मिथिलेश धर दुबे-
ये खबर कितनी दुखद है! 16 जनवरी की रात करीब 12 बजे युवराज मेहता (27) अपनी ग्रैंड विटारा कार से नोएडा के सेक्टर-150 टाटा यूरिका पार्क जा रहे थे। सेक्टर-150 मोड़ पर यूटर्न था। कोहरे की वजह से उन्हें आगे का रास्ता नहीं दिखा और उनकी कार नाले को तोड़ते हुए पानी से भरे प्लॉट के गड्ढे में गिर गई। मॉल के बेसमेंट के लिए यहां 30 फीट का गड्ढा खोदा गया था।
युवराज किसी तरह डूबती कार से बाहर निकलकर उसकी छत पर चढ़ गए। 12.20 बजे उन्होंने अपने पिता को फोन करके कहा- पापा मुझे बचा लो, मैं मरना नहीं चाहता। इसके बाद कार समेत नाले के पानी से भरे 30 फीट गहरे दलदल में समा गया।
पिता ने तुरंत डायल-112 पर घटना की सूचना दी। कुछ ही मिनट में पिता वहां पहुंच गए। करीब 30 मिनट बाद पुलिस और दमकल विभाग की टीमें पहुंची। रात 1.15 बजे एसडीआरएफ की टीम भी पहुंची।
उस समय घने कोहरे की वजह से युवराज की सिर्फ आवाजें ही सुनाई दे रही थी। युवराज करीब 80 मिनट तक चिल्लाता रहा कि कोई मुझे बचा लो। कार जल्दी ही डूब जाएगी। लेकिन कोई उसकी मदद नहीं कर सका। फिर पौने दो बजे के करीब गड्ढे भरे पानी में कार समेत युवराज डूब गए।


1.55 पर एनडीआरएफ की टीम भी गाजियाबाद से मौके पर पहुंची। सुबह करीब 4:30 शव को बाहर निकाला गया।
नरेंद्र नाथ मिश्रा-
हमारी रेस्क्यू और इंफ्रा सिस्टम कितनी ध्वस्त है उसका शर्मनाक दस्तावेज है नोएडा हादसा।
नोएडा में एक पिता अपने डूबते इंजीनियर बेटे को बचाने की विनती करता रहा लेकिन डिजास्टर मैनेजमेंट के लोग पुलिस-प्रशासन के साथ बेबस होकर भगवान भरोसे रहे। बेटा मर गया। 27 साल के इंजीनियर की गाड़ी का एक्सिडेंट हो गया और वह सड़क किनारे एक बिल्डिंग निर्माण् के लिए बने गड्डे में डूब गया। गिरने के कई घंटे बाद तक वह जिंदा रहा। उसने पिता को फोन कर जान बचाने की अंतिम काल भी की। पिता उस जगह पहुंचे भी। जिन्हें लाखों की सैलरी दी जाती है और इससे बड़े-बड़े हादसों में लोगों की जान बचाने की ट्रेनिंग दी जाती है वे भी बुलाए गए। उस बेबस की गुहार लगाती आवाज आती रही। लेकिन सभी दर्शक बने रहे। अंत में वह मर गया। अब लोग नोएडा में गुस्से में सड़क पर हैं।
यह हैं हमारे विकसित समाज की असलियत। किसी सभ्य समाज में ऐसी घटनाओं के बाद सरकारें हिल जाए लेकिन यहां लोग इस घटना के बाद भी शायद सरकार के बचाव में ही सामने आ जाएं। पिछले दिनों ही पानी पीकर कई लोगों की मौत इंदौर में हो गयी। किसी ने घटना की जिम्मेदारी न ली। न लोगों को फर्क पड़ा।
हां बस बाबर-औरंगजेब जैसे मसलों पर कोई बहस हो तो लोग आहत होकर टूट पड़ेंगे। जनता जिस चीज की जिम्मेदारी तय करेगी, प्राथमिकता तय करेगी उन्हें ऐसा ही शासन मिलेगा।
नाज़िया ख़ान-
ग्रेटर नोएडा में 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता को बचाने की कोशिश में एक डिलीवरी एजेंट ने अपनी जान जोखिम में डाली जबकि रेस्क्यू टीम्स वहाँ पहले से मौजूद थीं लेकिन कोई रिस्क लेने को तैयार नहीं था। युवराज की कार घने कोहरे के बीच एक बेसमेंट के गहरे नाले में गिर गई थी।
डिलीवरी एजेंट मोनिंदर ने अपनी कमर पर रस्सी बांधकर पानी से भरे बेसमेंट में कूदकर युवराज को बचाने की कोशिश की। मोनिंदर ने बताया कि हादसा आधी रात के आसपास हुआ, जब युवराज की कार ज़ीरो विज़िबिलिटी के चलते कंट्रोल खो बैठी और एक गहरे बेसमेंट में गिर गई।
उन्होंने मदद की पुकार सुनी। लगभग एक घंटे और पैंतालीस मिनट तक लड़का चिल्लाता रहा, ‘भाई, किसी तरह बचा लो।’
मोनिंदर ने बताया कि वह घटनास्थल पर लगभग 1:45 बजे पहुंचे, तब तक युवराज को गिरे दस मिनट हो चुके थे।
“मैंने SDRF वालों को सीढ़ी पर बैठे देखा और उनसे कहा कि लड़के को बाहर निकालिए न। उन्होंने मना कर दिया कि पानी ज़्यादा है और लोहे की रॉड वग़ैरह हो सकती हैं अंदर जाना रिस्की है।
फिर मैंने कहा कि ठीक है, मैं उतरता हूँ।
