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लाउडस्पीकर पर बलात्कार की धमकी ‘टेलीग्राफ’ में लीड न्यूज़ है!

संजय कुमार सिंह-

लाउडस्पीकर पर बलात्कार की धमकी और खबर भी नहीं… राजनीति से अलग सिर्फ पत्रकारिता पर बात करने वाले या पत्रकारिता की चिन्ता करने वाले क्यों नहीं पत्रकारों, संपादकों और मालिकों से पूछते हैं कि यह खबर दूसरे अखबारों में लीड क्यों नहीं है और द टेलीग्राफ में है तो क्यों है? आखिर पत्रकारिता के भी तो कुछ नियम-कानून पैमाने होने चाहिए। इमरजेंसी की पत्रकारिता अलग थी, उसका विरोध भी हुआ। इस पत्रकारिता पर चर्चा नहीं करना उसका समर्थन नहीं तो और क्या है। अव्वल तो सरकारी व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि कोई किसी से छेड़छाड़ कर ही नहीं सके, अगर करे तो शिकायत दर्ज हो और कार्रवाई हो और सजा सुनिश्चित हो।

यहां पूरी व्यवस्था चौपट नहीं है तो क्यों किसी को किसी के लिए ऐसी धमकी या ‘सेवा’ देनी पड़ रही है। पुलिस या पुलिस प्रमुख से यह सवाल कौन करेगा? ठीक है कि तैनाती सरकार करती है और मुख्यमंत्री न चाहें तो खराब तैनाती हो सकती है लेकिन जनता के पैसे से वेतन तो मिलता रहेगा। फिर अपना काम करने में डर किस बात का? वेतन की ऐसी गारंटी किसी दलाल पत्रकार को भी नहीं है। ठीक है कि पुलिस अपना काम नहीं करती है लेकिन जब महंत बजरंग मुनि दास कह रहे हैं कि वे पुलिस-जांचकर्चा और जज तीनों बन गए हैं तो क्या किसी को उन्हें यह बताना नहीं चाहिए था कि योगी जी चुनाव जीत कर बुलडोजर चला रहे हैं आप जीतने के बाद ये सब करना।

वैसे भी, अगर कोई इस तरह लाउड स्पीकर पर धमकी दे तो पुलिस-प्रशासन का क्या काम है। उसे इन धमकियों को सुनने के लिए भी क्यों रहने दिया जाए। क्या पुलिस थाना भंग नहीं कर दिया जाना चाहिए। क्या पुलिस राजनेताओं की निजी सेना के रूप में काम करने के लिए है? आखिर क्या जरूरत है ऐसे रक्षकों की। क्या विधायक की शिकायत पर पत्रकारों को नंगा करना ही डबल इंजन वाली पुलिस की वीरता है। बोलने वाले तो नहीं बोल रहे हैं पर पूछने वाले पूछ क्यों नहीं रहे हैं। अगर वे अपना काम नहीं कर रहे हैं, उनसे करवाया नहीं जा रहा है तो उनकी खबर कौन लेगा? और जो नहीं ले रहे हैं उन्हें क्यों बख्शना। उन्हें ईमेल भेजकर शिकायत दर्ज करने का अभियान तो चलाया जा सकता है।

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