आलोक कुमार-


लक्ष्मी जी सबको चाहिए। चाहने वालों की कमी नहीं। मगर हम ज़ी न्यूज़ वालों के लिए लक्ष्मी जी का असली मतलब लक्ष्मी गोयल जी हैं। ख्याल आते ही मन श्रद्धाभाव से भर उठता है। ढाई साल तक इनके अभिभावकत्व में शान से किए काम पर गर्व है।
बस चले तो लक्ष्मी जी वाले दिनों के ज़ी न्यूज़ संचालन के तौर तरीकों को आईआईएम पाठ्यक्रम का हिस्सा बनवा दूं। क्योंकि इससे पहले और बाद में कोई संस्थान नहीं मिला जहां बॉस के सनकी पन से मुक़ाबिल नहीं रहा। प्राइवेट संस्थानों में बॉस की बिलावजह रंगबाज़ी कर्मचारियों के लिए परेशानी का सबब है।
ज़ी न्यूज़ में परिवार बोध के साथ जीने के कई किस्से हैं। सच्ची कहानियां हैं। किसी ऊंच नीच या उल्टा सीधा होने पर सामान्य कर्मयोगी सीधे लक्ष्मी जी से संपर्क साध लिया करते। अयोग्यता को सहकर्मियों की आड़ में छिपाने की कोशिश करने वाले बॉस का अक्सर बाट लग जाया करता।
अख़बार में पंद्रह सालों की फाकामस्ती के बाद एक संयोग ने ज़ी न्यूज़ की दुनिया में ला पटका। सनकी बॉस के चर्चित किस्सों वाले टीवी न्यूज़ में जाने से गुरेज था। उससे होने वाले धनलाभ की इच्छा को दमनित कर रक्खा था। लेकिन किस्मत काम कर गई। ज़ी न्यूज़ में पत्रकारिता का शानदार कंफर्ट लेवल मिला। कई दमदार साथी मिले। उनकी जितनी तारीफ़ की जाए कम है।
संयोग ने अख़बार से उठाकर नवगठित झारखंड राज्य के पहले मुख्यमंत्री का मीडिया सलाहकार बनवा दिया। राजनीति में इमानदारी के चस्के ने हमें और हमारे प्रिय मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को कुर्सी से उतरवा दिया। अप्पन ठन ठन गोपाल हो गए।
दैनिक जागरण लौटना चाहा, तो आएं बाएं शाएं हो गया। वहां चौपट बॉस की शातिर इच्छा ने वापसी के तमाम दरवाजों की कुंडी कस दी। नए मालिक की हैसियत नहीं दिखी कि वह अपने पिता के दिए वादे को पूरा करवा पाते। जागरण में ससम्मान मेरी वापसी संभव नहीं हुई।
पत्रकारिता के कई हमनाम आलोक कुमारों के बीच ‘सीबीआई आईबी वाले जागरण के आलोक कुमार’ के तौर पर ही पहचान है। मेरा मानना है कि झारखंड सरकार ज्वाइन करने की छुट्टी देने वाले आदरणीय संपादक स्व. नरेंद्र मोहन जी संसार में होते तो मुझे नए मकाम के लिए टीवी न्यूज़ की दुनिया में झांकना नहीं पड़ता। क्योंकि सम्मान बचाकर जीने का आदी हूं। मुझ जैसे को टीवी की दुनिया में बॉसेज के चीख चीत्कार के भरे किस्सों ने भयभीत कर रखा था।
लेकिन क्या कीजे। होइहें वही जो, राम रची रखा। संकट में फंसा तो ज़ी न्यूज़ पहुंचने के खातिर अजीज़ मित्र Vinod Mehta का सहारा मिला। लक्ष्मी जी से संपर्क हुआ। मिलते ही जी को भा गए। उनके पावन मन की बात ही अलहदा है। उसपर ग्रंथ लिखा जा सकता है। उनसे 2003 से 2006 के ढाई वर्ष तक सान्निध्य में रहा। रिश्ते में मालिक नौकर जैसी कोई खाई नहीं। कहीं कोई घबराहट नही। जबतक रहा। काम की धुन में जिया। मस्ती से काम किया। ज़ी में कई विशाल व्यक्तित्व वाले साथियों से मुलाकात हुई। उसमें से कई की याद कभी भी लब पर मुस्कान बिखेर देती है।
साथी Rakesh Negi, Anil Sharma , Raju Khatri ,Manoj Menon जैसों के पराक्रम ने हम जैसों को फिर मिलने का मौका दिया। 23 दिसंबर की शाम नोएडा सेक्टर 38 के बारिश लाउंज एंड बार में लाकर Sarjana Sharama , Yusuf Ansari , Ravi Parashar , Vinod Kapri , Ravi Kant Mittal , Parvez Ahmed , Divya Varma , Rakesh Khar , Samir Ahluwalia Satish K Singh , Shailesh Kumar , Mukesh Kumar Singh जैसे सौ से ज्यादा साथियों को मस्ती के संसार में कैद कर दिया। सबका आभार। धुरंधरों से मिलकर मन पुलकित हो गया। ज़ी रियूनियन की कुछ तस्वीरों को साझा करने से खुद को रोक नहीं पा रहा।