मोनिंदर ने अपने कपड़े उतारे, कमर में रस्सी बांधी और लगभग 50 मीटर तक पानी में तैरकर आधे घण्टे युवराज और कार की तलाश की। लेकिन उन्हें नहीं ढूंढ पाए। वे सुबह लगभग 5:30 बजे साइट से लौटे, जब तक कार और युवराज नहीं मिले थे।
“उसके बाद क्या कहूँ? मैं निराश होकर चला गया, और फिर मुझे कुछ पता नहीं।” उन्होंने कहा।
युवराज ने गिरने के बाद कार से फोन पर अपने पिता राजकुमार मेहता को हादसे की ख़बर दी थी और कहा था, वे मरना नहीं चाहते, कुछ कीजिये जल्दी। पिता ने पुलिस को सूचना दी, 112 डायल किया और खुद मौक़े पर पहुंच गए थे। रेस्क्यू टीम ने युवराज को कार की छत पर खड़े देखा था, जहां वे फोन की टॉर्च जलाकर और चिल्ला-चिल्ला कर मदद मांग रहे थे।
पुलिस, फायर ब्रिगेड, SDRF और बाद में NDRF की टीमों के पहुँचने के बावजूद वे लोग ठंड, अंधेरे और कोहरे की वजह से हिचकिचा रहे थे। रेस्क्यू मिशन लगभग साढ़े चार घंटे तक चला। टीम ने शुरुआत में ठंडे पानी और अंडर कन्सट्रक्शन बेसमेंट में जोखिम के कारण पानी में उतरने से इनकार कर दिया था।
युवराज आख़िरकार कार के साथ डूब गए। गाज़ियाबाद से आई NDRF टीम ने बाद में युवराज को लगभग 30 फुट गहरे पानी से निकाला और डेड बॉडी को हॉस्पिटल पहुंचाया।
पिता और तमाम प्रत्यक्षदर्शियों ने बचाव अभियान में देरी और चूक का आरोप लगाया है, और कहा है कि मौत को रोका जा सकता था। कितने दुःख की बात है, इतनी सारी स्पेशलिस्ट टीम मौजूद होते हुए भी अपनी आँखों के सामने एक जान नहीं बचा पाईं। इतनी इंकमपीटेंसी!!!
इन लोगों को ऐसी परिस्थितियों के लिये ही ट्रेनिंग दी जाती है न? हमने विदेशों में कुत्ते और बिल्लियों के बच्चों तक को बचाने के लिये इतने स्पेशल एफर्ट्स देखे हैं। जर्नलिस्ट और यू-ट्यूबर आकाश बनर्जी और उनकी पत्नी नॉर्वे में फंस गए थे, आम लोगों ने जिस लेवल तक जाकर रेस्क्यू किया था, उसकी तो ख़ैर अपने यहाँ कल्पना भी नहीं की जा सकती। पर ऐसे नोएडा जैसी जगह में, एक यंग इंजीनियर को इस तरह जान गंवानी पड़ी, यह कितना अन्फॉरचुनेट और डरावना है। ऊपर से न्यूज़ साइट्स के कमेंट सेक्शन में जो लोग प्रशासन से सवाल कर रहे हैं, उनको गरियाया जा रहा कि प्रशासन क्या करे इसमें। आधी रात ठंड और कोहरे में निकला क्यों था, घर में चुपचाप पड़ा रहता!!!
राहुल शर्मा- अगर आपातकालीन विभाग के होते हुए भी कोई डूब रहा है चिल्ला रहा है तो सवाल ये है की इन लोगों की क्या ट्रेनिंग होती है। क्या मशीनरी लेकर ये मौके पर पहुँचे। कम से कम मजबूत रस्सियाँ भी काफ़ी थी अगर आवाज की दिशा में फेंकते। सर्च लाइट्स, फॉग लाइट, गोताखोर क्या कुछ भी नहीं था जो ये मदद के लिए पहुंचे? कोई फ्लिपकार्ट की डिलीवरी वाला पानी में कूद पड़ा था तो सरकारी वेतन पाने वाले, ट्रेंड लोग क्या कर रहे थे?
विनय जी- जिस देश में कार पर बैठे एक नौजवान को सरकारी मशीनरी अपनी आंखों के सामने मौत के मुंह में जाता हुआ देख रही है, वो देश कैसे दुनिया की बराबरी कर पाएगा? दिन भर टीवी पर बैठकर सांप्रदायिक मुद्दों पर पागल कुत्तों की तरह चीखने चिल्लाने वालों ने क्या इस बात पर डिबेट की कि संबंधित अधिकारियों को समय से सूचित करने के बाद भी उसे बचाया क्यों नहीं जा सका? उसकी मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा? उस बाप के दिल पर क्या गुजरी होगी जिसका जवान बेटा उसी से अपनी जान की भीख मांगकर मौत के आगोश में समा गया? इस देश में नेताओं की जन के अलावा किसी की जान की कोई कीमत नहीं है।




Surendra Singh Chaudhary
January 19, 2026 at 5:17 pm
दुखद तो है ही लेकिन उससे कहीं ज्यादा शर्मनाक है।NDRF,SDRF टीमों के सभी सदस्यों को तत्काल बर्खास्त कर उनके ऊपर कर्तव्य हीनता एवं आपराधिक लापरवाही का मुकदमा दर्ज कर लंबी सजाएं देनी चाहिए। यहां की जनता और सरकारें सिर्फ हिंदू -मुस्लिम करने में दिलचस्पी रखती हैं तो इसकी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी।