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इस संपादक ने की भारत-चीन बॉर्डर की सात दिनी यात्रा, पढ़िए कुछ रोचक प्रसंग

Sudhir Mishra-

दो चीनी सैनिक मुश्किल से दस मीटर की दूरी पर खड़े घूर रहे थे। हम थोड़ा और करीब बढ़े तो उन्होंने अपना कैमरा निकाल लिया और हमारी फोटो खींचने लगे। मुझे बड़ा अजीब लगा, मैने साथ चल रहे सेना के एक अफसर से कहा.. अब आप रोकिएगा मत, चीनियों ने हमारी फोटो ली है, अब हम भी इनकी फोटो खींचेंगे। अफसर ने हंसते हुए कहा कि नहीं नहीं, यह हम दोनों सेनाओं का प्रोटोकॉल है। अगर चीन की साइड से भी बॉर्डर पर कोई आता है तो हम भी उनकी फोटो लेते हैं। देखिए हमारे दो लोग कैमरा और दूरबीन लिए हुए वहां खड़े हैं। मैने देखा कि वाकई में ऐसा ही था। मेजर ने कहा कि वह कुपवाड़ा में रहा है। पाकिस्तानियों को शराब नहीं मिलती थी तो हमसे ही मांगते थे और रात में जब नशे में जाते तो बेवजह फायरिंग करने लगते। इस मामले में चीनी सैनिक बहुत सभ्य और व्यवहार कुशल हैं।

हमारी सात दिन की उत्तर पूर्व यात्रा गौहाटी से चेरापूंजी और फिर चेरापूंजी से गौहाटी , तेजपुर और तवांग से होते हुए 1530 फिर ऊंची हिमालय की चोटी पर खत्म हुई। इस दौरान हमने रोजाना औसतन दो सौ किलोमीटर की पहाड़ों को यात्रा चौपहिया वाहनों से की। मेरे लिए यह बड़ी बात थी क्योंकि देहरादून से मसूरी के चालीस किलोमीटर में ही मुझे कार में उल्टी हो जाती थी। इस डर से मैं कभी पहाड़ों की यात्रा पर नहीं जाता था। पर इस बार एक गोली ने चमत्कार किया। एक भी उल्टी नहीं हुई और अच्छी नींद भी आई। बहरहाल बूमला पास की यात्रा रोमांचक रही।

तवांग से एसएसबी कैंप से करीब दो घंटे चलने के बाद हम बूमला पहुंचे। वहां का तापमान तीन डिग्री था। थोड़े दिन माइनस तापमान रहा करेगा। बहुत सख्त जीवन है यहां तैनात सैनिकों का। मैने सिर्फ एक मोटी शर्ट और डीकैथलान से ली एक जैकेट और जींस पहनी थी। इस जैकेट के बारे में कम्पनी का दावा था कि यह माइनस तापमान में भी ठंड से बचाएगी। जैकेट एकदम खरी निकली। सेना के लोग काफी मोटी जैकेट पहने थे और मेरी एकदम हल्की जैकेट वही काम कर रही थी। इस भारत चीन बॉर्डर तक टूरिस्ट जा सकते हैं।

आमतौर पर वीआईपी टूरिस्ट ही इधर आते हैं। यहां आने के लिए खास परमिट की जरूरत होती है। वहां पहुंचने पर आर्मी के गेस्ट हाउस में हमें गर्मागर्म चाय दी गई जो कप में डालते ही ठंडी हो गई। इतनी ऊंचाई पर सांस लेने में दिक्कत होती है। इस परेशानी से निपटने के लिए हमने एक खास गोली खाई थी जिसने बढ़िया काम किया। कई लोगों का सिर भारी था और उन्हें चक्कर सा आ रहा था। मै एकदम सामान्य था। ऐसी जगहों पर स्वस्थ लोगों को ही जाना चाहिए, यह बात वहां समझ आ रही थी। कुछ देर में आर्मी के लोग हम को लेकर ठीक उस जगह पहुंचे जहां एक बल्ली लगी थी और उस पार चीन का झंडा और उनकी छावनी थी। हमे बताया गया की पहाड़ों की एक एल शेप की पूरी आकृति भारतीय सीमा के भीतर है।

