ओशो की बौद्धिक संपत्ति पर विदेशी चेलों का डाका, फर्जी हस्ताक्षर से 800 करोड़ की लूट

बिना आरबीआई से अनुमति के विदेश ले गए बौद्धिक संपत्ति, ओशो के विदेशी संन्यासियों ने फर्जी हस्ताक्षर कर संपति पर डाला डाका

मुंबई। ओशो के नाम से मशहूर रजनीश ने पूरे देश को अपने विचारों से झकझोर कर रख दिया था। एशिया से लेकर पश्चिमी देशों तक उनके इतने भक्त बने कि अमेरिकी राष्ट्रपति सहित 21 देशों की सरकारें हिल गर्इं। अब इसी ओशो के 800 करोड़ के करीब बौद्धिक संपत्ति का विवाद हाईकोर्ट में चल रहा है। उनकी मृत्यु के बाद उनके ही 6 विदेशी भक्तों ने इस संपत्ति पर डाका डालते हुए ओशो की फर्जी हस्ताक्षर के जरिए लूट कर विदेश ले गए हैं। Continue reading

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जब ओशो को बेड़ियों, हथकड़ियों और ज़ंजीरों से जकड़ कर विभिन्न जेलों मे घुमाया गया था…

अभिनेता आशुतोष राणा

Ashutosh Rana : ओशो और आदर्श अनुयायी.. आपको शायद याद हो अमेरिका में ओशो को बिना किसी गिरफ़्तारी वारंट के, बिना किसी प्राथमिकी के अमरीकी पुलिस ने अचानक गिरफ़्तार कर लिया था। और १२ दिनों तक एक निर्दोष, निहत्थे व्यक्ति को बेड़ियों, हथकड़ियों और ज़ंजीरों से जकड़ कर विभिन्न जेलों मे घुमाते हुऐ उन्हे यातना के कई आयामों से गुज़ारा। विश्व मीडिया बताता है, उस समय पूरे विश्व में ओशो के अनुयायियों की संख्या करोड़ों में थी, पर पूरे विश्व में कहीं कोई अशांति या हिंसक प्रदर्शन नहीं हुए।  ओशो जिस-जिस जेल में पहुँचते थे वहाँ सुबह-सुबह आदमियों की भीड़ नही बल्कि फूलों से लदे हुए ट्रक पहुँच जाते थे।

अकलोहोमा जेल के जेलर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, मै सेवानिवृत्ति के क़रीब था मैने बहुत क़ैदियों को अपनी जेलों में आते जाते देखा है पर जब यह शख़्स (ओशो) मेरी जेल में आया तो मैंने महसूस किया और देखा कि मेरी जेल एक चर्च के रुप में बदल गई थी। पूरी जेल फूलों से भर गई थी कोई जगह ख़ाली नहीं थी। तब मैं ख़ुद उस शख़्स के पास गया और अनायास ही मेरी आँखो से अश्रु बहने लगे, मैं समझ नहीं पा रहा था और भरे गले से मैंने उनसे पूछा कि, आप ही बताइए इन फूलों का मैं क्या करूँ?

ओशो ने मेरी तरफ प्रेमपूर्ण दृष्टि डाली और बोले- इन फूलों को पूरे शहर से स्कूलों और कॉलेजों में भिजवा दिया जाए ये मेरी तरफ से उस विद्यार्थियों को भेंट है जो अभी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। जब ओशो को जेल से अदालत लाया जाता था, तब उनके लाखों अनुयायी नगर वासियों को फूल भेंट करते थे और शांतिपूर्ण ढंग से प्रतीक्षारत रहते कि कब ओशो कोर्ट से बाहर आएँगे? जब ओशो कोर्ट से गुज़र जाते तो कोर्ट से लेकर जेल तक की सड़क फूलों से पटी होती थी। पूरे संसार से कहीं ऐसी कोई ख़बर नही थी कि ओशो के किसी अनुयायी ने कोई उग्र प्रदर्शन,आचरण किया या उग्र व्यक्तव्य दिया हो।

ओशो की तस्वीरें

जब भी कोई उनसे ओशो के सम्बध मे कुछ पूछता तो आँखों में आँसुओं के साथ यही कहते- प्रकृति कुछ प्रयोग कर रही है, हाँ ये प्रयोग हमारे लिये थोडा असहनीय और कष्टप्रद जरुर हैं, पर जैसी परमपिता की मर्ज़ी। हमारे सद्गुरू ने हमें ये सिखा दिया है कि कैसे परम स्वीकार के भाव मे जिया जाता है।  जिस जेल से ओशो को जाना होता, वहाँ का जेलर अपने परिवार के साथ उन्हे विदा करने के लिये उपस्थित होता और ओशो से आग्रह करता कि क्या मेरे परिवार के साथ आप अपनी एक फ़ोटो हमें भेंट करेगे? और ओशो मधुर मुस्कान से मुस्कराते हुए वही खड़े हो जाते और कहते कि आओ।

बहुत पहले जब ओशो भारत में थे तब उन पर छुरा फेंका गया, ओशो ने तत्क्षण कहा, कोई अनुयायी उन सज्जन को कुछ भी न कहे और उन्हें छुए भी नही। वे कुछ कहना चाहते हैं, ये उनके कहने का ढंग है। उन्हे बिल्कुल छोड़ दिया जाए।  फिर अगले दिन ओशो ने प्रवचन के मध्य कहा- मैं यह देख कर आनंदित हूँ कि तुममें से किसी ने उन सज्जन को कोई चोट नही पहुँचाई , वल्कि प्रेम से उन्हें बाहर जाने दिया गया। यही मेरी शिक्षा है। कल कोई मेरी हत्या का भी प्रयास करे या जान भी ले-ले लेकिन तुम उन्हें प्रेम ही देना ।

सच्चे सद्गुरू की शिक्षा और दीक्षा उनके अनुयायियों में परिलक्षित होती है। अनुयायी शब्द बडा समझने वाला है- अपने गुरू के बताये मार्ग पर ठीक ढंग से चलने वाले को अनुयायी कहते है ।  शांत, अनुशासन-शील, सर्व-स्वीकार और सुदृढ़ अनुयायी ही गुरु की सदाशयता को परिभाषित करते हैं। साथ ही स्मरण रखने योग्य तथ्य यह भी है की जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपने अनुयायियों, अपने को प्रेम करने वालों पक्षधरों की मानसिकता का निर्माण करने का गुरुतर दायित्व अग्रगामी आदर्श का होता है। एक मित्र ने मुझे यह भेजा। ओशो साहित्य संग्रह को आभार सहित सादर प्रेमप्रणाम।

जाने-माने फिल्म अभिनेता आशुतोष राणा की एफबी वॉल से.

ओशो को पढ़ने-जानने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर भी क्लिक करें…

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इस जगत को एक नाचते-हंसते-गाते हुए धर्म की जरूरत है : ओशो

…नाचने में कंजूसी मत करना। जी भर कर नाचो। ऐसे नाचो कि नाच ही रह जाए, तुम खो जाओ। हेरत-हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराई। नृत्य की बड़ी खूबी है, जो किसी और कृत्य में नहीं। नृत्य में जितने जल्दी नर्तक डूब जाता है और खो जाता है, किसी और चीज में नहीं खोता। हर चीज में द्वैत बना रहता है, नृत्य में बड़ा अद्वैत है। नृत्य नर्तक से अलग नहीं होता, संयुक्त ही रहते हैं, उनको अलग करने का उपाय ही नहीं।

नृत्य अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचता है, तब नर्तक बिलकुल विस्मरण में हो जाता है। यही संन्यास है। नृत्य की इस कला को, डूब जाने को, अपने को विसर्जित, विस्मृत कर देने की इस अदभुत प्रक्रिया ही तो संन्यास है। संन्यास मेरे लिए त्याग नहीं है। संन्यास मेरे लिए परमात्मा का भोग है। संन्यास मेरे लिए परमात्मा के साथ-साथ इस विराट विश्व के महारास में सम्मिलित हो जाना है। नाचते-नाचते एक दिन पाओगे कि मिल गया वह जिसकी तलाश थी। अपने भीतर ही मिल गया! नाचते-नाचते जो मिलता हो, उसे रोते-रोते क्यों पाना? नाचते-नाचते जो मिलता हो, उसे उदास और गंभीर होकर क्यों पाना?

हंसते-हंसते जो मिलता हो, उसके लिए लोग नाहक ही धूनी रमाए बैठे हैं। जैसे परमात्मा कोई दुष्ट है और तुम्हें सताने को आतुर है। सो गर्मी के दिन हों और आप धूनी रमाए बैठे हैं। उतने से भी चित्त नहीं मानता तो और भभूत लगा ली है शरीर पर, ताकि शरीर में भी जो रंध्र हैं, जिनसे श्वास ली जाती है, वे भी बंद हो जाएं। किसको सता रहे हो? उसी को सता रहे हो! क्यों सता रहे हो? लोग उपवास कर रहे हैं, भूखे मर रहे हैं और सोच रहे हैं कि इस तरह परमात्मा प्रसन्न होगा।

तुम क्या सोचते हो कि परमात्मा कोई दुखवादी है? कोई सैडिस्ट है? कि तुम अपने को सताओ तो वह प्रसन्न हो? तुम्हारे महात्मा रुग्ण हैं, बीमार हैं, मानसिक रूप से व्याधिग्रस्त हैं। इनको चिकित्सा की आवश्यकता है। जिनकी हंसी खो गई, इनसे आदमी बचना चाहते हैं, इनसे परमात्मा भी बचना चाहेगा। इस तरह के लोगों के साथ कौन होना चाहेगा? इसलिए नाचो! जी भर कर नाचो! हंसो! गाओ! इस जगत को एक नाचते हुए, हंसते हुए, गाते हुए धर्म की जरूरत है। वही इस जगत को बचा सकता है…

ओशो की किताब ‘रहिमन धागा प्रेम का’ के प्रवचन 5 का संपादित अंश.

