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सियासत

क्या है छठ के लिए 12 हज़ार स्पेशल ट्रेनों का सच…?

राजीव तिवारी बाबा-

जब से दीपावली महोत्सव की शुरुआत हुई यानि धनतेरस से ही मीडिया और खासकर सोशल मीडिया पर ट्रेनों को लेकर मारामारी की खबरें चमकने लगीं। इनमें त्योहार पर किसी भी तरह घर लौटने की जद्दोजहद में ट्रेनों में भेड़ बकरियों की तरह भरे हुए लोगों, टिकट की आस‌ में धूप में कई किलोमीटर तक लाइन लगाए लोगों और डिब्बे में घुसने की व्याकुलता पर RPF के लाठी कोंचने वाले वीडियो तो मन तो गहरे व्यथित करने वाले थे। वो इसलिए कि इन खबरों से करीब एक माह पहले रेल मंत्री का वो बयान विभिन्न मीडिया माध्यमों पर देख सुन रखा था कि इस बार दीपावली व छठ पर घर लौटने वालों की सुविधा के लिए करीब 12 हजार स्पेशल ट्रेनों को चलाया जाएगा। मगर जब वास्तविक हालात पूर्व के वर्षों से भी बदतर दिखे तो लगा कि कहीं कोई झोल जरूर है। क्योंकि केंद्र की मोदी सरकार आंकड़ों में हेर फेर कर अपनी पीठ थपथपाने में माहिर जो है….

पड़ताल

बहरहाल, दीपावली महोत्सव में प्रकाश पर्व के अगले दिवस आज जिस दिन ‘परेवा’ पर मिली फुर्सत के बीच रेल मंत्री के 12 हजार स्पेशल ट्रेनों के दावे की पड़ताल की, जो तथ्य निकल कर सामने आया वह मेरे संदेह के मुताबिक आंकड़ों का झोल ही निकला। चलिए इसे कुछ इस तरह से समझते हैं…

मैंने चेक किया कि भारतीय रेलवे देश में कुल कितनी ट्रेनों का संचालन करता है? तो जो आधिकारिक डेटा सामने आया उसके मुताबिक भारतीय रेलवे रोजाना करीब 13,000 से 14,000 पैसेंजर यानि यात्री ट्रेनें चलाता है। इसमें मेल/एक्सप्रेस (लगभग 7,000), पैसेंजर ट्रेनें (लगभग 3,000), और उपनगरीय ट्रेनें (लगभग 3,000-4,000) शामिल हैं। (स्रोत: रेलवे मंत्रालय और PIB, और 2024 डेटा)। ध्यान रहे कि ये “ट्रेनें” फिजिकल ट्रेन सेट्स नहीं हैं, बल्कि सर्विसेज या ट्रिप्स हैं। एक ट्रेन (रेक) दिन में एक या ज्यादा ट्रिप्स कर सकती है। रेलवे के पास करीब 10,000 -11,000 रेक्स (फिजिकल ट्रेन सेट्स) हैं, जो अलग-अलग रूट्स पर कई बार चलते हैं।

इस डाटा के आधार रेल मंत्री के 12,000 स्पेशल ट्रेनों के चलाए जाने के दावे का कोई मतलब है क्या? तो फिर तमाम मीडिया रिपोर्ट्स गलत थीं क्या? या इसमें वाहवाही लूटने के लिए कोई खेल हुआ क्या? रेलवे के एक सेवानिवृत्त अधिकारी से समझने की कोशिश की तो उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर जो बताया वो ये कि इस दावे को “ट्रेनें” नहीं, “ट्रिप्स” के रूप में बोला जाता और लोग पढ़ते तो शायद ये कन्फ्यूजन न होता। रेल मंत्री ने जब “12,000 स्पेशल ट्रेनों” की बात की, तो ये 12,000 ट्रिप्स रहा होगा न कि 12,000 अलग-अलग फिजिकल ट्रेनें। यानी, एक ही ट्रेन (रेक) को कई बार चलाया जाता है, और हर राउंड-ट्रिप को गिना जाता है।उदाहरण – अगर एक दिल्ली-पटना स्पेशल ट्रेन 10 बार चलती है (5 बार दिल्ली से पटना, 5 बार वापसी), तो इसे 10 ट्रिप्स गिना जाएगा। ये 12,000 ट्रिप्स 1 अक्टूबर से 15 नवंबर 2025 तक (45 दिन) की अवधि के लिए हैं, यानी रोजाना औसतन 266 ट्रिप्स।

