ओशो-
अहोभाव… जिंदगी में भटकने का भी एक मजा है, क्योंकि भटककर पाने का एक मजा है। जिसने खोया नहीं, उसे पाने का मजा नहीं मिलता। इस जिंदगी के विरोधाभास को जो समझ लेगा, उसने जीवन का सारा राज समझ लिया। लोग पूछते हैं, हम परमात्मा से दूर क्यों हो गए? इसीलिए कि हम पास हो सकें दूर न होओगे तो पास होने का मजा नहीं है।
मछली को निकाल लो सागर से, छोड़ दो घाट पर, तड़फती है। पहली दफा पता चलता है कि सागर में होने का मजा क्या था। सागर में थी एक क्षण पहले तक, तब तक सागर का कोई पता नहीं था। अब अगर यह सागर में वापस गिरेगी तो अहोभाव होगा, अब यह जानेगी कि सागर का कितना-कितना उपकार है मेरे ऊपर दूर हुए बिना पास होने का मजा नहीं होता । विरह की अग्नि के बिना मिलन के फूल नहीं खिलते। विरह की लपटों में ही मिलन के फूल खिलते हैं।
‘हादसाते-हयात की आँधी… जीवन की दुर्घटनाएँ और दुर्घटनाओं की तूफान
‘हस्बेफीक रास आती है… पात्रता के अनुसार रास आती है।
तुमने देखा? तूफान आता है, छोटे-मोटे दीयों को बुझा देता है; और घर में | आग लगी हो, या जंगल में आग लगी हो, तो और लपटों को बढ़ा देता है। यह बड़े मजे की बात है, छोटा दीया बुझ जाता है और लपटें जंगल की और बढ़ जाती हैं। तूफान वही था। सब पात्रता के अनुसार है।
तुम जरा जागो! तुम जरा जंगल की आग बनो! और तुम पाओगे कि जिंदगी की हर आँधी तुम्हारी लपटों को बढ़ाती है; तुम्हें बुझा नहीं पाती। जिंदगी का हर दुःख तुम्हें परमात्मा के सुख के करीब लाता है।
तेज करती है सोजे अहले-कमाल नाकिसों के दिये बुझाती है।
जिंदगी में न कोई गम हो अगर..
और अगर दुःख न हो जीवन में जिंदगी का मजा नहीं मिलता तो सुख का अनुभव ही नहीं हो सकेगा काँटों के बिना गुलाब के फूल में कोई रस नहीं है, कोई अर्थ नहीं है अँधेरी रातों के बिना सुबह की ताजगी नहीं है। और मौत के अंधेरे के बिना जीवन का प्रकाश कहाँ?
जिंदगी में न कोई गम हो अगर जिंदगी का मजा नहीं मिलता
राह आसान हो तो रहरी को गुमरही का मजा नहीं मिलता
देखो इस तरह से, तब संसार भी परमात्मा के मार्ग पर एक पड़ाव है। फिर संसार परमात्मा का विपरीत नहीं है, विरोध नहीं है, वरन् परमात्मा को पाने की ही चेष्टा का एक अनिवार्य अंग है। यह दूरी पास आने की पुकार है। यह दुःख जागने की सूचना है।