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भड़ास4मीडिया के भविष्य को लेकर यशवंत ने क्या लिया फैसला, जानें इस एफबी पोस्ट से

Yashwant Singh : ऐ भाई लोगों, कल हम पूरे 44 के हो जाएंगे. इलाहाबाद में हायर एजुकेशन की पढ़ाई के दौरान ओशो-मार्क्स के साथ-साथ अपन पामोलाजी-न्यूमरोलॉजी की किताब पर भी हाथ आजमाए थे. उस जमाने में हासिल ज्ञान से पता चलता है कि मेरा जन्मांक 8 और मूलांक 9 है. जन्मांक छब्बीस का छह और दो जोड़कर आठ बना इसलिए आठ हुआ. मूलांक तारीख, महीना और साल जोड़कर पता किया जाता है जो मेरा 9 होता है. इस बार जो 26 अगस्त सन 2017 है, इसका योग 8 बैठ रहा. 44 साल का होने के कारण चार प्लस चार यानि आठ हो रहा. मतलब जन्मांक और मूलांक दोनों आठ हो रहा है. ग़ज़ब संयोग या दुर्योग, जो कहिए, बैठ रहा है इस बार. वैसे, अपन तो कई साल पहले लिख चुके हैं कि बोनस लाइफ जी रहा हूं, इसलिए हर दिन जिंदाबाद. 🙂

अपने एक पत्रकार साथी मृदुल त्यागी, दैनिक जागरण मेरठ के जमाने में ज्योतिषीय ज्ञान-गणना के आधार पर राहु-केतु टाइप के दो खूंखार जीवों / ग्रहों-नक्षत्रों का मुझ पर भयंकर प्रकोप बताया-समझाया करते थे. तब मुझे मन ही मन लगता रहा कि जरूर ये मूलांक 9 वाला अंक राहु है और जन्मांक 8 वाला केतु. अंक ज्योतिष के हिसाब से 8 वाला अंक थोड़ा क्रिएटिव पर्सनाल्टी डेवलप करता है और 9 वाला दुस्साहसी / खाड़कू / दबंग टाइप का. जब दोनों साथ हों तो आदमी ‘एक तरफ उसका घर एक तरफ मयकदा’ मार्का द्वंद्व समेटे हुआ जीवन के हर क्षण को हाहाकारी टाइप से जीता है. अपन का भी कुछ कुछ ऐसा रहा है. 🙂

ऐसा लग रहा है कि राहु-केतु मेरा पिंड छोड़ रहे हैं. ज्योतिष के विद्वान लोग बताएं कि क्या मेरे इस बर्थडे पर राहु और केतु की अनंत प्यास बुझ जाएगी और वो मेरा पिंड छोड़कर मेरे किसी ‘चाहने’ वाले के कपार पर सवार हो उसे सदा के लिए बेचैन आत्मा बनाकर छोड़ेंगे 🙂

मौज लेते रहना चाहिए.

इस जन्मदिन पर मैं क्या सोच-गुन रहा हूं?

बस दो चीजें.

एक तो सोचने-दिमाग लड़ाने का काम लगभग बंद कर रहा हूं. ‘जाहे विधि राखे प्रभु, ताहे विधि रहिए’ वाला मेरा हाल हो गया है. इस रास्ते पर चलते हुए लग रहा है कि चलते रहो, जब जीवन का अंतत: कोई मकसद ही नहीं होता तो फिर काहें को टेंशन लेने का, हर साल का चार्ट काहें को तैयार करने का. तत्काल में यानि तुरंत में जीते रहो, न अतीत को लेकर परेशान होओ और न भविष्य को लेकर चिंतित. तत्क्षण को उदात्त तरीके से जीते रहो. जीवन यापन के लिए जो करो, इतने कलात्मक ढंग से, इतने मन से और इतने डूब कर करो कि वही तपस्या और ध्यान बन जाए.

बीते दो दशकों के दौरान समझ, संघर्ष, समय, चेतना और नियति आदि के मेलजोल के चलते अब एक जाग्रत भाव-सा निर्मित हुआ है. यह भाव महसूस किया जा सकता है, बताया नहीं जा सकता, क्योंकि जो इससे वंचित है, वह सारा का सारा शब्दजाल मानेगा. एक नया जीवन चर्या डेवलप होने लगा है. पुराने संस्कारों की ज़िद खत्म होती जा रही है. नई लाइफस्टाइल ने खुद ब खुद जगह बनाना शुरू किया है. एक ट्रांजीशन फेज चल रहा था पिछले चार पांच साल से, वह पूरा होने की ओर है. सहजता और शांति, ये ऐसी चीजें हैं जो बीते एक साल के दौरान शिद्दद से खुद के भीतर महसूस किया, कर रहा हूं. इन्हें खदेड़ने के वास्ते बाहरी तौर पर बेहद अशांत और असहज माहौल क्रिएट करता रहा, जान बूझ कर, पर जीतता रहा अंदर वाला ही. अपने आप.

किसी भी चीज की परवाह न करना, तत्क्षण में जीना, किसी भी तर्क-वितर्क या घटनाक्रम की निर्रथकता महसूस करना, ‘ये हो जाएगा तो क्या हो जाएगा और वो नहीं हो रहा तो क्या बिगड़ रहा’ टाइप फीलिंग का घर करते जाना… ये सब मिलाकर एक अ-सामाजिक सा व्यक्तित्व निर्मित होता रहा. एक शब्द आता है हाइबरनेशन. शायद मेरे मामले में उसी की बारी है. अतिशय उर्जा खर्च कर अब तक का भड़ भड़ टाइप जिया हुआ करियरवादी / क्रांतिकारी / अराजकतावादी (जिसे जो मानना हो माने, अपन तो जीवन को समग्रता में देखते हैं) जीवन फिलहाल इनके इतर या इन्हीं चीजों के दूसरे कांट्रास्ट / छोर की तरफ शिफ्ट हो गया है. सबका भला हो, सबको प्रेम मिले, सब सहज हों, सब भयमुक्त हों. ऐसा फील आने लगा है. ऐसा करने-कराने का मन करने लगा है. पहले भी थी, लेकिन तब दूसरे रास्ते तलाशे जाते थे. दूसरे हथियार अख्तियार किए जाते थे. अब तो अलग बात है. अब तो सहज बात है.

इस आंतरिक मन:स्थिति के इस लेवल की ज्यादा व्याख्या यहां संभव नहीं है. शब्द शायद सटीक न मिलें और इसके अभाव में व्याख्या कहीं सतही न हो जाए. वैसे भी, आंतरिक यात्राएं अधिकांशत: निजी हुआ करती हैं. बाहरी यात्राएं अक्सर सामूहिकता और परंपरा का स्वभाव लिए होती हैं. अध्यात्म आंतरिक यात्रा से जुड़ा मामला है. इसमें बाहरी मदद ज्यादा नहीं मिल सकती. इसमें सामूहिकता का कोई ज्यादा मतलब नहीं है. अप्प दीपो भव: वाली स्थिति होती है यहां. विज्ञान और व्यवस्था आदि चीजें परंपरा दर परंपरा निर्मित होती रहती है. इसमें हर पीढ़ी कुछ न कुछ जोड़ती रहती है. और, हर आदमी के जाग्रत होने के खुद के रास्ते तरीके होते हैं. फिलहाल इस विषय को यहीं छोड़ते हैं. यह इतना बड़ा टापिक है, इतने डायमेंशन हैं कि इसे लिखा नहीं जा सकता. दूसरे, अगर सब लिख दिया तो उसे सब महसूस नहीं कर सकते.

अब दूसरी बात. भड़ास को 26 अगस्त को बंद करने को लेकर जो मेरा ऐलान था, उसके बाद से लगातार मंथन, चर्चा और विमर्श अलग-अलग लोगों से होता रहा. तय फिलहाल ये हुआ कि भड़ास को बंद न किया जाए. और, इसमें बहुत ज्यादा उर्जा भी न खर्च की जाए. इसके संचालन के लिए आय के स्रोत क्रिएट करने को लेकर कई किस्म की चर्चाएं हुईं. मेरा निजी मन भड़ास से इतर कुछ नये आंतरिक प्रयोगों को लेकर है, सो भड़ास मेरी प्रियारिटी में न रहेगा. हां, बड़ा प्रकरण / मामला आएगा तो छोड़ेंगे नहीं, छोटे-मोटे मामलों का लोड लेंगे नहीं.

आखिरी बात. जो कुछ विजिबल है, उतना ही गहरा, उतना ही मजबूत इनविजिबल चीजें हैं. उर्जानांतरण इधर से उधर होता रहता है. इसे आप विजिबल मोड में फील कर सकते हैं, उस पाले, यानि इनविजिबल हिस्से को महसूस कर सकते हैं. इसके लिए दिन के उजाले से बचिए, रातों की दिनचर्या शुरू करिए. रात में बगल के पेड़ से आ रही चिट चिट वाली गिलहरी की आवाज के जरिए गिलहरी की रातचर्या को महसूस करिए. अगल-बगल दिखने वाले कुछ चुनिंदा अंधेरों से बतियाइए, उनसे दोस्ती करिए. ये सब एक डोर हैं जिनके जरिए आगे बढ़ा जा सकता है.

फिलहाल जैजै वरना कमरेडवा सब कहेंगे कि गड़बड़ा गया है 🙂

पर ये भी सच है कि ‘सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग.’ इसलिए मस्त होकर अपनी लाइफ खुद चुनिए, जीइए.

फिर से जैजै मित्रों.

भड़ास के एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से.

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बाबा कीनाराम जन्मोत्सव 2017 में शामिल हुए कई संपादक और पत्रकार! (देखें वीडियो)

औघड़/अघोरी परंपरा के आराध्य-ईष्ट बाबा कीनाराम जी का विश्व-विख्यात जन्मोत्सव समारोह-2017 धूमधाम से संपन्न हुआ.  देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं के साथ जाने-माने पत्रकार, न्यायाधीश, कलाकार, बुद्धिजीवीयों ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया. तीन दिन तक चले इस कार्यक्रम पर लगभग हर मीडिया हाऊस की नज़र थी. कार्यक्रम का समापन (वर्तमान में) अघोर-परंपरा के विश्व-विख्यात हेडक़्वार्टर “बाबा कीनाराम स्थल, क्रीं-कुण्ड” वाराणसी व् “बाबा कीनाराम अघोरपीठ” रामशाला, रामगढ़, चंदौली (दोनों)  के पीठाधीश्वर व पूरी दुनिया में अघोर-परम्परा के मुखिया अघोराचार्य महाराजश्री बाबा सिद्धार्थ गौतम राम जी के आशीर्वचन के साथ हुआ।

अपने आशीर्वचन में बाबा गौतम राम जी ने कहा कि “आज हमें अपने आदर्शों व् संस्कृति को बचाने की ज़रुरत है और यहां (पिछले 3 दिनों में ) जिन लोगों अपने विचार रखे , उन पर ग़ौर करने की आवश्यकता है”। समाज सेवा को ही मानवीय पक्ष बताते हुए बाबा ने कहा कि “मानव बनने की ज़रुरत है”। बाबा ने कहा कि “सिर्फ़ बोलने भर से कुछ नहीं होगा, आज कर्म-प्रधान होने की प्राथमिकता पर बल देना चाहिए”।

तीन दिन तक चले इस समारोह में जहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम, देश के नामचीन कलाकारों से गुलज़ार रहा वहीं देश-दुनिया के कई विद्वानों ने “बाबा कीनाराम जी, अघोर-परम्परा व् समाजिक सरोकार” के तहत आयोजित गोष्ठी में हिस्सा लिया।

नोबेल-पुरस्कार के लिए नामांकित पूर्व आई.एफ.एस. (भारतीय विदेश सेवा) अधिकारी व् योजना-आयोग के पूर्व सदस्य तथा पूर्व वाइस चांसलर (घासी राम विश्व-विघालय, छत्तीसगढ़) डॉ.दीनानाथ तिवारी ने बताया कि “अघोर-परंपरा का उद्गम तो सृष्टि के प्रारम्भ से ही है और समाज के कल्याण के लिए ही ये परम्परा जानी जाती है। बाबा कीनाराम जी व् बाबा सिद्धार्थ गौतम राम जी के बताये रास्तों पर चलकर ही समाज का भला हो सकता है। “

विचार-गोष्ठी में अपने उद्गार रखते हुए “इलाहाबाद हाई कोर्ट” के पूर्व मुख्य-न्यायाधीश माननीय चौहान साहब ने कहा कि “बाबा कीनाराम जी व् बाबा सिद्धार्थ गौतम राम जी मानवीय-पक्ष के हमारे आदर्श हैं। हमें अघोर-परम्परा के अदभुत आध्यात्मिक पक्ष को जांनने  अलावा इसका सामाजिक पक्ष भी जांनने का प्रयास करना चाहिए”।

गोष्ठी में अपनी बात रखते हुए “आरा जिला के जिला-न्यायधीश” माननीय रमेश कुमार ने बाबा कीनाराम जी व् बाबा सिद्धार्थ जी के आदर्शों से प्रेरणा लेने की ज़रुरत बताया और कहा कि “औघड़ परम दयालू होते हैं और मानवीय-पक्ष के उच्चतम आदर्शों के मापदंड होते हैं।”

अपने विचार रखते हुए विख्यात पत्रकार अरविन्द मोहन ने कहा कि “मैं इस विषय पर पहले ज़्यादा नहीं जानता था , लेकिन, यहां आकर काफ़ी कुछ समझने का  अवसर मिला , जिसका विस्तार करने की मैं कोशिश करूंगा “।

गोष्ठी में अपने विचार रखते हुए “प्रेस एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया” के अध्यक्ष जयशंकर गुप्ता ने कहा कि “आज हम सबको बाबा के विचारों को अपने अंदर अंगीकार करने की ज़रुरत है और यथासंभव अपना योगदान देना चाहिए “।

अघोर परंपरा और सामाजिक-राज़नीतिक ताने-बाने का ज़िक्र करते हुए “दैनिक जागरण “(दिल्ली) के डिप्टी ब्यूरो चीफ़ एस.पी.सिंह ने कहा कि “आज समाज में जिस तरह का राजनैतिक और सामाजिक ताना-बाना है , उसमें बाबा कीनाराम जी जैसे संतों का उल्लेख और सहयोग प्रासंगिक हो जाता है”।

“इंडिया वॉयस” टी.वी. चैनल के प्रधान-सम्पादक अनिरुद्ध सिंह ने कि “इस कार्यक्रम में आने से पहले , मैं, इस परंपरा से पूर्णतः अनभिज्ञ था पर आज  महसूस किया कि अघोर-परम्परा की शानदार आध्यात्मिक और सामाजिक सरोकार को अनदेखा नहीं किया जा सकता”।

मध्य-प्रदेश के प्रसिद्द समाजसेवी व् लेखक मनोज ठक्कर ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि “मैं तक़रीबन पिछले 10 सालों से इस परम्परा को समझने का प्रयास कर रहा हूँ और अब यही समझता हूँ कि ये अघोर की ये विरासत अनमोल है, दुर्लभ है, जिसे संजो के रखने की ज़रुरत है।”

कार्यक्रम के पहले दिन चर्चा करते हुए तेज़तर्रार पत्रकार विष्णुगुप्त ने सभ्यता  संस्कृति को बचाने  करते हुए, बाबा कीनाराम जी आदर्शों और उनकी मानवीय सेवा का उल्लेख किया।
“सम्पूर्ण परिवर्तन” अखबार के सम्पादक मुन्ना पाठक ने अघोर-परम्परा के अदभुत आध्यात्मिक और मानवीय पक्ष को जनसामान्य का एकमात्र सहारा क़रार देते हुए कहा कि “आज गाँव-शहरों के साथ-साथ महानगरों में भी, ,अघोर को , जनजागरण का हिस्सा बनाये जाने की ज़रुरत है “।

“APN News” के प्रबंध सम्पादक विनय राय ने कहा कि “अघोर-परम्परा का इतिहास शानदार रहा है और आज भी है ,जिसके सरल-सहज़ स्वरुप से (संचार-माध्यमों के ज़रिये) लोगों को अवगत कराने की ज़रुरत है “।

अपने तेज़तर्रार सम्बोधन में “पीपुल्स फर्स्ट” के सम्पादक नैमिष सिंह ने कहा कि “आज समाज को बाबा कीनाराम जी व् बाबा सिद्धार्थ गौतम राम जी के सिद्धांतों आदर्शों पर चलते हुए सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों को दूर ज़रुरत है”।

केंद्रीय हिंदी संस्थान (दिल्ली) के विभागाध्यक्ष डॉ. देवेन्द्र शुक्ल ने अघोर-परम्परा पर शोध पर बल देते हुए कहा कि “हम अघोर-परम्परा के दुर्लभ-अदभुत-अविश्वसनीय आध्यात्मिक आभा से तो परिचित हैं पर समाजिक-निर्माण में इसके योगदान को भी याद रखें और इस परंपरा का यथासंभव विस्तार करें “। गोष्ठी में अन्य कई जाने-माने शोधकर्ताओं व नागरिकों ने भी अपने विचार रखे।

लाखों लोगों की मौज़ूदगी व संध्याकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत भारत के जाने-माने कलाकारों की उपस्थिति ने पुलिस-प्रशासन को बेहद चौकन्ना कर रखा था। आयोजन समिती के अरूण सिंह और अजित कुमार सिंह, की अगुवाई और वरिष्ठ अधिकारियों की लगातार विज़िट से स्वयं-सेवक तथा पुलिस-कर्मी काफ़ी मुस्तैद दिखे। हर जगह प्रशासन ने बेहतर तरीके से अपने काम को अंजाम दिया। कार्यक्रम का शानदार संचालन धनंजय सिंह, सूर्यनाथ सिंह  और राजेन्द्र पाण्डेय ने किया। दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार नीरज वर्मा व् पूर्वांचल के वरिष्ठ पत्रकार संजय सिंह और आश्रम के वरिष्ठ सहयोगी  धनंजय सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया।

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Osho Tantra इस संन्यासी से सीखें तंत्र साधना के सारे रहस्य

 

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नाथ योगी संप्रदाय के प्रवर्तक गुरु गोरखनाथ के बारे में ओशो क्या कहते हैं, जानिए

ओपिनियन पोस्ट मैग्जीन ने इस बार गुरु गोरखनाथ के बारे में ओशो के विचार को प्रकाशित किया है. असल में योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का सीएम बन जाने के बाद से अचानक नाथ संप्रदाय और गोरखनाथ चर्चा में आ गए हैं. गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर के महंत योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने के बहाने नाथ संप्रदाय और गुरु गोरखनाथ को लेकर जो चर्चा चल पड़ी है, उसी बीच जाने माने चिंतक ओशो के गोरखनाथ के बारे में विचार / लेख को ढूंढ निकाल कर प्रकाशित कर देना एक बढ़िया कदम है.