ट्रिप्स की जगह अगर स्पेशल ट्रेनों बात होती तो कैसे अमल में लाया जाता। रेलवे अपने कुछ अतिरिक्त रिजर्व रेक्स (जो मालगाड़ी या रखरखाव में रहते हैं) को पैसेंजर सर्विस में डालता। कुछ मौजूदा ट्रेनों में अतिरिक्त डिब्बे जोड़े जाते। कुछ नये रूट्स बनाए जाते। जैसे दिल्ली-मुजफ्फरपुर, मुंबई-दरभंगा, शुरू किए गए। जैसा कि PIB (20 अक्टूबर 2025) की एक रिपोर्ट में कहा गया कि 1-19 अक्टूबर तक 3,960 ट्रिप्स हो चुके, और 8,051 और प्लान हैं, कुल 12,011 ट्रिप्स। 2024 के रिकार्ड पर नजर डालें तो पिछले साल 6,556 स्पेशल ट्रिप्स चली थीं, जिनमें 1.8 करोड़ यात्रियों ने सफर किया। 2025 में इसे बढ़ाकर 12,000 किया गया। (Business Standard, 23 सितंबर)।

इस साल के लिए 12,000 स्पेशल ट्रिप्स कहां से आईं? रेलवे की क्षमता: रेलवे के पास करीब 10,000 रेक्स हैं, जिनमें से 80-85% रोजाना इस्तेमाल होते हैं। बाकी रेक्स (1,500-2,000) को स्पेशल ट्रेनों के लिए इस्तेमाल किया गया। साथ ही, कुछ नियमित ट्रेनों को री-शेड्यूल कर स्पेशल रूट्स पर डाला गया। कैसे संभव है? छोटे रूट्स बनाए गए। कई स्पेशल ट्रेनें छोटे रूट्स (जैसे पटना-मुजफ्फरपुर) पर चल रही हैं, जो कम समय लेती हैं और एक रेक कई ट्रिप्स कर सकता है।

हाई-डिमांड रूट्स: दिल्ली, मुंबई, कोलकाता से बिहार-यूपी के लिए ज्यादा फोकस (1,670 ट्रिप्स नॉर्दर्न रेलवे, 763 सेंट्रल रेलवे)। स्टेशनों पर होल्डिंग एरिया, एक्स्ट्रा टिकट काउंटर, और RPF डिप्लॉयमेंट से रेक्स को तेजी से टर्नअराउंड किया गया।

कुल मिला कर ट्रेनों के स्थान पर 12,000 ट्रिप्स का आंकड़ा अतिशयोक्ति नहीं है। ये ट्रिप्स रेलवे की मौजूदा क्षमता और कुछ अतिरिक्त रेक्स से मैनेज हो रही हैं, हो जाएंगी। फिर भी भारी समस्या क्यों दिख रही है? इसके पीछे जवाब है रेलवे का मिस मैनेजमेंट और भीड़ का पूर्वानुमान ठीक से न कर पाना। सामान्य शब्दों में डिमांड व सप्लाई के अंतर को न भांप पाना। छठ पर 2-3 करोड़ प्रवासी बिहार-यूपी लौटते हैं। 12,000 ट्रिप्स (औसतन 1,000 यात्री प्रति ट्रिप) से सिर्फ 1.2-1.5 करोड़ यात्री ही कवर हो पाते हैं। बाकी लोग नियमित ट्रेनों पर निर्भर रहते हैं, जहां वेटिंग लिस्ट 500+ तक पहुंच रही है।

इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी- ट्रैक, प्लेटफॉर्म, और सिग्नलिंग की सीमित क्षमता के कारण ज्यादा ट्रेनें नहीं चलाई जा सकतीं। X पर लोग शिकायत कर रहे हैं कि “12,000 ट्रिप्स का क्या फायदा, जब टिकट ही नहीं मिलता? और लोगों में गलतफहमी उन मीडिया रिपोर्ट्स से हुई जिन्होंने रेल मंत्री की चापलूसी में ट्रिप्स को ट्रेन बनाकर छापा और रेलवे का मक्कारीपन देखिए कि उन्होंने भी इन रिपोर्टों का खंडन नहीं किया बल्कि अपनी पीठ अब तक थपथपा रहे हैं।

12,000 स्पेशल ‘ट्रेनों’ की जगह स्पेशल “ट्रिप्स” का दावा सही है, और ये रेलवे की मौजूदा क्षमता से मैनेज हो रहा है। इसे लेकर कम्युनिकेशन में थोड़ी अस्पष्टता रही या जानबूझकर कन्फ्यूजन क्रिएट किया गया ताकि अपनी वाहवाही हो और जब समस्या न संभले तो कह दें कि हमने तो ट्रिप्स की बात की थी, मीडिया ने अपनी ओर से ट्रेन छाप दी जिसकी वजह से लोगों में गलतफहमी हुई। जो कि मोदी सरकार की कार्यशैली भी है….

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