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प्री-वेडिंग : दौलत का दम दिखाता प्रयोजन और कंटेंट का भूखा मीडिया

सुशोभित-

धनकुबेर ने भारतवासियों को एक नया शिगूफ़ा दिया- प्री-वेडिंग। रोका-तिलक नहीं, सगाई नहीं, विवाह-पूर्व नक़ली और फिल्मी फ़ोटोशूट भी नहीं- वो तो सब अपनी जगह पर होंगे ही, और शादी जब होगी तब होगी। यह प्री-वेडिंग है। प्रयोजन? बस यों ही, दिल बहलाने के लिए, दौलत का दम दिखलाने के लिए। और हाँ, इलेक्टोरल बॉन्ड पर अदालत ने रोक लगा दी है ना। तो चुनाव के लिए जो पैसा निकाल रखा था, उसको प्री-वेडिंग में लगा दिया। हाथ में लिया पैसा फिर से जेब में नहीं रखते, अपशगुन होता है।

कंटेंट के भूखे मीडिया और सोशल मीडिया की बाँछें खिलीं। उसके सुरसा-मुख को तीन दिन की दावत मिली। मीम इंडस्ट्री मुस्कराई। ऊबी हुई जनता ने कहा, चलो इस सप्ताहान्त यही कौतुक। आईपीएल जब होगा, तब होगा। चुनाव में नेता नित-नई लीलाएँ रचकर जब मनोरंजन करेगा तब करेगा। कोई नई पिक्चर भी नहीं लगी है तो यही ठीक। दिल लगा रहना चाहिए। कोई परग्रही दूसरी गैलेक्सी से भटककर यहाँ चला आये तो समझेगा कि आज भारत-देश का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि दिल कैसे बहलायें। मनोरंजन की प्यास बड़ी है। और अतिरंजनाओं की क्षमता अगाध है। नाटकीयता- जितना अधिक उतनी भली। पीआर एक्सरसाइज़ चलती रहनी चाहिए। इमेज मेकओवर हो तो सोने में सुगंध। कैमरा सब जगह साथ जायेगा। भोजन परोसने से लेकर आँसू बहाने और गीत गाने तक हर क्षण को फिल्माया जायेगा। भारत चोपड़ा-जौहर-बड़जात्याओं की एक कभी न ख़त्म होने वाली फिल्म का नाम है।

जिसके पास ज़्यादा पैसा आ जाता है, वह सोचता है कि अब उड़ाऊँ कैसे, और वैसे कैसे उड़ाऊँ कि दिखाऊँ भी। उड़ाने और दिखाने के नित-नये बहानों में यह नया वाला है। देश के हर शहर के छुटभैये रईसों में प्री-वेडिंग का चलन अब आप आने वाले समय में देखेंगे। चट मंगनी पट ब्याह के दिन गए। दो फूलमालाओं में विवाह और एक धोती में विदाई अतीत की बात हुई। महात्मा गांधी समझा-समझाकर हार गए कि किफ़ायत से जीयो, मितव्ययी बनो। शाहख़र्ची बुरी है। आधुनिक इकोनॉमी कहती है कि बाज़ार में पैसा जितनी तेज़ी से घूमता है, उतना अच्छा।

लेकिन नीतिशास्त्र कहता है कि पैसा बाज़ार में जितनी तेज़ी से घूमेगा, समाज का उतना ही नैतिक-पतन होगा, लोगों में कलुष, विषाद, प्रदर्शनप्रियता, ओछापन बढ़ेगा। ​विषमताओं की विसंगतियाँ गहरायेंगी। संसाधनों पर नाहक़ दबाव पड़ेगा। अति-विलासिता शरीर के लिए बुरी है और मन के लिए तो त्याज्य।पर अब तो मजमेबाज़ी का दौर है। हर वस्तु का अश्लील प्रदर्शन करना ज़रूरी है।

विवाह के निजी क्षण को कारोबार और तमाशा बनाना कोई भारतीयों से सीखे। 130 अरब डॉलर सालाना की वेडिंग इंडस्ट्री है भारत में, और दूसरी तरफ़ ग़रीबी, भूख, शोषण के विकृत प्रतिरूप हैं। मानव-सूचकांकों पर शर्मनाक स्थिति है। सार्वजनिक शिक्षा और लोक-स्वास्थ्य के हाल बदहाल हैं। मैन्युफैक्चरिंग के अमृतकाल में नई सड़कें, बंदरगाह, हवाई अड्डे और मंदिर बन रहे हैं, पर स्कूलों में योग्य शिक्षक और अस्पतालों में उम्दा दवाइयाँ नहीं हैं। भारत एक ऐसे उघड़े घाव की तरह है, जिसे गोटे-झालर, फूल, सोने के वरक़ से सजा दिया गया है।

उपभोग ने राष्ट्रीय चेतना को आच्छादित कर दिया है। गले-गले तक भकोस लेना ही नया युगधर्म है। दिन में चार बार कपड़े बदलने वाला नेता ग़रीबों से वोट माँगता है और पूँजीपतियों से दोस्ती निभाता है। शायद चुनाव-प्रचार में व्यस्त होने के कारण नेता प्री-वेडिंग में नहीं जा पाया, पर उसकी बारात में धनकुबेर नोट ज़रूर बरसायेगा- इलेक्टोरल बॉन्ड नहीं तो किसी और ज़रिये ही सही- यार की जो शादी है!

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