ओशो ने अपने जीवन में ढेर सारे गुरुओं, संप्रदायों, फकीरों, संतों के बारे में लिखा है उनमें गुरु गोरखनाथ भी हैं. यहां तक कि टॉप टेन की ओशो की सूची में गुरु गोरखनाथ भी हैं. ओशो ने दस की सूची को कसते-कसते आखिर में जिन चार को भारतीय मानस के कालजयी निर्धारक माना है, वो हैं कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध और गोरखनाथ. तो, पहले ओपिनियन पोस्ट को धन्यवाद कि उसने बेहद मौके से एक पठनीय आर्टकिल प्रकाशित किया. दूसरा यह कि आप सभी को इस आलेख को पढ़ना चाहिए. नीचे ओपिनियन पोस्ट में कवर स्टोरी के रूप में प्रकाशित आर्टकिल के तीनों पेज हैं. एक-एक पेज पर क्लिक कर पेज को एक्सपैंड करें और अच्छे से पढ़ें. -संपादक, भड़ास4मीडिया

 

 

 

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डरे हुए लोग जाते हैं ज्योतिषियों के पास!

ज्योतिषियों के पास कोई आध्यात्मिक पुरुष थोड़े ही जाता है। ज्योतिषियों के पास तो संसारी आदमी जाता है। कहता है : भूमि-पूजा करनी है, नया मकान बनाना है, तो लगन-महूरत; कि नई दुकान खोलनी है, तो लगन-महूरत; कि नई फिल्म का उद्घाटन करना है, लगन महूरत; कि शादी करनी है बेटे की, लगन-महूरत। संसारी डरा हुआ है : कहीं गलत न हो जाए! और डर का कारण है, क्योंकि सभी तो गलत हो रहा है; इसलिए डर भी है कि और गलत न हो जाए! ऐसे ही तो फंसे हैं, और गलत न हो जाए!

संसारी भयभीत है। भय के कारण सब तरफ सुरक्षा करवाने की कोशिश करता है। और जिससे सुरक्षा हो सकती है, उस एक को भूले हुए है। वही तो पलटू कहते हैं कि जिस एक के सहारे सब ठीक हो जाए, उसकी तो तू याद ही नहीं करता; और सब इंतजाम करता है : लगन-महूरत पूछता है। और एक विश्वास से, एक श्रद्धा से, उस एक को पकड़ लेने से सब सध जाए–लेकिन वह तू नहीं पकड़ता, क्योंकि वह महंगा धंधा है। उस एक को पकड़ने में स्वयं को छोड़ना पड़ता है; सिर काट कर रखना होता है।

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महत्वाकांक्षा दुनिया का सबसे खतरनाक धीमा जहर है.. किसी भी शराब से अधिक, यहाँ तक कि मरिजुआना या एल.सी.डी. जैसे मादक द्रव्यों से भी अधिक खतरनाक धीमा जहर। क्योंकि, महत्वाकांक्षा आपके पूरे जीवन को बर्बाद करके रख देती है। वह आपको गलत दिशा में गतिशील रखती है। वह आपको धारणाएं बनाने, तरह-तरह की इच्छाएँ पालने, दिवास्वप्न देखने में व्यस्त रखती है, और आपको तरह-तरह से अपने पूरे जीवन को बर्बाद करने में लगाए रखती है।

महत्वाकांक्षा का अर्थ है मन में एक सूक्ष्म अहंकार का निर्माण हो जाना। एक बार उस अहंकार के निर्मित हो जाने पर वह आपको अज्ञान के अंधकार भरे सघन कोहरे में खींचता चला जाता है। फिर, उसी अहंकार के आधार पर आपका पूरा सामाजिक तानाबाना खड़ा होने लगता है। आपकी सारी सोच इस दिशा में कार्य करने लगती है, “सबसे आगे बढ़ो, सबसे पहले पहुँचो”। फिर, आप जहाँ कहीं होते हैं, जो कुछ भी कर रहे होते हैं, सबसे आगे बढ़ जाने, सबसे पहले पहुँच जाने की कवायद में लग जाते हैं, चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े। साम, दाम, दंड और भेद – कोई भी पैंतरा आजमाना पड़े, कोई भी समझौता करना पड़े, किसी की चापलूसी भी करनी पड़े, झूठ, अभिनय और डींग का सहारा भी लेना पड़े, आपके लिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, बस हर कीमत पर सफल हो जाना है, मानो कि सफलता ही जीवन का पर्याय हो गई हो! असल में, जीवन का सफलता से कोई लेना-देना नहीं है। सफलता आपको भविष्य की दिशा में गतिशील करने का भ्रम रचती है और मदहोश बनाकर रखती है। आने वाले बेहतर कल की उम्मीद में उलझाए रखकर वर्तमान के सहज और आनंद भरे जीवन से वंचित रखती है।”

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भोजन करते हुए या पानी पीते हुए भोजन या पानी का स्वाद ही बन जाओ, और उससे भर जाओ। हम खाते रहते हैं, हम खाए बगैर नहीं रह सकते। लेकिन हम बहुत बेहोशी में भोजन करते हैं-यंत्रवत। और अगर स्वाद न लिया जाए तो तुम सिर्फ पेट को भर रहे हो। तो धीरे-धीरे भोजन करो, स्वाद लेकर करो और स्वाद के प्रति सजग रहो। और स्वाद के प्रति सजग होने के लिए धीरे-धीरे भोजन करना बहुत जरूरी है। तुम भोजन को बस निगलते मत जाओ। आहिस्ते-आहिस्ते उसका स्वाद लो और स्वाद ही बन जाओ। जब तुम मिठास अनुभव करो तो मिठास ही बन जाओ। और तब वह मिठास सिर्फ मुंह में नहीं, सिर्फ जीभ में नहीं, पूरे शरीर में अनुभव की जा सकती है। वह सचमुच पूरे शरीर पर फैल जाएगी। तुम्हें लगेगा कि मिठास-या कोई भी चीज-लहर की तरह फैलती जा रही है। इसलिए तुम जो कुछ खाओ, उसे स्वाद लेकर खाओ और स्वाद ही बन जाओ।

तंत्र कहता है कि जितना स्वाद ले सको उतना स्वाद लो। ज्यादा से ज्यादा संवेदनशील बनो, जीवंत बनो। इतना ही नहीं कि संवेदनशील बनो, स्वाद ही बन जाओ। अस्वाद से तुम्हारी इंद्रियां मर जाएंगी, उनकी संवेदनशीलता जाती रहेगी। और संवेदनशीलता के मिटने से तुम अपने शरीर को, अपने भावों को अनुभव करने में असमर्थ हो जाओगे। और तब फिर तुम अपने सिर में केंद्रित होकर रह जाओगे।

पानी पीते हुए पानी का ठंडापन अनुभव करो। आंखें बंद कर लो, धीरे-धीरे पानी पीओ और उसका स्वाद लो। पानी की शीतलता को महसूस करो और महसूस करो कि तुम शीतलता ही बन गए हो। जब तुम पानी पीते हो तो पानी की शीतलता तुममें प्रवेश करती है, तुम्हारा अंग बन जाती है। तुम्हारा मुंह शीतलता को छूता है, तुम्हारी जीभ उसे छूती है और ऐसे वह तुम में प्रविष्ट हो जाती है। उसे तुम्हारे पूरे शरीर में प्रविष्ट होने दो। उसकी लहरों को फैलने दो और तुम अपने पूरे शरीर में यह शीतलता महसूस करोगे। इस भांति तुम्हारी संवेदनशीलता बढ़ेगी, विकसित होगी और तुम ज्यादा जीवंत, ज्यादा भरे-पूरे हो जाओगे।

जाने-माने दार्शनिक ओशो के अलग-अलग प्रवचनों के कुछ अंश.

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सूक्ष्‍म शरीर ही कारण बनता है नए जन्‍मों का…

आत्‍मा तो वस्‍तुत: एक ही है। लेकिन शरीर दो प्रकार के है। एक शरीर जिसे हम स्‍थूल शरीर कहते है, जो हमें दिखाई देता है। एक शरीर जो सूक्ष्‍म शरीर है जो हमें दिखाई नहीं पड़ता है। एक शरीर की जब मृत्‍यु होती है, तो स्‍थूल शरीर तो गिर जाता है। लेकिन जो सूक्ष्‍म शरीर है वह जो सटल बॉडी है, वह नहीं मरती है। आत्‍मा दो शरीरों के भीतर वास कर रही है। एक सूक्ष्‍म और दूसरा स्‍थूल। मृत्‍यु के समय स्‍थूल शरीर गिर जाता है। यह जो मिट्टी पानी से बना हुआ शरीर है यह जो हड्डी मांस मज्‍जा की देह है। यह गिर जाती है। फिर अत्‍यंत सूक्ष्‍म विचारों का, सूक्ष्‍म संवेदनाओं का, सूक्ष्‍म वयब्रेशंस का शरीर शेष रह जाता है, सूक्ष्‍म तंतुओं का।

वह तंतुओं से घिरा हुआ शरीर आत्‍मा के साथ फिर से यात्रा शुरू करता है। और नया जन्‍म फिर नए स्‍थूल शरीर में प्रवेश करता है। तब एक मां के पेट में नई आत्‍मा का प्रवेश होता है, तो उसका अर्थ है सूक्ष्‍म शरीर का प्रवेश। मृत्‍यु के समय सिर्फ स्‍थूल शरीर गिरता है—सूक्ष्‍म शरीर नहीं। लेकिन परम मृत्‍यु के समय—जिसे हम मोक्ष कहते है—उस परम मृत्‍यु के समय स्‍थूल शरीर के साथ ही सूक्ष्‍म शरीर भी गिर जाता है। फिर आत्‍मा का कोई जन्‍म नहीं होता। फिर वह आत्‍मा विराट में लीन हो जाती है। वह जो विराट में लीनता है, वह एक ही है। जैसे एक बूंद सागर में गिर जाती है।

