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साहित्य

जीत की चाहना से लथपथ इस संसार में, एक सुंदर दृश्य की तरह उगता है हारा हुआ पुरुष (कविता)

बाबुषा कोहली-

हारे हुए पुरुष में होती है कोई बात
कोई ऐसी चीज़ जो उसे आकर्षक बना देती है

नहीं, यह हताशा नहीं है
जो किसी सताई हुई स्त्री के अहं को पोषण दे
बहुत आसान है सताई हुई स्त्री के अहं को पूरना
हताश पुरुष को क्रोध में लाना और भी आसान

हारा हुआ पुरुष, बस ! हारा हुआ होता है
पौरुष के अतिरिक्त भार से मुक्त
अपने व्यक्तित्त्व के स्त्री-तत्त्व के थोड़ा और निकट

कभी-कभी उस बच्चे की तरह दिखता है हारा हुआ पुरुष
जो किसी और ही लोक की ज़ुबान में अपनी बात
कह कह कर थक चुका है
और अब सो जाना चाहता है कुछ देर को

कोई पुरुष शांत दिखे और अकेला भी
ज़रूरी नहीं तब वह शांति में है
बहुत मुमकिन है कि वह लड़ रहा हो कोई जंग चुपचाप
लड़ता हुआ पुरुष अक्सर अपने चारों ओर खींच लेता है
एक कँटीली बाड़ और अकेला हो जाता है
और और और अकेला

यह हारा हुआ पुरुष है
जो अपने कवच से बाहर निकल जाता एकाएक
हो जाता थोड़ा बेध्य
प्रेम को ग्रहण कर सकने के लिए थोड़ा तैयार

हारा हुआ पुरुष बहुत बोलता नहीं
फिर भी सीख लेता दुनिया की सबसे सच्ची भाषा
बिना किसी जतन के

देह ऊपरी बात है; कपड़े तो और भी बहुत ऊपरी
जीतने की वासना से भरा हुआ पुरुष किसी स्त्री को
निर्वस्त्र कर सकता है; नग्न नहीं
हारे हुए पुरुष के सामने स्वतः खुल जाता है
भरी छाती वाली स्त्री का हृदय

जीत की चाहना से लथपथ इस संसार में
एक सुंदर दृश्य की तरह उगता है हारा हुआ पुरुष
जैसे पथरीली ज़मीन पर बिना किसी तैयारी के उग आता
कोई हरा बिरवा

या सूखे घास की नोक पर टिक जाती
ओस की एक बूँद

हारा हुआ पुरुष
बहुत सारे हो-हल्ले के बीच
बहुत धीमी आवाज़ में उच्चारा गया
तुतलाता-सा कोई शब्द है

जिसे बड़ी आसानी से सुन लेती है कोई भी
भरी छाती वाली स्त्री


बाबुषा
नवम्बर,२३

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