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सुख-दुख

ये संन्यास का भाव नहीं बल्कि मिड एज क्राइसिस का डिप्रेशन है!

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-

यूं तो ईश्वर, जीवन और दुनिया की गुत्थियों को समझने-जानने की गहरी उत्सुकता किसी भी उम्र में जाग सकती है लेकिन 40-45 की उम्र पार करते ही कुछ लोग दुनिया और सांसारिकता से विरक्ति महसूस करते हुए वैराग अर्थात सन्यास की तरफ ज्यादा तेजी से भागने लगते हैं। पिछले कुछ बरसों में मुझे भी कई बार ऐसा लगने लगा कि शायद मेरे मन में भी वैराग्य का भाव बढ़ रहा है।

इसी ऊहापोह के बीच मेरी मुलाकात हुई संयोग से मेरे बचपन के एक ऐसे खास मित्र से, जो आजकल एक सामाजिक कार्यकर्ता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसने अपना अच्छा खासा नाम भी इस क्षेत्र में बना लिया है। उसके सामाजिक कार्यों के लिए काफी नामी गिरामी पुरस्कार उसे मिले है।

उसी के साथ बाई रोड मैंने एक ट्रिप की, जिसमें उसके कुछ दोस्त भी थे। वहां उसी ट्रिप के दौरान जब मैंने उससे अपने इसी वैराग्य के बढ़ रहे भाव पर चर्चा की तो उसने मेरे इस विचार को खारिज कर दिया।

उसका कहना था कि दुनिया के ज्यादातर इंसान अपनी युवावस्था खत्म होने के बाद जैसे ही अधेड़ अवस्था में प्रवेश करते हैं, उनमें यह भाव जगना स्वाभाविक है। मिड एज का यह एक नेचुरल प्रोसेस है, जिसमें शारीरिक, मानसिक, सामजिक बदलावों से इंसानों में एक छिपी हुई हताशा अथवा निराशा घर कर लेती है, जिसके बाद वह उसका इलाज वैराग्य में ढूंढने लगता है।
मित्र ने इस अवस्था से बाहर निकलने के लिए अपने किसी पैशन या शौक पर और मेहनत से जुटने की सलाह दी।

मित्र की वह सलाह अब मुझे ज्यादा अच्छी तरह से समझ आने लगी है, जब मैं अपनी ही उम्र यानी 45 प्लस के अपने जानकार लोगों को आध्यात्मिक या वैरागी होने के लिए आतुर या बेकरार देखता हूं। अब मुझे यह समझ आ गया है कि यही वक्त है कि अपने पैशन या शौक में डूबकर ऐसी डिप्रेसिव मानसिक अवस्था से निजात पाई जाए।

ईश्वर और अध्यात्म में रुचि जाग जाने की कोई उम्र नहीं होती और जिन लोगों की रुचि वाकई में ईश्वर या अध्यात्म में होती है, वे अधेड़ होने के बाद हो रहे मानसिक बदलावों से कन्फ्यूज होकर ईश्वर की तरफ़ नहीं भागते बल्कि जीवन के दुख- दर्द से घबरा कर या अपने स्वाभाविक लगाव या फिर दुनिया की हर मोह- माया से विरक्त होने का भाव जाग जाने के कारण उधर जाते हैं।

मेरे एक जघन्य मित्र Satyendra PS जी से अक्सर मेरी यह चर्चा होती है कि काश हम लोग सब छोड़ छाड़ कर उत्तराखंड में एक आश्रम बनाकर अपनी बाकी की जिंदगी वहीं काट देते। लेकिन अब मुझे समझ में यह भी आ गया है कि वहां कहीं जमीन का एक टुकड़ा खरीद कर उस पर कॉटेज या आश्रम बनाकर रहना इस मिड एज क्राइसिस का इलाज नहीं है।

आश्रम बनाकर फिर उस जमीन या आश्रम से मोह में बंध कर हम खुद को सन्यासी भले ही समझ बैठें लेकिन वैराग्य या सन्यास हर मोह से मुक्त होने का नाम है न कि किसी नए मोह से बंधने का।

रमता जोगी बहता पानी की कहावत भी यही बताती है कि जिसे सन्यासी बनने का आनंद लेना हो , उसे उत्तराखंड या जंगल में आश्रम बनाने का मोह न करके झोला कमंडल उठाकर पूरे भारत के तीर्थ और रमणीक स्थानों का यहां वहां भ्रमण करना चाहिए। जो मिले वह खाए, जहां जगह मिले , वहां विश्राम करे तो ही असल वैराग्य या सन्यास है।

बाकी तो सब मठाधीशी है, फिर चाहे शहर में रहकर करिए या किसी जंगल – पहाड़ में आश्रम या मठ बनाकर।

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