तीन बातें समझ लेनी जरूरी है। आत्‍मा का तत्‍व एक है। उस आत्‍मा के तत्‍व के संबंध में आकर दो तरह के शरीर सक्रिय होते है। एक सूक्ष्‍म शरीर, और एक स्‍थूल शरीर। स्‍थूल शरीर से हम परिचित है, सूक्ष्‍म से योगी परिचित होता है। और योग के भी जो ऊपर उठ जाते हैं, वे उससे परिचित होते है जो आत्‍मा है। सामान्‍य आंखें देख पाती है इस शरीर को। योग-दृष्‍टि, ध्‍यान देख पाता है सूक्ष्‍म शरीर को। लेकिन ध्‍यानातीत, बियांड योग, सूक्ष्‍म के भी पार, उसके भी आगे जो शेष रह जाता है, उसका तो समाधि में अनुभव होता है। ध्‍यान से भी जब व्‍यक्‍ति ऊपर उठ जाता है तो समाधि फलित होती है। और उस समाधि में जो अनुभव होता है, वह परमात्‍मा का अनुभव है।

साधारण मनुष्‍य का अनुभव शरीर का अनुभव है, साधारण योगी का अनुभव सूक्ष्‍म शरीर का अनुभव है, परम योगी का अनुभव परमात्‍मा का अनुभव है। परमात्‍मा एक है, सूक्ष्‍म शरीर अनंत हैं, स्‍थूल शरीर अनंत हैं। वह जो सूक्ष्‍म शरीर है वह है कॉज़ल बॉडी। वह जो सूक्ष्‍म शरीर है, वही नए स्‍थूल शरीर ग्रहण करता है। हम यहां देख रहे हैं कि बहुत से बल्‍ब जले हुए हैं। विद्युत तो एक है। विद्युत बहुत नहीं है। वह ऊर्जा, वह शक्‍ति, वह एनर्जी एक है। लेकिन दो अलग बल्लों से वह प्रकट हुई है। बल्‍ब का शरीर अलग-अलग है, उसकी आत्‍मा एक है।

हमारे भीतर से जो चेतना झांक रही है, वह चेतना एक है। लेकिन उस चेतना के झांकने में दो उपकरणों का, दो वैहिकल का प्रयोग किया गया है। एक सूक्ष्‍म उपकरण है सूक्ष्‍म देह, दूसरा उपकरण है, स्‍थूल देह। हमारा अनुभव स्‍थूल देह तक ही रूक जाता है। यह जो स्‍थूल देह तक रूक गया अनुभव है, यहीं मनुष्‍य के जीवन का सारा अंधकार और दुख है। लेकिन कुछ लोग सूक्ष्‍म शरीर पर भी रूक सकते हैं। जो लोग सूक्ष्‍म शरीर पर रूक जाते हैं, वे ऐसा कहेंगे कि आत्‍माएं अनंत हैं। लेकिन जो सूक्ष्‍म शरीर के भी आगे चले जाते है, वे कहेंगे कि परमात्‍मा एक है। आत्‍मा एक, ब्रह्म एक है।

मेरी इन दोनों बातों में कोई विरोधाभास नहीं है। मैंने जो आत्‍मा के प्रवेश के लिए कहा, उसका अर्थ है वह आत्‍मा जिसका अभी सूक्ष्‍म शरीर गिरा नहीं है। इसलिए हम कहते हैं कि जो आत्‍मा परम मुक्‍ति को उपलब्‍ध हो जाती है, उसका जन्‍म-मरण बंद हो जाता है। आत्‍मा का तो कोई जन्‍म-मरण है ही नहीं। वह न तो कभी जन्‍मी है और न कभी मरेगी। वह जो सूक्ष्‍म शरीर है, वह भी समाप्‍त हो जाने पर कोई जन्‍म-मरण नहीं रह जाता। क्‍योंकि सूक्ष्‍म शरीर ही कारण बनता है नए जन्‍मों का।

सूक्ष्‍म शरीर का अर्थ है, हमारे विचार, हमारी कामनाएँ, हमारी वासनाएं, हमारी इच्‍छाएं, हमारे अनुभव, हमारा ज्ञान, इन सबका जो संग्रहीभूत जो इंटिग्रेटेड सीड है, इन सबका जो बीज है, वह हमारा सूक्ष्‍म शरीर है। वही हमें आगे की यात्रा करता है। लेकिन जिस मनुष्‍य के सारे विचार नष्‍ट हो गए, जिस मनुष्‍य की सारी वासनाएं क्षीण हो गई, जिस मनुष्‍य की सारी इच्‍छाएं विलीन हो गई, जिसके भीतर अब कोई भी इच्‍छा शेष न रही, उस मनुष्‍य को जाने के लिए कोई जगह नहीं बचती, जाने का कोई कारण नहीं रह जाता। जन्‍म की कोई वजह नहीं रह जाती।

-ओशो
(मैं मृत्‍यु सिखाता हूं, प्रवचन- 2)

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जानिए, नोटबंदी को लेकर ओशो ने कई साल पहले एक प्रवचन में क्या कहा था!

तुम जिसको पैसा समझते हो वह एक मान्यता है अगर किसी दिन सरकार बदल जाए और रातोंरात यह एलान किया जाए कि फलाँ-फलाँ नोट नहीं चलेगा तो तुम क्या करोगे ?
मान्यता को बदलने में देर कितनी लगती है?

चंद कागज के टुकड़ों पर किसी का चित्र और हस्ताक्षर करने से वह मुद्रा बन गई और व्यवहारिक काम में आने लगी… अब मान्यता बदल गई तो वह मुद्रा दो कौड़ी की हो जाएगी …

सारा खेल मान्यता का है….

जड़ वस्तुऐं मूल्यहीन हैं महज एक मान्यता है जिसने उन्हे मूल्यवान बना दिया है! स्वर्ण रजत हीरे मुद्रा इनका मूल्य महज मान्यता का आरोपण है। जिस दिन तुम जगत की मान्यताओं से मुक्त हो गये उस दिन सब मिट्टी हो जाएगा उस दिन तुम चेतना को उपलब्ध होगे जो अनमोल है!

जाने-माने दार्शनिक ओशो के प्रवचन का एक अंश.

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ओशो का वह प्रवचन, जि‍स पर ति‍लमि‍ला उठी थी अमेरि‍की सरकार और दे दि‍या जहर!

ओशो का वह प्रवचन, जिससे ईसायत तिलमिला उठी थी और अमेरिका की रोनाल्‍ड रीगन सरकार ने उन्‍हें हाथ-पैर में बेडि़यां डालकर गिरफ्तार किया और फिर मरने के लिए थेलियम नामक धीमा जहर दे दिया था। इतना ही नहीं, वहां बसे रजनीशपुरम को तबाह कर दिया गया था और पूरी दुनिया को यह निर्देश भी दे दिया था कि न तो ओशो को कोई देश आश्रय देगा और न ही उनके विमान को ही लैंडिंग की इजाजत दी जाएगी। ओशो से प्रवचनों की वह श्रृंखला आज भी मार्केट से गायब हैं। पढिए वह चौंकाने वाला सच…

जब भी कोई सत्‍य के लिए प्‍यासा होता है, अनायास ही वह भारत में उत्‍सुक हो उठता है। अचानक पूरब की यात्रा पर निकल पड़ता है। और यह केवल आज की ही बात नहीं है। यह उतनी ही प्राचीन बात है, जितने पुराने प्रमाण और उल्‍लेख मौजूद हैं। आज से 2500 वर्ष पूर्व, सत्‍य की खोज में पाइथागोरस भारत आया था। ईसा मसीह भी भारत आए थे। ईसामसीह के 13 से 30 वर्ष की उम्र के बीच का बाइबिल में कोई उल्‍लेख नहीं है। और यही उनकी लगभग पूरी जिंदगी थी, क्‍योंकि 33 वर्ष की उम्र में तो उन्‍हें सूली ही चढ़ा दिया गया था। तेरह से 30 तक 17 सालों का हिसाब बाइबिल से गायब है! इतने समय वे कहां रहे? आखिर बाइाबिल में उन सालों को क्‍यों नहीं रिकार्ड किया गया? उन्‍हें जानबूझ कर छोड़ा गया है, कि ईसायत मौलिक धर्म नहीं है, कि ईसा मसीह जो भी कह रहे हैं वे उसे भारत से लाए हैं।

यह बहुत ही विचारणीय बात है। वे एक यहूदी की तरह जन्‍मे, यहूदी की ही तरह जिए और यहूदी की ही तरह मरे। स्‍मरण रहे कि वे ईसाई नहीं थे, उन्‍होंने तो-ईसा और ईसाई, ये शब्‍द भी नहीं सुने थे। फिर क्‍यों यहूदी उनके इतने खिलाफ थे? यह सोचने जैसी बात है, आखिर क्‍यों ? न तो ईसाईयों के पास इस सवाल का ठीक-ठाक जवाबा है और न ही यहूदियों के पास। क्‍योंकि इस व्‍यक्ति ने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। ईसा उतने ही निर्दोष थे जितनी कि कल्‍पना की जा सकती है।

पर उनका अपराध बहुत सूक्ष्‍म था। पढ़े-लिखे यहूदियों और चतुर रबाईयों ने स्‍पष्‍ट देख लिया था कि वे पूरब से विचार ले रहे हैं, जो कि गैर यहूदी हैं। वे कुछ अजीबोगरीब और विजातीय बातें ले रहे हैं। और यदि इस दृष्टिकोण से देखो तो तुम्‍हें समझ आएगा कि क्‍यों वे बारा-बार कहते हैं- ‘ अतीत के पैगंबरों ने तुमसे कहा था कि यदि कोई तुम पर क्रोध करे, हिंसा करे तो आंख के बदले में आंख लेने और ईंट का जवाब पत्‍थर से देने को तैयार रहना। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं कि अगर कोई तुम्‍हें चोट पहुंचाता है, एक गाल पर चांटा मारता है तो उसे अपना दूसरा गाल भी दिखा देना।’ यह पूर्णत: गैर यहूदी बात है। उन्‍होंने ये बातें गौतम बुद्ध और महावीर की देशनाओं से सीखी थीं।