चीन के दावों के बारे में भी उन्होंने बताया। चीन का कहना है कि पूरा अरुणाचल उनका है और भारत ने कब्जा का रखा है। यदा कदा उनकी घुसपैठ होती रहती है। जिसे बहादुर सैनिक रोक देते हैं। उन्होंने दूर पहाड़ी पर लगे एक अत्याधुनिक चीनी रडार के बारे में बताया जो तीस किलोमीटर दूर तक भारतीय सीमा की निगरानी करता है। चीनियों के पास सड़क मार्ग से दो सौ किलोमीटर दूर से आने वाली गाड़ियों का ब्यौरा होता है। जिस दिन गाड़ियां ज्यादा आ जाएं, चीनियों की शिकायत आ जाती है। चीनी सीमा में पर्यटक न के बराबर आते हैं।

सेना के अफसरों ने बताया कि तकनीक और संसाधनों में चीन भले ही आगे हो लेकिन सेना और आम भारतीयों के जज्बे के आगे वो नहीं टिकते। आम चीनियों को बॉर्डर और सेना से वैसा आत्मीय लगाव नहीं क्योंकि वहां हर युवा को पांच साल सेना में रहना होता है। परिवार में एक लड़का या लड़की ही होती है और उसे युवा होते ही सेना ज्वाइन करनी होती है। इस वजह से वो लोग भावनात्मक रूप से वैसे सेना से नहीं जुड़ते जैसे भारतीय जुड़ते हैं। हालांकि सैनिक के तौर पर चीनी बहुत प्रोफेशनल होते हैं। दुश्मनी और दोस्ती दोनों में। वो अगर लड़ते हैं तो अपने देश के आदेश पर, वरना दोस्ताना रहते हैं। लड़ाई के बाद फिर से आमना सामना होने पर मुस्कराते हैं और अपनी चोटें दिखाते हैं जो हमसे उन्हें लगी होती हैं। इस बॉर्डर पर गोली नहीं चलाने का करार है। इसलिए हाथ पांव से ही लड़ाई होती है।

बॉर्डर के जिस हिस्से में हम खड़े थे, वहां फोटो नहीं खींची जा सकती थी। करीब सौ मीटर लंबे इस गलियारे में जयपुर का जंतर मंतर, कोलकाता का विक्टोरिया महल, कथकली नृत्य और स्वर्ण मंदिर आदि के कट आउट लगे हुए थे। यह सैनिकों के उत्साह बढ़ाने के लिए थे। बॉर्डर को ठीक से देखने के बाद हम आर्मी की शॉप पर गए। वहां ऊनी कपड़े, चाय पत्ती और सेवोनियर आदि मिल रहे थे। कुछ खरीदारी की और फिर मेन बॉर्डर के गलियारे से निकलकर उस जगह पर आए, जहां हम कुछ फोटो ले सकते थे। सेना के कुछ जवानों को मैंने अपना यात्रा संस्मरण मुसाफिर हूं यारो भेंट किया और फोटो खिंचवाई।

करीब एक घण्टे तक वहां रहने के बाद हम लोग वापस तवांग शहर की ओर चल पड़े। हम लोग बहुत सुबह सिर्फ एक सेब खाकर निकले थे। अब हमारा नाश्ता रास्ते में पड़ने वाली माधुरी झील के किनारे होना था। पनीर, गोभी और मूली के पराठे, टमाटर धनिया की चटनी, दही और गर्म चाय का थरमस साथ में था। इस झील का स्थानीय नाम कुछ और है। फिल्म कोयला की शूटिंग के दौरान एक गाने का फिल्मांकन यहां हुआ था और उसमे माधुरी दीक्षित ने यहां डांस किया था। इस झील को तभी से माधुरी नाम दे दिया गया। सच कहूं मैने यूरोप और अमेरिका की कई खूबसूरत जगहें देखी हैं पर इतनी सुंदर जगह पर बैठकर इतना बढ़िया नाश्ता कभी नहीं किया था। बादलों की आवाजाही, पहाड़ों का बादलों में ढक जाना और झील में उनका तैरना सबकुछ अलौकिक और दिव्य था।

नूरजहां ने अगर कश्मीर की जगह अगर माधुरी झील के किनारे कुछ वक्त बिताया होता तो वो यहां के लिए भी यही कहतीं जो उन्होंने कश्मीर के लिए कहा था… दुनिया में कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है। वैसे पूरे का पूरा अरुणाचल खूबसूरत है। यहां की पहाड़ी नदियां, झरने और लोग सभी बहुत प्यारे हैं। मेरी यात्रा का यह पड़ाव बेहद खूबसूरत रहा।

