर दिया। पैसा पूछने की हिम्मत नहीं हुई। जमनापार कमरे पर लौट आए। जानने वाले से बोले कि आप ही रेट पूछ कर बता दें। वो महटिया गए। न पेमेंट का पता चला, न काम में हाथ लगा। अपना आज भी यही उसूल है। पहले एडवांस, फिर काम। घास से घोड़ा तभी दोस्ती करता है जब घास अपने क्लास की हो। बहरहाल…

संयोग से उसी जुलाई में यूएनआइ की नौकरी लग गई। कभी-कभार सीपीएम जाना होता था वीपी हाउस वाले कमरे में, वहीं एक दिन कामरेड येचुरी भेंटा गए। पहचान भी गए। अच्छा लगा। सिगरेट दगाते हुए बोले- यार उस किताब का क्या हुआ? हम बोले- पता नहीं, शायद रेट पर बात नहीं हुई थी इसलिए मामला अटक गया। उतनी ही सहजता से वे बोले- हम्म… और? यहां कैसे? हालचाल बताया गया, तो खुश हुए। फिर बीते बीस साल में कई बार मिले। उसी सहज शानदार अंदाज में सिगरेट दगाते हुए।
शायद 2013 की बात होगी। तहलका के लिए एक कवरस्टोरी लिखनी थी। कवरलाइन थी- ढलती शाम में संसदीय वाम। गोपालन भवन पहुंचे। सबसे मिले। नीलू दा से सबसे ज्यादा बात हुआ करती थी। येचुरी भी मिले। जब शीर्षक बताया, तो हंस दिए। हिंदी के मुहावरे थोड़ा कम पकड़ते थे, लेकिन बात पकड़ लिए। सीपीएम उस साल आम आदमी पार्टी को दिल्ली चुनाव में सपोर्ट कर रही थी। इसी पर लपेटने की कोशिश थी। किसी और से हमें बझाकर वो निकल लिए।
बीते दस साल में उनसे संक्षिप्त मुलाकातें होती रहीं, लेकिन आज भी मेरी सबसे पुरानी डायरी में नेताओं के लैंडलाइन नंबरों में येचुरी, नीलोत्पल बसु, डीपीटी, रबि राय, जॉर्ज फर्नांडीज, शरद यादव, मदनलाल खुराना, विजय मल्होत्रा, ऑस्कर फर्नांडीज जैसे कुछ नाम सबसे ऊपर हैं। इनका मोबाइल कभी डायरी में अपडेट ही नहीं हुआ। बदलते हुए मोबाइल फोनों में ही कैद रहा। आज भी होगा।
ऐसा लगता है कितनी पुरानी बात हुई। कितने पुराने लोग रहे। जो लोग उनके साथ के हैं, उनकी पीढ़ी के, उन्हें तो और भी पुराना लगता होगा। पुराने का झर जाना ऐसा ही होता है कि कुछ सुंदर फ्लैशेज दिमाग में बच रहें, तो बेहतर। हर चीज अपनी प्रासंगिकता खोती है। अभी लगता है कि येचुरी गए, या शरद यादव गए थे, तो उनके साथ के मुलाकातों के किस्से भी चले ही गए कहीं। एक आदमी जाता है तो अकेला वो नहीं जाता, अपने साथ कई लोगों के जीवन-प्रसंगों को भी ले जाता है। हर आदमी के मरने पर कई-कई बचे हुए आदमी रह-रह कर थोड़ा-थोड़ा अप्रासंगिक होते जाते हैं। ऐसे ही सब झर जाता है।
मंगलवार को मुरली का प्रेस स्टेटमेंट शायद 11 बजे दिन में आया था कि येचुरी वेंटिलेटर पर हैं। मैंने दफ्तर में कहा था कि एक ऑबिट लिख देते हैं। मन था। जीवित आदमी का ऑबिट कैसे कोई लिख सकता है भला? पत्रिका प्रेस में जानी थी उसी दिन, तो रह गया। अब कभी उन पर ऑबिट नहीं जाएगा। न ही मैं लिख पाऊंगा। मुझे लगता है आदमी के अप्रासंगिक हो जाते ही उस पर ऑबिट लिख दिया जाना चाहिए, मरने का इंतजार नहीं करना चाहिए।
अलविदा कॉमरेड!