ईसा जब भारत आए थे-तब बौद्ध धर्म बहुत जीवंत था, यद्यपि बुद्ध की मृत्‍यु हो चुकी थी। गौतम बुद्ध के पांच सौ साल बाद जीसस यहां आए थे। पर बुद्ध ने इतना विराट आंदोलन, इतना बड़ा तूफान खड़ा किया था कि तब तक भी पूरा मुल्‍क उसमें डूबा हुआ था। बुद्ध की करुणा, क्षमा और प्रेम के उपदेशों को भारत पिए हुआ था।

जीसस कहते हैं कि अतीत के पैगंबरों द्वारा यह कहा गया था। कौन हैं ये पुराने पैगंबर? वे सभी प्राचीन यहूदी पैगंबर हैं: इजेकिएल, इलिजाह, मोसेस,- कि ईश्‍वर बहुत ही हिंसक है और वह कभी क्षमा नहीं करता है!? यहां तक कि प्राचीन यहूदी पैगंबरों ने ईश्‍वर के मुंह से ये शब्‍द भी कहलवा दिए हैं कि मैं कोई सज्‍जन पुरुष नहीं हूं, तुम्‍हारा चाचा नहीं हूं। मैं बहुत क्रोधी और ईर्ष्‍यालु हूं, और याद रहे जो भी मेरे साथ नहीं है, वे सब मेरे शत्रु हैं। पुराने टेस्‍टामेंट में ईश्‍वर के ये वचन हैं। और ईसा मसीह कहते हैं, मैं तुमसे कहता हूं कि परमात्‍मा प्रेम है। यह ख्‍याल उन्‍हें कहां से आया कि परमात्‍मा प्रेम है? गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के सिवाए दुनिया में कहीं भी परमात्‍मा को प्रेम कहने का कोई और उल्‍लेख नहीं है। उन 17 वर्षों में जीसस इजिप्‍त, भारत, लद्दाख और तिब्‍बत की यात्रा करते रहे। यही उनका अपराध था कि वे यहूदी परंपरा में बिल्‍कुल अपरिचित और अजनबी विचारधाराएं ला रहे थे। न केवल अपरिचित बल्कि वे बातें यहूदी धारणाओं के एकदम से विपरीत थीं। तुम्‍हें जानकर आश्‍चर्य होगा कि अंतत: उनकी मृत्‍यु भी भारत में हुई! और ईसाई रिकार्ड्स इस तथ्‍य को नजरअंदाज करते रहे हैं। यदि उनकी बात सच है कि जीसस पुनर्जीवित हुए थे तो फिर पुनर्जीवित होने के बाद उनका क्‍या हुआ? आजकल वे कहां हैं ? क्‍योंकि उनकी मृत्‍यु का तो कोई उल्‍लेख है ही नहीं!

सच्‍चाई यह है कि वे कभी पुनर्जीवित नहीं हुए। वास्‍तव में वे सूली पर कभी मरे ही नहीं थे। क्‍योंकि यहूदियों की सूली आदमी को मारने की सर्वाधिक बेहूदी तरकीब है। उसमें आदमी को मरने में करीब-करीब 48 घंटे लग जाते हैं। चूंकि हाथों में और पैरों में कीलें ठोंक दी जाती हैं तो बूंद-बूंद करके उनसे खून टपकता रहता है। यदि आदमी स्‍वस्‍थ है तो 60 घंटे से भी ज्‍यादा लोग जीवित रहे, ऐसे उल्‍लेख हैं। औसत 48 घंटे तो लग ही जाते हैं। और जीसस को तो सिर्फ छह घंटे बाद ही सूली से उतार दिया गया था। यहूदी सूली पर कोई भी छह घंटे में कभी नहीं मरा है, कोई मर ही नहीं सकता है।

यह एक मिलीभगत थी, जीसस के शिष्‍यों की पोंटियस पॉयलट के साथ। पोंटियस यहूदी नहीं था, वो रोमन वायसराय था। जूडिया उन दिनों रोमन साम्राज्‍य के अधीन था। निर्दोष जीसस की हत्‍या में रोमन वायसराय पोंटियस को कोई रुचि नहीं थी। पोंटियस के दस्‍तखत के बगैर यह हत्‍या नहीं हो सकती थी।पोंटियस को अपराध भाव अनुभव हो रहा था कि वह इस भद्दे और क्रूर नाटक में भाग ले रहा है। चूंकि पूरी यहूदी भीड़ पीछे पड़ी थी कि जीसस को सूली लगनी चाहिए। जीसस वहां एक मुद्दा बन चुका था। पोंटियस पॉयलट दुविधा में था। यदि वह जीसस को छोड़ देता है तो वह पूरी जूडिया को, जो कि यहूदी है, अपना दुश्‍मन बना लेता है। यह कूटनीतिक नहीं होगा। और यदि वह जीसस को सूली दे देता है तो उसे सारे देश का समर्थन तो मिल जाएगा, मगर उसके स्‍वयं के अंत:करण में एक घाव छूट जाएगा कि राजनैतिक परिस्थिति के कारण एक निरपराध व्‍यक्ति की हत्‍या की गई, जिसने कुछ भी गलत नहीं किया था।

तो पोंटियस ने जीसस के शिष्‍यों के साथ मिलकर यह व्‍यवस्‍था की कि शुक्रवार को जितनी संभव हो सके उतनी देर से सूली दी जाए। चूंकि सूर्यास्‍त होते ही शुक्रवार की शाम को यहूदी सब प्रकार का कामधाम बंद कर देते हैं, फिर शनिवार को कुछ भी काम नहीं होता, वह उनका पवित्र दिन है। यद्यपि सूली दी जानी थी शुक्रवार की सुबह, पर उसे स्‍थगित किया जाता रहा। ब्‍यूरोक्रेसी तो किसी भी कार्य में देर लगा सकती है। अत: जीसस को दोपहर के बाद सूली पर चढ़ाया गया और सूर्यास्‍त के पहले ही उन्‍हें जीवित उतार लिया गया। यद्यपि वे बेहोश थे, क्‍योंकि शरीर से रक्‍तस्राव हुआ था और कमजोरी आ गई थी। पवित्र दिन यानि शनिवार के बाद रविवार को यहूदी उन्‍हें पुन: सूली पर चढ़ाने वाले थे। जीसस के देह को जिस गुफा में रखा गया था, वहां का चौकीदार रोमन था न कि यहूदी। इसलिए यह संभव हो सका कि जीसस के शिष्‍यगण उन्‍हें बाहर आसानी से निकाल लाए और फिर जूडिया से बाहर ले गए।

जीसस ने भारत में आना क्‍यों पसंद किया? क्‍योंकि युवावास्‍था में भी वे वर्षों तक भारत में रह चुके थे। उन्‍होंने अध्‍यात्‍म और ब्रह्म का परम स्‍वाद इतनी निकटता से चखा था कि वहीं दोबारा लौटना चाहा। तो जैसे ही वह स्‍वस्‍थ हुए, भारत आए और फिर 112 साल की उम्र तक जिए। कश्‍मीर में अभी भी उनकी कब्र है। उस पर जो लिखा है, वह हिब्रू भाषा में है। स्‍मरण रहे, भारत में कोई यहूदी नहीं रहते हैं। उस शिलालेख पर खुदा है, जोशुआ- यह हिब्रू भाषा में ईसामसीह का नाम है। जीसस जोशुआ का ग्रीक रुपांतरण है। जोशुआ यहां आए- समय, तारीख वगैरह सब दी है। एक महान सदगुरू, जो स्‍वयं को भेड़ों का गड़रिया पुकारते थे, अपने शिष्‍यों के साथ शांतिपूर्वक 112 साल की दीर्घायु तक यहांरहे। इसी वजह से वह स्‍थान भेड़ों के चरवाहे का गांव कहलाने लगा। तुम वहां जा सकते हो, वह शहर अभी भी है-पहलगाम, उसका काश्‍मीरी में वही अर्थ है- गड़रिए का गांव। जीसस यहां रहना चाहते थे ताकि और अधिक आत्मिक विकास कर सकें। एक छोटे से शिष्‍य समूह के साथ वे रहना चाहते थे ताकि वे सभी शांति में, मौन में डूबकर आध्‍यात्मिक प्रगति कर सकें। और उन्‍होंने मरना भी यहीं चाहा, क्‍योंकि यदि तुम जीने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)जीवन एक सौंदर्य है और यदि तुम मरने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)मरना भी अत्‍यंत अर्थपूर्ण है। केवल भारत में ही मृत्‍यु की कला खोजी गई है, ठीक वैसे ही जैसे जीने की कला खोजी गई है। वस्‍तुत: तो वे एक ही प्रक्रिया के दो अंग हैं।

यहूदियों के पैगंबर मूसा ने भी भारत में ही देह त्‍यागी थी!

इससे भी अधिक आश्‍चर्यजनक तथ्‍य यह है कि मूसा (मोजिज) ने भी भारत में ही आकर देह त्‍यागी थी! उनकी और जीसस की समाधियां एक ही स्‍थान में बनी हैं। शायद जीसस ने ही महान सदगुरू मूसा के बगल वाला स्‍थान स्‍वयं के लिए चुना होगा। पर मूसा ने क्‍यों कश्‍मीर में आकर मृत्‍यु में प्रवेश किया? मूसा ईश्‍वर के देश इजराइल की खोज में यहूदियों को इजिप्‍त के बाहर ले गए थे। उन्‍हें 40 वर्ष लगे, जब इजराइल पहुंचकर उन्‍होंने घोषणा की कि, यही वह जमीन है, परमात्‍मा की जमीन, जिसका वादा किया गया था। और मैं अब वृद्ध हो गया हूं और अवकाश लेना चाहता हूं। हे नई पीढ़ी वालों, अब तुम सम्‍हालो!