गौहाटी से दिल्ली की फ्लाइट में बैठे बैठे लिख रहा हूं तो बीते सात दिन फिल्म की तरह आंखों में घूम रहे हैं। चेरापूंजी का केव गार्डन, सबसे साफ गांव, डौकी नदी और उसके पार के बांग्लादेशी लोग, शिलांग का खूबसूरत वाटर रिजॉर्ट, गौहाटी का कामाख्या मंदिर, देरांग और तवांग की सुंदरता, बौद्ध मठ और सीआरपीएफ, बीएसएफ,एसएसबी और सेना के आत्मीय लोगों का बेहतरीन साथ। हमारे मित्र माहेश्वरी जी जिनका पुलिस फोर्स का अनुभव और अनुशासन अनुकरणीय रहा। अब अगले साल लक्ष्य द्वीप की यात्रा का लक्ष्य है। उससे पहले कहीं सुदूर दक्षिण जाने का मन भी है। यात्राएं चलती रहनी चाहिए क्योंकि हम सब मुसाफिर ही तो हैं यारो…

शहीद जसवंत सिंह का मंदिर

मैंने थेरांग में छोटे छोटे बच्चों को देखा था। कैसे वो सैनिकों को देखकर जोश से उन्हें सैल्यूट कर रहे थे। साथ में कह रहे थे कि देश की सेवा करनी है। आज तवांग में में दाखिल होते ही पंजाब रेजिमेंट के बहादुरों से मुलाकात के बाद जब शहीद जसवंत सिंह का मंदिर देखा था तो समझ आया कि देश भक्ति, वीरता और बहादुरी के यहां मायने क्या हैं। 1962 की लड़ाई के बारे में सेना का दावा है कि गढ़वाली राइफल मैन जसवंत सिंह ने अकेले ही 300 सैनिकों को मार गिराया था।

करीब 72 घंटे तक सोरा और नूरा नाम की दो स्थानीय महिलाओं व दो अन्य सैनिकों की मदद से उन्होंने चीनी सेना को अपनी छावनी में घुसने से रोका रखा। न उनके पास हथियार बचे थे और न खाना पीना, फिर भी वो लड़ते रहे। हथियार खतम होने के बाद चीनियों की मोर्टार पर कब्जा करने के बाद उनके ही हथियार से चीनियों की कब्रगाह तैयार कर दी। आज यहां उनका मंदिर बना हुआ है। पंजाब रेजिमेंट के लोग लोगों को प्रसाद के तौर पर हलवा खिलाते हैं और यहां से गुजरने वालों को मुफ्त चाय और गरम पानी देते हैं।

शहीद जसवंत सिंह को समय समय पर प्रमोशन मिलते हैं। उनकी वर्दी रोजाना धुलती और प्रेस होती है और जूतों पर पॉलिश की जाती है। फिलहाल यहां पंजाब रेजिमेंट देखभाल कर रही है। उन्होंने इस मंदिर को गुरुद्वारे जैसा बनाया हुआ है। यहां आने वालों को महावीर चक्र से सम्मानित शहीद जसवंत सिंह की कहानी सुनाई जाती है। भीतर मंदिर में उनकी मूर्ति लगी है और शौर्य गाथा के बोर्ड लगे हैं।

तवांग शहर में सेना की ओर से एक लाइट एंड साउंड शो होता है जिसमें अरुणाचल प्रदेश की जानकारी के साथ ही शहीद जसवंत सिंह की बहादुरी की किस्सागोई होती है। यहां रहने वालों का मानना है कि जसवंत सिंह आज भी जिंदा हैं और वो अपने एक घर में आते हैं। ऐसी कई किवदंतियां यहां फैली हुई हैं। यहां तैनात होने वाले एसएसबी, बीएसएफ और सेना के जवानों को उनकी बहादुरी की कहानी प्रेरित करती है। यहां इतनी ऊंचाई पर चीनियों से मुकाबला करने में जसवंत सिंह शहीद की शौर्य गाथा एक उत्प्रेरक की तरह काम करती है। उनकी कहानी प्रेरणा देती है कि हालात कितने भी खराब हों, मानव के आत्मबल और साहस से सबका मुकाबला संभव है।

सुधीर मिश्र नवभारत टाइम्स के संपादक हैं.

सौजन्य- एफबी

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1 Comment

1 Comment

  1. Santosh

    October 16, 2023 at 11:18 am

    बंधुवर सफर में उल्टी नहीं होने वाली गोली का नाम भी बता देते
    डॉक्टर की फीस भी बच जाती

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