मूसा ने जब इजिप्‍त से यात्रा प्रारंभ की थी तब की पीढ़ी लगभग समाप्‍त हो चुकी थी। बूढ़े मरते गए, जवान बूढ़े हो गए और नए बच्‍चे पैदा होते रहे। जिस मूल समूह ने मूसा के साथ यात्रा की शुरुआत की थी, वह बचा ही नहीं था। मूसा करीब-करीब एक अजनबी की भांति अनुभव कर रहे थेा उन्‍होंने युवा लोगों शासन और व्‍यवस्‍था का कार्यभारा सौंपा और इजराइल से विदा हो लिए। यह अजीब बात है कि यहूदी धर्मशास्‍त्रों में भी, उनकी मृत्‍यु के संबंध में , उनका क्‍या हुआ इस बारे में कोई उल्‍लेख नहीं है। हमारे यहां (कश्‍मीर में ) उनकी कब्र है। उस समाधि पर भी जो शिलालेख है, वह हिब्रू भाषा में ही है। और पिछले चार हजार सालों से एक यहूदी परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन दोनों समाधियों की देखभाल कर रहा है।

मूसा भारत क्‍यों आना चाहते थे ? केवल मृत्‍यु के लिए ? हां, कई रहस्‍यों में से एक रहस्‍य यह भी है कि यदि तुम्‍हारी मृत्‍यु एक बुद्धक्षेत्र में हो सके, जहां केवल मानवीय ही नहीं, वरन भगवत्‍ता की ऊर्जा तरंगें हों, तो तुम्‍हारी मृत्‍यु भी एक उत्‍सव और निर्वाण बन जाती है। सदियों से सारी दुनिया के साधक इस धरती पर आते रहे हैं। यह देश दरिद्र है, उसके पास भेंट देने को कुछ भी नहीं, पर जो संवेदनशील हैं, उनके लिए इससे अधिक समृद्ध कौम इस पृथ्‍वी पर कहीं नहीं हैं। लेकिन वह समृद्धि आंतरिक है।

ओशो

(पुस्‍तक: मेरा स्‍वर्णिम भारत)

सौजन्य- फेसबुक

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मस्ती की एक रात इस Osho पंथी संत ने यशवंत को दीक्षित कर नाम दे दिया स्वामी प्रेम संतति!

Yashwant Singh : तंत्र साधना को जानने की इच्छा के तहत काफी समय से बहुत कुछ पढ़, देख, सुन, खोज रहा हूं. इसी दरम्यान चंद रोज पहले लखनऊ में एक ओशो पंथी संन्यासी मिल गए, स्वामी आनंद भारती. उनसे तंत्र को लेकर त्रिपक्षीय वार्ता हुई. एक कोने पर Kumar Sauvir जी थे. दूसरे कोने पर खुद स्वामी आनंद भारती और तीसरे कोने पर मैं, श्रोता व वीडियो रिकार्डर के रूप में. ये 25 मिनट का वीडियो आपको बहुत कुछ बताएगा.

सबसे खास बात है कि ये जो स्वामी आनंद भारती हैं, वे दरअसल भानु प्रताप द्विवेदी हैं, जो बेहद सामान्य से आम नागरिक हैं. संपादन, प्रूफ, वकालत आदि के जरिए वह जीवन यापन का खर्च जुटाते हैं. व्यवहार इतना सहज कि पूछो मत.

‘जीवन कैसे जिया जाए’ के सवाल पर वे हमेशा एक बात कहते हैं- ”सहज रहो, मस्त रहो, जो अच्छा लगे करो, लेकिन हर वक्त चैतन्य रूप में, बिना होश खोए. पियो इसलिए नहीं कि होश खोना है, इसलिए पियो कि होश का विस्तार करना है”

मैं तो स्वामी जी का इतना मुरीद हुआ कि आनंद की महाअवस्था में उनको गुरु मान खुद को उनका शिष्य घोषित करा बैठा और उनने उसी रौ में कर दिया दीक्षित, मध्य रात्रि के वक्त मेरा नामकरण किया- स्वामी प्रेम संतति!

पूरी रात सोते वक्त सपने देखता रहा कि मैं यानि स्वामी प्रेम संतति, सतत प्रेम करते हुए दुनिया के कई देशों को दुखों से मुक्त कर मस्ती के धागे में पिरो रहा हूं.

समझ ये आया कि संन्यासी या संत या स्वामी बनने की क्रिया तो बेहद निजी होती है लेकिन जब आप बन जाते हैं तो फिर सार्वजनिक यानि सबके सुख के लिए समर्पित हो जाते हैं. अत्यंत अंतर्मुखी से उदात्त बहिर्मुखी.

क्या ऐसा है?

बस यूं ही एक विचार आया, और एक विचार के एक ही डायमेंशन होगा, इसलिए यह कंप्लीट नहीं हो सकता क्योंकि यह ब्रह्मांड थ्री डी, फोर डी, सेवेन डी तो छोड़िए अनंत डी से निर्मित है, इसलिए विचार, जो कि वन डी होते हैं, कभी कंप्लीट नहीं हो सकते.

हर विचार इसीलिए अभिव्यक्त के योग्य होता है क्योंकि उसमें अथाह अधूरापन सन्निहित होता है. पूर्ण विचार अव्यक्त होते हैं.

ऐसा क्या?

हां जी.

जय हो.

वीडियो नीचे है, क्लिक करें>

 

 

https://www.youtube.com/watch?v=-OlZbU_4CM0

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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मांस मदिरा से मोक्ष तक की बात करने वाला एक बुजुर्ग OSHO पंथी संन्यासी (देखें वीडियोज)

Yashwant Singh : OSHO मांस मदिरा से मोक्ष तक, एक बुजुर्ग ओशो अनुयायी संन्यासी का दर्शन प्रवचन देखें सुनें… ओशो कह गए, संभोग से समाधि तक. उनके हाथों दीक्षित एक बुजुर्ग ओशो अनुयायी कह रहे हैं मांस मदिरा से मोक्ष तक. लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार Kumar Sauvir के ठिकाने पर एक शाम फक्कड़ों की हुई जुटान में इस ओशो पंथी संत से मांस मदिरा उत्सव के दौरान इस विषय पर हुई बेबाक बातचीत को मैंने छह पार्ट में मोबाइल से रिकार्ड किया.

जरूर देखने सुनने लायक है ये वीडियो, नीचे क्लिक करें>

https://goo.gl/YXYl66

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संबंधित अन्य वीडियोज ये रहे…

https://www.youtube.com/watch?v=d6CorFD0Pqs

https://www.youtube.com/watch?v=WmAg1rFIUlg

https://www.youtube.com/watch?v=uKyCfbpsYP0

https://www.youtube.com/watch?v=sg5jpC74mXg

https://www.youtube.com/watch?v=-pvLSYRkMKY

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https://www.youtube.com/bhadas4media

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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व्यापमं में उलझे शिवराज का मकसद था मोदी को खुश करना : थानवी

भोपाल। वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने विश्व हिंदी सम्मेलन को वैभवशाली बनाए जाने पर कहा है कि इस सम्मेलन को वैभव देकर और पूरे शहर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरों से रंगकर व्यापम घोटाले में फंसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मोदी को खुश करने की कोशिश की है। प्रदेश की राजधानी भोपाल में चल रहे 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन में हिस्सा लेने आए पत्रकार ओम थानवी ने कहा, “इस सम्मेलन की मुश्किल यह हो गई कि शुरुआत से ही इसका मकसद यह हो गया कि राज्य सरकार और मुख्यमंत्री शिवराज प्रधानमंत्री मोदी को प्रभावित करेंगे, क्योंकि वे खुद व्यापम घोटाले में फंसे हैं और अगर अपने माई-बाप को प्रभावित करते हैं तो थोड़ा सा तो बचाव है।”

थानवी ने कहा, “आप देखिए न, हवाईअड्डे से लेकर पूरा शहर प्रधानमंत्री की तस्वीरों से पटा पड़ा है। इसमें मुख्यमंत्री अपनी तस्वीर नहीं लगा सकते तो एक संगठन का जिक्र किया गया है, एक ऐसा हिंदी प्रेमी संगठन जिसका कभी नाम नहीं सुना गया।”

उन्होंने कहा कि हिंदी बड़ी भाषा है और इस तरह के आयोजन से प्रोत्साहन मिलता है, मगर इस आयोजन में साहित्य को उतना महत्व नहीं दिया गया, जितना दिया जाना चाहिए था, मगर सिर्फ साहित्य को महत्व दिया जाए यह भी जरूरी नहीं है, क्योंकि हिंदी के जितने क्षेत्र हैं, जैसे- रंगमंच, पत्रकारिता, शिक्षा, शिक्षण कर्म, इन सभी को महत्व मिलना चाहिए, लेकिन सहित्य इनमें सबसे बड़ी चीज है, क्योंकि साहित्य ही भाषा को पहचान देता है।

उन्होंने कहा, “साहित्य कालजयी होता है, पत्रकारिता वक्त के साथ खत्म हो सकती है। साहित्य को सबसे अधिक महत्व मिलना चाहिए जो इस सम्मेलन में नहीं मिला है।”

थानवी ने कहा कि भोपाल में कई प्रतिष्ठित सहित्यकार हैं, जिन्हें महत्व नहीं दिया गया है। गोविंद मिश्र, रमेश चंद्र शाह जैसे लोग अगर आयोजन में न दिखें तो लगता है कि साहित्य की उपेक्षा हुई है। इसकी वजह नौकरशाहों की कार्यप्रणाली नजर आती है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “आयोजन में वही हिंदी सेवी नजर आ रहे हैं जो पिछले सम्मेलनों में दिखते रहे हैं, सवाल उठता है कि क्या देश में और लोग तैयार नहीं हो रहे हैं? नए लोगों की बात सुनी और समझी नहीं जाना चाहिए। इस सम्मेलन में विषय तो ठीक हैं, मगर बोलने वाले ‘फटीचर’ इकट्ठे कर लिए गए हैं, जो हमें भाषा का ज्ञान दे रहे हैं।”

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ओशो के आगे

Yashwant Singh : कुछ नए बदलावों को महसूस कर रहा हूँ। खुद के भीतर। बाहर की दुनिया के प्रति बहुत मामूली जुड़ाव लगाव द्वेष राग शेष है। अंदर की यात्रा शुरू हो गई है। जैसे कोई बीज वर्षों से यूँ ही पड़ा हो और अब अचानक वो धरती से बाहर निकलने को मचल रहा हो। न आगे दौड़ जाने की ख्वाहिश है न पीछे बीते हुए को पकड़े रहने ज़िद। जिस क्षण में हूँ उसी संग प्रवाहित होने की कोशिश है। पहले भागने की सोचता था। पहले गुरु की तलाश में परेशान था। अब सब नियति पर छोड़ दिया है। जाहे विधि राखे राम। लालसाएं कामनाएं इच्छाएं पक कर टपकने लगी हैं। अब कैसे किससे क्यों संवाद करूँ। जो खुद ब खुद मिल रहा है वो अद्भुत अव्यक्त है।

पूरे 2 साल लगे हैं इस बदलाव के उस छोर से इस छोर तक पहुँचने में। बीते 2 सालों में कई बार मरा हूँ, डरा हूँ। केंचुल उतरने की प्रक्रिया का सुख दुःख महसूसा है। अब विराट असीम से एकाकार का वक़्त शुरू हुवा है। ये कोई कहने बताने समझाने की चीज नहीं। पर अभी नयी यात्रा का शिशु हूँ तो हरकतें कुछ न कुछ करूँगा ही। विदेह होने का सुख समझाया नहीं जा सकता। और, विदेह होना कोई ठान लेने से नहीं हुवा जाता। इन्द्रियजन्य और मानवजन्य अनंत जाल हैं जिसमें फंसे रहने को अभिशप्त हैं हम, ख़ुशी ख़ुशी। ये शायद प्रकृति प्रभु असीम ब्रम्हांड की कृपा हो जो नयी यात्रा पे चल पड़ने का प्रसाद मिला है। आप सभी नए पुराने मित्रों का आभार। प्यार। आप उदात्त सन्दर्भ में सब कुछ लें। मगन रहें, जो कुछ भी करें, अच्छा या बुरा 🙂

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जो क्षुद्र के लिए प्यासा होता है, वह क्षुद्र को पाकर भी आनंद उपलब्ध नहीं करता। और जो विराट के लिए प्यासा होता है, वह उसे न भी पा सके, तो भी आनंद से भर जाता है। If the desire is for something insignificant, there will be no joy even if you get it; but if you long for the significant, the ultimate and you don’t get it, then you will be filled with joy even if you don’t get it. -ओशो

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अपनी अवधारणाएं, अपने आग्रह, अपना नजरिया, अपनी खुद की मूर्ति तोड़ छोड़ पाना बहुत मुश्किल काम होता है। ओशो के इस बहुत पुराने और रेयर बताए गए वीडियो को सुनिए। जी हाँ। आँख बंद कर सुनियेगा पहली बार। दूसरी बार भले देखिएगा भी 🙂 https://www.youtube.com/watch?v=FFni_YQ_u6M

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कुछ लोगों को लगने लगा है कि मैं बाबा संन्यासी आध्यात्मिक होने लगा हूं… अरे भाइयों, बाबा संन्यासी आध्यात्मिक तब बना जाए जब इस फील्ड में घुसकर मनमोहक वेष धर कर धंधा पानी करना हो… आंतरिक यात्रा सब करते हैं, कई बेहोशी में तो कुछ होश में. आंतरिक यात्रा सब करते हैं, कई घोषित करके करते हैं, कुछ चुपचाप. आंतरिक यात्राएं हमारे चाहने न चाहने के बावजूद जारी रहती हैं, कभी तेज गति से, कभी सुप्त गति से. आंतरिक यात्राएं कभी कभी मुख्यधारा बन जाया करती हैं जीवन की, वरना बाहरी यात्रा ही मुख्य धारा बनी रहती है. आंतरिक यात्रा के प्रति जब चैतन्य होकर सजग होकर एलर्ट होकर चाहत से भरकर देखने समझने लगते हैं तो नए रास्ते नए दृश्य नया संसार खुलता दिखता महसूस होता है वरना आंतरिक यात्रा की नदी सूखी कृपण उपेक्षित अकालग्रस्त बनी रहती है. और ये कि, आंतरिक यात्रा जबरन स्पीड नहीं पकड़ सकती, यह खुद ब खुद होने लगता है, एक समय एक उम्र एक समझ एक चेतना के बाद.. सो, ये मत समझना कि बाहर की दुनिया पर नजर नहीं है. सब देख सुन रहा हूं जी. हरंम्पना जारी आहे 🙂

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मार्क्स को पढ़ने भर से कोई लेनिन या माओ नहीं बन जाता. क्रांति के जरिए व्यस्था बदल देने वाले लेनिन और माओ ने मार्क्स को खूब पढ़ा-समझा लेकिन मार्क्स के दर्शन को कट्टरपंथी की तरह फालो नहीं किया, जैसे भारतीय मूर्ख कम्युनिस्टों ने किया. लेनिन और माओ ने मार्क्स की आत्मा को समझा और उसे अपने देश समाज काल परिस्थिति के हिसाब से विकसित रूपांतरित परवर्तित संशोधित समायोजित परिमार्जित कर लागू किया. इसी कारण ये दोनों शख्स अपने अपने देशों रूस और चीन में क्रांति करने में सफल हो सके. व्यवस्था को उखाड़ फेंकने में कामयाब हो सके.

ठीक उसी तरह सिर्फ राम, कृष्ण, कबीर, बुद्ध, महावीर आदि भगवानों संतों महात्माओं मनीषियों को पढ़ने भर से आंतरिक यात्रा शुरू नहीं हो जाती. मोक्ष के रास्ते पर चल पड़ना संभव नहीं हो जाता. ओशो ने अपने बेहिसाब किताबों भाषणों प्रवचनों के जरिए धर्म अध्यात्म संतई जीवन आनंद प्रेम आदि की जो व्याख्याएं की हैं, वो अदभुत व अनमोल है. आप एक ओशो को इकट्ठे पढ़ सुन लें तो आपको अलग अलग कई सज्जनों को पढ़ने सुनने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा. लगेगा प्यास तो यहीं पूरी हो गई. सबके सब एक जगह ही मिल गए.

यही कारण है कि मैं ओशो को आजकल दुबारा खूब पढ़ रहा हूं. पहली बार इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ग्रेजुएशन की पढाई के लिए जब पहुंचा था, तब ओशो से किताबों के जरिए संपर्क हुआ था और उनसे जुड़ाव का सिलसिला लंबा चला. ओशो बेमिसाल हैं. लेकिन ओशो के आगे भी जाना है. आगे जाने का मतलब ओशो को पछाड़ना नहीं. ओशो से होड़ लेना नहीं. ओशो ने जिस रास्ते को चलने लायक बनाया, कंकड़ पत्थर मिट्टी गिट्टी सब तोड़ ताड़ समतल किया, उस रास्ते पर चलते हुए आगे उस पहाड़ पर चढ़ने की तैयारी करना जिसके लिए ये सारे रास्ते तैयार किए गए, इतनी सारी तैयारी की गई. ओशो ने ध्यान मेडिटेशन पर जितना काम किया है, वह नाकाफी है. वह शुरुआती है. वह वर्णनात्मक ज्यादा है, वह उत्सवधर्मी ज्यादा है, वह गेटटूगेदर सा है. वह भयग्रस्त भीड़ का समूह में इकट्ठा होकर आत्मविश्वास हासिल करने का प्रयास सा लगता है. गलत बिलकुल नहीं है. बस शुरुआत है. वह प्रथम मंजिल का प्रारंभ है. लेकिन दुर्भाग्य या दुख ये है कि इसी प्रथम मंजिल तक ओशो भक्त पहुंचकर चरम अवस्था तक पहुंचना समझ लेते हैं.

सच कहूं तो ये प्रथम मंजिल, ये प्रथम चरण आपको खुद ब खुद मिल जाता है, अकेले ही, जब आप चैतन्य हो जाते हैं, चाहने की इच्छा से भर जाते हैं, पूर्ण-सा महसूस करने लगते हैं. इस कवायद में आप चाहें जितना नाच गा लें, ध्यान कर लें, उल्लास से भर जाएं. आगे की यात्रा शुरू नहीं होती, बस आप पहले चरण को ही जीते रह जाते हो. आगे के चरण ऐसे हैं जिससे डर लगेगा प्रथम चरण वालों को. मृत्यु, दुख, अंधेरे के साथ जीते हुए आप जीवन, सुख, प्रकाश को महसूस करने लगेंगे. लेकिन यह इतना सामान्य, वर्णनात्मक नहीं है, जितना यहां मैं कह बता पा रहा हूं. यह सपने में पहाड़ से गिरने जैसा है भी और नहीं भी. तो कैसा है यह?

… बताउंगा. थोड़ा वक्त लगेगा. जरूर बताऊंगा. पर क्या आप इसे सिर्फ सुनना जानना चाहते हैं या जीना भी 🙂

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से उनके कई अपडेट्स का संग्रह.

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